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पुष्यमित्र की किताब ‘रुकतापुर’ का एक अंश

लेखक-पत्रकार पुष्यमित्र की किताब आई है ‘रुकतापुर’। बिहार को लेकर लिखी गई इस किताब का एक चुनिंदा अंश पढ़िए। किताब का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन समूह के उपक्रम सार्थक ने किया है। आप अंश पढ़ सकते हैं-

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किताब के बारे में – यह किताब एक सजग-संवेदनशील पत्रकार की डायरी है, जिसमें उसकी ‘आँखों देखी’ तो दर्ज है ही, हालात का तथ्यपरक विश्लेषण भी है। यह दिखलाती है कि एक आम बिहारी तरक्की की राह पर आगे बढ़ना चाहता है पर उसके पाँवों में भारी पत्थर बँधे हैं, जिससे उसको मुक्त करने में उस राजनीतिक नेतृत्व ने भी तत्परता नहीं दिखाई, जो इसी का वादा कर सत्तासीन हुआ था। आख्यानपरक शैली में लिखी गई यह किताब आम बिहारियों की जबान बोलती है, उनसे मिलकर उनकी कहानियों को सामने लाती है और उनके दुःख-दर्द को सरकारी आँकड़ों के बरअक्स रखकर दिखाती है। इस तरह यह उस दरार पर रोशनी डालती है जिसके एक ओर सरकार के डबल डिजिट ग्रोथ के आँकड़े चमचमाते दावे हैं तो दूसरी तरफ वंचित समाज के लोगों के अभाव, असहायता और पीड़ा की झकझोर देने वाली कहानियाँ हैं। इस किताब के केन्द्र में बिहार है, उसके नीति-निर्माताओं की 73 वर्षों की कामयाबी और नाकामी का लेखा-जोखा है, लेकिन इसमें उठाए गए मुद्दे देश के हरेक राज्य की सचाई हैं। सरकार द्वारा आधुनिक विकास के ताबड़तोड़ दिखावे के बावजूद उसकी प्राथमिकताओं और आमजन की जरूरतों में अलगाव के निरंतर बने रहने को रेखांकित करते हुए यह किताब जिन सवालों को सामने रखती है, उनका सम्बन्ध वस्तुत: हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है।

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जय-जय भैरवी 

शोषण की इंतिहा और अदालती लड़ाई लड़ती लड़कियाँ

‘जय-जय भैरवी, असुर भयाउनि’ गीत की रचना मैथिली के सुप्रसिद्ध कवि विद्यापति ने की थी। शक्ति के उपासक मैथिल जब दुर्गा और काली जैसी पराक्रमी देवियों की आराधना करते हैं, तो उन्हें हमेशा यही गीत सूझता है। मगर यही मैथिल और बिहारी समाज अपने आसपास रहने वाली भैरवियों को कभी शक्तिशाली बनने नहीं देता। कभी वे विवाह के नाम पर बिकती हैं तो कभी ताउम्र अविवाहित रह जाती हैं। कभी विवाह से मना करने पर तेजाब से भी नहला दी जाती हैं। इनमें से कुछ भैरवियाँ ऐसी भी हैं जो आँख से आँख मिलाकर जवाब देने का साहस करती हैं। इस अध्याय में ऐसी ही भैरवियों की कथा है।

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वह 2006 के जून महीने की एक सुबह थी। मैं कटिहार जिले के बरारी प्रखंड के हिन्दुस्तान संवाददाता दिलीप मिश्रा के साथ इस स्टोरी के सिलसिले में उनकी बाइक पर निकला था। बिहार में यह मेरी पहली घुमन्तू रिपोर्टिंग थी। उन दिनों मैं हिन्दुस्तान अखबार के भागलपुर यूनिट में काम कर रहा था। मेरी ड्यूटी पहले पन्ने पर थी, मगर मुझे खबर लिखने का चस्का था।

इससे छह महीने पहले अपने गाँव पूर्णिया जिले के धमदाहा में मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से हुई, जिन्होंने अपनी बेटियों की शादी हरियाणा और पंजाब के इलाके में करवा दी थी। बदले में लड़के वालों ने उन्हें कुछेक हजार रुपए दिए थे। वे लोग काफी गरीब थे, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, ज्यादातर मुशहर जाति के। एक-दो डिसमिल जमीन में उनकी फूस की झोंपड़ी हुआ करती थी, जिसमें वे अपने बड़े से परिवार के साथ ठुँसे रहते थे। सुबह सब लोग काम की तलाश में निकलते और देर रात जब लौटते तो अगर कुछ इन्तजाम हुआ तो रात का खाना पकता। कुछ लोग भू-स्वामी गिरहथों (गृहस्थों) के घर से जूठा भी बटोर लाते थे।

तो इन लोगों को यह सौदा काफी पसन्द आया। बेटियों की शादी भी हो जा रही है और बदले में पैसे भी मिल रहे हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति को मैंने अपने दोनों गालों में मीठा पत्ता पान की गिलौरी भरे, हाथ में मछली की पॉलीथि‍न लिये बाजार से लौटते देखा। व्यक्ति हमारा परिचित था। जैसा कि गाँवों में होता है, उस व्यक्ति में आए इस बदलाव को देख लोग चौंक गए और उसे दरवाजे पर बुलाया गया। उस भोले व्यक्ति ने फटाफट सारी कहानी बता दी और यह भी बताया कि टोले के कई लोगों ने पैसे लेकर अपनी बेटियों की शादी पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के इलाकों में कराई है, कई लोग कराने की तैयारी में हैं। पत्रकारिता की मेरी सहज बुद्धि जाग उठी थी। मैंने कई सवाल किए। जैसे, क्या वहाँ से उनकी बेटियाँ लौटकर आती हैं? क्या वे वहाँ अपनी बेटियों को देखने जाते हैं? फोन वगैरह करते हैं? इन तमाम सवालों के जवाब में उस व्यक्ति ने ‘ना’ ही कहा। मगर वह सशंकित नहीं था। उसने लड़के वालों से बात की थी, उनका स्टेटस देखा था। वह इस नशे में था कि उसकी बेटी पैसे वालों के यहाँ ब्याही गई है। उसका जीवन सुधर गया है। अब वह अपनी छोटी बेटी की शादी भी ऐसे ही घर में कराएगा। बहरहाल, मैंने इस परिघटना को सामाजिक बदलाव की एक नजीर के रूप में लिखा और वह अखबार पहले पन्ने पर बॉटम में छपी। वह इस मसले से सम्बन्धित पहली खबर थी।

मगर छह महीने के भीतर दो-तीन लोग मुझसे मिलने भागलपुर पहुँच गए थे। उनकी बेटियाँ जो साल-दो साल पहले ब्याहकर पंजाब गई थीं, वे न लौटकर आईं, न उनका फोन आता था, न चिट्ठी-पत्री, न अगुआ कुछ बताता था कि वे किस हाल में हैं। कटिहार के अखबार में दो-एक खबरें भी छपीं। एक खबर इन्हीं दिलीप मिश्रा की थी। इन खबरों को बटोरकर मैं अपने तत्कालीन सम्पादक विश्वेश्वर कुमार के पास पहुँचा और कहा कि सर, यह मामला काफी गम्भीर है। सम्पादक ने तत्काल मेरा तीन दिन का टूर बना दिया और कहा कि जाओ पूरे इलाके में घूमकर खबर करो। जरूरत पड़े तो और वक्त लेना। यह प्रस्ताव मेरे लिए बिलकुल नया था, मुझे मालूम भी नहीं था कि इसे ही घुमन्तू पत्रकारिता कहते हैं। मगर यह काफी आकर्षक था।

दिलीप अपने इलाके में काफी पाॅपुलर थे। यह बात उनके साथ निकलते ही समझ में आ गई थी। कदम-कदम पर उन्हें लोग रोक रहे थे, अपनी फरियाद सुना रहे थे। वह थोड़े झिझक भी रहे थे, क्योंकि उनके पीछे मैं उनका सीनियर, हेडआॅफिस से आया पत्रकार था। मैं दूसरी वजह से आशंकित था, क्योंकि यह काम अपनी पहचान उजागर किए बगैर जानकारी बटोरने का था। इतने पाॅपुलर आदमी के साथ घूमूँगा तो असली कथा शायद ही मिलेगी। पहले उन्होंने इस यात्रा के लिए एक सूमो गाड़ी का इन्तजाम कर रखा था, जो उस जमाने में स्टेटस सिंबल हुआ करती थी। एक स्थानीय नेता को जब पता चला कि हिन्दुस्तान के भागलपुर ऑफिस से एक पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए आया है, तो उन्होंने टंकी फुल करवाकर ड्राइवर के साथ गाड़ी दिलीप मिश्रा के दरवाजे पर भिजवा दी थी। मगर मैंने बड़ी निष्ठुरता से उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। मुझे अन्देशा था कि बड़ी गाड़ी से अगर किसी गाँव में पहुँचा तो लोग नेता या अफसर समझ लेंगे और सच्ची बात नहीं बताएँगे। मैंने कहा, “आपकी मोटरसाइकिल से ही चलेंगे और उसकी टंकी में तेल मैं ही डलवाऊँगा।”

बाद के दिनों में मैंने इसे अपना नियम बना लिया। 90-95 फीसदी रिपोर्टिंग बाइक पर घूमते हुए ही की। यह तो सिद्धान्त था ही कि किसी अधिकार सम्पन्न व्यक्ति की सुख-सुविधा का उपभोग करने से पत्रकार अनावश्यक दबाव में आ सकता है।

दिलीप को लेकर मेरे मन में जितनी शुरुआती आशंकाएँ थीं, बाद में सब निर्मूल साबित हुईं। बहुत जल्द वह मेरे रंग में ढल गए और कहने लगे कि हेडऑफिस से कोई आता है तो प्रखंड संवाददाता से यही सब अपेक्षाएँ रखता है, कटिहार के जिला ब्यूरो प्रभारी का भी यही निर्देश रहता है, इसलिए उसने यह सब इन्तजाम कराया। खैर, फिर अगले तीन दिन तक हम दोनों उनकी मोटरसाइकिल पर किसी मित्र और पेशेवर पत्रकार की तरह घूमते रहे। मैं खबरें बटोरता रहा और वे अपने कैमरे से तसवीरें उतारते रहे। हम लोग सबसे पहले जिस गाँव में पहुँचे उसका नाम था, भैंसदियर।

भैंसदियर का नाम मैंने सुन रखा था। मुझे यह नाम हमेशा अजीब लगता था। भैंस का दियर…हमारे इलाके में लोग देवर को दियर कहते हैं। मगर वहाँ जाकर पता चला कि गाँव को लोग भैंसदीरा कह रहे हैं। तब भेद खुला। दीरा यानी दियारा। तो वह गाँव गंगा नदी का दियारा होगा, जहाँ भैंसों का बथान लगता होगा। पास में ही काढ़ागोला था, वह भी कभी एक दियारा था। सम्भवतः किसी वक्त गंगा, कोसी और महानंदा का संगम होने की वजह से यह इस इलाके का महत्त्वपूर्ण तीर्थ रहा होगा। सिखों के नौवें गुरु तेगबहादुर जब असम की यात्रा पर जा रहे थे तो कुछ दिनों के लिए वे काढ़ागोला में अपने काफिले के साथ ठहरे थे। सम्भवतः बाढ़ की वजह से आगे जाना मुमकिन नहीं रहा होगा। उनके इस पड़ाव के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु उनके पास पहुँचते थे, वे सबको सिखों का प्रसिद्ध कड़ा प्रसाद देते थे। इसलिए इस जगह का नाम काढ़ागोला पड़ गया। इस इलाके के कई लोग सिख बन गए। उन्होंने अपना एक गुरुद्वारा भी बना लिया। इस यात्रा के तीसरे दिन दिलीप मिश्रा मुझे उस गुरुद्वारे में भी ले गए थे। इस पिछड़े इलाके के लिहाज से गुरुद्वारा काफी भव्य था। वहाँ मुझे अपने गाँव के कुछ मजदूर भी मिल गए, जो सिख बन गए थे और उसी गुरुद्वारे में नौकरी करते थे। उनकी कहानी फिर कभी। फिलहाल भैंसदियर गाँव और वहाँ के उन परिवारों की कथा, जिन्होंने समृद्धि देखकर अपनी बेटियों की शादी हरियाणा और पश्चिमी यूपी के पुरुषों से करा दी थी, मगर बाद में उनकी बेटियों का पता नहीं चला।

दिलीप सबसे पहले जिस लड़की के घर मुझे ले गए थे, उसका नाम समिसवा था। हमें देखते ही उसकी माँ रोने लगी और बिलख-बिलख कर कहने लगी, पड़ोस के गाँव के दशरथ चौधरी के कहने पर उसने अपनी बेटी समिसवा की शादी पश्चिमी यूपी के एक युवक से करा दी थी। मगर दो-तीन साल हो गए उसे कोई खबर नहीं कि उसकी बेटी कहाँ और किस हाल में है। जब वह और उसके पति रामौतार ऋषि, शादी के अगुआ दशरथ चौधरी से इस बारे में पूछते हैं, तो वह कहता है कि पहले दस हजार दो, फिर वे उसकी बेटी लौटा देंगे। दरअसल यह दस हजार शादी का खर्चा था। लड़के वालों ने यह राशि दशरथ चौधरी को दी थी, जिसमें से दशरथ चौधरी ने पाँच हजार रामौतार ऋषि को दिए थे। रामौतार ने कुछ पैसे बेटी के कपड़े और गहने पर खर्च किए, बाकी बचे पैसों को खा-पी गया। अब वह एकमुश्त दस हजार रुपए कहाँ से लाए, उसे कुछ सूझ नहीं रहा। उसके घर-द्वार को देखकर भी यह बात आसानी से समझ आ रही थी कि दस हजार तो दूर उसके लिए एक हजार रुपए जुटाना भी मुश्किल होगा। वे अगुआ दशरथ चौधरी की खुशामद करते कि कम से कम बेटी से एक बार फोन पर बात ही करा दे। मगर अगुआ हर बार टाल जाता।

भैंसदियर गाँव के ऋषिदेवों के मुहल्ले में ऐसे तीन-चार परिवार मिले, जिनकी यही कथा थी। ये सब थोड़े से पैसों के लालच में फँसकर अपनी बेटियों को खो बैठे थे। अब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें। बेटियों की माँएँ रोज रोतीं और बाप का जीना मुहाल कर देतीं। बाप खुद को कसूरवार मानकर शर्म से आँखें गड़ाए बैठा रहता। इनकी कहानियाँ सुन-सुनकर मन व्याकुल होने लगा।

फिर दिलीप मुझे पड़ोस के गाँव बाड़ीनगर ले गए, जहाँ हमारी मुलाकात किरण यादव से हुई। किरण से मिलना इस लिहाज से सार्थक रहा कि उसकी शादी भी इसी तरह कराई गई थी, मगर वह अपने ससुराल से जान बचाकर अपने गाँव भाग आई थी। उसको मालूम था कि वहाँ इन लड़कियों के साथ क्या होता है। उससे मिलने से पहले मेरे दिमाग में यही बात थी कि हरियाणा और पश्चिमी यूपी के इलाकों का लिंगानुपात काफी गड़बड़ है, इसलिए वहाँ के लोग हमारे इलाके में शादी करने आते हैं। थोड़े से पैसे खर्च करने पर यहाँ औरतें मिल जाती हैं। पर अगर मामला सिर्फ विवाह का है, तो फिर ये लड़कियाँ लौटकर मायके क्यों नहीं आतीं? उन्हें अपने माँ-बाप से फोन पर ही सही बात क्यों नहीं करने दिया जाता? यह सामान्य मामला तो कतई नहीं था।

किरण ने बताया कि उसके पति उसे कहीं बेचने की तैयारी कर रहे थे, इसलिए वह जान बचाकर भाग आई। उसने बताया कि कोसी-सीमांचल के इलाके से ब्याहकर जानेवाली लड़कियों को वहाँ पत्नी का दर्जा कम ही मिलता है। रात में सोते वक्त भले ही पत्नी बन जाए मगर पूरे दिन मजदूर की तरह खटाया जाता है। लड़कियों की इतनी कमी है कि अक्सर उन्हें चार-चार, पाँच-पाँच भाइयों की बीवी बनकर रहना पड़ता है। और मन भर गया तो बेच देते हैं, किसी और को। खरीदार न मिला तो कोठे वालों को भी और अगर वहाँ भी नहीं बिकी तो किडनी ही बेच देते हैं। यहाँ से जो लड़कियाँ पटरानी बनने का ख्वाब लेकर जाती हैं, वे वहाँ निरी गुलामी का जीवन गुजारती हैं। इसलिए किसी को चिट्ठी-पतरी या फोन करने भी नहीं देते।

किरण के शब्द हमारे ऊपर हथौड़े की तरह बरस रहे थे। हमने कभी सोचा नहीं था कि सीधी-सादी शादी जैसी कहानी का अंजाम इतना बुरा हो सकता है। उसके चेहरे पर जो दर्द था, वह कभी आँसुओं में बदल जाता तो कभी वह गुस्से में रणचंडी की तरह दिखने लगती। उसने फिर हमें अपने भागने की कथा भी बताई। एक अकेली लड़की का पश्चिमी यूपी के सहारनपुर जिले के किसी गाँव से भाग आना आसान भी नहीं था। मगर उसका साथ उसके यहाँ काम करने वाले एक बिहारी मजदूर ने दिया। ट्रेन का टिकट कटाया और अपने साथी मजदूरों के साथ बिठा दिया। पता नहीं उस मजदूर का क्या हुआ। शायद उसने भी काम छोड़ दिया होगा, जैसा वह बता रहा था। किरण डर भी रही थी कि कहीं उसके ससुराल वालों ने मुकदमा न कर दिया हो, यूपी की पुलिस उसे ढूँढ़ने उसके गाँव न पहुँच जाए, उसे लेकर न चली जाए। हालाँकि उसके टोले के लोग कह रहे थे, किसी सूरत में इसे जाने न देंगे।

किरण की बात सुनने के बाद मन निराश हो गया था, कहीं और जाने की इच्छा नहीं थी। पड़ोस के बाजार में हमने थोड़ा नाश्ता किया और चाय बनने का इन्तजार करने लगे। हमने मन बना लिया था कि आज इसी स्टोरी को लिखकर भेज देंगे, आगे की खबर कल करेंगे। मगर रुकना हमारे नसीब में नहीं था। दिलीप के एक इन्फाॅर्मर ने खबर दी कि भैंसदियर गाँव में ही एक दलाल है, जिससे बातचीत की जा सकती है। मगर पहचान छिपानी पड़ेगी। मतलब हमें शादी वाली पार्टी बनना पड़ेगा। चेहरे से मैं थोड़ा परदेसी टाइप लगता था और चंडीगढ़ शहर में एक साल रहने का अनुभव भी था, तो दूल्हा बनने का अवसर मुझे ही दिया गया। दिलीप खुद मेरे लोकल एजेंट बन गए और दलाल के घर की तरफ निकल गए।

तकरीबन बारह-तेरह साल बाद इस कथा को लिख रहा हूँ, मगर मुझे ठीक-ठीक याद है कि दरवाजे पर अपनी खाट पर उस दलाल ने हमें बैठने की जगह दी थी। साफ चादर भी बिछाया था, एक भरा गिलास दही का शरबत भी पिलाया गया। गिलास की गन्दगी के बावजूद मुझे वह पीना पड़ा था। दलाल का नाम तो याद नहीं मगर यह बात मुझे अच्छी तरह याद है कि उसने पचास हजार से शुरुआत की थी और तीस हजार पर मान गया था। लड़की के रूप-रंग और उसके मेहनती स्वभाव का भी उसने जिक्र किया था। उसने बताया था कि पाँच दिनों के लिए आकर इसी गाँव में रहना होगा। उसने हरियाणा के कई गाँवों का नाम लिया जहाँ के लोगों का रिश्ता उसने कराया था। वह ‘लड़की दिलाई’ शब्द का उल्लेख कर रहा था और अपनी आवाज में हरियाणवी पुट लाने की खूब कोशिश कर रहा था। जब अपने काम के लायक जानकारी हमें मिल गई, तो हम कोई और बहाना करके वहाँ से निकल गए।

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