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कवि चोर के लव जिहाद की कथा: मृणाल पाण्डे

चौरपंचाशिका से लेकर उत्तराखंड के लोकगीतों में विस्तृत कथाओं का रस घोल यह कथा तैयार की है जानी मानी लेखक मृणाल पाण्डे ने। बच्चों को न सुनाने लायक़ बाल कथाएँ सीरीज़ की यह 21 वीं कथा ज़रा देर से आई लेकिन लव जिहाद क़ानून की व्यथा के बीच चोर कवि और राजकुमारी की सैकड़ों-हज़ारों साल से सुनी सुनाई जा रही कथा का रस है। आप भी पढ़िए-

(कथाकार जन्मजात उठाईगिरे होते हैं। जहां रसवंत किस्सा दिखा, तोते की तरह लोभ संवरण न कर सके, तुरत उसे कुतर लिया। फलों की बगीची की ही तरह कथाओं के बाग से कुछ पुराने गल्पों (गप्पों?)में चोंच मारने को पुराने समय के संस्कृत मीमांसाकारों ने चोरी नहीं स्वीकरण कहा है। यानी मूल को पचा कर उसकी नये सिरे से पुनर्रचना। अस्तु।

प्रेम की इस कथा का स्वीकरण 8वीं सदी की एक लघुप्रेम कथा चौरपंचाशिका और उत्तराखंड के लंबे लोकगीतों को एक साथ कथारस में घोलते हुए बना है । चौरपंचाशिका वसंततिलका छंद के पचास श्लोकों में एक कवि हृदय चोर और राजकुमारी के बीच के निषिद्ध प्रेम की आत्मकथा कहती है। धारणा है कि यह दुखांत प्रेमकथा काश्मीरी कवि बिल्हण ने रची।

पर धारणा का क्या?

सवा अरब के देश की सवा अरब धारणाओं पर क्या बिचारे नीति आयोग प्रमुख ने नहीं कह बैठे कि भारत में लोकतंत्र कुछ अधिक ही है!

उनकी जो गत बनी सो बनी, पर सरकार बहादुर के कई बड़ों की राय में लव जिहाद यानी दो वर्जित प्रेम जो है सो इस्लाम की फतह के साथ ही भारत में घुसा। हम असहमत हैं।

वसंततिलका छंद में कही गई चौरपंचाशिकी ठोस सबूत है कि 8वीं सदी के म्लेच्छ विहीन अतीत में भी दो अलग अलग जाति कबीलों के बीच निषिद्ध प्रेम का बिरवा अकारण, अनायास ही उपज जाय करता था। और उनका अंत भी सदा भला नहीं होता था।

चौरपंचाशिका के तीन पाठ काश्मीर, वाराणसी और दक्षिण भारत से मिलते हैं। क्या इसे इस बात का प्रमाण माना जाये कि सामाजिक तौर से वर्जित प्रेम हमेशा से एक अखिल भारतीय रुचि और युवा प्रयोगधर्मिता का विषय रहा है। लिहाज़ा कुल जमा यह, कि हमारे पूर्वज भी यह गुनाह बार बार करते रहे हैं और उनके कबीलों-बापों का रिएक्शन भी पीढी दर पीढी बदला नहीं है।

शायद हम सभी रोमांटिकों की तरह चौरपंचाशिका सरीखी कविता के प्रेमियों को उम्मीद थी, कि जब तक जिहादी कवि सूली तक पहुंचेगा, कला प्रेमी राजा उसकी कविता से पिघल चुका होगा। और उसे प्राणदान देकर शायद राजकन्या का हाथ भी उसे थमा देगा। पर हा हंत, इस पर भी मतभेद है।

करणा से पिघल कर अपने चुगे फलों से हमने इस कथा में सुदूर उत्तराखंड से सुनी निषिद्ध प्रेम की अमर कथा मालूशाही को भी ला जोड़ा जिसे घुमंतू गायक गाते आये हैं। द्रोणगिरि पर्वत की छाया में अलग कबीलों: तिब्बती सीमांत के अमीर शौका व्यापारी सुनपति की बिटिया राजुला और बैराठ के क्षत्रिय राजा के बेटे का प्रेम प्यूणी के फूल सा स्वयमेव उपजा, फिर सुनजै(सोनजुही)की लतर सा परवान चढ गया! राजुला मालूशाही की कथा अलकनंदा की तरह साथ साथ बहती आई अनेक उमगती, उच्छृंखल प्रेमकथाओं को भी ले आई। अब उन सबके संगम से बनी इस प्रेम सुरसरि को जो लेखक जगह न दे, उसकी लेखनी को सराप न लगता? सो भूल चूक लेनी देनी सहित हम शुरू करते हैं राजकुमारी यामिनी पूर्णतिलका और चोर कवि के लवजिहाद की कथा।)

एक राजा था। उसकी दुलारी बेटी यामिनी पूर्णतिलका ने एक दिन अपनी सहेलियों से कहा: ‘ हम छोरियों ने जनम से अब तक महलों के भीतर बूढियों की चौकीदारी तले उनकी बासी कथायें और प्रवचन सुन सुन कर अपनी मूंडी महलों में ही छिपाये रखी। आज तक उनकी ही आंखों से हमने जितनी उन्ने दिखाई बस उतनी दुनिया देखी। चलो आज जब वे दिन में खर्राटे भर भर कर लार चुआती हुई सोती होंगी, हम चुपचाप जाकर स्वयं बाहर की दुनिया भी देख आयें ।’

छोकरियां तो छोकरियां। बूढियों को चरका देकर बाहर भागना सबको सुहाया। राज़ी हो गईं। तुरत।

गर्मी की दोपहर में जब रनवास से गेट पर तैनात सब बूढी कुटनियाँ और खोजासरा फसाफस सोते थे, छोकरियों की चिडियों सी टोली बाग के रास्ते फुर्र हुई । पास जाकर वहीं किसी झुरमुट में कोई बडी मीठी बंसी बजती सुनी। छोरियाँ राजकुमारी के साथ साथ उधर को चल दीं।

जाकर क्या देखती हैं? कि बस एक साँवली, सलोनी बोतल सी सुती जवान मरद की जाँघ, पेड की पत्तियों के बीच लटक रही है। पत्तियों में छुपा उसका अनदिखता मालिक बांसुरी से उनको कुछ कुछ चिढाता सा ऐसे टेर रहा है, जैसे उसे अटल भरोसा है वे खिंची चली आयेंगी।

शैतान राजकुमारी ने पेड़ को झकझोरा।

अचानक कूद कर एक रूपवान बलिष्ठ युवक पेड से निकल कर धम्म से राजकुमारी के ऐन सामने आन खडा हुआ।

‘मुझे पीने को पानी दे दो!’वह राजकुमारी की आंखों में आंखें डाल कर बोला।

राजदुलारी राजकुमारी ने नहीं दिया। क्यों देती? पानी खींचना तो दूर, वह जो दसियों को अपने लिये एक गिलास पानी लाने को कह सकती थी इस ढीठ लंगर को पानी काहे देती?

’क्यों दूं तुझे पानी?तू मेरा कौन?’ राजकुमारी हंस पड़ी। उसके गालों पर दो गढे। युवक को लगा वह उनका ही रस पी कर तृप्त हो सकता है।

राजकुमारी हंसी तो उसकी सब सहेलियों को भी हंसी का दौरा सा पड़ गया।

झनकारो, झनकारो, झनकारो,

गोरी प्यारो लगै है तेरो झनकारो।

‘तुम हो कौन?’ यामिनी रत्नतिलका ने पूछा।

‘मैं मनुष्य हूं और अपनी मां के पेट से निकल कर आया हूं।’

बात सुन कर हंसी की एक और लहर छोरियों को हिला गई।

‘तुम्हारे साथ ब्याह कर लूं तो भी पानी नहीं दोगी?‘

‘तेरे जैसा पति हुआ तो उससे तो मैं सौ घड़े पानी भरवाऊंगी।’ इतना कह कर नटखट छोरियों की वह इठलाती टोली पैंजनियां बजाती महल को चल दी।

मृगी सी चितवनवाली कनकचंपा की रंगतवाली राजकुमारी जाने क्यों मुड़ मुड़ कर बांसुरीवाले युवक देखती रही।

‘बजेली झांवर छमाछम ओ हो, ठमाठम चले जब

पीछे देखके आगे आगे जानेवाली,..’

मन सोचता रहा और पैर लौट चले। पैरों के लौटने से क्या? मन सोचता रहा, बजेली तेरी झांवर छमाछम ओ हो!

पानी पिलाओगी मुझे?

बाहर एक बांसुरी है जो बंद भी हो जाती है। पर भीतर की यह कैसी बांसुरी है जो बंद नहीं होती। फिर अपने अपने ठौर में दाखिल हो कर दोनों मन बाहर से दूर भीतरघुसरू हो गये ।

एक दूसरे से अपनी अपनी दूरियाँ तय कीं, पर मन पीछे जाता, पैर आगे।

राजकुमारी ने खाना न खाया।

चोर ने कमंद नहीं फेंकी।

हुंह, शादी करेगा मुझसे!

मुझसे?

रात, रात, रात। किसी अनजान नदी के कलकल जल की सी स्वच्छ हंसी पीछा करती। अकेला कवि उठता, पानी पीता, नींद फिर भी नहीं आती। हाय रे किस घड़ी में सामना हुआ राजा की उस कनकवर्णी कन्या से। और क्या जाने वह मृगनयनी कि देश का सबसे शातिर चोर और कवि, जिसे दस सालों से उसके पिता की सारी गुप्तचर सेना खोजती थी, उसके गाल के गढों में डूब चुका, ठगा-लुटा अंधेरे में खुल गई खिडकी से छला खडा था।

तू कहीं खोजी नहीं जा सकती थी, युवक ने नदी पर झुकते हुए सोचा। तू दरअसल कहीं है ही नहीं, न इस वन के अंधेरे में, न किसी राजमहल की बगीची में। न तू बांसुरी में है, न मेरे होंठों की उस फूंक में जो उसमें सुरों के परान भर कर तेरे परान मुझ तक खींच लाती है। तू सिर्फ मेरी आंख की पुतली में बंद अपना ही रूप है।

कवि मन भ्रमर समान भटकता फिरता रहा जब तक वह चेहरा आंख से ओझल न हुआ। फिर उसने आंखें बंद कर लीं, और सब कुछ अंधेरा हो गया। फिर वह अपनी कमंद से घड़ा भरने लगा।

उसी की तरह आधी रात को हिमालय की घाटी में बैराठ का राजकुमार मालूसाही भी जागता था।

उसकी मां पूछती: बेटा क्या द्वार पर कोई भूखा खड़ा है? या कि तेरा चरुआ बैल गोठ में नहीं? या तू किसी के प्रेम में पड़ गया है? तू मेरा इकलौता, फिर भी तुझ के भीतर कितनी दु:ख हैं? बोल, माँ से कैसी शरम जिसने तुझसे भी पहले तुझको नंगा देखा है।

मां, मालू गोद में सर छुपा कर बोला। तुझसे क्या छुपा है? यहाँ तो हाय सुवा रात ढली, कि आंख बंद करते ही मखमली अंगिया पहिरे सुनपति शौक की नाज़ों पली राजुला दिखती है। पुन्यू के चंदा (पूर्णचंद्र) जैसी, बुरुंश के फूल जैसी, फेरे हुए पान जैसी। उसे देखा नहीं, कि मुझे ‘खुद’ लग जाती(अनकही व्यथा व्याप जाती) है। सब कुछ अलोना अनमना।

बेटा तो जी हलका करके गोद में सो गया। डरी मां रात भर जागती रही, हाय इसके बाप राजा को पता चला तो? उसके बाप सुनपति शौक को पता चला तो?

मां को भी सोचते सोचते ‘खुद’ लग जाती।

राजकुमारी यामिनी पूर्णतिलका को भी रात भर करवटें बदलते कभी वंशी की धुन  सुनाई देती, कभी हरे भरे नये चिकने पत्तों के बीच सोने की गदा सी जाँघ अचानक कूद कर एक बाँके युवक में बदल जाती। तिरभंगी खडा हो कर भारी मेघ जैसा एक कंठ हंस कर पूछता, ‘पानी पिलाओगी मुझे?’

प्रेम में पराया हुआ मन अपने ही लिये परदेस। न ही दिन दिन पान के पत्ते सी कुम्हलाती बेटी का बाप कुछ समझ पाता।

बस माँओं को ‘खुद’ लग जाती जो सब समझ रही होतीं।

हे देवा कैलास परबत के जोगी – दक्ष परजापति की राजलली, छौनों की रक्षा करना। तुम जनों ने भी तो अपने मन से एक दूसरे का हाथ थामा था?

पर दक्ष का कोप? बबू। सगे दामाद को भी नहीं न्योता जज्ञ में। बेटी जल मरी। दामाद पगला गया। क्या मिला किसी को?

माँओं को ‘खुद’ फिर लग जाती।

तू बांसुरी क्यों बजाता है? गुस्से से सोचती यामिनी पूर्ण तिलका की नज़र गई, अरे! यह क्या? उसकी खिड़की के नीचे सौ घड़ों में पानी भरा रखा था ।

जंगली बिल्ले की फुर्ती से वह उसके पीछे से आया और फुसफुसा कर बोला,’ले आया तेरे लिये सौ घडे जल के! अब तो पानी पिला!’

पानी पीने लगा तो तृप्त ही न हो। न वह, न यह। युग युग की प्यास।

हर दिन जलाभिषेक।

आखिरकार कवि का वही हुआ जो होना था । राजकुमारी के शयनकक्ष से पेड़ पर छलांग लगाता वह धरा गया।

तेरी यह मजाल कहते हुए उसे बाँधा गया। पीटा गया। फिर उसे सूली पर चढाये जाने का शाही फरमान जारी हो गया। राजा के घर में सेंध?

भैंस की प्यास और क्षत्री के कोप की कोई सीमा नहीं होती । दरबार में बेडियों में जकड़े चोर कवि को देखते ही दूध के उफान सा क्रोध राजा के सर चढ उफ़ना गया। पर कहता क्या? वह चोर जिसे दस बरस से राज की सारी सेना खोजती थी,  उसे शयनकक्ष मे पनाह देती उसकी अपनी लड़की को भी तो बाप के मान का ध्यान न रहा!

दंड दो इसे, कठोरतम दंड। हुकुम हुआ।

महामंत्री ने हाथ जोड दिये,’महामना, आपके कलाप्रेम से देश परिचित है। मातृभाषा के पुजारी विमल सरस्वती दास हो आप! और यह दु्ष्ट सरस्वती का चरदपुत्र कवि! राष्ट्रहित में मेरा अनुरोध है सूली तक ले जानेवाली पचास सीढियाँ चढते चढते इस अभागे के मुख से उसकी अंतिम पचास कवितायें सुन ली जायें।

प्रार्थना मंज़ूर हुई ।

सूली वाले दिन काव्यप्रेमियों और साहित्य संगीत से शून्य किंतु अपनी ही धृष्ट संतान से छले गये माता पिता और जबरन अनचाहे विवाहों मे डाले गये नागरिकों की भारी भीड़ जुट गई।

कवि चोर जंज़ीरों में बंधा सीढियां एक एक कर चढने लगा। ढिठाई से मुस्कुराता हुआ वह सीढी दर सीढी एक एक अद्भुत् श्लोक में अपने विगत प्यार की कथा कहता चला। उसका लक्ष्य राजा नहीं, जो यामिनी पूर्णतिलका का बाप था। मंत्री भी नहीं जो उसकी कविता अपने नाम से छपा कर उसे स्वर्णमुद्रायें भेजता रहा था। वह भीड भी नहीं जो अपने विनष्ट सपनों की सज़ा उसे भुगतते हुए देखने का पर उत्पीड़न सुख लेने आई थी।

उसकी कवितायें सिर्फ उन भयभीत मृगी जैसे नयनों को संबोधित थीं, जिनकी स्वामिनी खंभे के पीछे छिपी खडी उसको सुनती थी।

‘आज फिर देखता हूं मन की आंखों से

सपनों के भंवर तिरते उन आंखों में,

जब जब शरीरों ने हमको आनंद में गोता लगाने को पुकारा

जब हम मछुआरे धीरज की डोर सहित मछलियों के बीच सानंद डूबते थे,

हमारे ऊपर उड़ती चिड़ियों की डार की छाया सी

बन गई थी दुनिया राजा रानी प्रजा और चोरों कवियों समेत।

माया हमको भंवर में घूमते दारु खंडों सा घुमाती रही…

आज जब प्राण कंठागत हैं

उस अनावृत रूप छुरी का स्पर्श

फिर जबरन खोल देता है उजली खिड़की,

कुछ दूर तक नदी, पहाड़, फिर भंवर, बस भंवर में आनंद से डूबता मन।’

इधर चोर की निष्प्राण देही झूली, उधर राजकुमारी पछाड़ खाकर गिरी फिर न कभी उठी।

आग ने दोनों को दाग दिया। नदी ने दोनों को बहा दिया।

कुछ लोग कहते हैं, राजा ने चोर को माफ करके राजकुमारी का हाथ उसे पकड़ा दिया था ।

कुछ का कहना है कि एक झिलमिल करता रथ उतरा आकाश से और सहसा सबका जी फीका हो गया। प्राण अकुला उठे और इसी बीच इंद्र की परियाँ आकर राजकुमारी और चौर कवि की अंगूठे बरोबर आत्मा को गाती हुई देवलोक ले गईं।

कुछ से हमने यह भी सुना कि कवि ने मरते मरते अपनी मृत प्रेमिका को अपने प्रिय धनुष की सारी आभा दे दी। लडकी मर कर बादलों की ओट हो गई तो लड़के की आत्मा उसके गिर्द का इंद्रधनुष बन गई। जब जब इंद्र धनुष उगता है, तब तब मोरों के जोडे केहां केहां कर नाचने लगते हैं। उनका आनंद देख कर आसमान से टप टप बादलों से जल गिरता है।

भोले लोग उसे कहते हैं वर्षा!

अब किसी को कैसे पता कि क्या हुआ। जो हुआ सो ठीक नहीं हुआ यह सब जानते हैं।

हमने जितना सुना उतना कहा। बाकी तुम जानो, तुम्हारा काम!

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