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अलविदा सीमा घुरैया: सीरज सक्सेना

देश की ख्यातनाम चित्रकार सीमा घुरैया 22 सितम्बर की शाम अपनी उस अनन्त यात्रा में चली गईं, जहाँ से वे अब केवल कला-बिरादरी की स्मृतियों में ही रहेंगी। ‘जानकी पुल’ और उसके साप्ताहिक उपक्रम ‘कविता शुक्रवार’ के लिए हमारे विशेष आग्रह पर यह स्मृति-लेख युवा कलाकार सीरज सक्सेना ने लिखा है।  –राकेश श्रीमाल

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              भोपाल से कलाकार मित्र वसंत भार्गव का बहुत ही संक्षेप सन्देश आया “दुखद समाचार, सीमा जी नहीं रहीं”

               सीमा जी के साथ पहली और आखिरी मुलाकातों की स्मृतियों के बीच वो तमाम छोटी बडी मुलाकातें ज़हन में एक मोन्टाज की तरह दिखाई देने लगीं। इन स्मृतियों में दृश्य ही अधिक मुखर हैं आवाज़ इतनी नहीं। मुझे याद आया कि जब मैं उनसे पहली बार भोपाल में मिला था तब वे ग्राफिक कला में सक्रिय थीं। एप्रेन पहनें उन्हें ग्राफिक स्टूडियो, में कभी कागज तो कभी स्याहीं से रंगें अपने हाथों के साथ टेबल पर रखी अपनी प्लेट पर झुखे देखा हैं। उनकी एप्रेन पर लगे काली स्याही के छोटे- बड़े निशान उनकी ग्राफिक कला के प्रति निरंतरता का दृश्य प्रमाण थे। फिर उन्होंने चित्र रचना शुरू किया और अपने चित्रों से भी उनकी एक पहचान बनना शुरू हो चुकी थी। अब उनका संघर्ष रहने और खाने पीने की जरूरत को पूर्ण करने से कहीं आगे जा चुका था। वे भारतीय आधुनिक कला में एक युवा व सक्रिय कलाकार की तरह जानी और मानी जा रहीं थीं। उनके चित्रों की ख्याति दिनों दिन बढ़ती रही। पर इस ख्याति और लोकप्रियता से उनकी जीवन शैली में मामूली सा बदलाव ही हुआ। अपनी स्कूटी छोड़ वे अब कार से आतीं जातीं। उतार चढ़ाव भरे शहर के भूगोल में उनका मानचित्र सीमित था। उन्हें सरल सहज जीवन जीना पसंद था। उनका खानपान भी सरल और सात्विक ही था। उनके पास एक सहज और निहायती सादी भाषा थी। यह मैं अब तक समझ नहीं पाया हूँ कि भाषा से उन्हें परहेज था या भाषा को उनसे। दिन भर अपने स्टूडियो में चित्रकर्म वे डूबी रहतीं और शाम को कभी किसी युवा कलाकार की प्रदर्शनी के शुभारम्भ के न्योते पर वे जातीं कला वीथिका में। भोपाल के अपने कलाकार मित्रों से मिलतीं और उस कलाकार के चित्रकर्म को सराहतीं। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि  प्रदेशों से आए कलाकारों के चित्र भी वे न सिर्फ उत्साह से देखतीं  बल्कि खरीदतीं भी बगैर यह जताए कि वे एक कला संग्राहक भी हैं या वे ऐसा उनकी सहायता करने के लिए कर रहीं हैं। उनके खरीदे चित्रों में कई आदिवासी कलाकारों द्वारा बनाए चित्र भी हैं। भोपाल जैसे छोटे शहर में किसी युवा कलाकार के चित्र का बिकना उस कलाकार को वह सम्बल प्रदान करता, जिसकी कभी उसने कल्पना तक नहीं की होगी। इस छोटी और ज़ाहिर तौर पर व्यक्त नहीं की गयी निजी पहल से कलाकार के उत्साह में वह वृद्धि होती, जो किसी सामूहिक पहल या कला संस्थाओं द्वारा युवा कलाकारों के लिए किए जा रहे कृत्य से नहीं मिलती। भोपाल में शायद ही ऐसा कला संग्राहक कलाकार होगा जैसा सीमा जी थीं।
            कला हमें सर्वप्रथम एक अच्छा मनुष्य बनाती हैं वह मनुष्य जो अपनी प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्यों से प्रेम कर सके। यह पाठ शायद उन्होंने मध्यप्रदेश के प्रिय कलाकार मरहूम सैयद हैदर रज़ा साहब से सीखा हो। जो जब भी भोपाल आते तब सीमा जी से जरूर मिलते उनके चित्रों को देखते और उनसे अपने किसी करीबी अनुज चित्रकार की तरह बात करते।मैंने कई बार भोपाल में राजा साहब को सीमा जी के चित्र के सामने चित्रलिखित सा खड़ा होते हुए देखा हैं। रज़ा साहब के इस तरह चित्र देखने पर वे कुछ असहज भी होतीं थीं। उन्हें उम्मीद नहीं होती कि रजा साहब जैसे एक बड़े और अनुभवी चित्रकार, जिसने दुनिया भर में कला को नज़दीक से देखा हैं, वह उनके चित्र के सामने इतनी देर ठहर जाए। रज़ा साहब उनका हाथ इस रह थामते थे, जैसे उस हाथ में बसी कलात्मक ऊष्मा को महसूस करना चाहते हों। उन्हें कुछ पुरस्कार भी मिले, जिसमें स्वयं रजा साहब द्वारा तय किया गया प्रतिष्ठित रज़ा सम्मान भी शामिल हैं, जो स्वयं रज़ा साहब ने उन्हें अपने हाथों से दिया था। कला के सम्मान में आयोजित हुई वह रोशन शाम आज भी मुझे याद हैं। उनके चित्रों की नुमाइश में वरिष्ठ कलाकार और कला समीक्षक भी सहर्ष आते। इस सम्मान के बाद ही उन्हें प्रदेश ने भी सम्मानित किया हैं।
             उनके स्वभाव की तरह उनके चित्र भी सरल ज्यामितीय आकारों और पारदर्शी रंगों की परतों में लिपटे हुए थे। यहां ज्यामितीय को गणित का हिस्सा कम और उसके सौंदर्य का एक महत्त्वपूर्ण अंश मानने पर मेरा ज़ोर अधिक हैं। क्योंकि सीमा जी के व्यवहार में जो गणित बसा था वह अच्छे गणितज्ञ के हिस्से में भी कम ही नज़र आता हैं। उनके चित्रों में एक तरह का अहिंसक भाव गहरे से महसूस होता हैं।उनके चित्र एक आदर्श परिधि या सीमा में ही खिलते थे। पर उसी परिधि में भी उनके आकार पारदर्शी रंगों की रौशनी में दूर तक (जहां तक हमारी नज़र जा सकती हैं) एक असीम यथार्थ रचते नज़र आते हैं। सरलीकरण उनके चित्रों में कुंजी की तरह प्रतीत होता हैं। उनके चित्रों में कोई मोटी ज्यामितीय लकीर जिस अंदाज़ से रूप बदलती है या असीम पार्श्व में करवट लेती है, यह देखना एक तिलिस्मी अनुभव हैं। जो उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया के नैरंतर्य से ही अर्जित किया हैं। छोटी- छोटी लकीरें भी गहरे और गूढ भाव लिए चित्रित केनवास पर तिनके की तरह उनके चित्र में तैरती हैं। कला गुरु जगदीश स्वामीनाथन का सानिध्य भी उन्हें सहज ही मिला। इस मायने में वे मध्यप्रदेश के चुनिंदा कलाकारों में शुमार हैं। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन में स्वामी की उपस्थिति को कभी जाहिर नहीं किया। स्वामी से उनका एक मौन, कलात्मक और निजी संवाद रहा।
            बाली (इंडोनेशिया) में एक चित्रकला शिविर व बैंगलोर में श्री श्री रविशंकरजी के आश्रम में भी उनके साथ रह कर उन्हें चित्र बनाते हुए भी देखा। बाली में समुद्र तट पर एक युवती के आग्रह पर अपने पैरों की मालिश वे तब तक करवातीं रहीं, जब तक स्वयं उस युवती ने रुकने की इज़ाज़त नहीं मांगी। पूरी मालिश के दौरान वे आइसक्रीम खाती रहीं और उस लड़की को वे मुस्कुराहट से सराबोर अपने चेहरे से देखतीं रहीं। वे उस लड़की को अन्य कहीं और जाकर काम नहीं करने देना चाहतीं थीं। जितना उस युवती ने मालिश के ऐवज़ में पैसा माँगा, उसे दिया और उसे भी आइसक्रीम दिलाकर किसी सखी की तरह विदा किया।
             वे चित्र बनाते हुए भी उसी तरह सहज रहतीं थीं जैसा कि वे किसी और काम करते हुए रहतीं थीं। चित्र बनाने या चित्रकार होने के दम्भ और तनाव से भी वे मुक्त थीं। अपने कनिष्ठ कलाकारों से भी वे समय समय पर उनके हालचाल पूछतीं थीं। जब भोपाल से हमारी (मेरी और मेरे मित्र महरूम मोहन मालवीय) की अनचाही विदाई हुई तब मात्र दो दिन के अंतराल में पिछले चार सालों में किए अपने सिरेमिक शिल्पों को रखने के लिए मुझे एक महफूज़ जगह की तलाश करनी थी। जहां मैं अपने कामों को निश्चिंतता और बिना किसी दबाव के रख सकूँ। उन दो दिनों में मुझे शहर के बड़े होने का अहसास सबसे अधिक हुआ। किराए पर कोई जगह लेना तो उस वक्त न सम्भव था और न ही ऐसा सोचना बस में था। तब सिर्फ एक फोन करने पर सीमा जी ने अपना एक फ्लेट (जो उस वक्त बंद ही था) खोल दिया और मैंने अपने ज़हीन सिरेमिक शिल्प वहां रखे और निश्चिन्त होकर दिल्ली रवाना हुआ। दिल्ली आकर एक नया जीवन शुरू हुआ और सालों वे शिल्प इनके घर सुरक्षित रखे रहे। जब अभी उस फ्लेट में कोई काम होता तो वे स्वयं जाकर यह निश्चित करतीं कि कहीं किसी ने वहां रखें शिल्पों को छुआ तो नहीं।
             उनकी साफगोई उनके चित्रों में देखी जा सकती हैं। उनके चित्रों में रंगों की तरलता निश्छल नज़र आती हैं। रंग अपनी ही सहजता में उनके केनवास पर प्रकट होता हैं न की कलाकार के दबाव में आकर। वह अपना होना बदलता हैं। वे मध्यप्रदेश की उन गिनी चुनी महिला कलाकारों में से हैं, जिन्होंने अलावा कला कर्म के कभी कोई और काम नहीं किया और न ही किसी भी प्रकार की नौकरी की। मैं उन्हें मध्यप्रदेश का पहला फ्रीलांसर फ़ीमेल कलाकार मानता हूँ जिसके लिए कला के अलावा अपने जीवन को जीने का और कोई उपाय कभी नहीं रहा हैं। यह बात उनकी कला के प्रति आस्था आत्मविश्वास व ज़िद का एक सजीव उदाहरण हैं।
                 कैंसर की बीमारी से जूझते हुए वे लम्बे समय तक दैहिक पीड़ा में रहीं, पर फिर उसे काबू कर पुनः जीवन में लौटीं। कीमोथेरेपी ने उन्हें कुछ विचलित किया था और वे हताशा भी महसूस कर रहीं थीं। इस निराशा से एक साधारण मनुष्य की ही तरह वे भी पीछा छुड़ाना चाहती थीं। उनके शरीर ने भी उनके आत्मविश्वास की हुंकार सुनी और पुनः अपने रचे जीवन में वे लौटीं। खुद को संभालने के बाद अपनी सक्रियता से वे सभी को अचंभित भी कर रहीं थीं। अपनी बेटी से बेहद मुहब्बत करने वाली सीमा ने एक माँ की भूमिका भी ईमानदारी और समर्पण से निभायी हैं। अपने परिवार से विद्रोह करने के बाद खुद को एक अजनबी शहर और कला बिरादरी में स्थापित करने के बाद भी वे अपने साथी कलाकारों से विद्रोह करने में नहीं चूकतीं थीं। अपने परिवार के अन्य ज़रूरतमंद सदस्यों को भी उन्होंने लगातार सहयोग किया हैं। एक नेक मनुष्य की तरह उन्होंने कभी किसी का रत्ती भर भी न बुरा सोचा और न ही किया। उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा अपने केनवास पर ही खर्च की हैं। अपनी कलाकार बिरादरी से भी वे हर बात बेझिझक कहती थीं।
               उन्होंने कलात्मक सक्रियता से अपना जीवन जिया। उनके मुस्कुराते हुए चमकते चेहरे को रोशन करते उनके सफ़ेद दाँत हमेशा अब यादों में उनकी स्मृति को जगमगाते रहेंगें। अपने ऐनक के पार से झाँकती उनकी आँखें अब अपलक हमें देखती रहेंगीं ।
अलविदा सीमा।
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