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हमारा सिनेमा और कहानियाँ बदल रही हैं

हाल में ओटीटी प्लेटफ़ोर्म पर प्रदर्शित कुछ फ़िल्मों, वेब सीरिज़ को लेकर यह लेख लिखा है भूमिका सोनी ने।  भूमिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स में पढ़ाई करने के बाद एक बहुराष्ट्रीय बैंक में काम करती हैं और अलग अलग विषयों पर लिखती रहती हैं-

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भारतीय सिनेमा में हीरो होना अलग मायने रखता है।  जब तक हीरो की धुआँधार एंट्री ना हो, सिनेमा हॉल तालियों से ना गूँज उठे, तब तक फ़िल्म  मज़ेदार नहीं कहलाती। समय के साथ हीरो चेक शर्ट वाले जेंटलमैन से सिक्स पॅक वाला माचोमैन बन गया। हीरोइन पहले पेड़ों के इर्द गिर्द हीरो के साथ गाना गाते हुए दिखाई जाती थी तो अब ज़ीरो-फिगर में प्रसिद्ध फॅशन डिजाइनरों के कपड़ों में जलवे दिखाते हुए स्क्रीन पर नज़र आती हैं। पर जब से ऑनलाइन प्लैटफ़ार्म का प्रचलन लोकप्रिय हुआ है, सिनेमा के अंदाज़ भी बदले हैं। अब ऐसी कहानियाँ भी दिखाई जा रही हैं जहाँ हीरोइन- एक महिला का किरदार फ़िल्म  की कहानी का मुख्य हिस्सा है। कई फिल्में ऐसी भी हैं जिनमें कहानी और किरदारों की भावनाएँ, उनके मनोविकार फ़िल्म का केन्द्र हैं। अब ऐसी कई फिल्में देखने को मिल जाएँगी जहाँ हीरो से फोकस हट कर उस बात पर है जो कहानीकार लिखना चाहता है और निर्देशक दिखना चाहता है।

हाल में नेटफ्लिक्स पर आई फ़िल्म ‘बुलबुल’ इसका सटीक उदाहरण है।  बुलबुल की कहानी शुरुआती 19वीं सदी की है। कहने को तो यह एक हॉरर फ़िल्म है, जिसमें गाँव वालों की मान्यता है कि गाँव में एक चुड़ैल रहती है और वही लोगों के मरने या गायब होने का कारण; लेकिन इस हॉरर और रोमांच से भरपूर कहानी में स्त्रियों पर की जाने वाली यातनाओं का एक अनोखा विवरण हैं। फ़िल्म की शुरुआत में एक छोटी सी बच्ची की शादी अपने से कई ज़्यादा उमर के आदमी से कर दी जाती है और फिर शुरू होता हैं एक बेमेल जोड़ी का सफ़र जिसमें विवाह को निभाने की ज़िम्मेदारी औरत पर थोप दी जाती है।  फ़िल्म  में विधवा जीवन की नीरसता और समाज की बेरूख़ी का भी चित्रण है। कहानी एक लोक कथा जैसी लगती है जिसमें अलौकिक शक्तियों के सहारे समाज की रूढ़िवादी परम्पराओं को उजागर किया गया है। ये फ़िल्म  कलाकारों की प्रभावशाली अदाकारी, 19वीं सदी के आवरण और स्क्रीन पर इस्तेमाल किए गए शानदार रंगों के लिए भी देखनी चाहिए।

इसी कड़ी में दूसरी फिल्म है नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की ‘रात अकेली है’। यह फ़िल्म एक ‘मर्डर मिस्ट्री’ है जहाँ नवाज़ एक पुलिस ऑफीसर का किरदार निभा रहे हैं। शहर के जाने माने व्यक्ति की अपनी शादी की रात हत्या हो जाती है। सारे घरवाले उनकी पत्नी (राधिका आप्टे) पर आरोप लगाते हैं लेकिन राधिका के पास अपनी सफाई में अलग ही कहानी है। जैसे जैसे फ़िल्म  आगे बढ़ती है, किरदारों की साफ़ दिखने वाली छवियों की परतें खुलने लगती है और इसी के साथ घर के कई राज़ भी बाहर आने लगते हैं। हम अपने स्वार्थ और रिश्तों में इतना उलझे होते हैं कि अच्छे बुरे का फ़र्क भूल जाते हैं। यह फ़िल्म मुझे ऐसी लगी जैसे एक कड़वी दवाई मीठे घोल में दी जाती है। सिनेमा एक ऐसा ज़रिया है जिसमें बात सीधे तरीके से ना कहकर भी कह दी जाती हैं और यही इस फ़िल्म की भी ख़ासियत है।

ज़्यादातर फ़िल्में और वेब सीरीज आजकल अपराध की दुनिया पर केंद्रित हैं। इनसे हटकर एक बहुत ही प्यारी फ़िल्म  देखने को मिली- ‘चिंटू का बर्थडे’। फ़िल्म की कहानी है चिंटू के बर्थडे के दिन की। चिंटू एक पाँच साल का बच्चा है जो अपने परिवार के साथ बगदाद, इराक़ में रहता है। चिंटू के पापा एक सेल्समेन है जो कई साल पहले व्यापार के सिलसिले में बिहार से इराक़ आ गए थे । तब बग़दाद के हालात अशांत नहीं हुआ करते थे। लेकिन अब, वे फिर से देश नहीं जा पा रहे क्योंकि कि चिंटू के पापा नेपाल का फ़र्ज़ी वीजा बनवा कर इराक़ में आए थे। अब जब यह परिवार ख़तरों से भरे इस युद्ध क्षेत्र में फँस गया है, जहाँ आए दिन धमाके होते रहते हैं, चिंटू बस अपना जन्मदिन मनाना चाहता है, कुछ पल खुशियों के गुज़ारना चाहता है। हालाँकि, उस एक दिन कुछ कारणों से अमरीकी सैनिक उनके घर घुस आते हैं और चिंटू का जन्मदिन हर साल की तरह फिर से फीका पड़ जाता है। हालाँकि, यह एक दुखद फ़िल्म नहीं हैं। यह एक उम्मीद से भरी, परिवारिक नोकझोक और प्रतिकूल समय में भी एक दूसरे को खुश रखने की कोशिश पर फ़िल्म है। इतनी मुश्किलों में भी चिंटू का परिवार उनके अफ़ग़ान मकान मलिक को सैनिकों से बचाने की कोशिश करता है। यह फ़िल्म राजनीतिक मुद्दों से उपर उठ कर मानवीय संवेदनाओं को दिखाने का प्रयास करती है। किरदार बेबस होते हुए भी आपके चेहरे पर एक मुस्कान दे जाते हैं।

दो और फिल्में हाल में काफ़ी चर्चित हुई- शकुंतला देवी और गुंजन सक्सेना। दोनों ही फिल्में सच्चे पात्रों पर आधारित है। ऐसी स्त्रियाँ जिन्होनें अपनी जिद्, समर्पण और मेहनत से इतिहास रचा। शकुंतला देवी जिन्हें हम ‘ह्यूमन कंप्यूटर’ के नाम से भी जानते हैं, गणित की जीनियस। वे बड़ी सी बड़ी गणना चुटकियों में कर देती थीं। जिस तरह से आज गाने या कॉमेडी के शो होते हैं, वे उस जमाने में “मेथेमेटिक्स शो” किया करती थीं जिनमें वो लोगो द्वारा पूछे गए कठिन से कठिन गणित के सवालों का कंप्यूटर से भी जल्दी हल निकाल कर दे देती थीं । हालाँकि, बहुत लोगों को यह फ़िल्म  इसीलिए पसंद नहीं आई क्योंकि कि इसमे शकुंतला देवी की निज़ी जिंदगी के बारे में ज़्यादा और उनकी गणित की काबिलियत के बारे में कम बताया हैं। ज़्यादातर फ़िल्म ‘वो कैसी माँ थीं’ इस पर केंद्रित हैं। लेकिन इसमे कुछ ग़लत नहीं! पहली बात, शकुंतला देवी की कभी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई; उनपर कई शोध किए गए जिनसे उनकी कि इस काबिलियत के बारे में पता लगाया जा सके, पर कुछ सामने नहीं आया। दूसरी, आज से कुछ 50-60 साल पहले एक महिला का अपने दम पर पूरी दुनिया पर छा जाना कोई आम बात नहीं। इसके साथ साथ एक सफल कामकाज़ी महिला से हमेशा यह उम्मीद की जाती है  कि वो घर की ज़िम्मेदारियों में भी उतनी ही दक्ष हो। ऐसी महिलाएँ एक समय में दो लड़ाइयाँ लड़ रही होती हैं- घर और बाहर दोनों। ऐसी ही एक कशमकश में शकुंतला देवी थीं- वो दुनिया में नाम कमाना चाहती थीं और अपनी बेटी के लिए भी एक अच्छी माँ होने का फ़र्ज़ निभाना चाहती थीं । यही कहानी सुनने में जितनी आसान लगती है, निभाने में उतनी कठिन। अनु मेनन जो इस फ़िल्म की निर्देशक है, कहानी के इस हिस्से को ज़्यादा उभारती हैं, तो मेरी राय में इसमे कुछ ग़लत नहीं।  यह भी शकुंतला देवी के जीवन का एक अहम हिस्सा था जिसे बनाए रखने में उन्हें उतनी ही मेहनत करनी पड़ी जितना अपने कौशल का परिणाम देने में। शकुंतला देवी को एक बेहद चुलबुली और मस्त-मौला महिला दिखाया गया है, जो पूरे समय आपका ध्यान अपनी और खींचे रखती हैं।

गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल, फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना के जीवन पर आधारित हैं। कुछ फ़िल्म को दर्शाने के तरीके से सहमत हुए तो कुछ नहीं। गुंजन सक्सेना ‘वॉर ज़ोन’ में जाने वाली पहली महिला अफ़सर थीं। फ़िल्म में गुंजन की मेहनत और निष्ठा तो दिखाई ही है, लेकिन साथ में महिला होने के कारण उनके साथ होने वाला भेदभाव भी दिखाया गया है, जो विवादों का कारण भी बना। इन सब बातों को एक बार के लिए दरकिनार करें और सोचे कि एक लड़की जब घर से बाहर निकल कर कुछ करना चाहती हैं तो कितनी मुश्किलें उसके सामने आती हैं; एक तो वो खुद होती हैं जो कई बार अपने से भरोसा खो बैठती है। फ़िल्म के एक सीन मे गुंजन अकेडमी छोड़ कर घर वापस आ जाती है और शादी करना चाहती है। वो भी बाकी दोस्तों की तरह ‘सेट्ल’ होना चाहती है। यहाँ गुंजन के पिताजी (यह रोल दिग्गज कलाकार पंकज त्रिपाठी निभा रहे हैं) उनका हौसला बढ़ाते हैं और फिर से उसे अकेडमी भेजते हैं। फ़िल्म की कहानी प्रेरित करती है  और साथ साथ मनोरंजक भी है।

हमारा सिनेमा और कहानियाँ बदल रही हैं। साथ ही दर्शकों की पसंद भी जो अब नायिका प्रधान फिल्मों को भी उतने ही चाव से देख रहे हैं। ऐसी कहानियाँ जो प्रेरणा के साथ मनोरंजक भी हो ज़्यादा समय तक दर्शकों के साथ रहती हैं और बड़ी सरलता से अपनी बात कहके निकल जाती हैं। फिल्में जिनमें कहानी ही असली पात्र है, अब ‘मेनस्ट्रीम’ सिनेमा का हिस्सा बन रही हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और युवाओं (जो फ़िल्में देख रहे हैं और जो फ़िल्में बना रहे हैं!) की बदलती पसंद को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए है।

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2 comments

  1. अच्‍छाा लेख हैै. नई फिल्‍मों के बारे में पता चला.

  2. ओटीटी प्लेटफार्म के दो लाभ है मेरे जैसे दर्शक जिन्हें सिनेमाघर का घुटन भरा माहौल पसंद नहीं और घंटे घंटे से ज्यादा लगातार नहीं बैठना चाहते फिल्म देख सकते हैं| फ़िल्म के गंभीर होने पर आप अल्पविराम ले सकते हैं| इस कारण अलग अलग फिल्मों को देख पाना सरल है|
    अधिकतर लोग सिनेमाहाल में अकेले नहीं जाते इसलिए उन फिल्मों को देखा जाता रहा जहाँ आम सहमति बन जाए|
    सिनेमा की नई धाराएं इस लोकतंत्रीकरण के कारण सामने आ रहीं है|
    लेख बेहतर है, बेहतरीन हो सकता था|

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