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भगत सिंह को बचाने वाली दुर्गा भाभी की कहानी

त्रिलोकनाथ पांडेय आजकल अपने उपन्यास ‘चाणक्य के जासूस’ के कारण चर्चा में हैं। वे भारत की गुप्तचर सेवा के आला अधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने दुर्गा भाभी पर यह लिखा है। दुर्गा भाभी का नाम क्रांतिकारी आंदोलन में प्रमुखता से लिया जाता रहा है। भगत सिंह को गिरफ़्तारी से बचाने में उनकी भूमिका भी अहम थी। उनके बारे में त्रिलोकनाथ जी का लिखा पढ़िए-

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19 दिसम्बर, 1928 लाहौर रेलवे स्टेशन पर भारी गहमागहमी थी. जबरदस्त ठंढ के बावजूद पिछले दो दिनों से तमाम पुलिस वाले स्टेशन पर तैनात थे. इनकी नजर खास तौर से लाहौर रेलवे स्टेशन से छूटने वाली ट्रेनों पर थी. वे कुछ खास नौजवानों को खोज रहे थे.

     17 दिसम्बर 1928 को प्रशिक्षु युवा पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स (सहायक पुलिस अधीक्षक, लाहौर) की हत्या दो युवकों ने सरेआम गोली मार कर कर दी थी. जब सांडर्स का हमराही हेड कांस्टेबल चानन सिंह ने इन युवकों का पीछा करने की कोशिश की तो उनके दो अन्य साथियों ने उसे गोली मार कर घायल कर दिया और चारो फरार होने में सफल हो गये. उन चार युवकों में एक सिख युवक भी था जो उनका सरदार (नेता) था.

     पुलिस को शक था कि चारो युवक लाहौर शहर से बाहर भाग सकते हैं. इसलिए पूरे शहर में नाकेबंदी की गयी थी. लगभग चार सौ पुलिस वाले जगह-जगह तैनात थे. उनमें ज्यादातर बावर्दी थे. उन्हीं में से कुछ बिना वर्दी के थे, जो सीआईडी वाले थे और छुप कर खुफियागीरी कर रहे थे. पुलिस वालों को उस सिख युवक पर ख़ास नजर रखने को कहा गया था, जो उन चारों युवकों का सरदार था. .

     लाहौर से बाहर जाने के लिए टिकट लेने वालों और रेलगाड़ी में सवार होने वालों से पुलिस कड़ी पूछताछ कर रही थी. इसी दौरान एक अभिजात्य एंग्लो-इंडियन युवक से भी पुलिस पूछताछ करने लगी, लेकिन युवक के अंग्रेजी बोलने के लहजे, अंग्रेजी रंग-ढंग और कपड़े तथा साथ में संभ्रांत परिवार की बहू-सी दिखने वाली पत्नी और उसकी गोद में एक नन्हे बच्चे को देखकर पुलिस वाले मारे संकोच के पीछे हट गए. युवा दंपत्ति ने हाबड़ा मेल से कानपुर तक के लिए फर्स्ट क्लास के दो टिकट और अपने नौकर के लिए थर्ड क्लास का एक टिकट लिया. रईस युवा दंपत्ति की सुविधा के लिए रेलवे वालों ने उन्हें एक अलग कूपे में यात्रा करने का प्रबंध कर दिया.

     कानपुर उतर कर युवा दंपत्ति अपने नौकर और नन्हें बच्चे के साथ लखनऊ गये. लखनऊ से वे दूसरी गाड़ी से हाबड़ा के लिए प्रस्थान किये और उनका नौकर लखनऊ से बनारस रवाना हो गया. सांडर्स के क़त्ल की वजह से लाहौर से हाबड़ा पहुँचने वाली ट्रेन के यात्रियों की खासा जांच-पड़ताल हो रही थी. युवा पति-पत्नी पुलिस की इस जांच बचना चाहते थे. क्यों? ऐसा क्या इस संभ्रांत दंपत्ति ने कर दिया था?

     सांडर्स गलतफहमी में मारा गया था. मारने वाले असल में जेम्स स्कॉट को मारने चाहते थे, जिसे वे साइमन कमीशन के विरोध का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पर डंडे बरसवा कर मौत के मुंह में धकेलने के लिए जिम्मेदार मानते थे. युवा पुलिस अधिकारी की हत्या सरदार भगत सिंह और उनके साथी शिवराम राजगुरु ने की. इन्हें सहयोग दे रहे थे चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव थापर. सांडर्स की हत्या कर भाग रहे भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने वाले चानन सिंह को गोली मार कर चंद्रशेखर आजाद ने घायल कर दिया ताकि भगत सिंह और राजगुरु सुरक्षित निकल सकें. नौजवान भारत सभा के ये चारों युवा सदस्य अपनी-अपनी साइकिलों से अलग दिशाओं में भाग लिए. पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार वे सभी एक गुप्त सेफ हाउस में मिले. वहां वे दो दिनों तक छुपे रहे और आगे भागने की योजना बनाते और क्रियान्वित करते रहे.

     18 दिसम्बर की रात भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर नौजवान भारत सभा के एक अन्य सदस्य भगवतीचरण वोहरा के घर पहुंचे. सबने अपना हुलिया बिलकुल बदल रखा था. सरदार भगत सिंह की दाढ़ी-मूंछ सफाचट, केश छोटे-छोटे, और पारम्परिक पंजाबी पगड़ी की जगह सिर पर अंग्रेजी हैट.

     भगवतीचरण वोहरा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) गये हुए थे. उनकी पत्नी दुर्गावती देवी, जिन्हें क्रांतिकारियों के बीच दुर्गा भाभी के नाम से जाना जाता था, घर पर अकेली थीं. साथ में तीन साल का छोटा बेटा शचीन्द्र. आगंतुक युवकों में से सिर्फ दो को दुर्गा भाभी पहचान पायीं. तीसरा व्यक्ति अजनबी था. इतनी रात को किसी अकेली औरत का अपने घर में इन युवकों और उनके अजनबी साथी को घुसने देना बहुत हिम्मत की बात थी. जब हैट धारण किये उस अजनबी युवक का परिचय सरदार भगत सिंह के रूप में कराया गया तो दुर्गा भाभी उनके इस बदले हुए रूप को देख कर हैरत में पड़ गयीं.

     क्रांतिकारी साथियों की आर्थिक मदद का दुर्गा भाभी ने तुरंत प्रबंध किया. यही नहीं,  कुंवारे भगत सिंह की बीवी बनकर और अपने नन्हें बच्चे को गोद में लेकर भगत सिंह को यात्रा के लिए अतिरिक्त आवरण (कवर) प्रदान किया ताकि वह पुलिस वालों की आँखों में धूल झोंक कर सुरक्षित भाग निकले.

     इधर चंद्रशेखर आजाद ने रामनामी ओढ़ एक पंडा का रूप धारण कर लिया और दो स्त्री जजमानों को तीर्थयात्रा कराने के बहाने हरिद्वार की ओर निकल भागे. इन दो स्त्रियों में से एक सुखदेव की माँ थी और दूसरी सुखदेव की बहन.

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     दुर्गावती का जन्म एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में 7 अक्टूबर 1902 को हुआ था. यह परिवार बहुत पहले उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी (तत्कालीन इलाहबाद) जिले के शहजादपुर गाँव (तहसील सिराथू) में आकर बस गया था. दुर्गावती के बाबा पुलिस में दरोगा थे और इनके पिता पंडित बांके बिहारी इलाहबाद कलक्टरी कचहरी में नाजिर थे. बचपन में ही दुर्गावती की माँ गुजर गयी थीं और पिता सन्यास ले लिए थे. चूँकि परिवार सम्पन्न था अतः दुर्गावती को कोई परेशानी नहीं थी.

     दस वर्ष की उम्र में ही दुर्गावती की शादी लाहौर के शिवचरण वोहरा के 15-वर्षीय बेटे भगवती चरण वोहरा से हो गयी थी. शिव चरण रेलवे में (संभवतः ठेकेदार) थे और अंग्रेजों ने उन्हें राय साहब के ख़िताब से नवाजा था. सम्पन्न परिवार और अंग्रेजों से अच्छे ताल्लुकात वाले परिवार का होने के बावजूद युवक भगवती चरण अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के लिए क्रांतिकारी कार्यकलापों में भाग लेने लगे थे. उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बीए किया. 1920 में पिता की मृत्यु के पश्चात वे खुलकर क्रांतिकारी कार्यों में भाग लेने लगे. इस बीच, उनकी पत्नी दुर्गावती ने भी संगीत में ‘प्रभाकर’ तक की शिक्षा ग्रहण कर ली और लाहौर के एक बालिका विद्यालय में अध्यापन करने लगीं. पति की क्रांतिकारी गतिविधियों से प्रभावित होकर वे भी उनमें भाग लेने लगीं. 1925 में उन्हें एक बेटा पैदा हुआ, जिसका नाम शचीन्द्र रखा गया. प्यार से सब लोग उसे शचि बुलाते थे.

     1 जनवरी 1925 को बंगाल के क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों के एक संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ बनाया गया था. उसी साल 9 अगस्त को इस संगठन ने काकोरी ट्रेन डकैती कांड को अंजाम दिया, जिसके लिए देश भर से इसके 28 सदस्य गिरफ्तार किये गये. इनमे प्रमुख थे असफाक उल्लाह खां, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिरी, जिन्हें बाद में (दिसम्बर 1927 में)  फांसी दे दी गयी. काकोरी कांड के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन एकदम क्षीण हो गया. इस कमी को पूरा करने के लिए मार्च 1926 में भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह वगैरह ने मिलकर ‘नौजवान भारत सभा’ नामक एक संगठन की. सांडर्स की हत्या के बाद नौजवान भारत सभा भी कमजोर पड़ गयी. 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में फिर से जान फूंकने के लिए कई प्रदेशों के क्रांतिकारियों ने मिलकर चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में दिल्ली में ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ शुरू किया. भगवतीचरण वोहरा ने इस नए संगठन का मेनिफ़ेस्टो तैयार किया. नौजवान क्रांतिकारियों में भगवतीचरण सबसे बड़े बुद्धिजीवी और विद्वान व्यक्ति माने जाते थे.

     इन क्रांतिकारियों के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर दुर्गा भाभी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेती थीं. उन्हें अपने मायके से पांच हजार और ससुराल से चालीस हजार रूपये मिले थे वक्त-जरूरत पर खर्च करने के लिए, लेकिन उन्होंने यह सारा धन क्रांतिकारियों को दे दिया. यही नहीं, जब भगत सिंह और अन्य साथियों पर मुकदमा चलने लगा तो उन्होंने पैरवी के लिए अपने गहने तीन हजार रूपये में बेच दिए.

     1929 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की असलहों की जरूरत को पूरा करने के लिए दो गुप्त कारखाने खोले गए – एक लाहौर में और दूसरा दिल्ली में. दिल्ली वाली फैक्ट्री भगवतीचरण वोहरा और दुर्गा भाभी के निर्देशन में एसोसिएशन के अन्य सदस्य विमल प्रसाद जैन द्वारा क़ुतुब रोड पर ‘हिमालयन टॉयलेट्स’ के छद्मनाम से चलायी जा रही थी.

     लाहौर वाली फैक्ट्री भगवतीचरण वोहरा कश्मीर हाउस नामक किराये के मकान में चलाते थे. वे पिस्तौल और बम बनाने में माहिर थे. दुर्गा भाभी ने उन्हीं से पिस्तौल और बम बनाने की विधि सीखी. वे बम और पिस्तौल खुद तैयार करने के साथ-साथ भगवती चरण को भी इस काम में सहयोग देती थीं. साथ ही, इस फैक्ट्री में बने हुए हथियारों को विभिन्न क्रांतिकारियों के पास पहुँचाने का काम भी दुर्गा भाभी के जिम्मे ही था. अपने स्त्री होने और प्रतिष्ठित परिवार की बहू होने के नाते कोई उन पर शक न करता था. इस बात का फायदा उठाते हुए वे हथियारों के सप्लाई के काम में बड़ी मुस्तैदी से लगी रहती थीं. कहते हैं कि चन्द्रशेखर आजाद ने इलाहबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क (अब आजाद पार्क) में पुलिस मुठभेड़ और आत्महत्या (27 फरवरी 1931) जिस कोल्ट पिस्तौल का प्रयोग किया था उसे दुर्गा भाभी ने ही सप्लाई किया था.

      भारत की स्वतंत्रता की मांग को दुनिया की नजर में लाने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका और नारे लगते हुए गिरफ्तार कर लिए गये. 15 अप्रैल 1929 जब लाहौर वाले कारखाने पर पुलिस का छापा पड़ा तो वहां से सुखदेव, जय गोपाल और किशोरी लाल पकडे गए. संयोगवश भगवतीचरण वोहरा वहां नहीं थे. तत्क्षण वोहरा दंपत्ति अंडरग्राउंड हो गये. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर के बोर्स्टल जेल[1] में रखे गये.

      इस हालत में इन क्रांतिकारियों के बीच सम्पर्क बनाये रखने की जिम्मेदारी उठाई दुर्गा भाभी ने. अंडरग्राउंड ‘पोस्टबॉक्स’ के रूप में वह न केवल क्रांतिकारियों और उनके परिवार जनों के पत्र खुद रिसीव करती थीं, बल्कि उनके गंतव्य तक पहुचती भी थीं. ख़ुफ़िया सूचनाएं और चेतावनियाँ क्रांतिकारियों तक सही जगह और सही समय पर पहुंचाने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभाती थीं. गुप्त सूचनाओं के संचार के लिए उन्होंने कई ख़ुफ़िया तरीके अपना रखे थे. इनमें कोड वर्ड का प्रयोग प्रमुख था. ये कोड वर्ड, जिन्हें क्रन्तिकारी कोड कहा जाता था, वे खुद तय करती थीं. अपने लिए उन्होंने ‘पोस्टबॉक्स’ कोड चुना था. मौखिक रूप से सूचनाएं ज्यादातर वह खुद चल कर पहुँचाती थीं. जब लिख कर सूचनाएं पहुंचानी होती थी तो वे कुछ खास रसायनों का प्रयोग कर अदृश्य अक्षरों में लिखती थीं जिन्हें पाने वाला खास विधि से ही पढ़ पाता था. कहते हैं इस कार्य में कभी-कभी वे दूध से लिखे हुए अक्षरों वाली चिट्ठियां भी भेजती थीं, जिन्हें पाने वाला क्रातिकारी साथी आंच पर सेंक कर पढ़ लेता था.

     एक दिन बोर्स्टल जेल में बंद भगत सिंह को बताया गया कि उनके पिंड बंगा (जरनवाला तहसील, जिला लायलपुर) से उनकी बहन बसंती कौर मिलने आई हैं. भगत सिंह हैरत में पड़ गये कि इस नाम की तो उनकी कोई बहन ही नहीं है. फिर भी, उन्होंने अपनी हैरानी किसी पर प्रकट न होने दिया और इस रहस्यमयी महिला के बारे में जानने की उत्सुकता लिए मुलाकाती कक्ष की ओर चल दिए. ड्यूटी पर तैनात सन्तरी मुलाकाती कक्ष से लगी सलाखों वाली कोठरी में उन्हें ले जाकर बंद कर दिया और कुछ दूरी पर खड़ा होकर मुलाकात का वक्त ख़त्म होने का इन्तजार करने लगा.

     भगत सिंह ने देखा कि सलाखों के उस पार पंजाबी सूट-सलवार पहने और चुन्नी से अपना मुंह थोडा ढंके एक लम्बी-छरहरी युवती उनकी ओर बढ़ी आ रही है. युवती ज्यों ही नजदीक पहुंची, भगत सिंह के मुंह से हठात निकल पड़ा, “आप!” आगे वह सम्भल गये और धीरे से फुसफुसाए, “दुर्गा भाभी आप!” दुर्गा भाभी ने चितवन से उन्हें बरज दिया ताकि जज्बातों के भाव में कहीं भंडाफोड़ न हो जाय. मुआ सन्तरी लगातार उनकी ओर दूर से घूरे जा रहा था – पता नहीं उसे कोई शक हो गया था या औरत को घूरने का वह मजा ले रहा था.

     मुलाकाती बहन ने सलाखों के पीछे खड़े अपने भाई से, जिसकी कभी वह पत्नी भी बनी थी, कुछ औपचारिक हालचाल किया. बहन ने भाई को भरोसा दिया कि उसके मुकदमे की पैरवी खूब जोरशोर से की जा रही है और पैसों की कोई परवाह नहीं है. किन्तु, शीघ्र ही उसकी आवाज फुसफुसाहट में बदल गयी ताकि वहां मौजूद सन्तरी न सुन ले – “दो दिन बाद बोर्स्टल से सेंट्रल जेल ले जाते समय पुलिस वैन पर हमला करके उसे छुड़ा लिया जायेगा. अलर्ट रहना है.”

     यह संक्षिप्त मुलाकात समाप्त हुई. भाई भगत सिंह दुर्गा भाभी की हिम्मत और चालबाजी की मन ही मन दाद देते हुए अपनी बैरक की ओर वापस लौट पड़े. बहन दुर्गा भाभी शीघ्रता से वहां से चल पड़ी. उसे अभी इस अभियान के लिए बहुत तैयारियाँ करनी थी. इन सब बातों से अनजान सन्तरी लौटती लड़की के हिलते नितम्बों को चुपचाप घूरता रहा.

     हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की एक अत्यंत गुप्त मीटिंग में निर्णय लिया गया था कि पुलिस वैन पर बमों से हमला करके भगत सिंह को छुड़ा लिया जायेगा. इस जोखिम भरे अभियान की गुपचुप तैयारियाँ शुरू हो गयीं. सड़क पर घायल पड़ी एक महिला का अभिनय करने की जिम्मेदारी दुर्गा भाभी को दी गयी. उन्हें पुलिस वैन के पहुँचते ही मदद की गुहार लगानी थी ताकि मदद के लिए पुलिस वालों को आकृष्ट किया जा सके और उन्हें कुछ देर तक उलझाये रखा जा सके. बम बनाने की जिम्मेदारी भगवतीचरण वोहरा को दी गयी, जबकि बमों को फेंकने की जिम्मेदारी दो क्रन्तिकारी सदस्यों को दी गयी. दो अन्य सदस्यों कोप पिस्तौल से लैस होकर वहां तैनात रहना था ताकि कवर फायरिंग की जा सके. अभियान सफल होते ही पिस्तौल-धारी युवकों की जिम्मेदारी थी कि गोलियों की आड़ में भगत सिंह को भगा ले जाएँ, जबकि बम फेकने वाले युवकों की जिम्मेदारी थी दुर्गा भाभी को सुरक्षित वहां से निकालने की.

     लाहौर में बोर्स्टल और सेंट्रल जेल आमने-सामने थे. भगत सिंह और साथियों के मुकदमे की सुनवाई जेल में ही होती थी, जिसके लिए उन्हें बारी-बारी से बोर्स्टल से सेंट्रल जेल ले जाया जाता था. जिन क्रांतिकारी साथियों को यह अभियान सौंपा गया था उन्होंने दुर्गा भाभी के साथ इस स्थान की भलीभांति रेकी कर ली. बम तैयार कर लिए गये. बमों की गुणवत्ता को परखने के लिए भगवतीचरण वोहरा दो साथी क्रांतिकारियों के साथ 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर सुनसान में गये. बमों की टेस्टिंग शुरू हुई. वोहरा जी के बम सब बहुत अच्छे थे. आखिर बम बनाने की विद्या उन्होंने मशहूर बंगाली क्रांतिकारी जतीन्द्र नाथ दास से सीखी थी. टेस्टिंग के दौरान एक बम वोहरा जी की हथेली में ही फट गया और उनका शरीर चीथड़े-चीथड़े उड़ गया.

     दुर्गा भाभी विधवा हो गयीं. भगत सिंह को छुड़ा लेने की योजना बिखर गयी. कई क्रांतिकारी जेल में बंद थे. कुछ दूसरे या तो मारे गये थे या फांसी चढ़ा दिए गये थे. पति भगवतीचरण के बिना वह एकदम अकेली पड़ गयी थीं. साथ में नन्हें बेटे शचीन्द्र के पालन-पोषण का काम भी उनके ऊपर था. लेकिन, दुर्गा भाभी ने हिम्मत न हारी. ठप्प पड़ गयी क्रांतिकारी गतिविधियों में फिर से जान फूंकने के लिए वह निकल पड़ीं.

     कभी बुढ़िया का रूप धारण कर दुर्गा भाभी रावलपिंडी पहुँच जाती, तो कभी राजस्थानी लहंगा-चोली पहन जयपुर चली जातीं. जहाँ उन्हें जरूरत महसूस होती वह रूप बदल कर क्रांतिकारियों के ग्रुप से मिलने जातीं. वहां क्रांतिकारी साथियों का हौसला बढ़ातीं; नयी योजनायें बनातीं और उन्हें कार्यान्वित करने के लिए उन्हें उत्साहित करतीं. कभी वह भिखारिणी का वेश बना कर अपने गूदड़ में, तो कभी सुशिक्षित विदुषी बन अपने अंतर्वस्त्रों में, हथियारों को छुपाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचातीं. हर बार उनका एक नया रूप होता और उनके क्रांतिकारी साथी उन्हें देख कर चौंक जाते. इस दौरान गुप्त सन्देश पहुँचाने वाला ‘पोस्टबॉक्स’ वाला कर्तव्य भी वह भलीभांति निभाती रहतीं.

     इस बीच एक बार फिर वह भगत सिंह से मिलने जेल पहुँच गयीं. इस बार उन्होंने भगत सिंह की बुढ़िया चाची का वेश बना लिया और जेल प्राधिकारियों को ठगते हुए भगत सिंह से मिलने में सफल रहीं. लेकिन, इस बार दोनों का मिलन मामूली न था. दोनों बहुत भावुक हो उठे. परिस्थितियों के हाथों क्रांति की ज्वाला बुझते सोच कर उनकी आँखों में आंसू आ गये. कल ही, 7 अक्टूबर 1930 को, तो कोर्ट ने भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई थी.

     दूर खड़े सन्तरी को लगा कि भतीजा और चाची फांसी की सजा के डर से रो रहे हैं. उसे कहाँ पता था कि आजादी के दीवानों को मृत्यु का कहाँ भय! उन्हें तो दुःख सिर्फ इस बात का था कि आजादी की जंग में लड़ने वाले साथी एक-एक कर ढेर होते जा रहे हैं.

     जेल से लौट कर दुर्गा भाभी ने बड़ी फुर्ती और गोपनीयता से क्रांतिकारियों की एक गुप्त मीटिंग बुलाई. उस मीटिंग में उन्होंने ललकारा कि तीन साथियों को फांसी की सजा सुनाये जाने का विरोध करने के लिए कुछ हंगामेदार कार्रवाई करनी चाहिए. कहते हैं कि संगठन (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) की क्षीण स्थिति देख कर साथियों ने सलाह दी कि कुछ दिनों अभी चुप बैठना चाहिए. दुर्गा भाभी उनसे राजी न हुईं. वह चुप कहाँ बैठने वाली थीं. उन्होंने ललकारा कि वे अकेले कुछ कर के दिखायेंगीं.

     मजबूत इरादे के साथ दुर्गा भाभी अपने दो साथियों – यशपाल और वैशम्पायन – के साथ बम्बई के लिए चल पड़ीं. उन्हें मालूम था कि पंजाब का भूतपूर्व गवर्नर लार्ड हैली उन दिनों बम्बई में ही था. उसकी हत्या कर दुर्गा भाभी तीन साथियों को फांसी की सजा सुनाये जाने का बदला लेना चाहती थीं. भारतीयों के विरुद्ध दमनात्मक गतिविधियों के लिए हैली लगातार क्रांतिकारियों के निशाने पर था.

     9 अक्टूबर 1930 की रात दक्षिण बम्बई (मुंबई) के लैमिंगटन रोड पर हैली को मारने तीनों हैली के आवास के निकट पहुंचे. दुर्गा भाभी ने वहां गोलियां चला दीं. उस गोलीबारी में हैली का तो कुछ न बिगड़ा. अलबत्ता, वहां खड़े एक अंग्रेज सर्जेंट और उसकी बीवी मामूली तौर पर घायल हो गए. दुर्गा भाभी का मुख्य मकसद अंग्रेजों के शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती देना.

     गोली चला कर भागते समय अंग्रेज जान गये कि गोली किसी महिला ने चलाई है क्योंकि गोली चला कर भागने की प्रक्रिया में दुर्गा भाभी की साडी फट गयी थी और उसका एक टुकड़ा वहीं पड़ा रह गया था. एक औरत के इतने जोखिमभरे और खतरनाक काम को देख कर अंग्रेज हैरत में पड़ गये. ऐसी दिलेरी किसी हिन्दुस्तानी औरत में उन्होंने पहली बार देखी थी.

     साड़ी के टुकड़े को सुराग मान कर बम्बई पुलिस दुर्गा भाभी के पीछे पड़ गयी. वे जहाँ भी छुपतीं, सुराग लगाते हुए पुलिस वहीं पहुंच जातीं. कहीं बहू बनकर, तो कहीं बहन बन कर वह छुपतीं. कहीं घरेलु नौकरानी बन कर रहतीं, किसी के यहाँ कोई रिश्तेदार बन कर रह जातीं. लेकिन, पुलिस वाले हर बार उनका  पता खोज निकालते. कभी-कभी बुरका पहन कर वह बाहर निकलतीं. वे तरह-तरह के जगहों में भेष बदल कर रहतीं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनका बेटा शची था जिसे वह कहीं दूसरे के पास छोड़ न पातीं.

     इधर, 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद में पुलिस के साथ मुठभेड़ के दौरान खुद गोली मार कर चन्द्रशेखर आजाद ने अपनी जान दे दी थी. इसके एक महीने बाद ही, 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी. साथी क्रांतिकारियों के शहीद हो जाने के बाद दुर्गा भाभी एकदम अकेली पड़ गई. वह अपने पांच वर्षीय पुत्र शचींद्र को शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करने के उद्देश्य से वह साहस कर दिल्ली चली गई, जहां पर पुलिस उन्हें बराबर परेशान करती रही. दुर्गा भाभी उसके बाद दिल्ली से लाहौर चली गई, जहां पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन वर्ष तक नजरबंद रखा. फरारी, गिरफ्तारी व रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा. अंत में लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में गाजियाबाद में प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करने लगी और कुछ समय बाद पुन: दिल्ली चली गई और कांग्रेस में काम करने लगीं. कांग्रेस का जीवन रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में उसे छोड़ दिया.

     इस दौरान दुर्गा भाभी बहुत चिंताग्रस्त रहीं. उन्हें संतोष था कि देश के लिए उन्होंने यथासामर्थ्य बहुत कुछ किया. देश पर अपना सर्वस्व लुटा दिया. एक पत्नी के रूप में भी अपने कर्तव्य से वह संतुष्ट थीं. उन्हें इस बात का गर्व था कि अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए उन्होंने न तो किसी को धोखा दिया और न कोई हिंसा की. उन्हें अफ़सोस इस बात था कि देशप्रेम के आवेश और क्रांतिकारी गतिविधियों के चक्कर में वह अपने बेटे शचीन्द्र के लिए कुछ न कर कीं. उन्हें खेद था कि वे अच्छी माँ  साबित न हो कीं.

     1939 में इन्होंने मद्रास जाकर मारिया मांटेसरी से मांटेसरी पद्धति का प्रशिक्षण लिया तथा 1940 में लखनऊ में कैंट रोड (नजीराबाद) के एक मकान में सिर्फ पांच बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला. इस स्कूल को देखने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी एक बार पहुंचे थे और दुर्गा भाभी से मिल कर बहुत प्रभावित हुए. आज भी यह विद्यालय लखनऊ में मांटेसरी इंटर कालेज के नाम से जाना जाता है.

     गुप्तचरों का बुढ़ापा अक्सर गुमनामी में गुजर जाता है. यही दुर्गा भाभी के साथ भी हुआ. गुमनामी का जीवन जीते हुए वे बुढ़ापे में गाजियाबाद में आकर रहने लगीं, जहाँ कुछ पड़ोसी उन्हें भगत सिंह की पत्नी के तौर पर जानते थे. यह भी एक विडम्बना है कि कभी किसी छलपूर्ण आवरण का ओढ़ा जाना किसी गुप्तचर के साथ ऐसा जुड़ जाय कि वही कुछ लोगों के लिए उसकी पहचान बन जाय!

     14 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में ही दुर्गा भाभी ने गुमनामी में इस संसार से विदा ले लिया.

***

[1] Kuldip Nayar, The Martyr: Bhagat Singh – Experiments in Revolution (Har-Anand Publications, 2000)

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