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आयो गोरखाली और गोरखाओं का इतिहास

गोरखाओं के इतिहास पर एक किताब आई है ‘आयो गोरखाली – अ हिस्ट्री ऑफ द गुरखा’स’, जिसके लेखक हैं टिम आई. गुरुंग. वेस्टलैंड से आई इस पुस्तक पर आज कलिंगा लिटेररी फ़ेस्टिवल के भाव संवाद में लेखक से बातचीत करेंगे नेपाल मामलों के विशेषज्ञ अतुल कुमार ठाकुर। फ़िलहाल आप किताब के बारे में पढ़िए-

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गोरखाओं के स्वर्णिम इतिहास में एक और अध्याय जोड़ने आ रहे हैं, ‘आयो गोरखाली – अ हिस्ट्री ऑफ द गुरखा’स’ के लेखक टिम आई. गुरुंग, कलिंग लिटरेरी फेस्टिवल के भाव-संवाद में और उनसे गुफ्त-गू करने के लिए साथ में होंगे लेखक और कॉलमनिस्ट अतुल कुमार ठाकुर। इस महत्त्वपूर्ण सत्र का प्रसारण होगा 28 नवंबर को शाम 6 बजे से, कलिंग लिटरेरी फेस्टिवल के ऑफिशियल (फेसबुक, ट्विटर, यूट्युब) पेज से।

‘आयो गोरखाली..’ कहनी है 1767 के नेपाल की। पृथ्वी नारायण साह के शासन में उन्नति की ओर बढ़ता हुआ एक छोटा सा साम्राज्य। कुछ ही दशकों में उनकी गोरखा सेनानी ने एक शक्तिशाली साम्राज्य कायम कर लिया जिसकी सीमा पश्चिम में कांगरा से मिलती थी तो पूरब में तीस्ता से। इस विशाल प्रांतर में शामिल था वर्तनमान हिमाचाल प्रदेश और उत्तराखंड का बहुत बड़ा भूभाग और लगभग पूरा का पूरा नेपाल और सिक्किम।

1815 में ब्रिटिश साम्राज्य और गोरखाओं के बीच एक नये सैन्य संबंध की शुरुआत हुई। गोरखाओं के युद्ध कौशल से प्रभावित होकर ब्रिटिश आर्मी में उनकी भर्ती की जाने लगी। गुरखा लगभग एक शताब्दि तक अनेक युद्धों में अतुल्य शौर्य का परिचय देते रहे। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में उनके पराक्रम के लिए उन्हें अनेक शौर्य पदक प्राप्त हुए।

1947 में भारत की आज़ादी के बाद गुरखा प्रमुख रूप से ब्रिटिश, भारतीय और नेपाली सेनाओं में बंट गए।

एक पूर्व ब्रिटिश गोरखा, टिम आई. गुरुंग द्वारा लिखित ‘आयो गोरखाली’ इस समुदाय के किसी सदस्य द्वारा लिखा गया पहला ऐतिहासिक कार्य है, जो उन वीरों की गाथाओं को जीवंत कर देती है जो केवल अपनी ही नहीं अन्य सेनाओं में भी सम्मानजनक सेवा देते हुए अपने परंपरागत सैन्य भावनाओं को अक्षरश: जीते रहे।

यह कहानी गोरखाओं के सैन्यकर्म और वीरता से भी आगे की है। यह कहानी है लोचदार मानवीय भावनाओं की, एक ऐसे छोटे समुदाय की जिन्होंने विश्व के इतिहास में अपने लिए एक खास मुकाम बनाया है।

लेखक टीम आई. गुरुंग का जन्म 1962 ई. में पश्चिम मध्य नेपाल के धामपुस नामक गुरुंग गाँव में हुआ था। अपने दादा और चाचाओं के पदचिन्हों पर चलते हुए, उन्होंने 17 साल की आयु में ब्रिटिश गोरखा ज्वाइन किया था और तेरह वर्षों तक सेवा देने के बाद 1993 में अवकाश प्राप्त होकर अगले बीस वर्षों तक चीन में अपना व्यवसाय करते रहे। अपने पचासवें जन्मदिन से पूर्व टीम ने एक पूर्ण-कालिक लेखक बनने का फैसला लिया जिसने उनका जीवन बदल दिया। उसके बाद से वे पंद्रह उपन्यास लिख चुके हैं। टीम अभी अपने परिवार के साथ हाँग का‍ँग में रहते हैं।

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