Home / Featured / हिन्दी दिवस – कथा का उपसंहार: नवीन चौधरी

हिन्दी दिवस – कथा का उपसंहार: नवीन चौधरी

नवीन चौधरी ‘जनता स्टोर’ के लेखक हैं, किताबों की मार्केटिंग के क्षेत्र के अनुभवी व्यक्ति है। हिंदी के नए पाठकों को लेकर उनका यह सर्वेक्षण नए पाठकों के मानस को समझने में बहुत मदद करने वाला है। आप भी पढ़िए-

====================

14 तारीख को धूमधाम से हिन्दी दिवस मनाया गया। वेलेंटाइन दिवस के बाद 14 तारीख को मनाया जाने वाला यह दूसरा महत्वपूर्ण पर्व है। किसी ने हिन्दी से प्रेम जताया, किसी ने हिन्दी की दुर्दशा पर लिखा, किसी ने व्यंग्य। ऐसे पर्व पर कुछ लिखना आवश्यक होता है तो मैंने अपने फेसबुक मित्रों से उनकी पसंदीदा 3 हिन्दी की किताबों की सूची मांगी जिसे वह कई बार पढ़ सकते हैं।

176 लोगों के जवाब आए और 3 किताब के हिसाब से 500 से अधिक किताबों के नाम होने चाहिये थे। जब मैंने इन किताबों के नाम पर गौर करना शुरू किया तो कुछ खटका और मैंने उन नामों की सूची बनानी शुरू की। 176 लोगों द्वारा दिये गए जवाब में किताबों की सूची 125 भी पार न कर सकी। अर्थात अधिकांश लोगों ने कुछ गिनी चुनी किताबों का ही नाम बार-बार लिया।

मार्केटिंग वाला होने के नाते मेरी रुचि इस आंकड़े में बढ़ी। मैंने आए हुये डाटा सेंपल को और ध्यान से देखना शुरू किया। 80% के करीब जवाब 40 साल से कम उम्र के लोगों के थे और उनमें भी बहुतायत 25-35 वालों की थी।

अगर मैं उन 10 किताबों का नाम कहूँ जिनका सबसे अधिक जिक्र हुआ तो वरीयता क्रम में यह कुछ यूं है– गुनाहों का देवता, राग दरबारी, मैला आँचल, गोदान, बनारस टॉकीज, मुसाफिर कैफे, कसप, चित्रलेखा, रश्मिरथी और डार्क हॉर्स रही।

बहुत लोगों ने किताब का नाम लिखने की जगह प्रेमचंद का सम्पूर्ण साहित्य भी लिख दिया। कुछ और किताबें जिनकी चर्चा हुई उनमें मुझे चाँद चाहिये, शेखर एक जीवनी, आपका बंटी रही। कुछ जवाब मंटो और इस्मत चुगताई की कहानियों के बारे में भी थे। नए लेखकों की किताबों में ऊपर वर्णित के अलावा ट्वेल्थ फेल, बकर पुराण, ठीक तुम्हारे पीछे का जिक्र रहा। हालांकि मैंने अपनी किताब का नाम न लिखने को कहा था लेकिन फिर भी कई जवाबों मे जनता स्टोर का नाम आना अच्छा ही लगा।

इन आंकड़ों में 95% लोगों ने कथा का जिक्र किया। नॉन फिक्शन की बहुत गिनी चुनी किताबों का नाम दर्ज हुआ जिसमें कश्मीरनामा प्रमुख थी। ऐसा नहीं कि हिन्दी में नॉन-फिक्शन नहीं बिकता लेकिन अभी भी संभवतः पाठक वर्ग हिंदी लेखन को कथा-कविता में ही देखता है।

जिस चीज ने मुझे सबसे ज्यादा आश्चर्यचकित किया वह ये जिन किताबों का जिक्र हुआ वह या तो क्लासिक थी जिनके लेखक अब जीवित नहीं या एकदम नए लेखकों की जो 5-7 साल से फ़लक पर हैं। वर्तमान वरिष्ठ पीढ़ी के किसी भी जीवित लेखक (मन्नू भण्डारी जी के अलावा) की किताब का जिक्र किसी ने नहीं किया ना उन 80% लोगों ने जो 40 साल के कम के हैं ना उन 20% ने जो 40 से ऊपर के हैं।

इन आंकड़ों से मेरे मन मे हिंदी लेखन और प्रकाशन को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं और मैं खुद ही उनका जवाब इन आंकड़ों और अनुभव के आधार पर निकालने की कोशिश करके आपके सामने रख रहा हूँ। मैं अक्सर यह सवाल खुद से पूछता हूँ कि क्या हिन्दी के पहले लिखे साहित्य में सिर्फ ये 5-7 किताबें हैं जो हर पीढ़ी हर समय पढ़ना चाहती है? मुझे कई बार इसका जवाब नहीं में विभिन्न माध्यमों से मिल चुका। हाल ही में लेखक मित्र दिव्यप्रकाश दुबे ने एक अँग्रेजी किताब के बारे में लिखते हुये कहा क्या हिन्दी में कभी ऐसा लिखा जाएगा? उसके जवाब में बहुत सारे मित्रों ने हिंदी की कई किताबों का जिक्र किया जो उसी तरह की बोल्डनेस के साथ लिखी गयी थी। जवाब देने वाले अधिकांश लोग हिंदी साहित्य, हिंदी अध्यापन या प्रकाशन से जुड़े थे। उनके अलावा अन्य पाठकों को इस विषय में जानकारी नहीं थी। प्रेमचंद एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिनकी सबसे ज्यादा किताबों के नाम पाठकों को याद हैं। रेणु की तमाम रचनाओं में पाठक सिर्फ मैला आँचल याद रखता है जबकि उनका बाकी काम भी कम सराहनीय नहीं।

मुझे ये जवाब एक बार और मिला कि हिंदी मे तमाम विषयों पर काफी कुछ लिखा तो गया लेकिन उसे पाठकों को बताया नहीं गया। बताया जाता तो क्यों कोई पाठक रेणु की बाकी कृतियों का जिक्र न करता जिनमें अधिकांश आज भी सामयिक हैं।

इसी बात से मुझे इस प्रश्न का भी जवाब मिलता है कि क्यों इस सूची में किसी भी वर्तमान पीढ़ी के वरिष्ठ का जिक्र नहीं। क्या उन्होने अच्छा नहीं लिखा? वर्तमान पीढ़ी में भी एक से एक बढ़कर लेखक हैं जिन्होने तमाम तरह के विषय छूए। उदयप्रकाश तो कहानी से लेकर अन्य मामलों में अक्सर चर्चा में रहते हैं और जवाब देने वालों मे बहुत से उन्हें जानते भी हैं पर एक भी व्यक्ति उनका नाम नहीं लिखता। अखिलेश को आप पढ़ेंगे तो कहानी आपके दिमाग में घूमती रहेगी। चित्रा मुद्गल, आलोक धन्वा, मृदुला गर्ग, ममता कालिया आदि ऐसे कई नाम हैं इस पीढ़ी के जिन्हें यहाँ होना चाहिए था लेकिन उनका नाम इस सूची में नहीं दिखता।

आप इसका दोष छोटे सेंपल साइज़ पर दे सकते हैं या इसे एक विशेष पाठक वर्ग का ही जवाब समझ सकते हैं लेकिन बाज़ार का गणित, किताबों की बिक्री को देखें तो इस सेंपल साइज़ और पाठक वर्ग का जवाब काफी हद तक सही लगता है। पुनः इस प्रश्न पर आयें कि इनका जिक्र क्यों नहीं तो मुझे इसके कई जवाब मिलते हैं। जिस आयु वर्ग ने यहाँ जवाब दिये, उन तक इन लेखकों का नाम और काम उस तरह नहीं पहुंचता जैसे ये 5-7 क्लासिक किताबें पहुँचती हैं। जिस तरह नए लेखकों द्वारा और उनके मित्रों द्वारा उनके काम का प्रचार होता है वैसा इन लोगों के बारे में कभी नहीं हुआ। हम जिस युग में हैं उस युग में पाठक तक किताब को पहुंचाना आवश्यक है क्योंकि उस पाठक तक पहुँचने के लिए और उसका पाठन समय लेने के लिए एक दूसरी दुनिया काम पर लगी हुई है। कहीं ऐसा तो नहीं इस पीढ़ी के लेखक आपस में चर्चा-परिचर्चा करके संतुष्ट हो गए।

मुझे एक बड़ी दिक्कत दिखती है हिंदी प्रकाशकों की किताबों के प्रति उदासीनता। मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि हिंदी प्रकाशक प्रचार से लेकर बाज़ार में आगे बढ़ने को लेकर पूरी तरह उदासीन हैं। इन दिनों में हालांकि उनकी तरफ से कई कोशिशें दिखी हैं लेकिन वो कोशिशें बाज़ार की गति के हिसाब से बहुत कम है। ऐसा लगता है कि अगर बाज़ार फेरारी की गति से दौड़ रहा है तो प्रकाशकों ने उसे पकड़ने के लिए बैलगाड़ी छोड़ कर मोपेड ले ली है और फेरारी का पीछा कर रहे हैं।

प्रकाशक का काम अच्छा लेखन चुनना, उसे छापना और पाठकों तक पहुंचाना है। मैं डिस्ट्रिब्यूशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा की एक किताब का जिक्र करना चाहूँगा। मेरे एक मित्र उस किताब को पढ़ना चाहते हैं। अधिकतर समय वह किताब स्टॉक मे नहीं होती और जब होती है तो उसे खरीदना बहुत महंगा लगता है क्योंकि वह किताब सिर्फ हार्डबैक में है जिसकी कारण कीमत ऊंची है और ऊपर से 70 रुपये डिलिवरी चार्ज। मित्र का कहना है कि प्राइम पर अगर ये किताब उपलब्ध होती तो वह इसे ऊंचे दाम पर भी मँगवा लेते लेकिन इतनी महंगी किताब पर इतना डिलिवरी चार्ज नहीं देना चाहते।

जिस किताब को मित्र पढ़ना चाहते हैं वह एक चर्चित किताब है और गाहे-बगाहे उसका जिक्र कहीं-कहीं होता रहता है लेकिन प्रकाशक की ओर से उसे ज्यादा सुलभ बनाने के प्रयास नहीं दिखते। हम अँग्रेजी प्रकाशन वाले लोग जब भी किसी किताब का ऐसा जिक्र देखते हैं, तुरंत उस किताब को नए तरीके से उपलब्ध करवाते हैं और भरपूर प्रचार करते हैं। हिंदी में ये आक्रामकता नहीं दिखती। कई और ग्राहक होंगे जो इसी तरह किताबों को छोड़ देते होंगे और इस तरह एक नए किस्म की किताब से रूबरू होने से वंचित हो जाते हैं। आज के युवा पाठक को डिलिवरी चार्ज से बहुत फर्क पड़ता है क्योंकि वह अब प्राइम पर बिना चार्ज के किताबें लेने का आदी हो चुका। मेरी खुद की किताब जाने कितने महीनों से प्राइम से हटी हुई है। वह किताब को छोड़ देता है और इंतजार करते है। हम मार्केटिंग में मानते हैं कि उठाई गई चीज अगर तभी न खरीदी गयी तो उसके बाद में खरीदे जाने की संभावना 70% तक गिर जाती है। मार्केटिंग में हम कंज़्यूमर बिहेवियर एनालिसिस करते हैं और यह एक बिहेवियर एनालिसिस जिसे हिंदी प्रकाशन कई बार नजरअंदाज करता नजर आता है।

नए लेखकों के आगे बढ्ने में प्रचार के अलावा डिस्ट्रिब्यूशन में भी उनके द्वारा प्रकाशक पर दिया जाने वाला दबाव है। नए लेखक की बात चल पड़ी है तो एक अन्य दिलचस्प आंकड़ा नए लेखकों को लेकर भी मिला। क्लासिक किताबों का जिक्र करने वाले पाठकों मे 5% ही ऐसे थे जिन्होने अपनी पसंदीदा 3 में से 1 स्थान नए लेखक को दिया। नए लेखकों का जिक्र करने वाले 95% पाठकों ने नए लेखकों का ही जिक्र किया जो कहीं न कहीं बताता है कि उन्होने और कुछ नहीं पढ़ा। क्या इन पाठकों तक पहुँचने के लिए प्रकाशकों ने कोई कोशिश की? ये नया पाठकवर्ग है जिसे इन नए लेखकों ने खुद बनाया है। क्या इस पाठक वर्ग के लिए वरिष्ठ लेखकों ने कभी सोचा? क्या उन्होने इस पाठक वर्ग को गंभीर विषयों से जोड़ने की कोशिश की?

कई बार आरोप लगता है कि वरिष्ठ लेखक क्लिष्ट लिखते हैं लेकिन मेरी नजर में ये सत्य नहीं। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश का लिखा हुआ काफी हद तक आज के युवा पाठक को समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी और उसकी रुचि भी होगी। फिर ऐसा क्यों है? जवाब ढूँढेंगे तो मिलेगा कि प्रकाशक और लेखक दोनों उदासीन बैठे रहे। लेखक बदलते बाज़ार और पाठकों के टेस्ट की आलोचना करके संतुष्ट हो रहे हैं। लेखकों को समझना होगा कि अब साहित्य सिर्फ सेवा नहीं एक बाज़ार है जहां नए तरीके से सब कुछ करना होगा। उन्हें पाठकों से सीधे ज्यादा जुड़ना होगा।

हिंदी प्रकाशन को भी एक बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है। प्रकाशकों को बाजार को एक बार ग्राहकों की नजर से देखना होगा और उसके लिए जरूरी है उनका प्रोफेशनल होना। ग्राहकों की नजर से देखने का अर्थ यह नहीं कि क्या बिकता है वही बेचें। इसका अर्थ हुआ कि क्या बिक सकता है और क्या पाठकों को पढ़वाना चाहिये इस पर भी ध्यान दें। ऐसा न करें कि जो लेखक अपने आप बिक गए सो बिक गए बाकी लेखक ने खुद खरीद कर बेच दी।

फिलहाल हिंदी प्रकाशन एक कुटीर उद्योग की तरह चल रहा है। कुटीर उद्योग में दो दिक्कतें होती हैं – पहली होती है छुपी हुई बेरोजगारी। Hidden Unemployment अर्थशास्त्र का सिद्धान्त है जहां माना जाता है कि किसी उद्योग में जीतने लोग लगे हैं उतने की जरूरत नहीं। यह स्थिति कुटीर उद्योग में दिखती है जहाँ पूरा परिवार उद्योग में लग जाता है और आंकड़ों में सब रोजगार प्राप्त दिखते हैं। इसका दूसरा नुकसान होता है कि संगठन में प्रोफेशनल और स्वतंत्र सोच के लिये किसी बाहरवाले की बहुत जगह नहीं बचती।

ये युग प्रचार का युग है। अच्छे काम को भी अच्छा प्रचार चाहिये। पाठकों तक पहुँचने के लिए अब लेखक और प्रकाशक दोनों को मिलकर करना होगा। आपके मन में ये सवाल हो सकता है कि प्रकाशक अपने छापे को बेचने में रुचि क्यों नहीं लेगा? प्रकाशन की दुनिया बैकलिस्ट से चलती है यानि पहले छपी किताबें। हिन्दी प्रकाशकों को क्लासिक किताबों की रिटेल बिक्री और लाइब्रेरी सेल्स से अच्छा टर्नओवर मिल रहा है और जब तक हिंदी प्रकाशन कुटीर उद्योग की तरह चलेगा ये टर्नओवर प्रकाशकों को खुश करता रहेगा। वो मोपेड छोड़ फेरारी की तरफ नहीं जाएंगे।

अंत में जाते हुये कहूँगा कि इस छोटे से सेंपल साइज़ के जवाब को खारिज मत करिएगा क्योंकि मार्केटिंग वाले जानते हैं कि हर सेंपल साइज़ कुछ कहता है।

===============

दुर्लभ किताबों के PDF के लिए जानकी पुल को telegram पर सब्सक्राइब करें

https://t.me/jankipul

  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

रामविलास पासवान की जीवनी का प्रकाशन

रामविलास पासवान की जीवनी वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव लिख रहे थे। यह जानकारी मुझे थी। …

One comment

  1. विवेकानंद

    बहुत नीक अय! 💐

Leave a Reply

Your email address will not be published.