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कोरोना काल में सोशल बिहेवियर को रेखांकित करने वाली किताब

वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की किताब प्रकाशित हुई है ‘कोरोना काल की दंश कथाएँ’। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की समीक्षा की है हेमंत पाल ने। आप भी पढ़ सकते हैं- 
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इक्कीसवीं सदी का बीसवां साल सदियों का दस्तावेज बन गया है। कोविड 19 के रूप में क महामारी ने दुनियाभर में भारी तबाही मचाई और यह अभी खत्म नहीं हुई है। लोगों की जान पर आई आफत ने मानवीयता और अमानवीयता के कई पहलुओं को उजागर किया तो कुछ दबे या अनछुए रह गए। कई ऐसी घटनाएं इस देशकाल और समाज में घट रही थीं और अभी भी घट रही हैं, जो शायद हमारे लिए अभूतपूर्व थीं और हैं। इसे साहित्य में कितना महसूस किया गया, यह साफ नहीं है, लेकिन कोरोना में हुए इस असाधारण सामाजिक बदलाव को प्रखर पत्रकार अजय बोकिल ने अपने नजरिए से देखा, समझा, परखा और उसका मूल्यांकन किया है।
यह उनकी पैनी और गहन दृष्टि का ही परिणाम है कि कोरोना लाॅक डाउन और कुछ अनलाॅक के दौरान उनके लिखे लेख देश प्रदेश ( विशेषकर मध्यप्रदेश) इस कालावधि में हुई सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का पत्रकारीय दस्तावेज बन गए हैं। हिंदी पत्रकारिता में संभवत: यह पहली किताब है, जो कोरोना काल में सोशल बिहेवियर को रेखांकित करती है और जिसकी रेंज बहुत व्यापक है। अजय बोकिल विषय रोजमर्रा की जिंदगी से उठाते हैं, लेकिन उसका इतनी गहराई से विश्लेषण करते हैं कि वो आलेख भी एक दस्तावेज बन जाता है। लेखक का मानना है कि कोरोना ने जो हमें जो दंश दिया है, उससे उबरने में समाज और देश को लंबा समय लगेगा।
दरअसल कोरोना काल महज एक महामारी से उपजा समय नहीं है, जिसने सामाजिक रूप से उथल-पुथल मचाई हो! बल्कि, इसने भारतीय समाज की जीवनशैली और दिनचर्या के साथ-साथ रिश्तों को भी नए सिरे से परिभाषित किया है। लेखक ने विशिष्ट घटनाओं को आधार बनाते हुए किस्सागोई की तरह समकालीन परिस्थितियों को लिखा है। ये अपनी तरह की पहली ऐसी किताब है, जिसमें कल्पना की उड़ान कम, सच्चाई की कड़वाहट और बेबाकी ज्यादा है। मध्यम और निम्न मध्यमवर्ग ने इस कोरोना काल को जिस तरह भोगा है, वो भी कई जगह इस दस्तावेज का हिस्सा बना! खाद्यान्न का संकट, नौकरी गंवाने की पीड़ा, परिवार के घर में कैद हो जाने की बेबसी आदि कई घटनाओं को अजय बोकिल ने जिस शिद्दत से महसूस किया और कागज पर उतारा, वह काबिले तारीफ है। ‘कोरोनाकाल की दंश कथाओं’ में शब्दों के माध्यम से वास्तविक मानवीय पीड़ा का जो दर्द झलकता है, पाठक उससे विलग नहीं रह सकता! क्योंकि, इस महामारी ने हर व्यक्ति, हर समाज, हर वर्ग और हर घर को छुआ है।
खास बात यह है कि ये किताब सोचकर नहीं लिखी गई और न ही इसके लिखे जाने की कोई पूर्व योजना बनी! यहाँ तक कि इसके विषयों के बारे में भी पहले से कोई विचार किया गया हो, ऐसा नहीं लगता! इस किताब में शामिल सभी लेख दरअसल लेखक अजय बोकिल की नियमित रचनाधर्मिता का परिणाम हैं। यही कारण है कि किताब के अधिकांश लेख तात्कालिक विषयों पर आधारित हैं, लेकिन अजय बोकिल उनकी आत्मा तक पहुंचते हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प रचना है ‘हाँ बाबा, रिसर्च के लिए प्रज्ञा चाहिए, ड्रेसकोड नहीं!’ इसे बाबा रामदेव के ‘पतंजलि’ संस्थान के कोरोनाकाल में खोजी गई महामारी की आयुर्वेदिक दवा को आधार बनाकर लिखा गया है। इसमें लेखक ने विवादों के सारे आस्पेक्ट समेटे और विश्लेषित किए हैं। मोदी सरकार द्वारा चीन के खिलाफ उठाए गए कथित सख्त कदमों पर लिखा गया ‘चीन पर डिजीटल स्ट्राइक और हमारा डिजीटल राष्ट्रवाद’ भी बेहद खरी-खरी है। चीनी सेना की भारतीय सीमा पर तैनाती के जवाब में चीन के ऍप्स पर बंदिश लगाने के सरकार के फैसले पर जबरदस्त कटाक्ष है। टिक-टॉक, वीबो पर प्रतिबंध लगाकर ये समझ लेना कि हमने चीन को खदेड़ दिया सरकार की ग़लतफ़हमी ही तो है।ये सिर्फ कॉलम नहीं, सटीक सम्पादकीय है जो पढ़ने वाले के दिमाग पर भी डिजीटल स्ट्राइक करती है। पूरी किताब में बदलते जीवन, समाज और देश के हर पहलू पर बेलाग टिप्पणी की गई है। भविष्य में पत्रकारिता का कोई विद्यार्थी यदि कोरोना काल का कच्चा इतिहास टटोलना चाहे, तो यह किताब उसके काम आ सकती है।
अजय बोकिल के लेखन की सबसे बड़ी खासियत है, शब्दों के साथ उनका खेलना! शब्द उनकी कलम के आस-पास गरबा करते नजर आते हैं, जो उनकी भाषा समृद्धि का परिचायक भी है। अजय की लेखन शैली में भाषा की शुद्धता, अपनी बात कहने की रोचक शैली और शब्दों का अनंत भंडार है। वे एक ही बात को कई तरह से कहने और समझाने की काबलियत रखते हैं। विषय के मुताबिक लेखन शैली उनकी एक और विशेषता है। एक प्रभावी और किसी हद तक सार्वकालिक पत्रकारीय लेखन के जरूरी है पत्रकार में अपने समय के भीतर और गहरे तक झांकने की अंतदृष्टि। अर्थात वर्तमान के आईने में भविष्य की आहट सुनना। इसके लिए लंबी साधना और कमिटमेंट की जरूरत होती है। यह तभी संभव है, जब पत्रकार अपनी भाषा अर्जित कर ले। इस पुस्तक में जाने माने कथाकार, चित्रकार, लेखक प्रभु जोशी की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अजय ‘नईदुनिया’ समाचार पत्र में प्रभु के कनिष्ठ सहयोगी रहे हैं। उन्होंने अजय बोकिल को पत्रकार के रूप में ‘ग्रो’ होते हुए देखा है। प्रभु लिखते हैं- ‘ अजय पत्रकारिता की नर्सरी माने जाने वाले इन्दौर के ‘नईदुनिया’ का एक ऐसा पौधा है, जिसने अब एक तनावर दरख्त़ की वह ऊँचाई हासिल कर ली है, जिसके चलते वह अलग से दिखायी देने लगा है। पत्रकारिता में ऊँचाई का अर्थ मेरे लिए अख़बार की दुनिया में ओहदों से ओहदों पर छलाँग पर छलाँग लगाते हुए, किसी शिखर पर बैठ जाना नहीं है। क्योंकि, मैं पत्रकार को बौद्धिक संसार का, एक निर्भीक नागरिक मानता हूँ जिसमें, ‘आलोचनात्मक विवेक’ को अपने अन्दर एक अभीष्ट की तरह स्थापित करना होता है। उसमें, यह प्रतिभा होती है कि वह, ‘स्तुतियों’ और ‘भर्त्सनाओं’ को एक सिरे से ख़ारिज करता हुआ, अन्तत: ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम हितों’ का पहरेदार बनना ही उसकी प्राथमिक प्रतिज्ञा होती है। अजय बोकिल को, मैं उसके अँकुरण के काल से जानता हूँ। वह ‘जीनान्तरित’ नहीं, ‘जीवनान्तरित’ बीज था, इसीलिए वह विवेक और ज्ञान को, अपनी प्रज्ञा के साथ नाथ कर, हमारे ‘समकाल’ पर, ऐसी विवेचनात्मक टिप्पणियाँ लिख कर, इस विस्मृत सच को प्रतिपादित कर पाया कि पत्रकारिता केवल ‘सत्ता का प्रतिपक्ष’ नहीं है। प्रतिपक्ष, तो ‘विरोध और प्रतिरोध’ के लिये एक दलगत निष्ठा के तहत अपनी भूमिका के निर्वाह के लिये बाध्य है। इसलिये अजय का पत्रकारीय लेखन, इस दृष्टि से अधिक निरपेक्ष है। उसके लिखे में दृष्टि किसी भी विचारधारा के समक्ष ‘सार्वदेशीय सत्य’ की अनसुनी या अनदेखी करना नहीं है। बल्कि, एक ‘अधिक मनुष्य’ और ‘अधिक नागरिक’ होकर लिखने की, सच के प्रति ईमानदारी का पर्याय है। उसके लिखे में ‘देश और काल’ बोलता है। हाँ, राष्ट्र भी बोलता है, लेकिन राष्ट्रवाद नहीं बोलता। उसकी एक आँख पीठ में भी है, जो ‘पास्टनेस ऑफ पास्ट’ को देखती है और सामने की सच्चाई को अपनी ही दो आँखों से नहीं बल्कि ‘जन’ की आँखों से देखता है। इसलिए अजय के लिखे में विगत की समझ, आगत को पढ़ने की दृष्टि के साथ, वर्तमान को बहुत वस्तुगत ढंग से देखने की एक सहज और सरल भाषा के उपकरणों की आविष्कृत प्रविधियाँ भी हैं। मुझे उससे बहुत उम्मीदें है कि वह भाषा की स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर की परम्पराओं को आत्मसात करता हुआ, इस विस्मृति के युग में, एक बहुत सकारात्मक पत्रकारिता के प्रतिमानों में अपनी कलम की स्याही से सच के हर संस्करण को उत्कीर्ण करेगा।
पुस्तक में संकलित अजय बोकिल के तमाम आलेख भोपाल से प्रकाशित ‘सुबह सवेरे’ में प्रकाशित हुए हैं। इस पत्र के प्रधान संपादक और मप्र के ख्यात पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने इस पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में कहा है ‘पत्रकारिता के गोलाकार सपाट दायरों में भी अजय बोकिल हर दिन एक बहुआयामी रचनाधर्मी के रूप में अखबार मे प्रकट होते हैं। उनके पत्रकारीय लेखन में साहित्य की सृजनशीलता, संस्कृति की मर्मज्ञता और विज्ञान की तार्किकता स्पष्ट झलकती है। यह सम्मिश्रण ही उन्हें विशिष्ट बनाता है।‘ उमेश त्रिवेदी ने लिखा है- ‘एक पत्रकार के रूप में अजय बोकिल गुणवत्ता की कसौटियां निर्धारित करते हैं। कोरोना के इस दौर में मानवीय करुणा समेटते हुए अपने पत्रकारीय दायित्वों अंजाम देना आसान काम नहीं है।’
 
इस पुस्तक को पढ़ने से अजय बोकिल की पत्रकारीय दृष्टि के साथ साथ उनका विषय वैविध्य और समझ की रेंज विस्मित करती है। शायद ही कोई विषय हो, जिस पर उनकी कलम न चली हो। न सिर्फ चली बल्कि इस रूप में चली है कि मानो वो विषय के विशेषज्ञ हों। अजय पत्रकारिता में मेरे हमसफर रहे हैं, लेकिन दैनिक स्तम्भ लेखक के तौर पर उनका यह रूप मेरे लिए भी नया है। अगर कोरोना काल की बात करें तो समाज, कला, विज्ञान, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, संस्कृति, फिल्म आदि अनेक क्षेत्रों से विषय उठाकर उन्होंने उसका अपनी दृष्टि और पैमाने पर विश्लेषण किया है। जिसमें रोचकता के साथ साथ तार्किकता भी बनी रहती है। जिसका आनंद सामान्य और बुद्धिजीवी पाठक समान रूप से ले सकता है। वो अपनी हर बात तथ्यों के आधार पर कहते हैं। लेकिन तथ्‍य को ही अंतिम सत्य नहीं मानते। बल्कि वो तथ्य के भीतर छिपे सत्य को अनावृत्त करने की सफल कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में कोविड 19 मृतकों की संख्या 1 लाख होने पर न्यूयाॅर्क टाइम्स का अपना पहला पृष्ठ काला छापना पूरी दुनिया के लिए पत्रकारीय नवाचार था। कोरोना काल में ही कार्टून चरित्र टाॅम एंड जेरी के जन्मदाता जीन डाइच का निधन, शोले के सूरमा भोपाली के देहांत पर अजय बोकिल ने जो अनूठी श्रद्‍धांजलि दी है, वह काॅमेडियन जगदीप के साथ भोपाली जबान पर भी विस्तार से प्रकाश डालती है। एक और महत्वपूर्ण लेख कोरोना से लड़ाई के तरीकों पर है। अजय सवाल उठाते हैं कि कोरोना जैसी वैश्विक महामारियों से तानाशाही बेहतर ढंग से निपट सकती है या लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं। भारत में ‘संपादक के नाम पत्र पुरूष एंथोनी पाराकल’ पर सार्थक टिप्पणी इस किताब में है। पत्रकारों की नई पीढ़ी को तो इस बारे में ज्यादा पता भी नहीं होगा।
अजय प्रिंट मीडिया के भविष्य, मीडिया की ‘माफियागिरी’, ब्यूटी बाजार में फेयर एंड लवली में से फेयर शब्द हटाने का बाजार का मानसशास्त्र, कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों की विवंचना, कोरोना के साइड इफेक्ट :केरल से सोनागाछी तक अपनी नजर दौड़ाते हैं। ये सभी लेख भी पठनीय है। तेलंगाना में पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस नेता पी.वी. नरसिंहराव की जन्मशती पर राज्य की वायएसआर कांग्रेस सरकार द्वारा विज्ञापन जारी करने के राजनीतिक ‍निहितार्थ पर गंभीर टिप्पणी और सवाल हैं। अजय इस बात को खास तौर पर रेखांकित करते हैं कि अब कांग्रेस के इस बड़े नेता को भी दूसरी पार्टी ने हाइजैक कर लिया।
अजय बोकिल के समूचे पत्रकारीय लेखन का मूल स्वर और सरोकार समाज और मानवता के पक्ष में है। इस मायने में वो उस पत्रकारिता से बहुत दूर है, जहां केवल सत्ता को साधना एकमात्र मकसद रहता है। आज जब कि प‍त्रकारिता में भी ‘इस पार या उस पार’ होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, पूरे मीडिया को खेमे में बांटकर देखा जा रहा है, ऐसे में निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ भाव से समकालीन घटनाक्रमों का आकलन, विश्लेषण बहुत महत्पूर्ण है। लाॅक डाउन के दौरान भूखे प्यास प्रवासी मजदूरों के लिए पारले जी बिस्किट का संजीवनी के रूप में उभरना, सोशल डिस्टेसिंग के चलते घरों में काम वाली बाई और ‘मैडमजी’ के पारंपरिक‍ रिश्तों का बिगड़ना, मध्यप्रदेश में कोरोना काल में सत्ता की छीना झपटी और खुद को प्रदेश का टाइगर सिद्ध करने की राजनीतिक होड़, पैसा कमाने कृष्ण की तरह विदेश गए भारतीयों का कोरोना की मार के चलते ‘सुदामा’ की तरह स्वदेश लौटना, लोअर ‍मिडिल क्लास का दर्द, लाॅक डाउन के दौरान लोगों की साइकिल की तरफ फिर लौटना, सोशल मीडिया में लोगों का मांगकर शुभकामनाएं और सांत्वनाएं बटोरने का अजब चलन, पूरे समाज का विचार शून्यता की अोर बढ़ने का खतरा, वर्क फ्राॅम होम के कारण बदलता सामाजिक आचार व्यवहार, लाॅक डाउन में सत्यदर्शी पत्रकारिता पर को लाॅक करने की सत्ता की दुष्प्रवृत्ति, कोरोना काल में आम जैसे रसीले फल का सहमा सहमा सा होना,मोदी गमछे को लेकर दो राज्यो में टकराव, उद्योगपति एलन मस्क द्वारा अपने बेटे का अजब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले संख्यात्मक नामकरण का औचित्य, देश में श्रम कानूनों में बदलाव के बाद श्रमिकों की दुर्दशा का जायजा, छत्तीसगढ़ राज्य में गोबर की सरकारी खरीद पर चुटकी, कोरोना काल में चाय की फसल बर्बाद होने के बाद की स्थिति का आकलन, कोरोना जनित नए पांच शब्दों का हिंदी शब्दकोश में शामिल होने से लेकर माफी देने का वास्तविक अधिकार किसे, इस सवाल पर भी गंभीर टिप्पणी पुस्तक में है।
अजय बोकिल की पत्रकारिता की ताकत यही सम्यक दृष्टि है, जो उन्हें दूसरे पत्रकारों से अलग करती है। आज के दौर में जिम्मेदार और निष्पक्ष पत्रकारिता अब दुर्लभ होती जा रही है। ऐसे में अजय बोकिल जैसे पत्रकारों की लेखनी हिंदी पत्रकारिता के दीप स्तम्भ स्व. राजेन्द्र माथुर की परंपरा को ही आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
दरअसल यह किताब कोरोना काल की घटनाओं का दस्तावेज ही नहीं , बल्कि तुरत फुरत लिखा गया इतिहास ही है। क्योंकि पूरे देश में लगभग दो माह तक लाॅक डाउन रहना एक अभूतपूर्व देशबंदी थी, जिसके बारे में पहले न को किसी ने सोचा और न ही ऐसा कोई पूर्वानुभव समूचे देश के पास था। ऐसे में पत्रकार की नजर से अपनी आंखों से गुजर रहे इतिहास को जानना समझना अपने आप में अपूर्व अनुभव है।
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( समीक्षक हेमंत पाल वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
पुस्तक: कोरोना काल की दंश कथाएं
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर
मूल्य: 250 रू.
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