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पात्रापात्रा टर्रानेवाले मेंढक और चींटी की कथा:  मृणाल पाण्डे

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे ने बच्चों को न सुनाने लायक बालकथाएँ लिखनी शुरू की तो परम्परा से चली आ रही एक से एक लोक कथाएँ पुनर्जीवन पाने लगी, नए संदर्भों में प्रासंगिक लगने लगी।  यह इस सीरिज़ की 19वीं कथा है। क़िस्सा पुराना है लेकिन पढ़ते हुए अपना समय ध्यान आने लगता है। आप भी पढ़िए-

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(यह बड़ी पुरानी कहानी कई भाषाओं के लोकसाहित्य में मिलेगी। शायद वजह यह, कि इसमें दुनिया के एक क्षुद्रतम जीव की, अपने बच्चों को बचाने के लिये खुद से कहीं बड़ी और छोटों से मुंह फेरनेवाली व्यवस्था से कड़ी दर कड़ी जूझते हुए अपने जीवट से छोटों की दुनिया को बचा लेने की कथा है। कुछ कथाओं में चींटी की बजाय कथा की नायिका अपने छोटे भूखे बच्चों का दाना बचाने को लड़नेवाली नन्ही सी गौरैया मिलेगी, तो कहीं कोई चुहिया। यह अनायास नहीं, कि ऐसी कथाओं को सुनानेवाले खुद भी अक्सर परिवारों के सबसे कमज़ोर सदस्य: बूढी औरतें या पुराने टहलुए या चौपाल मे बैठे किस्सागो और उनको सुननेवाले होते हैं समाज के सबसे निष्कवच सदस्य, नन्हें बच्चे। शायद इसी लिये ऐसी कथायें कभी मरती नहीं, नये नये अवतार लेती आई हैं। )

 

तो भाई एक बार की बात है कि एक चींटी अपने छोटे छोटे बच्चों सहित तालाब के किनारे दाना खोजने को निकली। उसका सबसे छोटा बच्चा किनारे पर फिसल कर छपाक् से तालाब में जा गिरा। बच्चे को पानी में छटपटाते देख कर माँ चींटी ने इधर उधर सहारा तलाशने को निगाह दौडाई तो देखा कि एक मोटा सा मेंढक मज़े से कमल के पत्ते पर लेटा लेटा आसमान की तरफ मुख कर के ‘पात्रापात्रा’ टर्रा रहा था।

‘भाई मेरी मदद कर दो। तुम तो जलचर हो, मेरा नन्हा बच्चा तालाब में गिर पड़ा है, उसको निकाल दो।’ चींटी गिड़गिड़ाई।

मेंढक ने मुस्कुरा कर एक लंबी जीभ निकाली, और चट से पास उड़ते भुनगे को निगल कर बोला, ’चल भाग! मुझे क्या पड़ी है पानी में कूदने की? देखती नहीं मैं धूप में लेटा लगातार टर्राने में कितना व्यस्त हूं? चले आते हैं जाने कहाँ कहाँ से!’

‘देखना तेरा घमंडी टर्राना एक दिन तुझको बडा भारी पडेगा’, कहती हुई चींटी भागी सांप के बिल की तरफ। मोटा सा सांप बिल के आधा भीतर आधा बाहर, धूप खा रहा था।

‘कौन?’ वह फुंकारा।

चींटी के पास डरने का बखत नहीं था। ‘सांप भैया मेरी मदद करो। जा कर उस मेंढक को निगल जाओ वह मेरे तालाब में डूबते बच्चे को नहीं बचा रहा और मेरी कतई नहीं सुनता।’ रोती-हांफती चींटी बोली।

‘मुझे क्या पड़ी है बेवजह टर्रानेवाले मेंढक से पंगा लेने की? वैसे भी मैने अभी एक खरगोश को खाया है। मुझे भूख नहीं है,’ सांप रुखाई से बोला और फिर सो गया।

चींटी के पास तकरार को रुकने का समय न था, जबकि उसका बच्चा पानी में हाथ पांव मार रहा था। फिर भी जाते जाते ‘ठहर रे दुष्ट आगे तेरी भी खबर लूंगी किसी दिन,’ कहती हुई अम्मा चींटी अब लपकी संपेरे की झोंपडी की तरफ। संपेरा गुड़गुड़ी पीता हुआ धूप में बिछी खटिया पर बैठा हुआ था।

‘भैया संपेरे उस कोने में एक बहुत दुष्ट सांप रहता है, जो मेरे डूबते बच्चे को बचाने में मेरी मदद से इनकार करता है। उसे बीन बजा कर बिल से बाहर खींच लो, और कमबख्त के ज़हर के दाढ़ उखाड़ कर उसे पिटारे में बंद कर दो!’ रोती चींटी ने संपेरे से कहा।

पर संपेरा उठने को कतई तैयार न था। ‘मुझे क्या पड़ी है कि चींटी के बच्चे को बचाने के लिये मैं ज़हरीले सांप और पात्रापात्रा टर्रानेवाले मेंढक से जा भिडूं? भाग ! अभी गुडगुडी पी रहा हूं। इस दम तो सांप छोड कोई केंचुआ न पकडूं मैं।‘ संपेरा बोला ।

‘वैसे भी मेरे पास अभी ज़रूरत लायक काफी सांप हैं। और राजमहल की अप्सरा उर्वशी मैडम का हम सपेरों को हुकुम है कि ज़रूरत से अधिक वन्य जीवों को मत पकडो वरना सीधे नरक भेज दिये जाओगे।’

‘बडा आया अप्सरा का गुलाम, लबार कहीं का!’ दांत किटकिटा कर चींटी आलसी संपेरे से बोली। ‘देख किसी दिन तुझसे और तेरी उस अप्सरा से हिसाब किताब करती हूं,’ जंगल की तरफ जाती हुई चींटी ने कहा।

जंगल में घुसते ही चींटी को एक इतराता हुआ मोर दिखाई दिया, ‘अरे मोर भाई मेरी मदद करो। मेरा बच्चा तालाब में गिर गया है। तुम तनिक बाहर निकल कर उस बिल में से एक दुष्ट सांप को पकड़ो जो पात्रापात्रा टर्राते हुए उस मेंढक को नहीं डरा रहा, जो मेरे डूबते बच्चे को बचाने से मनै कर रहा है।’ बिलखती चींटी मोर से बोली।

मोर ने दुम फैला कर आत्ममुग्ध होते हुए चकरी ली। बोला, ‘देख री चींटी, तू ठहरी क्षुद्रतम जीव। पर मैं एक प्रसिद्ध राजपक्षी हूं। मुझे क्या पड़ी है कि तेरे बच्चे को बचाने के लिये सांप को जा पकडूं, जो पात्रा पात्रा टर्रानेवाले मेंढक को नहीं डराता? तुझे पता नहीं, कि इन दिनों खुद महाराज अपने उपवन में आकर अपनी हथेली पर दाना धर कर मुझको चुगाते हैं। सारे देश में मेरी छवियाँ दिखाई जाती हैं। और यह सुंदर मित्र मेंढक पात्रापात्रा करते हुए सारे तालाब की मछलियों को मेरी यशगाथा सुनाता रहता है। अपनी छवि मलिन करने को उससे काहे वैर मोल लूं, वह भी एक चींटी के कहने से? चल भाग।’

निराश चींटी अब महाराज के उपवन जा पहुंची। महाराज तो भीतर योगाभ्यास कर रहे थे, बाहर उनका खतरनाक जरमन कुत्ता बैठा था। ‘भाई रॉटवेलर! तुमको हिटलर की आन, ज़रा महाराज से कहो कि वे मोर, सांप, संपेरे, मेंढक को आज्ञा दें कि वे मेरे डूबते बच्चे को बचाने को आगे आने से इनकार कर रहे हैं।’ चींटी रो कर बोली।

रॉटवेलर गुर्राया, ‘मुझे क्या पड़ी है कि साहिब को योगाभ्यास के बीच तेरा संदेसा दूं? मोर वैसे भी उनका बडा चहीता है। भला चाहती है तो यह दोषारोपण बंद कर। दफा हो अब वरना…’

चींटी खिसक ली। जाते जाते उसे महाराज की मुंहलगी अप्सरा उर्वशी की बिल्ली दिखी, ‘बिल्ली मौसी, बिल्ली मौसी,’ चींटी गिडगिडाई, ‘तुम तो महाराज की प्रिय उर्वशी नर्तकी की मुंहलगी हो। तनिक उनसे कहो कि वे रॉटवेलर भैया को महाराजा से पिटवा कर उससे मेरे डूबते बच्चे को बचाने की मेरी अपील निकलवा दें, जिसे वह निगोड़ा अपने भखार जैसे पेट में हजम किये बैठा है।’

बिल्ली रानी पहले तनी। पोर पोर खींच कर अंगडाई ले कर उसने धनुष की तरह देह को ताना, फिर जीभ से पंजा, पंजे से मूंछें साफ करती हुई बोली, ‘मुझे तेरे बच्चे का क्या मोह? बड़ी बेवकूफ है तू! तुझे राजमहल के कायदे का कोई पता नहीं, कि यहां किसके पेट से कौन, कैसे किसका भेद निकलवाता या नहीं निकलवाता। चल भाग।’

अंगड़ाई ले कर नर्तकी की बिल्ली पेड़ पर जा चढी।

निराश चींटी को तभी महल के बाहरी कोने में रखा एक डंडा नज़र आया। बड़े जीवों से तो उसकी आस टूट चुकी थी, अब वह डंडे के पास गई और बोली,  ‘भाई डंडे तू भी काट कर अपनी वृक्ष माता से जबरन अलग किया गया, फिर तुझे छीला गया, तुझ पर रंदा चला, तुझको तो पता है हम गरीबों पर कैसी बीतती है। मुझ दुखियारी, बच्चे से बिछड़ी गरीबनी को तेरी मदद चाहिये। देगा?’

‘देख भैण, मैं तो ठहरा बिलकुल लट्ठ गंवार। न मेरी आन ना औलाद। पर माँ की याद तो हिये में है ही। तू भी उसकी तरैयां अपने बच्चे से जुदा हुई, सो तेरी इतनी भर मदद कर सकता हूं कि तू जिसे कहे उसे पीट दूं। पर मुझे कोई दोनो हाथों से चलानेवाला होना चाहिये।’

‘जीता रह मेरे भाई’ चींटी बोली। ‘सच कहते हैं, जब किसी की न चले तो फिर अंत में लट्ठ ही बोलता है। खोजती हूं कोई छोटा गरीब बंदा।’

चींटी की नज़र बगीचे में तितली पकड़ते एक अनाथ बच्चे पर गई। वह उसके पास जा कर बोली, ’बच्चा मेरा बेटा तालाब में डूब रहा है। लट्ठ मदद को राज़ी है पर मैं इन हाथों से लठ्ठ किस तरह चलाऊं? मुझे यह लठ्ठ चलाने को तेरी मदद चाहिये।’

लड़के का बाप मशहूर लठैत था पर उसे अभी लट्ठ चलाना नहीं सिखा पाया कि एक बार लड़ाई के दौरान मारा गया था। माँ थी नहीं, खुले में सोना, मांगे का खाना। महाराज फहाराज से वह न डरता था। उसका क्या कर लेंगे?

लड़का तो बस यह सोच के खुश हुआ कि आखिरकार उसे लट्ठ भंजाई का मौका मिल रहा था। तुरत लट्ठ को उठा लाया और बोला,’चल मौसी।’

चल मेरे साथ तुझे बताती हूं किसे डराना है।’ खुश खुश चींटी बोली।

चींटी और बाल लठमार और लट्ठ संग संग चले।

जैसे ही उसे पेड़ तले धूप में पसरी बिल्ली दिखी, तो चींटी ने आंख से इशारा किया। लठैत बिल्ली के पीछे पड़ा तो बिल्ली भागी राजनर्तकी की ओर, कहती हुई कि, ‘‘उर्वशी जी, तुरत महाराज के रॉटवेलर से कहला दें कि वह महल के भीतर जा कर चींटी का संदेसा उनको दे दे, वरना यह लठ मुझे मार डालेगा।’

अपनी प्रिय बिल्ली को बचाने के लिये नर्तकी ने भाग कर वैसा ही किया।

अब लठ पडा रॉटवेलर के पीछे। वह भी ‘त्राहिमाम्’ करता संदेसा देने भीतर भागा महाराज, बचाइये।

महाराजा ने अपने अंगरक्षक और विश्वस्त कुत्ते को बचाने के लिये मंत्री जी से मोर को हुकुम भेजने को कहा, कि समय कम था। इसलिये मोर से सांप को डरवाने की बजाय सीधे महाराज का नाम ले कर उस पात्रा पात्रा टर्रानेवाले मेंढक को डरवाया जाये। और कहा जाये कि बहुकुम महाराज वह सारा काम छोड़ कर चींटी के डूबते बच्चे को तुरत पानी से निकाल कर उसकी जान बचाये।

साहिब कहें सौ सुजान! तुरत फुरत ऐसा ही किया गया।

हुकुम पाते ही मेंढक ने तुरत इतराना बंद किया और तुरत पानी में कूद कर चींटी के बच्चे को बाहर ले आया। चींटी ने नन्हें लठैत और लट्ठ का बहुत बहुत शुक्रिया अदा किया, और बच्चों को घेर कर घर ले चली।

पर चींटी भूली न थी कि उसके दुश्मनों में अब भी बच रहे थे सांप और संपेरा।

अपने सुरक्षित बच्चों को बिल में ले जाने के बाद उनको खिला पिला सुला कर चींटी उनको सबक सिखाने वापिस आई।

पहले वह गई संपेरे की कुटिया में। वह सर पर हाथ धरे बैठा था। उसकी पिटारी खुली थी। गुडगुडी का मसालेदार तंबाकू पीते हुए तनिक आंख लग गई तो साला सांप निकल ही भागा। उसको दिखा कर नचा कर होनेवाली मेरी तो कमाई अब बहुत कम हो जायेगी। वह अपने बीबी बच्चों से कह रहा था।

चींटी जा कर बोली, ‘देख रे संपेरे, तूने मुसीबत में मेरी मदद नहीं की, पर मां हूं। सो तेरे बीबी बच्चों का सूखा मुंह देख कर तुझे मदद के लिये बताती हूं। मुझे एक बांबी का पता है जिसमें एक बड़ा सा नाग घुसा हुआ है। तू बीन ले कर मेरे साथ चल और उसे बाहर निकाल कर पकड़ ला।‘

अंधा क्या मांगे? दो आंखें! संपेरा तुरत झोली और बीन ले कर चींटी के संग हो लिया।

बीन सुन कर सांप झूमता हुआ बाहर आया तो चतुर संपेरे ने उसे दुम से पकड कर झोली में बंद कर लिया। ‘अब घर जा कर इसके ज़हर के दांत उखाड दूंगा। देखना चाहे तो तू भी चल,’ वह चींटी से बोला। चींटी संग संग चली। सांप को छटपटाते देख कर उसको बहुत सुख हुआ। संपेरे की बीबी ने उसको उसके बच्चों के लिये ढेर सारा चून दिया।

चींटी रानी खुश खुश घर को वापिस आई।

बिना डरे बड़ों से लड़ कर एक नन्हीं चींटी ने फतह पाई।

तुम भी पाओ, सोने जाओ, नानी की खाली करो रज़ाई।

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2 comments

  1. सत्येंद्र

    बिना लठ्ठ काम नहीं चलने वाला।

  2. डॉ कनक लता

    हमेशा की तरह काफी शानदार कहानी है जो इशारों में ही बहुत कुछ कहती है…

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