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बड़े विजन की कहानियाँ

वास्को डी गामा की साइकिल– युवा लेखक प्रवीण कुमार का नया कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। राजपाल एंड संज से प्रकाशित इस कहानी संग्रह की विस्तृत समीक्षा की है राहुल द्विवेदी ने। आप भी पढ़ सकते हैं। आज से यह कहानी संग्रह बिक्री के लिए उपलब्ध रहेगा-

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श्लाघ्य: स एवं गुणवान रागद्वेष बहिष्कृता: /भूतार्थ कथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती –  (राज तरंगिणी,1,7)
( प्राचीन वृत्तांतों  के विवरण के संदर्भ में वस्तुतः वही इतिहासकार श्लाघ्य एवं  निष्पक्ष माना जा सकता है जिसकी दृष्टि न्यायाधीश की भांति राग द्वेष से विवर्जित है)। यद्यपि यह संदर्भ राज तरंगिणी में इतिहासकारों के लिए आया है, पर यदि समग्र रूप से देखा जाय तो  साहित्यकार भी इस विवेचना से अछूते नहीं हैं… और जबकि एक रचनाकार अपने किताब के कवर पर ही यह उद्घोषित कर रहा हो–  “लोककथा, मिथक और फैन्टेसी को फेंटकर विकसित हुई कथा शैली“ तब यह प्रश्न अत्यधिक समीचीन हो जाता है कि वास्तव में रचनाकार समय निरपेक्ष है या नहीं…

आज से लगभग 4 साल पहले “छबीला रंगबाज़ का शहर“ से साहित्यिक जमीन पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाले युवा कहानीकार प्रवीण अपनी दूसरे कहानी संग्रह “वास्को डी गामा की साइकल“  के साथ अपने पाठकों के बीच उपस्थित हुए हैं। अब तक के सारे प्रचलित मुहावरों को धता बताते हुए ‘कहन’ या यों कहें कि साधारण पर असाधारण रूप से विकसित की गई बतकही शैली में अपने किस्सों को पाठकों के बीच लाते हुए प्रवीण उन सारे आसन्न खतरों से भी काफी चौकन्ने हैं जो अक्सर बतकही शैली में दिख जाती है।
प्रस्तुत कहानी संग्रह की बात यदि की जाए तो इसमें कुल जमा सात कहानी हैं , जिसकी शुरुआत “एक राजा था जो सीता फल से डरता था”  नामक शीर्षक से शुरू होती है और संग्रह के अंतिम कहानी जो कि इस पुस्तक का शीर्षक भी है पर जाकर सांस लेती है । सचमुच वह इसलिए कि एक बार जब पाठक किताब को पढ़ना शुरू करेगा तब ‘वास्को डी गामा की साइकल’ पर ही जाकर ही उसकी सांस थमेगी।
प्रवीण की कहानियाँ उनके शीर्षकों की तरह लंबी और रोचक होती हैं। कई बार तो पाठक शीर्षक से आकर्षित हो कहानी के मोहपाश में फँसता चला जाता है और यही कहानीकार की विशेषता है। कहानी का कथ्य और शिल्प दोनों आपको जकड़ लेता है और आप उसमें डूबते चले जाते हैं।
संग्रह की चर्चा यदि कहानियों के माध्यम से की जाय तो ‘एक राजा… ‘ कहानी लगभग दो साल पहले तद्भव में आ चुकी थी और इन दो सालों में कुल जमा सात कहानियाँ लिखना यह बताता है कि लेखक अपने रचनाओं के प्रति कितना सजग और ईमानदार है और कम से कम वह किसी प्रकार के तथाकथित दौड़ से अपने आपको अलग रख, संवेदनाओं की जमीन पर कुछ संजीदा रचने का प्रयास कर रहा है, उसमें लगभग सफल भी हो रहा है ।
प्रवीण के फैन्टेसी, मिथक और लोक कथाओं पर चर्चा करने से पहले मैं उन दो कहानियो का जिक्र करना चाहूँगा , जो संवेदना की जमीन पर अलहदा कहानियाँ हैं और जो प्रवीण की खुद की शख्सियत को उभारती  है।  संग्रह की दूसरी कहानी हाफपैंट इसी संवेदना को छूती हुई कहानी है। इस कहानी के बारे में कुछ लिखते समय राजेश रेड्डी के उस मशहूर शेर को लिखने का लोभ न संवरण कर पाया –
“ मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है“
यह सोचने की बात है कि हिन्दी साहित्य मे बालमन पर संजीदा कहानियाँ न के बराबर हैं। जब भी बाल मन पर लिखी कहानियों की बात होती है तो प्रेमचंद याद आते हैं और ‘ईदगाह’ या ‘बड़े भाई साहब’ ही सबसे पहले जेहन में उभरता है। और आगे बढ़ें तो जैनेद्र की ‘पाजेब’ और अमरकान्त की ‘बहादुर’ ही याद आती  है। अब प्रेमचंद के यहाँ एक सरल  समय की बुनावट मे  हामिद जैसे बच्चों की गुंजाइश थी, कई हद तक यह एक आदर्श स्थिति भी दिखाता है, वहीं ‘बड़े भाई साब’ दो बच्चों के सहारे पूरी शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग्य दिखाता है।’पाजेब’ और ‘बहादुर’ में बालमनोविज्ञान पर मध्यम वर्ग की मानसिकता ज्यादा हावी दिखती है।
प्रवीण के यहाँ ऐसा कुछ नहीं दिखता। वास्तव में यह विशुद्ध बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी है, ऐसे बच्चों पर जो कागज जैसे  कोरे हैं और दुनियावी सरोकारों से उन्हे कोई मतलब नहीं। संजू, शिबू, नवीन और कथा नायक मैं , इन चौगड्डी की अपनी एक दुनिया है बिल्कुल मासूम-सी दुनिया , जिसमें ज़हर भरने का काम उनके स्कूल की प्रिंसपल करती हैं। बच्चे अंत तक समझ ही नहीं पाते कि औरत भी गंदी हो सकती है क्या? जब संजू ने उन सबसे रोते हुये कहा कि मैम बहुत गंदी हैं। इस पूरी कहानी सबसे कम संवाद संजू के हिस्से आते हैं पर उसकी चुप्पी, उसके आँसू और धीरे धीरे उसका हर दृश्य से अपने आपको गायब कर लेना न जाने कितने संवादों पर भारी पड़ते हैं और अंत में जब संजू पूरी बाजू की बुशर्ट और फुल पैंट पहन कर स्कूल आती है तो थोड़ा सुकून में होती है… बच्चों के यह पूछने पर कि समस्या थी क्या उस पर संजू का हौले से मुस्कुरा कर कहना कि – हाफ पैंट …। कहानी का समापन एक बहुत बड़ी सामाजिक विद्रूपता पर प्रश्न उछालते हुये  होता है और पाठक सोचने पर मजबूर।
वहीं बसई–दारापुर की संतानें  उस त्रासदी को लेकर पाठक के बीच आती है, जहां आधुनिकीकरण के दौर की त्रासदी झेलता हुआ एक पीढ़ी जो कि अतीत हुआ ही  चाहता है और दूसरी पीढ़ी जो आधुनिक होने की दौड़ में कब जमीन से कट गया, पता ही नहीं चलता। यहाँ पर वसीम बरेलवी का वह मशहूर शेर बरबस ही दिमाग में कौंध जाती है –
“अपने मिट्‍टी को जरा सी पीठ दिखलाई है
ये कैसी दरबदर भटकने की सजा पाई है”

कहानी की शुरुआत ही बहुत मारक बिम्ब के साथ शुरू होती है, जब सूबेदार खेत्तरपाल पार्क की मिट्टी उठा मिट्टी से सवाल पूछते है – “ रे तू तो बांगर सै? तू कद तै यहाँ आई?“ यह एक विचारणीय प्रश्न है, इसकी गंभीरता का अंदाजा तब लगाया जा सकता है जब सूबेदार खेत्तरपाल अपनी पत्नी से कहते हैं – दिल्ली की मिट्‍टी बदल रही है…  यौ अपशकुन सै… अब देखने की बात यह है कि यह बदलाव आधुनिकता की कीमत पर परंपरा को खत्म कर हो रहा है।
और यही कुछ यहाँ भी तो हो रहा है…  एक विचित्र बदलाव है, गांव गांव न रह गया अब। सूबेदार के समझ में यह बात बहुत अच्छी तरह से आती है, वह खीज कर कहते भी हैं –“दो किलोमीटर की भी तो दूरी ना है गांव से गोल्डेन अपार्टमेंट की… कौन सा कल्चर सुधारेगा “जब बलवान सूबेदार क़ो समझाते हुये कहते हैं कि पोता पढ़ लिख कर अच्छा करेगा। और “तब तक हम ना होंगे “ यह टीस आज के दरकते पारवारिक मूल्यों को महीन तरीके से उजागर करती है।
कहानी में एक प्रसंग आता है जब खेत्तरपाल और बलवान बस से जा रहे और तिहाड़ गांव का टिकट माँगते हैं, और कंडक्टर हंसने लगता है कि तिहाड़ जेल कि गांव … । खेत्तरपाल नाराज हो कहते हैं कि पहले गांव बना कि जेल… गांव की इज्जत होती है और उसके नाम पर जेल बना कर उसकी इज्जत खा कर हँसते हो। यहाँ खेत्तरपाल की मरजाद, होरी के मरजाद से ज्यादा व्यापक है। होरी की त्रासदी व्यक्तिगत थी जबकि खेत्तरपाल के यहाँ एक पूरे गांव के अस्तित्व के खोने की त्रासदी के साथ है। जिस देश की रक्षा के लिये पूरी जवानी गला दी खेत्तरपाल ने अब सोच रहे वह देश भीतर ही भीतर कितना बदल गया… और यदि परिवार को एक ही एक देश रूपी ईकाई मान लिया जाय तो यह भी तो कितना बदल  गया, पता ही न चला… दो बेटे… एक जमीन बेचने की ज़िद में और दूसरा माफिया बनने की ज़िद में… और उधर चौधरी भी तो है जो यह कहता है कि “इब गांव के गांव बिक गये यो खेत्तरपाल चीज के सै…।“
कहना न होगा कि इस कहानी में प्रवीण ने खेत्तरपाल की अनुभवी आंखों का सहारा लेकर… पूरी दुनिया के बदलाव के बाद की त्रासदी को साधने का प्रयास किया है। गांवो से होते हुए कस्बे तक पहुँचने वाले लोग अंत में शहर में ठूँसते चले गये और शहर की तथाकथित समृद्धि अंतत घातक गृह-युद्धों में तब्दील हो  गये। 1991 को याद कीजिये, युगोस्लविया के पास अपने सारे निवासियों का पेट भरने के पर्याप्त संसाधन से अधिक होने के बावजूद भयानक रक्त पात के साथ टुकड़े–टुकड़े हो गया। और अभी इस करोना की महामारी में वापस गांव की तरफ लौटते लोगों के हुजूम ने यह साबित कर दिया कि  शहरों की चमक के अंदर कितना खोखलापन है। जब बेकल उत्साही इसी बात को अपने शेर में कहते हैं –
“ तुम्हारे शहर में रंगीनियत के सिवा कुछ भी नहीं
हमारे गांव में मोटा महीन कुछ तो है “
तब लगता है कि  यही “कुछ”  मोटा महीन ही तो  खेत्तरपाल जैसों को  जड़ों को जिंदा रखा है।

फैंटेसी की बात यदि की जाय तो दरअसल फैंटेसी का उपयोग लेखक के लिए कई अर्थों में सुविधाजनक होता है। जीवन में जो घटनाएँ, विचार असंगत कहे जाते हैं, फैंटेसी में वे ही संगीत का उन्मेष करते हैं। स्थितिबद्ध और स्थितिमुक्त वैयक्तिकता का समन्वय उच्चतर स्थिति में पहुँच जाता है और इसके फलस्वरूप जो प्रभाव अभास-मात्र होते हैं वे लेखक  के मन-मस्तिष्क पर चित्र बनकर उभरते  हैं और उन चित्रों को वह भाषाबद्ध करता है।फैंटेसी के रूप में अप्रस्तुत विधान  समृद्ध हो जाता है और यह समृद्धि  शब्दों के अर्थ के द्वारा पैदा होती है। इसके पीछे सार्वजनिक सामाजिक अनुभवों  की एक लंबी परंपरा होती है।इसलिए अर्थपरंपराएँ फैंटेसी के मूल अर्थ को काटती ही नहीं है वरन तराशती भी हैं, रंगहीन ही नहीं करती अपितु नया रंग भी चढ़ाती हैं, इसके अतिरिक्त उसे नये भावों, विचार-प्रवाहों से संपन्न करके अर्थक्षेत्र का विस्तार करती है। कहना न होगा कि प्रवीण इस विधा में एक सधे हुये खिलाड़ी की तरह मजबूती से क़दम रख रहे हैं। इस संग्रह में चार कहानियाँ फैंटेसी, मिथक और लोक तत्व को समेट कर लिखी गई हैं।
जब मैं कहानी एक राजा था  जो सीताफल से डरता था के बारे में सोचता हूँ तो अनायास ही मेरा ध्यान  महाभारत के पंचम पर्व ( उद्योग-पर्व प्रजागर उप पर्व )में वर्णित विदुर-नीति की तरफ चला जाता है –
सुलभाः पुरुषाः राजन् सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः (अर्थात हे राजन् । ऐसे लोग खूब मिलेंगे और आसानी से मिलेंगे जो तेरे पक्ष में बोलेंगे लेकिन जो अप्रिय बोले पर जरुरी बोले ऐसा वक्ता भी दुर्लभ है और श्रोता भी )। यह जरूरी संवाद आदिकाल से ही मुश्किल होता आया है फिर चाहे राजा देवनाप्रिय हो या फिर प्रजाप्रिय। जब यह कहा जाता है कि ‘ सर्वं परवशम दुखम’ तो यह कहीं से भी गलत नहीं है। वर्तुल नगर में चारो तरफ धनधान्य की कमी नहीं थी।हर तरफ उजाला ही उजाला था, अंधेरे का कोई नामलेवा न था पर जनता परवश थी, राजा का अनकहा ख़ौफ़ धीरे-धीरे जनता में बढ़ता जा रहा था… और एक दिन जनता अंधेरे को अपनाने लगी यहाँ तक कि प्रजाप्रिय का सबसे विश्वासप्रिय सुंग भी अंधेरे में झपकी ले लेता है। अंत में अपने निष्कर्ष कि राजा मनुष्य है ही नहीं… क्षोभ में आत्म हत्या कर लेता है… बहुत बड़ा विमर्श देकर कहानी खत्म होती जाती है कि यह मोहभंग होने का दौर है बिलकुल उसी तरह जैसा आजादी के तुरंत बाद था। मोहभंग के इस दौर में  मुझे मशहूर पकिस्तानी अफ़सानानिगार इब्राहीम जलीस की एक चर्चित कहानी “उल्टी कब्र” की याद आती है जो दोनों मुल्कों की आजादी के बाद के दौर का  है। पूर्वी पाकिस्तान से कराची  आई आयशा ने नुरुल से पूछा – काइद –ए –आजम ने कहा था…। नुरुल जल्दी से बात काटते हुये बोला “आशु , देखती नहीं कि  काइद –ए –आजम को उसके मकबरे में छुपा दिया गया है – बस चुप कर …। सपने दिखाने वाले इस तरह व्यतीत हो जाते हैं । लोग उन्हें जेहन में याद नहीं रखना चाहते । दिखाये गये रौशनी की जगह  लोगों को अंधेरे पसंद आ रहे हैं , यह सत्ता के विरुद्ध का प्रतिकार है और प्रवीण इस जगह बिना किसी शोर शराबे के बहुत सलीके से चित्र को प्रतिबिम्बित करते हैं ,जिसने इस कहानी को और मारक बना दिया है ।

सिद्ध पुरुष जब समालोचन पर आई तो इस कहानी ने एकदम से चौंका दिया। रामेश्वर राय  इस कहानी को पढ़ कहते हैं प्रवीण हिंदी कहानी के भरोसेमंद वर्तमान हैं और भविष्य की उम्मीद भी।रामेश्वर राय आगे कहते हैं ‘छबीला रंगबाज का शहर ‘ की कहानियों के रचनाकार प्रवीण का यह अगला पड़ाव है।कहानी के केंद्र में एक अवकाशप्राप्त स्कूल शिक्षक गोगिया जी हैं—अभिधात्मक धरातल पर एक आदर्शवादी, कुछ सनकी और अपने जीवन-व्यवहार में असामान्य मध्यवर्गीय व्यक्ति।लेकिन वस्तुतः कहानी के भीतर वे विराट अर्थहीनता के अँधेरे में जीवन के अर्थ की तलाश के बेचैन रुपक हैं।इस तलाश की प्रक्रिया में ही पता चलता है कि जीवन मंच और नेपथ्य में विभाजित है।जो दिख रहा है,वह है नहीं और जो है वह दिख नहीं रहा।इस दृष्टि से यह कहानी हमें हमारे समय की राजनीति और बाज़ार तंत्र के तहख़ाने में ले जाती है जहाँ हम असली,मगर क़ैदी सच की झलक पाते हैं।प्रवीण ने कहानी के कथ्य को बहुस्तरीय बनाया है।
जब प्रवीण  फतांसी की बात करते हैं तो निःसंदेह इस कहानी में  वह प्रतिबिम्बित होता है। यहाँ कहानीकार सायास कुछ नहीं कह रहा ऐसा लगता है कि गोगिया साहब का लेखक में परकायान्तरण हो गया है, और पात्र ने  लेखक के जरिये पूरी कहानी को बुना है, यह  चमत्कृत कर जाता है।
यों तो गोगिया साब पूरी जिंदगी एक ईमानदारी का जीवन जीते रहे। पर कहीं न कहीं शर्मा की आर्थिक प्रगति उनकी कुंठा को बढ़ावा देती थी। एक प्रचलित मुहावरा  है – व्यक्ति ईमानदार मौके न मिल पाने से बनता है या फिर वह डरपोक होता है और पाप पुण्य के डर से ईमानदारी का स्वांग रचता है। कहीं न कहीं गोगिया साब पर यह लागू होता है। शर्मा की आर्थिक प्रगति गोगिया के लिए कहीं से भी स्वीकार न थी। हमारे चारों ओर गोगिया की भरमार ही तो है। स्वयं को सिद्ध करने और ताउम्र खुद को साबित करने में होम हुए जाते हैं। प्रसंग चाहे जो हो हम आत्म ग्लानि से ग्रसित रहते हैं और आसपास के घटित -अघटित की जिम्मेदारी के बीच झूलते रहते हैं। कोई अनजान आदमी किसी का पता पूछता है और हम सहज तरीके से बता देते हैं। वही यहाँ भी हुआ, दो स्कूटर सवार लड़के गोगिया साब से शर्मा जी का पता पूछते हैं। शर्मा का पता अपनी सहज बुद्धि से गोगिया ने बता दिया। पर शर्मा की हत्या गोगिया को बेचैन कर देता है। हालांकि सक्सेना से इस घटना का जिक्र भी गोगिया  के ऊपर आत्मग्लानि और अपनी बेवकूफी की छटपटाहट के साथ  हावी हो जाता है और फिर अदालत , गवाह, जेल ,बेल इन घटनाओं के बीहड़ के बीच खुद को निर्दोष साबित करने का ताना बाना बुनते गोगिया बैचैन हो जाते हैं और यह बैचेनी आखिर तक अपनी सांद्रता के साथ बनी रहती है। इन सब बारीक दृश्यो की बुनावट  प्रवीण को एक अलग मुकाम देती है|
राम लाल फरार है यह कहानी एक नये ट्रीटमेंट  के लिये जानी जायेगी। सम्भवत: हिंदी में इस तरह के मिजाज की पहली कहानी है। रामलाल का चरित्र अब से पहले रचना सम्भव भी था इस पर संशय है। प्रवीण के यहाँ यह स्पेस दिखता है कि पात्र अपने रचनाकार को आइना दिखा सके। देखा जाय तो पचास के दशक में मन्नु भंडारी की एक चर्चित कहानी आई थी – मैं हार गई । उस कहानी में भी कहानी का पात्र और उसके रचना कार के बीच वार्तालाप है ,चरित्रों का परशानिफिकेशन है। उस दौर में एक अलग ट्रीटमेंट के लिए जानी गई इस कहानी की बहुत चर्चा हुई। ग़ौरतलब है कि 1956 के आसपास लिखी गई यह कहानी उस समय के मोहभंग की कहानी है जहाँ एक आदर्श नेता की तलाश में कथा नायिका ने पात्रों को रचना शुरू किया और निराश हो अपने ही हाथों पात्रों की हत्या कर दी। यहां तक कि पहले पात्र जो कि जो गरीबी से उठा हुआ था और  पिता की मृत्यु से वह हिल उठा, अंधी मां और बीमार बहन ने उसके जमीर को हिला दिया। देश से पहले कि परिवार, उसकी प्राथमिकता बदल गई। लेखिका का भ्रम अपने पिता से भी  भंग होता है, जो कि प्रभावशाली मंत्री हैं और वह उन्हे एक आदर्श नेता समझती थी पर वह भाई-भतीजावाद से न बच पाए। अमीर पात्र को केंद्र में रख कर जब कहानी बढ़ाई तो वह व्यसनों में लिप्त हो गया। और कहानीकार ने क्षोभ में उस पात्र को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया। यहाँ एक बार ग़ौरतलब है कि कहानी के अंदर ही रचनाकार और उसके अंदर उसके द्वारा सृजित पात्र हैं अतः जो घटा उसकी सम्भावना बनी हुई है। क्योंकि मूल रचनाकार उन्हें कहानी के बाहर से नियंत्रित कर रहा है और कहानी की जो भी संवेदना पक्ष है उसमें मूल रचनाकार कहीं न कहीं अध्यारोपित है।
राम लाल फरार है लगभग छ दशक बाद रची गई कहानी है और तब से अब तक वर्ग चेतना ज्यादा मुखरित हुई है, इतना कि पात्र ने अपने सर्जक से ही विद्रोह कर दिया।कहानीकार परेशान है कि कोई पात्र कहानी से कैसे भाग सकता है। एक औसत दर्जे का निचले तबके का पात्र, जो कि प्रोफेसर की दया पर जिंदगी बसर कर रहा वह गायब हो जाय। और पूछने पर पंडितजी,  ठाकुर साब, लालाजी आदि-आदि संबोधन से सम्बोधित कर कहानीकार को चकित कर देता है। बकौल कहानीकार कितना कुछ तो किया इस पात्र के लिए…मुफलिसी में जी रहे आदमी को उसी के गांव का प्रगतिशील युवा प्रोफेसर अपने साथ दिल्ली लाता है और उसको साथी कह कर सम्मान देता है। जबकि रामलाल इन्ही सब को धता बताते हुए फरार हो गया। बड़ी मानमनौअल  के बाद जब वह आता है तो उसका पहला सवाल यही था- कि तुमने मेरा नाम रामलाल क्यों रखा ? नाम को लेकर पात्र की जागरूकता लेखक को चकित करती है। वह सवाल भी उठाता है कि ऐसे औसत चरित्र के व्यक्ति का नाम अब फ्रेंकलिन रूजवेल्ट तो न रखा  जाएगा। और इसी जगह रामलाल ने बुर्जवाजी वर्ग की सोच पर पहला चोट करता है। इतिहास के पन्नो को यदि पलट कर देखा जाय तो अम्बेडकर वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने गाँधी जी के “हरिजन” के प्रयोग का जमकर विद्रोह किया था।
लेखक अपने को जस्टीफाई करना चाहता है कि उसकी पत्नी और बेटी खत्म हो गई थीं , वह भी मरणासन्न था, उसे  समानता दिया। प्रोफ़ेसर उसे साथी कहता था पर रामलाल के अंदर का अपरिभाषित संस्कार इतना जड़ जमा चुका था कि वह बाऊ जी से ऊपर न बढ़ पाया।रामलाल ने अपनी चिट्ठी में कहा कि गरीबी उतना उदास नहीं करती जितना कि अपमान। रामलाल यही नहीं रुकता, उसने आरोप लगाया कि अपनी कहानी में दोहरी मार्मिकता के लिए मेरी पत्नी और बच्ची दोनों को मार डाला।जिसके बिना प्रोफेसर उसे दिल्ली कैसे ला पाता! वह कैसे ढकोसले करता वह उसे साथी कैसे कहता (वह इस डर से कि कहीं रामलाल उसका नाम न ले दे क्योंकि वह गांव में रामलाल को भइया बोलता था। यह क्रान्ति, यह आग, सब दिखावा है और रामलाल थूकता है इन सब पर। यह विद्रोह बिल्कुल उसी तरह है जिस तरह डॉ अम्बेडकर अपने एक पुस्तक “व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स”  जिक्र करते हैं। वह कांग्रेस और गांधी दोनों पर ढोंग करने का आरोप लगाते हैं और उसे सिद्ध करते हैं।
कहानी का चरम इसके अंत मे आता है जब रामलाल सूटेड-बूटेड हो लेखक से मिलने आता है। यह फतांसी का चर्मोत्कर्ष है। लेखक से मिलने उसका पात्र आये और वह भी कहानी के रचे किरदार से अलग। इतना अलग कि लेखक अपने पात्र को न पहचान पाया जब उसने अपना नाम अनुभव शेखर बताया। लेखक के आश्चर्य करने पर वह हंस पड़ा और व्यंग्यात्मक लहजे में कह पड़ा कि यदि मैं धोती कुर्ता में दीनहीन आता तो तुम पहचान जाते?  मुझे आजाद करो। मुझे यदि दिल्ली न लाया गया होता तो पड़ोस की विधवा से शादी कर जिंदगी बसर कर रहा होता। तुम्हारे प्रोफ़ेसर ने मुझे गुलाम ही तो रखा, उसकी बीबी का, उसके बच्चों का। उसने मुझे आजादी दी ही कहाँ? वह मेरे लिए रेहड़ी खुलवा सकता था। मैं अपनी जवानी, अपनी वासना अपनी इच्छाओं को मनचाहे तरीके से पूरा करता। पर नहीं, प्रोफ़ेसर की क्रांति कहाँ दीखती इसमें। एक पददलित को सहारा दे जो वाहवाही मिली वह कहाँ मिलती फिर? दरअसल यह वही मार्मिकता थी जिसका खंडन डॉ अम्बेडकर करते हैं। अम्बेडकर ने गांधी की आलोचना ही इसलिए किया कि गांघी ने अछूत समुदाय को करुणा की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया। यह स्वीकार्य न था।
यह अब समझना होगा कि बराबरी क्षैतिज नहीं ऊर्ध्वाधर होना चाहिए। रामलाल का दुःख रामलाल के होने में ही है। यह बहुत बड़ी बात है, इसे समझना ही होगा। वरना रामलाल जिंदगी से फरार होते ही रहेंगे, क्योंकि अब जागरण का समय है। और वह किसी के दया के मोहताज नहीं हैं, चाहे वह उनका सर्जक ही क्यो न हो। कहना न होगा कि यह भविष्योन्मुखी कहानी है।
वास्को डी गामा की साइकिल  फंतासी और यथार्थ के  बीच धीमे-धीमे चलती हुई अपने समय से रुबरू कराती हुई कहानी है । यह कहानी कई फ्रंट को एक साथ साधती हुई चलती है। उन प्रवासियों की,  जो रोजीरोटी के चक्कर मे दिल्ली जैसे शहर में संघर्ष कर रहे  हैं। उस पर तुर्रा यह कि उसे ‘बिहारी’ होने का जुमला  सुनना पड़ता है। बजरंगी ऐसे ही एक कैरेक्टर हैं। सपने और यथार्थ के बीच गड्डमड्ड होते। आर्थिक स्थिति का  अहसास भी है और नेता भी बनना चाहते। उसके परिणाम भी देखे हैं उन्होंने — आखिरकार उनका इकलौता बेटा केंद्रीय विद्यालय में पढ़ रहा है तो इसी नेतागिरी के कारण ही तो।
बजरंगी का सहचर यदि है तो उनकी साइकिल। इसकी भी दिलचस्प कहानी, जो गोवा में वास्कोडिगामा की जहाज डूबी थी उसमें मिले तोपों को काटकर बनाई गई साइकिल। बजरंगी से बतियाने वाली साइकिल। प्रवीण ने बोलने वाली साइकिल का जो फटेन्सी रचा है वह कमाल का है। यह साइकिल वस्तुतः बजरंगी का दूसरा मन ही तो  है। जो उन्हें हर कदम पर रोकता-टोकता आगाह करता रहता है।
व्यक्ति चाहे जिस जमीन से हो उसकी महत्वाकांक्षा हमेशा उसे नैरेट करती है। यही बजरंगी के साथ हुआ। फिर चाहे उनका भाई जी से जुड़ना हुआ या फिर श्वेत-धवल गरिमामयी साहेब सर से मुलाकात। बजरंगी की महत्वाकांक्षा उनके सर चढ़ गई। पर दूसरी तरफ यह साइकिल ही तो थी जो उन्हें आगाह करती थी। पर बजरंगी इतने होशियार तो थे ही… उनका पलट कर यह सवाल कि तुम का समझोगी जो हम उंहा समझ कर आये हैं। हालांकि यहां बजरंगी भी जानते हैं कि वह कुतर्क कर रहे पर राजनीति की सनक बहुत खतरनाक होती है। यह सपने दिखाती है। वह भी ग्रेटर कैलाश एक या दो का सपना देखते हैं जो कि उनके राजनीतिक गुरु भैया जी बताते हैं। यहाँ पर यह कहना समीचीन होगा कि जब साहेब सर ने सवाल पूछा कि क्या करते हैं बजरंगी जी? उन्होंने राजनीति का ककहरा वहीं सीख लिया… एकदम साफ झूठ बोल गए और जिस फैक्ट्री में मजदूर थे उसके मालिक बन बैठे। यहाँ प्रवीण इशारे से राजनीति के शुचिता के कमजोर नस पर हाथ रख देते हैं।
इस लंबी कहानी का टर्निग पॉइंट वह रात है, जब बजरंगी जलसे के इंतजाम आदि से निपट घर आ रहे थे, उन्हें पार्क की गंदगी में आवाज सुनाई दी। पास जा कर देखे तो एक छ फुट का हब्शी लहूलुहान पड़ा था। इसे वह घर लाते हैं। सुबह लड्डू से पता चला कि वह सोलोमन है जो कि नाइजीरिया का नहीं इथोपिया का है। यह वह जगह है जहां प्रवीण एक बड़ा विमर्श खड़ा करते दीखते हैं। इस विमर्श को देखने के लिए नोआ हरारी की “सेपियंस” से गुजरना होगा। नोआ अपनी इस खोजपरक पुस्तक में यह स्थापना लेकर आते हैं कि होमो सेपियंस पूर्वी अफ्रीका से सारे विश्व में फैले। इथोपिया उसी पूर्वी अफ्रीका का एक देश है। सोलोमन वहां का निवासी है। यानी वह उसी मानव-जाति को प्रतिध्वनित कर रहा जो दुनिया के सभी मानव जीवन के आधार रहे हैं और वह लहू-लुहान हो औंधे मुंह पड़ा है। यह निराशा  की पराकाष्ठा है। और यह निराशा वहां जाकर सघन हो गई जब साइकिल के पूछने पर कि तुम्हारे जैसे नेताओं की उम्र ही कितनी होती है। उस पर बजरंगी का यह जवाब कि लोहा गलाने वाले मजदूर साठ तक नहीं पहुँचते। यानी लगभग सौ साल पहले जो होरी की पीड़ा प्रेमचन्द के यहाँ दीखती है वही पीड़ा प्रवीण के यहां बजरंगी में दिखती है। फर्क सिर्फ इतना कि यह औद्योगीकरण की चाशनी लपेटे हुए है।
इस कहानी में एक फैंटेसी उस समय दीखता है, जब मिज़ो और सोलोमन ने मिल कर एक कूलर खरीद दिया, पैसा बाद में देने की शर्त पर ( इस कूलर के आने  की कहानी भी त्रासदीपूर्ण है जब लड्डू गर्मी से बेहाल हो उल्टी दस्त करने लगा था… और पैसे के अभाव के बजरंगी साइकिल बेचने की सोचते हैं उस पर अपने कम दाम लगाने पर साइकिल का दाम में सुधार पीड़ा की गहनता और बढ़ा देता है। यहां रामलाल फरार है में रामलाल का वह कथन याद आ जाता है कि गरीबी नहीं कष्ट देती, अपमान कष्ट देता है। साइकिल भी उस गर्वीली गरीबी का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती है.) कूलर की ठंडक से बेटे-बेटी सोए हुए हैं… बजरंगी और उनकी पत्नी को नींद नहीं आ रही। बजरंगी थके हैं। पत्नी सुमन से पैरों पर पैर रखने को कहते हैं, और फूलों के छूते ही बजरंगी नींद के आगोश में आ गए। पति पत्नी के आत्मीय सम्बधों को  इशारे से और शानदार खूबसूरती के साथ प्रवीण ने रचा है वह आज के कई रचनाकारों के लिए सबक है… खैर !
इसी जगह बजरंगी को खूब बड़ा हरा भरा मैदान दिखता है जिसमें सोलोमन अपनी दादी से मिलाता है, बजरंगी को वह अपनी ईया लगती हैं, वह लपक कर पैर छूते हैं। ईया जो पका रहीं वह साग है। वहीं मिज़ो और उनका कुनबा भी है। और तो और वहीं वह बहरूपिया भी है जो एक बार साइकिल लेने आया था, वहीं दुकानदार भी है। और हंसते हुए बहरूपिया कहता है कि यह इंडिया ही है। बजरंगी का यह सपना एक अद्भुत बिम्ब लेकर आता है। अफ्रीका, यूरोप, एशिया सब एक ही तो थे बहुत पहले…। वह तो अब अलग हो गए न? नहीं तो सोलोमन की दादी और बजरंगी की ईया में क्या फर्क। हमारे पूर्वज तो एक ही हैं न? बजरिये फतांसी नंगे यथार्थ से रूबरू कराने का बेहद खूबसूरत तरीका प्रवीण के यहां देखने को मिला। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब बजरंगी अपने नस्ल की अहमियत देते हैं और गंडा, तिलक लगाने लगे हैं। जब उनके अंदर जातीय चेतना जोर मार रही है। ठीक उसी समय बजरंगी द्वारा देखा गया यह सपना बहुत कुछ कह जाता है।
कहानी का यू-टर्न तब आता है, जब अचानक दंगा भड़क जाता है। साइकिल के मना करने के बावजूद वह दंगा प्रभावित रास्ते से जाते हैं। वहां उन्हें डरा हुआ अहमद मिलता है, इसे उसके ठिकाने छोड़ते हैं। फिर सोलोमन, उसकी मंगेतर, मिज़ो की दोनों बहनों को घर ले आते हैं। डेढ़ कमरे का मकान एक विश्व बन जाता है। बजरंगी सुकून में होते हैं। बाकी सबकुछ बेमानी लगता है बजरंगी को। राजनीति का सबक उन्हें याद आता है कि कई बार साथ चलने वालों के रास्ते अलग अलग हो जाते हैं। बजरंगी का मोह-भंग हो चुका था। भैया जी के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगाने वाले बजरंगी भैया जी का फोन काट देते हैं …और वह साइकिल चुप है…। प्रवीण राजनीति के मोहभंग काल को बहुत इशारे से दर्शाते जाते हैं, बिना किसी शोर शराबे के बाकी पाठक का विजडम!!
इस संग्रह में एक और कहानी पवन जी का प्रेम और प्रेजेंट टेन्स भी है,  इस कहानी को इस संग्रह में रखने का कारण प्रवीण ही जाने। हालाँकि यह एक अंतरजातीय विवाह के पृष्ठ भूमि पर लिखी गई कहानी है, पर बाकी कहानियो के मुकाबले उन्नीस ठहरती है, बिना इस कहानी के भी संग्रह अपने आप में संपूर्ण था। प्रवीण ने इस संग्रह में फैण्टेसी में  यथार्थ का जो छौंका लगाया है कि उस छौंके की झार पाठकों के आँख से होते हुए मन मस्तिष्क तक अपना असर करते दिखती है। भवानी प्रसाद मिश्र की मशहूर पंक्तियाँ याद आ रही हैं –
“जिस जगह जागा सबेरे / उससे आगे बढ़ के सो“

किसी भी रचनाकार के लिए यह एक गंभीर चुनौती है कि उसने जो अपनी पहली कृति में मानक स्थापित किए हैं दूसरी कृति उन मानकों के पासंग कहाँ तक टिक पा रही है। कहना न होगा कि प्रस्तुत कहानी संग्रह अपने पूर्ववर्ती कहानी संग्रह से कहीं से भी कमतर नहीं बल्कि उससे बीस ही ठहरती दिखती है। इस कहानी संग्रह में मौजूद कहानियों एक राजा था जो सीताफल से डरता था, हाफ पैंट, बसई-दारापुर कि संतानें, रामलाल फरार है, सिद्ध पुरुष  या वास्को डी गामा की साइकल में से कोई भी एक कहानी किसी भी समकालीन रचनाकार के लिए गर्व का विषय हो सकता  है और निःसन्देह प्रवीण इस मामले में अपने को भाग्यशाली और गौरवान्वित महसूस कर सकते हैं कि यह सारी कहानियाँ उनके ही कलम से निकली हैं।


राहुल द्विवेदी
अवर सचिव ,दूर संचार विभाग,भारत सरकार
{पूर्व में ( बीती सदी के 90 के दशक में ) कई बार आकाशवाणी से प्रसारित ,विभिन्न  पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित ।लगभग 15साल बाद लेखन मे पुन:सक्रिय ।
2018 मे प्रतिलिपि कविता सम्मान से सम्मानित
rdwivedi574@gmail.com}

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