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सोशल मीडिया की असलियत बताने वाली फ़िल्म है ‘द सोशल डिलेमा’

प्रज्ञा मिश्रा ब्रिटेन में रहती हैं और समय-समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर जानकी पुल पर नियमित लिखती हैं। उनकी यह टिप्पणी जेफ़ ओरलोवसकी निर्देशित डोक्यूड्रामा ‘सोशल डिलेमा’ पर है। आप भी पढ़िए-

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पिछले कुछ सालों में न जाने कितनी बार यह बात कही और सुनी गयी है कि सोशल मीडिया और उस से जुडी टेक्नोलॉजी लोगों में बीमारी की तरह, एक बुरी लत की तरह, नशे की तरह फैलती जा रही है। ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का तीन चौथाई हिस्सा बिना किसी पोर्टेबल टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के बिता दिया, लेकिन आज हर दस मिनिट में अपने फ़ोन को देखना नहीं भूलते। अपने बच्चों को इतनी बार नहीं दुलराया होगा जितनी बार फ़ोन पर हाथ फेरा जाता है। क्या यह addiction नहीं है? और अगर सोशल मीडिया और इस से जुडी टेक्नोलॉजी का यह असर इस उम्र दराज पीढ़ी पर इस कदर है तो उन नयी ज़िन्दगियों के बारे में ज़रा सोचिये जिन्हें यह पता ही नहीं है कि बिना सोशल मीडिया के, बिना फ़ोन के भी कोई ज़िन्दगी होती है। ऐसे बच्चे हर घर में मौजूद हैं जिन्हें बोलना नहीं आता, लिखना पढ़ना तो दूर की बात है, लेकिन उन्हें अपनी पसंद का यू ट्यूब वीडियो देखना आता है। और उनके आसपास मौजूद माँ बाप इसी बात पर फ़िदा रहते हैं कि देखो हमारा बच्चा दूसरों से कितना आगे है।

सोशल मीडिया और इस टेक्नोलॉजी से जुड़ी डोक्यूड्रामा फिल्म “The social Dilemma” नेटफ्लिक्स पर आयी है, इस फिल्म को हर उस इंसान को देखने की जरूरत है जो स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल करता है, जिसका सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम वगैरा वगैरा ) का अकाउंट मौजूद है। क्योंकि यह ज़ोर का झटका जोर से ही देने वाली फिल्म है। 90 मिनट की इस फिल्म के बाद इस कदर बेचैनी बढ़ती है कि फ़ोन को हाथ लगाने में भी घबराहट होती है, लैपटॉप को तुरंत बंद करके घर से बाहर निकलें तो ही गहरी सांस आती है।

डायरेक्टर जेफ ओर्लोव्स्की की यह फिल्म चौंकाती है, डराती है जब आंकड़े सामने आते हैं।  2009 में स्मार्ट फ़ोन पर सोशल मीडिया का अवतरण हुआ और इसके बाद सोशल मीडिया हॉलीवुड की फिल्मों की तरह एक शैतान की ही तरह बढ़ता चला जा रहा है। इसके बाद से दुनिया में फेक न्यूज़ और नफरत और अतिवाद कई गुना बढ़ा है। लेकिन जो सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाली बात है वो जुडी है बच्चों से। आंकड़े बताते हैं कि दस से चौदह साल की उम्र की लड़कियों में खुद को चोट पहुँचाने के और इनकी वजह से अस्पतालों में भर्ती होने के मामलों में एक सौ नब्बे प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और आत्महत्या के मामले डेढ़ सौ प्रतिशत बढे हैं।

इस डॉक्यूड्रामा फिल्म में सिलिकॉन वैली और टेक जायंट कंपनी के मास्टरमाइंड अपनी बात अपने विचार रखते हैं,  गूगल के एथिक्स डिज़ाइन करने वाले त्रिस्तान हैरिस को एक दिन एहसास हुआ कि जितना भी यह वर्चुअल वर्ल्ड बनाया  जा रहा है उसका लोगों पर क्या असर होता है क्या हमने कभी सोचा है? बस इस ख्याल से बात आगे बढ़ी और अब हालत यह है कि त्रिस्तान सोशल मीडिया और पोर्टेबल टेक्नोलॉजी से संभलने की सलाह देते हैं (उन्होंने गूगल कभी का छोड़ दिया) पिछले ही साल उन्होंने टेक्नोलॉजी और उसके लुभावने ढंग और उसके असर पर अमेरिका की सीनेट में अपनी बात कही थी। त्रिस्तान अकेले नहीं हैं, कई लोग हैं जो ट्विटर, फेसबुक, गूगल, इंस्टाग्राम छोड़ कर इस राह पर निकल पड़े हैं जिसमें सोशल मीडिया और उसके असर के बारे में लोगों को बता सकें।

दरअसल सोशल मीडिया इंसानों के लिए दिलासा देने वाला जरिया बन गया है। अकेले हैं तो सोशल मीडिया पर लोगों से बात कर लो उनकी खबरें देख लो और लीजिये आपका घंटा कहाँ गया पता भी नहीं चला। धीरे धीरे पता भी नहीं चलता कि किस तरह इसकी लत लग गयी है कि उठते से फ़ोन हाथ में आता है और सोने के पहले फ़ोन आखिरी बार चेक करना नहीं भूलते।

यह फिल्म हाल के समय के सबसे ख़ास फिल्म है क्योंकि न सिर्फ यह खतरे बताती है, वो  बातें जो कहीं न कहीं सभी जानते हैं उन बातों को उनकी पूरी सच्चाई के साथ टेबल पर सजा दिया गया है। यह टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट नाउम्मीद नहीं है,  वो खुद की कमजोरियां बताते हैं, लेकिन साथ ही साथ यह भी कहना नहीं भूलते कि बच्चों पर इसका बहुत बुरा असर होता है इसलिए उनसे इसे दूर रखना ही बेहतर है। कोई कहता है कि इसका सबसे बड़ा खतरा सिविल वॉर जैसा भयानक भी हो सकता है। लेकिन क्या कोई उम्मीद है? क्योंकि इसे इंसानों ने  इसे बनाया है, हमारी ही जिम्मेदारी है इसे बदलने की। सोशल मीडिया के कई फायदे हैं लेकिन जो अनदेखे नुक्सान हैं वो कई गुना बड़े हैं। आर्टिफिशियल  इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी ने मिलकर इंसानी ज़िन्दगी पर इस कदर चुपके से कब्ज़ा कर लिया है कि पता ही नहीं चला। और यह फिल्म इंसानों को रिसर्च लैब के चूहे वाली ज़िन्दगी का असली चेहरा दिखाती है। किस तरह नोटिफिकेशन और न्यूज़ अपडेट के चक्कर में लोगों के दिन महीने साल बराबर वक़्त गुजरता जा रहा है। त्रिस्तान कहते हैं कि यह लुभाने वाली टेक्नोलॉजी समाज का खौफनाक चेहरा सामने लाती है और यह इंसान के अस्तित्व के लिए खतरा है। इस खतरे को कम करने की राह में पहला कदम है इस फिल्म को देखना। तो पहली फुरसत में नहीं फुरसत निकाल कर इसे देखें।

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