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प्रतिभा कटियार की कहानी ‘विश्वदीपक’

प्रतिभा कटियार की कहानी पढ़िए। प्रतिभा कटियार – लखनऊ में जन्मी, पली-बढ़ी। राजनीति शास्त्र में एम ए, एलएलबी, पत्रकारिता में डिप्लोमा। 12 वर्षों तक प्रिंट मीडिया में पत्रकारिता। कुछ कहानियां, कुछ कविताएं व लेख हंस, नया ज्ञानोदय, कथाक्रम, वागर्थ, समास, अकार, अहा जिन्दगी समेत लगभग सभी हिंदी अखबारों में प्रकाशित। व्यंग्य संग्रह ‘खूब कही’ और मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कारों पर आधारित पुस्तक ‘चर्चा हमारा’ का संपादन। रूसी कवियत्री मारीना त्स्वेतायेवा की जीवनी प्रकाशित। इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन देहरादून में कार्यरत-

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विश्वदीपक

रात का तीसरा पहर था। अमावस वाला पखवाड़ा चल रहा था इसलिए अँधेरा खूब घना था। भादो की उस रात के घने कालेपन पर मोगरे, चम्पा, चमेली, मनोकामिनी, रातरानी, जूही के फूलों ने अपनी सफ़ेद रंगत और मगरूर खुशबू के संग धावा बोल दिया था। विश्वदीपक रात के इस खूबसूरत तिलिस्म से दूर तीसरी मंजिल के अपने कमरे में टीवी के आगे बैठे-बैठे तरह तरह के मृत्यु के ख्यालों से घिरा हुआ था। टीवी पर एक अभिनेता की आत्महत्या की खबर जलजले की तरह चले जा रही थी। विश्वदीपक उस खबर में से सिर्फ आत्महत्या सुन पा रहा था।

खुद को खत्म करने के ख्याल के साथ वो पिछले एक महीने से है। महामारी का इंतजाम कुछ इस तरह किया सरकार ने कि पहले घर बिठाया फिर घर बिठा ही दिया। लाकडाउन खुला और नौकरी गयी। हालाँकि उसने ताली थाली सब बजायी फिर भी नौकरी गयी। उसके थाली बजाने वाले मालिक ने अपने थाली बजने वाले कर्मचारी को नौकरी से निकाल ही दिया। तो अब इस खुले हुए लाकडाउन का वो क्या करे। कम्पनी ने छंटनी की है तो किया भी क्या ही जा सकता है। वही कम्पनी जिसका नाम सहायतार्थ आर्थिक मदद करने वालों की सूची में मुस्कुरा रहा था।

विश्वदीपक के सर पर घर परिवार की कोई जिम्मेदारी थी नहीं इसलिए अपने बाकी नौकरी खोने वाले साथियों की अपेक्षा वह कम परेशान था। किसी के बच्चे की फीस, किसी के माँ बाप की दवाइयां, किराया, किसी के सर पर लोन… लोग कराह उठे हैं। महामारी के डर से कम नौकरी जाने के गम से ज्यादा परेशान हैं लोग। आखिर बिना नौकरी के भी जान कहाँ बचने वाली है।

विश्वदीपक को बहुत गुस्सा आता। उस गुस्से में यह हुआ कि पहले अनलॉक में उसने खूब सारी बियर खरीद ली। बियर और चखने के साथ आत्महत्या के ख्याल को चुभलाना मन में भरी तमाम कुंठाओं को चुभलाने जैसा था। हालाँकि सरकारी नौकरी में अच्छी पोस्ट पर सेवारत पैसे पापा भेज देंगे फिर भी उसे लग रहा था कि उसे दुखी तो होना ही चाहिए। आखिर नौकरी गयी है। तो वो दुःख को महसूस करने के उपक्रम में लग गया। तमाम उपक्रमों के बावजूद दिन के किसी न हिस्से में उसका मन चुपके से खुश भी हो लेता। यह खुश होना उसके संग रहने वाले परम मित्र आलस के कारण भी सकता है। लेकिन जैसे ही वो ख़ुशी को अपनी देह के भीतर रेंगते हुए महसूस करता उसे गिल्ट होने लगता। बताओ बन्दे की नौकरी गयी है और इसे ख़ुशी महसूस हो रही है। फिर वो गम की महफ़िल सजाता और बचपन से अब तक के सारे दुखों को, अपमान को याद कर-करके बुलाता।

बियर, मूंगफली और दुखों की महफिल। विश्वदीपक डूबने लगता। उसे क्लास 5 में किये गये अपने पहले प्रपोजल का रिजेक्शन याद आ गया। कित्ती सुंदर आँखें थीं नेहा की। टिफिन भी शेयर करती थी। होमवर्क में भी मदद करती थी। परीक्षा में नकल भी करा देती थी। एक दिन विश्वदीपक ने इंटरवल के बाद उसके टिफिन में आई पूड़ी और आलू की सब्जी खाने के बाद उसे बोला,’ आई लव यू’ और उसे किस करने को बढा। नेहा चिल्ला दी। उसने मैडम से शिकायत कर दी। हाय राम कित्ती तो बेज्जती हुई थी उसकी। सबके सामने नेहा ने बोला था कि इसने मेरे को आई लव यू बोला। सारे बच्चे मुंह पर हाथ रखकर हाहाहा करने लगे। अगले दिन मम्मी पापा को भी स्कूल बुलाया गया और पापा ने सारी बात सुनकर सबके सामने चमाट भी लगा दिया। विश्वदीपक चमाट की उस स्मृति में नेहा की खुश आँखों को सह नहीं पाया। पहली बार उसे नेहा की बड़ी-बड़ी आँखों को देखकर गुस्सा आया।

उसी गुस्से में उसने दूसरी बोतल। बियर की दूसरी बोतल के साथ ही बचपन के किस्से जवान हो गए और कॉलेज में अंशिका, रूबी, स्निग्धा ने उसे कैसे लताड़ लगाई थी का किस्सा सामने आ खड़ा हुआ। इन सब लड़कियों को वो अलग-अलग मैसेज किया करता था। उसे क्या पता कि सब आपस में उन मैसेजेस को मिला लेंगी और उसकी बजा देंगी।

सिर्फ प्रेम में उसकी बेज्जती नहीं हुई पढ़ाई में लद्धड होना भी करेले पर नीम जैसा था। लटक-लटक के किसी तरह बीए किया और एमए प्राइवेट भर दिया। पापा ने अपने दोस्तों से जब उसके लद्धड होने की चिंता व्यक्त की तो रामेश्वर अंकल ने कहा भेज दो अख़बार में लगा लूँगा। और इस तरह विश्वदीपक पीछे वाले दरवाजे से बिना पत्रकारिता की पढाई किये जोरदार इंट्री लेकर बन गए पत्रकार। बाद में उनके लिए एक सर्टिफिकेट जुगाड़ा गया पत्तलकारिता, सौरी पत्रकारिता का। थोड़े ही दिन में राजा बाबू ऐसा चमके कि सारे फर्जी डाक्युमेंट बनवाने का ठेका उन्होंने उठा लिया। अंकल का हाथ सर पर था और विश्वदीपक का भौकाल एकदम टाईट था।

तीसरी बियर की बोतल के साथ विश्वदीपक की आत्ममुग्धता फ्रंट पर आ गयी और उसे खुद पर नाज़ होने लगा कि ऑफिस में कैसे सब उससे थर-थर कांपते थे। सबको पता था सम्पादक उसके अंकल हैं तो मजाल है कोई चूं कर जाय। उसकी एक से एक फर्जी खबरों की तारीफों के ढेर लग जाते। मुश्किल तब होती है जब दूसरों को बेवकूफ बनाते हुए खुद को भी बना बैठते हैं। विश्वदीपक का यह भूत उतारा रामरतन ने। देर से पानी पिलाने पर चिल्लाते हुए जब विश्वदीपक ने रामरतन को फटकारा तो भरे एडिटोरियल में सबके सामने विश्वदीपक को ऐसा धोया कि भाई साहब।।।जलजला ही आ गया। उसने उठाकर आईना रख दिया विश्वदीपक के सामने कि अंकल के भरोसे जो अकड़ है वो अंकल के जाने के बाद कहाँ गुम होगी पता भी न चलेगा। विश्वदीपक रामरतन को मारने को दौड़ा तो रामरतन ने भी किलो किलो की गालियाँ सुना दीं। अनुज ने जब मारने को लपकते विश्वदीपक को रोका तो वो मन ही मन खुश हुआ कि रामरतन के हाथों पिट जाने के अपमान से तो बचा कम से कम। देख लूँगा देख लूँगा के सद्वचनों के साथ विश्वदीपक और रामरतन दोनों अलग हुए। विश्वदीपक ने देखा उस वक्त महिलाएं तो नहीं थीं कहीं। सिर्फ रागि थीलेकिन वो अपने केबिन में फोटो करेक्ट कर रही थी तो शायद उसने ये सब न देखा हो यही सोचकर राहत की सांस ली विश्वदीपक ने। बाकी लोगों के सामने कॉलर ऊंचा करके खिसियाहट छुपाते हुए वो बोला, ‘गलती मेरी ही है छोटे लोगों के मुंह लगना ही नहीं चाहिए।’ हालाँकि सच्चाई सबको पता ही थी तो सब मुंह छुपकर अंदर ही अंदर हंस ही रहे थे। कुछ को तो पुराने बदले पूरे हो गये जैसा भी अनन्द आया।

अगले दिन अंकल ने अपने केबिन में जब उसे डांटा तब उसे पता चला कि रामरतन मैनेजर का दूर का साला है। अब साले की हैसियत भतीजे से टकराएगी तो जीतना तो साले को ही हुआ। बियर घूँटते हुए विश्वदीपक आत्ममुग्धता की जिस गली में विचरने गया था वहां भी उसे अपनी इज्जत के तार बिखरे ही मिले।

उधर टीवी चैनल पर मीडिया कथित दोषियों की फजीहत करते हुए अपनी तरह से सजा देने पर तुला हुआ था और इधर विश्वदीपक निष्कासित पत्रकार होने की पीड़ा को सह नहीं पा रहा था। यूँ अगर वो नौकरी से निकाला न गया होता तो वो भी इन्हीं गिध्धों में शामिल होता लेकिन फ़िलहाल तो वो कार्पोरेट वाले गिध्धों का भोज ही बना हुआ है। अंकल को अपनी ही नौकरी बचाने की मुश्किल हो रही भतीजे को कौन पूछे।

चौथी बोतल खोलते हुए विश्वदीपक ने मन ही मन तय कर लिया कि वो आत्महत्या कर लेगा फिर वो हीरो हो जाएगा। आखिर वो पत्रकार तो है ही पत्रकार बिरादरी तो जरूर उसकी खबर को फुटेज देगी। पापा को भी सबक मिलेगा जो हमेशा उसे डांटते रहते हैं। और मम्मी जो हमेशा जीजी की तरीफ करती हैं उन्हें भी सबक मिलेगा। जब इकलौता बेटा खोयेंगी तब वैल्यू समझेंगी।

चौथी बोतल आधे पर अटकी थी और रात भी आधी ही थी कि फोन बज उठा। नितिन का फोन था, ‘अबे सुन, जल्दी से हास्पिटल आ जा मनोज निकल लिया यार। धोखेबाज निकला वो बे।’ नशे की हालत में आत्महत्या के विचारों में डूबा विश्वदीपक एकदम से हिल गया मानो। मृत्यु जब सामने आ खड़ी हुई तो हालत सूखे पत्ते सी हो गयी।

अगर रात के तीसरे पहर वो नशे की हालत में निकलेगा तो पक्का पकड़ा जाएगा। उसने दो दो मास्क पहन लिए। गाड़ी निकालने गया तो उसे दो-दो गाड़ी नजर आयीं। उसने चारों तरफ देखा सुनसान अँधेरा था। सिर्फ रात के सफ़ेद फूल अपनी खुशबू के संग बतिया रहे थे। चौकीदार भी कोने में बैठा ऊंघने लगा था। ‘अगर मैं किसी गाडी से या दीवार से टकरा गया तो? मनोज के साथ मैं भी निकल लूँगा।’ थोड़ी देर पहले खुद को खत्म करने के विचारों से जूझ रहा विश्वदीपक सामने मौत खड़ी देखकर घबरा गया। कौन कमबख्त कहता है आत्महत्या कायरों का काम है बड़ी हिम्मत चाहिए कसम से। वो वापस लौट आया। आते ही बिस्तर पर पसर गया और उसे नींद ने घेर लिया। टीवी ऑन ही रहा और उस पर खबरों का  जलजला कायम रहा।

धूप चढ़ आई और उसकी आँखों में झम्म से कूद गयी तो उसकी आँख खुली। पिछली रात उसके सर पर सवार थी। मनोज… ओह। उसे हास्पिटल जाने की सुध आई। मुश्किल से वाशरूम तक गया। फ्रेश होकर लौटा तो बचे खुचे नशे को उतारने की गरज से ब्लैक कॉफ़ी के लिए पानी चढ़ा दिया। साथ ही नितिन को फोन लगा दिया। दिल भारी था उसका। कैसे सामना करेगा वो उसके घरवालों का। अभी तो पहुंचे न होंगे, दोस्त तो आ गए होंगे यह सब मन में चल रहा था, उधर नितिन को घंटी जा रही थी इधर कॉफ़ी का पानी उबलने में मीडिया के पत्रकारों से होड़ लिए पड़ा था। नितिन ने फोन उठाया। ‘हैलो…’ आवाज ऊंघती हुई सी थी उसकी। ‘सौरी यार रात पहुँच नहीं पाया। मनोज…’ कहकर हलक से थूक गटका उसने और बात पूरी की ‘बता किस हास्पिटल में आना है?’

ऊंघते हुए नितिन की आवाज अब चौंकने वाले नितिन की आवाज बन गयी थी। ‘क्या हुआ? सुबह-सुबह हास्पिटल क्यों जाना है भाई’

‘अरे मनोज…’ विश्वदीपक रुक रुक कर बोला।

‘क्या हुआ मनोज को? यहीं तो सोया है मेरे कमरे में।’ नितिन ने कहा और मनोज को उठाते हुए बोला’ अबे उठ ये तेरे को हास्पिटल भेज आया नशे में। ले बात कर’ नितिन ने मनोज को फोन टिकाते हुए अपने मुंह पर तकिया खींच ली।

‘अबे तू दारू कम पिया कर और न्यूज़ चैनल तो एकदम ही न देखा कर। साला फ्री फंट में हास्पिटल भेज दिया। वैसे टांग-वांग तो न टूटी थी मेरी?’ मनोज ने जमुहाई लेते हुए कहा।

‘अरे नहीं यार… ठीक था तू’ झेंपते हुए विश्वदीपक बोला। ‘चल सोने दे अब।’ कहकर मनोज ने फोन काट दिया। कॉफ़ी का पानी खौले जा रहा था लेकिन बिना कॉफ़ी पिए ही विश्वदीपक का पूरा नशा उतर चुका था।

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पता- सिल्वर रॉक अपार्टमेंट C-109, कर्जन रोड, डालनवाला, देहरादून, उत्तराखंड, 248001

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3 comments

  1. A. Charumati Ramdas

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति है, प्रतिभा जी!

  2. A. Charumati Ramdas

    पहली बार आपको पढ़ने का मौका मिला, प्रैभा जी! बहुत रोचक ढंग है आपके लिखने का…

  3. प्रतिमा बहुत सुंदर कहानी विश्व दीपक बहुत अच्छी लगी अभी अभी पढ़कर और मैं तुमको कमेंट लिख रही हूं और तुम्हारा चेहरा मेरी नजरों के सामने है हंसता हुआ बहुत सारा प्यार

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