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धोनी रांची में नहीं, हमारी कहानियों में रहता है!

महेंद्र सिंह धोनी ने अचानक अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले लिया। सब हैरान रह गए। उनके खेल पर यह लेख लिखा है शंपा शाह ने। शंपा जी जानी-मानी लेखिका हैं, कलाकार हैं, अनुवाद करती हैं। यह लेख पढ़िए-

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किसी लेखक का  काम ही लिखना है। वह कहानी लिखे तो इस पर आश्चर्य की कोई बात नहीं। उसकी कल्पना को  बड़ा सामान्य सा किरदार या घटना भी जगा सकती है। खास बात तो तब होती है, जब कभी समाज का एक बड़ा हिस्सा अचानक कहानियां गढ़ने लगे। पूरे समाज की कल्पना को जो पर लगा दे वह नायक कहलाता है। उसकी कहानी दरअसल विधिवत लिखे जाने के बहुत पहले कई-कई बार लिखी जा चुकी होती है। लिखी नहीं, बल्कि कही जा चुकी होती है। कही नहीं, बल्कि सुनी जा चुकी होती है। सुनी और कई-कई बार सुनाई जा चुकी होती है।

ऐसे नायक की कहानी बरसों बरस, हर दिन, कई लोगों की ज़ुबानी, शहर के किसी चाय के टपरे पर,  किन्हीं कस्बाई खेल के मैदानों में, अकारण हंसती लड़कियों की टोली में, एक ही अख़बार को सुबह से शाम तक चाटते और उसकी जुगाली करते बूढ़ों के समूह में,  उन सब युवा या अधेड़ हो चले लोगों, जो जिंदगी की शुरुआत में कुछ कर गुजरने, ईमानदार जीवन जीने का स्वप्न देखना चाहते हैं या उस स्वप्न से ख़ुद को  भटका हुआ पाते हैं, के दिलों में लिखी जाती है। पिछले डेढ़ दशक में महेंद्र सिंह धोनी ने इस देश के जन मानस को जितनी कल्पना की उड़ान और कहानियां दी है, उतनी शायद ही किसी और ने दी हो। धोनी जितना यथार्थ हैं, उतना ही हमारी कल्पना से गढ़ा हुआ। वे सिर्फ रांची में नहीं, लोगों की  फिर-फिर सुनाई जाती कहानियों में भी रहते हैं!

ज़रा सुनिए इन कहानियों को जो असल भी हैं और दर-असल भी!

हमारी यानी मानव आँख को झपकने में .04 सैकंड का समय लगता है, लेकिन धोनी ने वेस्ट इंडीज़ के कीयो पॉल को .08 सैकंड में स्टंप कर पैविलियन की राह दिखा दी थी। बिजली सी फुर्तीली स्टंपिंग का  यह कारनामा  उनके हाथों एक नहीं सैकड़ों बार नुमायां हुआ है।

ओलिंपिक और  कितनी ही दौड़ों में स्वर्ण पदक जीतने वाले उसान बोल्ट दुनिया के सबसे तेज धावक हैं। लेकिन विकेट के बीच की बाईस गज की दूरी को जिस तेज़ी से धोनी नापते हैं, उससे हिसाब लगाने पर धोनी बोल्ट को पीछे छोड़ देते हैं, वह भी मय भारी बल्ले के और हां, पैड पहन कर! (लेकिन जैसा कि धोनी कहते हैं ‘सब कुछ हमारे हाथ में नहीं होता’। इसे विडम्बना कहिए या खेलों का खेल, इस खिलाड़ी के जीवन की पहली और अंतिम अंतरराष्ट्रीय पारी में वह रन आउट करार दिया गया – इतिहास में यही दर्ज़ होगा।)

बीसियों बार वह दूर जा चुकी लहर-सी जीत को अंतिम क्षण में रिझा कर अपने साथ खींच लाया है।

लेकिन असंख्य कहानियों का नायक वह इन हैरतंगेज़ कारनामों की वजह से नहीं है। कहानी का नायक वह इसलिए है कि अंतिम क्षण तक सब कुछ को दांव पर लगाने के बाद यदि जीत लहर सी दूर निकल गई तो वह उसे फौरन दूसरे की जीत और इस तरह खेल की अनिवार्य शर्त की तरह स्थितप्रज्ञ बालक सा देख पाता है। ऐसे मौकों पर उसके मुंह से गुस्से या हताशा के उद्गार विरले ही किसी ने देखे हों। इत्मीनान के डग और लंबी सांस भरता, वह बच्चों की स्निग्ध मुस्कान के साथ टीम के युवा गेंदबाजों के पास जाता है और अगले किसी मैच में फेंकी जा सकने वाली किसी गेंद की बात करने लगता है। उसके ऐसा करने से उन सारे युवा खिलाड़ियों के कंधों पर आ झुका तनाव ढील जाता है और आंखें फिर उम्मीद से जगमगा उठती हैं।

वह नायक इसलिए है कि 2011 का वर्ल्ड कप जीतने की स्थिति में भी उसके चेहरे और शरीर के हाव-भाव में कोई खास फर्क नहीं दिखा था। वही मुस्कान, तनाव रहित कंधे और इत्मीनान के डग भरता वह विश्व कप उठाता है और ला कर टीम के दूसरे खिलाड़ियों के हाथ में थमा उस ऐतिहासिक दिन खिंचने वाली तमाम तस्वीरों के फ्रेम से लगभग गायब हो जाता है। अगले दिन अख़बार में छपी तस्वीर में लोग जीत दिलाने वाले कप्तान को खोजते हैं और अंतिम कतार में टीम के फिजिशियन के पीछे से उसका आभास भर पाते हैं। ऐतिहासिक छवि से नदारद कप्तान कहानी का नायक बन लोगों की जुबां से बयां होता है।

ग़ौर करने की बात है कि महेंद्र सिंह धोनी जब भारतीय टीम में आता है तब टीम में क्रिकेट इतिहास के कुछ सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी भारतीय एकादश में खेल रहे थे- लक्ष्मण, द्रविड़, गांगुली, सचिन, सहवाग, अनिल कुंबले। कपिल देव जब भारतीय टीम में कदम रखते हैं तब भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी- विश्वनाथ, वेंगसरकर, गावस्कर, अमरनाथ, आदि।

इन दोनों नामावलियों का क्या कहना- इनमें से प्रत्येक एक चमकता नगीना है। इनके अंदाजे बयां का क्या कहना। दुनिया इनकी विरुदावली गाते नहीं थकती। ये सभी बड़े शहरों से (अलबत्ता सभी मध्यम वर्गीय परिवारों से) आए थे। इन्हें ठीक-ठाक ट्रेनिंग और खेलने के बेहतर अवसर भी मिले। लेकिन चंडीगढ़ और रांची क्रिकेट के गढ़ नहीं थे। कपिल देव और धोनी इन दोनों की खेल शैली के लिए विशेषज्ञ लगातार ‘नैसर्गिक’ या नेचुरल शब्द का प्रयोग करते रहे हैं। यानी जो मंजाई से, ट्रेनिंग से नहीं संवरे। ये ऐसे शॉट्स के लिए जाने जाते हैं जिनका ज़िक्र क्रिकेट की पुस्तकों में नहीं मिलता, जिन्हें कोच किसी खिलाड़ी को नहीं सिखाता।

एक समय तक क्रिकेट के जो असल जानकार और प्रेमी हुआ करते थे, वे  दरअसल टेस्ट क्रिकेट को पसंद करते थे।  उसी को खेल की असल कसौटी माना जाता था। ये लोग जिनमें मैं स्वयं शामिल हूं, एक हद तक क्लासिकी तरीके के क्रिकेट के ही मुरीद होते हैं। लेकिन कपिल देव और धोनी ने हमारे क्रिकेट को खेलने, देखने, समझने के तरीकों में आमूलचूल बदलाव ला दिया। क्रिकेट सदा से ही टीम गेम है लेकिन टीम के हर सदस्य को इन्होंने जिस तरह से जिम्मेदार और ज़रूरी बनाया, उससे खिलाड़ी सचमुच एक टीम की तरह जुटे और इसीलिए इनकी कप्तानी में हमने इक्का दुक्का मैच नहीं, पूरी श्रृंखला, पूरे टूर्नामेंट जीते। चाहे छोटे स्कोर को बचाना हो या विशालकाय स्कोर का पीछा करना हो, सब कुछ हमारे लिए संभव हो पाया। टेस्ट मैच क्रिकेट में भी इनकी कोशिश रही कि खेल का नतीजा निकले यानी वह ड्रॉ न हो ताकि हार जीत के परे खेल की मूल आत्मा बची रहे।

आपको ख्याल होगा कि ‘लगान’ फिल्म में गांव की टीम के खिलाड़ी जिस अंदाज़ से बल्ला घुमाते, गेंद लपकते हैं, उसमें तकनीक है ही नहीं, वे तो जज्बे से ही मैच खेलते और जीतते हैं। सच पूछिए तो धोनी का प्रसिद्ध हेलीकॉप्टर शॉट कुछ उसी अंदाज़ का शॉट है, वह जज्बे से और ताक़त से खेला जाता है। ऐसे मौकों पर कमेंट्री कर रहे विशेषज्ञ बोलते पाए जाते हैं – ‘पता नहीं इस शॉट को क्या कहा जाए? इसे पहले कभी देखा याद नहीं आता, पर कमाल का शॉट है, गेंद क्या दनदनाती हुई मैदान के बाहर गई है!!’

जहां ट्रेनिंग का महत्त्व है, वहीं नवाचार का, बेखौफ सोचने-करने का अपना महत्त्व है। हमारी शिक्षा प्रणाली केवल औसत, काम चलाऊ, क्लर्की दिमाग और एक कतार में चलने वाली पीढ़ियां तैयार करने में विश्वास करती आई है। और तिस पर लंबी गुलामी से भोथरा हो चला दिमाग कुछ भी अपने मन से करने में डरता है। हम हूबहू अंग्रेजों की नकल कर किसी तरह उन जैसा दिखना चाहते हैं ताकि वे हमें गया गुज़रा न समझें। हम अपने लिए और अपनी तरफ से सोच ही नहीं पाते।

‘गुलाम दिमाग का छेद’ जिसे किशन पटनायक कहते हैं, उसका असर हमारे समाज के हर क्षेत्र पर है। हम त्रिशंकु की तरह अभिशप्त, अधर में लटके हुए हैं। न हममें  कायदे-कानून, कार्य पद्धति, शोध वृत्ति  के प्रति उन जैसा जज्बा है और न ही हमने अपनी पुरानी प्रविधियों को झाड़ फूंक कर पुनर्नवा किया है। परंपरा के नाम पर हम अभी भी भोडी बैंड बाजा बारात लेकर दुल्हन लाने जाते हैं। हमारे लिए यह मूलतः दुनिया को अपनी शान दिखाने का मौका है। इसीलिए हड़कंप मच जाता है जब अपने विवाह पर धोनी अपने इने-गिने चार दोस्तों भर को बुलाता है, अपनी टीम के सारे सदस्यों तक को नहीं बुलाता! सब नाराज़ हो जाते हैं लेकिन धोनी के लिए यह साफ है कि शादी कम से कम टीम का मामला नहीं है!

धोनी विकेट कीपर-बल्लेबाज हैं। विकेट कीपिंग के क्लासिकी अंदाज़ का भी धोनी में अभाव पाया गया था। इधर जानकार इस पर खेद मना ही रहे थे कि उसी बीच उसने विकेट कीपिंग पर पुस्तक में लिखीं तमाम बातों को नए सिरे से लिख डाला। क्रिकेट के दिग्गज ही नहीं, निखालिस भौतिकी का सिद्धांत बताता है कि तेज़ रफ्तार गेंद को कैच करते समय अपनी हथेलियों से बने प्याले को पीछे लाना होगा ताकि गेंद के धक्के को सोखा जा सके और वह उछल कर फिर से बाहर न कूद जाए। लेकिन भौतिकी को लगभग धता बताते हुए धोनी गेंद को लपकते समय हाथों को आगे को ले जाते हैं, जिससे वे पल का कुछ हिस्सा कमा लेते हैं और बल्लेबाज को स्टंप आउट कर देते हैं। लेकिन ज़ाहिर है कि भौतिकी का नियम तो नियम है, इसलिए हाथों की ग्रिप इतनी लूज़, इतनी शिथिल करनी ही होगी कि गेंद टकरा कर वापस न उछले।

स्टंप के पीछे धोनी कहां खड़े हैं इसका इतना सटीक अनुमान उन्हें होता है कि सीमा रेखा से थ्रो आने पर वे बिना विकेट की तरफ देखे, पलटे, उलट दिशा से गेंद मारते हैं और खिलाड़ी रन आउट करार दिया जाता है। रन आउट और स्टंपिंग के धोनी से जुड़े लाजवाब और इतने सारे किस्से हैं कि एक पूरी किताब इनको समर्पित हो सकती है। आईपीएल के एक मैच में धोनी ने अपनी विकेट कीपिंग के तरीके में एक और हैरतअंगेज कारनामा जोड़ लिया। विशेषज्ञों ने बाद में इसे पाइथोगोरस की थ्योरम की मदद से समझाया। विकेट के पीछे खड़े धोनी के हाथ तो कैच लपकने की ही मुद्रा में झुके रहे लेकिन दायां पैर 90 डिग्री के कोण पर जा उठा और उसने निश्चित चौके के लिए जाती गेंद को रोक लिया! शिव की तांडव नृत्य मुद्रा की याद दिलाती इस भंगिमा को देख लोग सकते में आ गए। और तब से हर गली मोहल्ले में बच्चे इसका अनवरत अभ्यास कर रहे हैं।

क्रिकेट हाथ पैरों से ही नहीं, मूलतः तो दिमाग से खेला जाता है इसका ठोस अहसास भी धोनी ने ही करवाया। अपनी टीम का गेम प्लान बनाने के साथ-साथ, दूसरे की योजना को भांपना, उसे पहले से पढ़ पाना और अपनी योजना में उस मुताबिक किसी भी क्षण फेर बदल कर पाना ही धोनी को कप्तानों का कप्तान बनाता है। ‘कप्तान कूल’, ‘धोनी टच’, ‘धोनी रिव्यू सिस्टम’ ये उपाधियां यूं ही नहीं बन गईं। ऐन उत्तेजना के मौके पर, कंधों को ढीला छोड़, लंबी सांस भर उसका दिमाग़ दूसरों से कुछ कदम आगे सोच पाता है और कुछ अलग कर भी गुजरता है। देश के ही नहीं, दुनिया के तमाम खिलाड़ी उसकी कप्तानी में खेलना, उस जैसा बनना चाहते हैं। आई.सी.सी. की वर्ल्ड इलेवन में आठ साल तक धोनी का नाम आया और पांच बार तो बतौर कप्तान।

सैकड़ों वर्षों की गुलामी जिस देश ने सही है और फिर वह समाज जहां गैर-बराबरी घर से लेकर हर सामाजिक संस्थान में व्याप्त है, वहां इस खिलाड़ी ने अपने पदार्पण के दिन से ही दुनिया को बराबरी से देखने का माद्दा दिखाया है। बिना आक्रामक हुए और बिना अत्यधिक नम्र हुए धोनी दूसरे की आँख से आँख मिला, मुसकुरा कर हाथ मिला पाता है। सन् 2008 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेले गए मैच की वह घटना ही देखिए।

ऑस्ट्रेलिया को दो सौ के अंदर आउट करने के बाद हम आसानी से मैच जीतने के कगार पर थे। सिर्फ 10 रन दूर थे कि धोनी ने ग्लव्ज बदलने का इशारा किया। सब जानते हैं कि मैदान में ऐसा प्रायः कप्तान अपना कोई संदेश भेजने के लिए करते हैं। धोनी तो स्वयं ही मैदान पर थे, वे पैविलियन में बैठे खिलाडियों को क्या संदेश भेज सकते हैं, उनकी तो अब कोई भूमिका ही नहीं है? बहुत बाद में जा कर कप्तान के भेजे इस संदेश का खुलासा हुआ। धोनी ने संदेश भेजा कि जीत की ख़ुशी का कोई खास इज़हार न किया जाए।  जीत को ऐसे लिया जाए कि जीतना तो एक सामान्य सी बात है, गोया कि अब तो ऐसा होता ही रहेगा! उन दिनों ऑस्ट्रेलिया को हराना, वह भी उनके मैदान पर असंभव था। भारतीय टीम के जीत के इस इत्मीनान भरे इज़हार ने  ऑस्ट्रेलिया के खिलाडियों की नींव हिला दी थी ऐसा उनमें से कई ने बाद में माना।

किसी से न खौफ खाना, न किसी पर रौब जमाना, ये सचमुच एक आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व की पहचान है। मैदान से बाहर के धोनी से जुड़े सैकड़ों किस्से उसकी इसी खूबी को बिंबित करते हैं, जिनके चलते वह आज भी अपने स्कूली दोस्तों, पुराने चायवाले, रांची स्टेडियम के गार्ड आदि से सहज, निसंकोच मिल पाते हैं, बिना उनके भीतर हीनता बोध पैदा किए। वह उनके साथ ज़मीन पर बैठ कर खाते हैं, अपनी प्लेट ख़ुद धोते हैं। पर सच पूछो तो इसमें इतनी बड़ी बात क्यों है? क्या बड़ा आदमी आदमी नहीं रह जाता या कि उसे सच्चे मित्रों की दरकार नहीं रहती? लेकिन हम ग़ैर बराबरी के इतने आदी हो चुके हैं  कि बराबरी के बर्ताव को पचा ही नहीं पाते। हम या तो पैर छूना, आशीर्वाद पाना या फिर पैर छुआना और आशीर्वाद देना चाहते हैं। इसलिए धोनी के बराबरी के आत्मीय किस्से  हमारे लिए विरल अजूबा हैं।

जब राजदीप सरदेसाई ने धोनी से पूछा कि वर्ल्ड कप जीतने की कगार पर खड़े उस मैच के अंतिम ओवर को खेलते हुए आप पर कितना प्रेशर था तो जवाब में धोनी ने कहा “ये सोचिए कि उस गेंदबाज पर कितना प्रेशर होगा जो मुझे गेंद डालने जा रहा था!” उस ऐतिहासिक वर्ल्ड कप, जिसे धोनी के छक्के से हमने जीता था को देखने के बाद, सुनील गावस्कर जब धोनी से मिले तो उन्होंने कहा ” मैं अपने अंतिम क्षण पर इस शॉट को देख धरती से अलविदा कहना पसंद करूंगा क्योंकि आपका यह शॉट मेरे चेहरे पर मुस्कान ले आता है और मैं मुसकुराते हुए धरती से विदा होना चाहता हूं।”

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2 comments

  1. बहुत ही उम्दा लेख।

  2. शम्पा जी का यह लेख उनके क्रिकेट प्रेम को दिखाता ही हैं साथ ही धोनी को जिस नज़र से शम्पा जी ने खेलते हुए देखा हैं वह स्वयं हर हाल में सहज ,सरल दिखने और उसी अंदाज़ से खेलने वाले धोनी जी ने भी नहीं देखा होगा। यह लेख भारतीय क्रिकेट टीम के भूतपूर्व कप्तान धोनी जी को तो हर हाल ही में पढ़ना चाहिए क्योकि हिंदी में उनके क्रिकेट के गुर,महत्त्व पर लिखा यह एक बिरला लेख हैं। यह लेख कलम से नहीं बल्कि क्रिकेट पीच पर कई या लगभग हर मैच जिसमे धोनी खेले हों को घंटों नज़रें गढ़ाए  देखने के बाद ही लिखा जा सकता हैं। यह लेख सिर्फ धोनी पर ही नहीं बल्कि क्रिकेट की समग्रता (धोनी की उपस्थिति ) को उसके रोमांच को शिथिल नहीं होने देता हैं। जिस तरह चित्रकार हुसैन अपने जीवन (पीच) और केनवास पर अपनी कलाकारी से आश्चर्यचकित करते थे ठीक वैसा ही जादू और सहजता मुझे धोनी में देखने को मिलती हैं। बड़प्पन की यह सहजता अब तो और भी दुर्लभ होती जा रही हैं ,शम्पा जी को बधाई 

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