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मुझे दस जूते मार लीजिए लेकिन घर से मत निकालिए

बनारस का नाम आने पर लेखक शिव प्रसाद सिंह का नाम ज़रूर आएगा। उनके ऊपर एक बहुत अलग तरह का गद्य लिखा है बीएचयू की शोध छात्रा रही प्रियंका नारायण ने। आप भी पढ़िए-

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मुझे दस जूते मार लीजिए लेकिन घर से मत निकालिए

दो पथिक (पहला- आगंतुक, दूसरा – आटविक)

पथिक – महाकाल विश्वेश्वर की नगरी में यह कोलाहल क्यों आटविक? विंध्य की ये मनोरम उपत्यकाएं, प्रपातों का हाहाकार, चंद्रप्रभा का आसिंजनकारी प्रवाह, आटविक जनों का सादा- सरल अनुरागमय जीवन, नौगढ़ के ये अरण्य प्रदेश, पंचक्रोशी के जीवंत काही वृक्ष व विश्रामशालाएं…क्या ये इन कोलाहलप्रिय जनों का तनिक भी मन नहीं मोहती?…यहाँ आने के पश्चात् न तो यशोलिप्सा शेष रहती है न आक्षेपों का भय…। बाड़े को तोड़कर अनंत जीवन के अवगाहन- धारण की क्षमता से विहीन, कार्य- कारण स्थिति को समझे बिना क्षुद्र कीटों- सा जीवन…हूंह…क्या ही प्राप्य है इनका…

आटविक – अब का करबा महाराज! विश्वेश्वर के मयवा इहे ह … जब ना तब इहवां के बकैत ( विदूषक ) बिना सिर –पैर के बातन में भीड़ जइहें… आ जब जीत न पैयेहें तब गरियावल शुरू कर दीहें …आ ओहसे भी कमवा ना चली तब कपारे फोड़े लगिहें एक दूसरा के …

दोनों के ठहाके से चंद्रप्रभा प्रकम्पित हो उठी।

अच्छा… एक बात बताओ मित्र !…इस अरण्य- आटविक जनों से दूर विश्वेश्वर की नगरी में चंद्र किरणों की रहस्यमयी नीलिमा को परखने वाला कौन था ? सुना है… चंद्रलेखा की इन रुक्ष- ऊँची पहाड़ियों को उसका पवनपंखी घोड़ा प्रचंड ऐसे ही पार कर जाया करता था… कोई भारी विद्वान था संभवतः। विश्वेश्वर की काशी में साहित्य का ‘शिव’ था वह । गुरु भी अघोर साधनाओं के महाप्रतापी कोई ‘हजारी’ हुआ करते थे।

मित्र! ये सब तो जानी- सुनी, कही- कहायी बातें हैं। कुछ अनकहा जानते हो तो बताओ …तुम्हारे कोष में तो लोक- ग्राम, श्रेष्ठी- चेट्टी, राज- काज से लेकर महाकाल तक ऊँघते हैं। कुछ इनके बारे में बताओ…

रूपांतरित भाषा के साथ

आटविक –  सुनो मित्र! पथ काटने को तुमने ये अच्छी चर्चा छेड़ दी और जिस ‘शिव’ की तुमने चर्चा की वह वास्तव में समय और साहित्य के शिव – प्रसाद ही थे। कोई भी नवीन साहित्यिक विषय उनसे छूट न पाता  था। मित्र! वास्तव में जब दृष्टि और लक्ष्य दोनों ही स्पष्ट हो तभी ऐसा होता है – जब इस अत्यल्प जीवन काल में कुछ कालजयी सध जाता है। विद्वत शिवप्रसाद के साथ ऐसा ही था।

आज तुम्हें इन कही- सुनी बातों से इतर एक ही छत के नीचे रहने वाले उनके मित्र राणा. पी.बी. सिंह और

उनके संबंधों की कथा सुनाता हूँ। राणा पी. बी सिंह शिव प्रसाद जी के किराएदार थे। आगे चलकर राणा और शिवप्रसाद मित्र नहीं बल्कि गुरु- शिष्य संबंध में बंध गए थे।

हालाँकि यह निर्णय करना मुश्किल है कि कौन- किसका गुरु था? राणा आज भी उन्हें गुरु कहते हैं और शिवप्रसाद अपने उपन्यासों के लिए आजीवन उनसे सीखते रहे। यथार्थ जीवन को चित्रित करने के लिए यथार्थ को केवल देखना या जीना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसकी सही माप, वर्णन और उनके प्रभावों की गणना और मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है। राणा से शिवप्रसाद ने यही सीखा था।

राणा आज भी कहते हैं – शिवप्रसाद जी बड़े गंभीर लेकिन प्रतिक्रियावादी आदमी थे। एक बार मेरी अनुपस्थिति में उन्होंने मेरे घर का सामान भी फिंकवा दिया था, सो मैं तो उनसे डरा ही रहता था। एक बार उन्होंने मुझसे कहा- सुनो राणा! तुमसे एक काम है। मंजू ने कहा है, नहीं तो मैं तुमसे कहता भी नहीं। यह मेरे एक उपन्यास का अंश है। सौ पृष्ठों की सामग्री है-  देख कर बताओ कि कैसा है? तुम्हारा फील्ड वर्क बहुत अच्छा है और तुम जिस गुरु के शिष्य हो वो मेरे भी आराध्य हैं…प्रो. आर. एन. सिंह।

मैंने चुपचाप ले लिया। उनके क्रोधी स्वाभाव से मैं डरा ही रहता था। इसलिए चुपके से लिया और अगले दिन लौटा दिया। कहा- बहुत अच्छा लिखा है आपने…बहुत ही अच्छा लिखा है।

शिवप्रसाद – अरे अच्छा थोड़े सुनना है, कुछ बताओ भी।

सर! मैं पैर पकड़कर क्षमा मांगता हूँ। मुझे दो जूते मार लीजिये लेकिन मेरा मुंह न खोलवाइये। मुँह खोलना मेरे लिए बहुत कठिन होगा।

क्यों?

नहीं सर! जूते मार लीजिए लेकिन सत्य किसी को बर्दाश्त होता नहीं और मेरी जो ट्रेनिंग है, मुंह से निकल जाएगा तो संघर्ष होगा।

नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा – शिवप्रसाद जी ने कहा।

नहीं सर…ऐसा ही होता है।

फिर शिवप्रसाद जी ने राणा जी को बैठाया। राणा कहते हैं- डेढ़ साल उनके घर में रहा होगा लेकिन एक ही दो बार उनके साथ उनके घर में चाय पीने का मौका मिला था। उस दिन उन्होंने चाय मंगवायी। पत्नी से कहा- कुछ इसको खिलाओ- पिलाओ दो कि इसका दिमाग ठीक हो।

इसके बाद कहा अब शांति से बैठो और बताओ…

राणा –  सर, ऐसा बकवास और यूज़लेस मैटर मैंने आज तक अपनी जिंदगी में पढ़ा ही नहीं था।

गुरुदेव एकदम से चौंक उठें। राणा संकोच और घबराहट में कहने लगे –  सर मैंने पहले ही कहा था- मेरे से मत कहलवाइये। अब आप मुझसे तुरंत मारपीट फ़साद करेंगे …

अरे नहीं! नहीं! लेकिन राणा आज तक मुझे किसी ने ऐसा कहा ही नहीं…

राणा- सर आपका चेला लोग तो कहेगा कैसे? उनको चाटुकारिता से फुर्सत होगी तब तो कहेंगे। चेले तो बस चाटना जानते हैं।

हालाँकि राणा ऊपर से तो कह रहे थे लेकिन बकौल राणा- मैं बोल तो रहा था लेकिन मेरी हलक सूख रही थी।

असल में गुरुदेव की आँखें अब तक मंजू से मिल चुकी थी और मंजू ने उन्हें शांत रहने का इशारा कर दिया था।

मैं अकबकाया- सा उन्हें देखता रहा।

अब शिवप्रसाद जी बोले – तुम्हें तो भूगोल का बहुत अच्छा ज्ञान है और तुम्हें क्षेत्र की बारीकियों का भी पता है। कथा के बारे में भी तुम जानते हो। अब बताओ कि कैसे सिद्ध करोगे कि बकवास है ?

तब राणा जी कहते हैं –  बस एक लाइन सुन लीजिए …मैं बोल नहीं पाऊंगा। बस एक पंक्ति सुन लीजिए…सर! हाथी जब चलेगा और क्षेत्र दलदल का है तब हाथी उसमें कैसे चलेगा ? आप ये बताएं…

शिवप्रसाद सिंह – हाँ! ये तो है।

दूसरी बात कमल जब खिलता है, स्वच्छ पानी में खिलता है, कीचड़ में नहीं खिलता है। ये कहावत है कि कीचड़ में जन्मेगा लेकिन कीचड़ में खिलता नहीं है।

शिवप्रसाद सिंह – हाँ, ये भी सत्य है।

तीसरी बात- हाथी दलदल क्षेत्र पार किया और उसके बाद किला आ गया तो किला तो वहाँ बन ही नहीं सकता है।

शिवप्रसाद सिंह – हाँ! ये भी सत्य है…

तो गुरुदेव यही न वर्णन किया है आपने सौ पृष्ठों में।

जानते हो मित्र! इसके बाद शिवप्रसाद जी अचानक से उठे और उन सौ पृष्ठों को टुकड़े- टुकड़े कर हवा में उड़ा दिए। बकौल राणा-  मेरी हालत ख़राब होती गयी। मैं कांपने लगा था। बी.पी. बढ़ गया। मैं उठा और सीधे उनके पैर पकड़ लिए- सर! मुझे माफ़ कर दीजिए। माफ़ कर दीजिए। मेरे बच्चे छोटे- छोटे हैं। मैं इतनी जल्दी दूसरा मकान नहीं ढूंढ पाऊंगा। मेरा इस शहर( बनारस) में रहना मुश्किल हो जाएगा। मुझे दस जूते मार लीजिये लेकिन घर से मत निकालिए। मैं एकदम से रोने लगा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैंने क्या कर दिया ? सर ! मुझे कुछ मोहलत दे दीजिए… मैं चला जाऊँगा।

इसके बाद मंजू सामने आयीं। उन्होंने कहा कि देखिये आप मेरे भाई हैं। आपको कोई नहीं निकालेगा। जब मेरी लाश निकलेगी तभी आपको कोई निकाल पाएगा यहाँ से। इतना सुनना था कि शिवप्रसाद जी भी रोने लगे।

असल में मंजू की तबीयत उस समय बहुत ख़राब रहने लगी थी। दर्द से वो बैठ नहीं पाती थी। शिवप्रसाद जी दिन- रात बिटिया के लिए रोते रहते थे और अंत में उसकी मौत ने तो उन्हें तोड़ ही दिया था। मंजू के यह कहने पर उन्हें फिर से ध्यान में आ गया सो वो रोने लगे थे। बड़ी मुश्किल से उस दिन किसी तरह मामला शांत हुआ। फिर कहा- मैं तुमसे एक हफ्ते बाद मिलूँगा। तुम कौन- सा स्कूटर रखे हो?

सर! मेरे स्कूटर का नाम तो चेतक है और मेरा नाम राणा है। मुझे बहुत लगाव है अपने स्कूटर से।

शिवप्रसाद जी बोले – अब तुमने मुझे जो कुछ कहा है, वह सब तुम्हें प्रूफ़ करना होगा। तुम ले चलोगे मुझे अपने ‘चेतक’ से और उन सभी जगहों को दिखाओगे।

मैंने कहा- सर! मेरा ‘चेतक’ तो आपका ही है।

इसके बाद राणा शिवप्रसाद जी को लेकर अगले कई दिनों तक स्कूटर पर बैठाकर सर्वे के लिए जाते रहे। जहाँ- जहाँ उनके पात्र थे, उन सभी जगहों पर ले गया। कई बार ऐसा होता कि पात्र और जगहों से वे इतने कनेक्ट हो जाते कि रोने लगते…कभी बेहोश हो जाते। बहुतों बार अगल- बगल के लोगों को आवाज़ देकर उन्हें उठा कर हवा- पानी करना पड़ता। इसके बाद उन्होंने फिर से उस नॉवेल लिखा और मुझे पढ़ने के लिए दिया।

मैंने कहा भी कि सर, अब मुझे मत कहिए लेकिन वो नहीं माने। इसके बाद मैंने पढ़ा और लिखा भी कि ‘मैं तो साहित्य का नहीं हूँ लेकिन काश! इतिहास को इस तरह से मिथकों व पौराणिक साहित्य से जोड़कर सर्वे के द्वारा उपन्यासों की लिखा जाता। यह अद्भुत उपन्यास है।’ समय के अनुसार उन्होंने भाषा उस समय की रख दी, इसलिए यह कठिन हो गया और दूसरा उनका कोई ग्रुप नहीं था। जैसे एक रामविलास जी का ग्रुप था, एक नामवर जी का ग्रुप था, एक भगवती शरण सिंह का ग्रुप था …जैसे आज तो पचास ग्रुप है। आपके बी.एच यू में ही देख लीजिए एक अवधेश प्रधान और पाण्डेय जी का ग्रुप है तो दूसरा अशोक सिंह का ख़ुरापाती ग्रुप है तो एक कविता  कहने वालों का है, दूसरा आलोचना वालों का है…साहित्य…खैर! हाँ तो शिवप्रसाद जी के तीनों उपन्यासों में ‘गली आगे मुड़ती है’( नीला चाँद, वैश्वानर) को हिन्दी साहित्य में “चटपटा पड़ाका” कह सकते हैं। ‘काशीकथा’ में मैंने उस पर वक्तव्य दिया था।

सुनो मित्र! ८३- ८४ में कोई भाषण- भूषण हुआ था। वहाँ शिवप्रसाद जी भी थे…कमलनाथ गुप्त भी थे और राणा भी पहुंचे हुए थे। ‘गली  आगे मुड़ती है’ पर बात चल रही थी और उस पर लगातार काल्पनिक होने का आक्षेप लगाया जा रहा था। राणा सुनते- सुनते जब थक गए तब उठ खड़े हुए और कहा– मैं साहित्य से तो नहीं हूँ लेकिन इंसानियत के नाम पर कोई मुझे बोलने दे। यहाँ किताब भी है और उसके लेखक भी लेकिन मेरा इन सबसे कोई वास्ता नहीं है। इस व्यक्ति से व्यक्तिगत होने या साहित्यिक होने न होने की तो यहाँ कोई बात ही नहीं है लेकिन जो सच है वो सच है। मै बस यह पूछना चाहता हूँ कि कोई यहाँ कसम खा कर बताए कि इस नॉवेल में जो लिखा गया है आप में से किसी ने फील्ड में जाकर चेक किया है ? है कोई जो माँ की कसम खा कर कहे कि उसने तथ्यों को जाँचा है।

  कमल जी ने कहा – आपका हो गया …बैठिए। जाइए यहाँ से।

राणा- नहीं! सच सुनना पड़ेगा। इस उपन्यास पर आप सब मिथ्या होने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन मैंने पच्चीस बार से ऊपर इसे पढ़ा है और फील्ड में जाकर जाँच की है। एक रिसर्चर होने के नाते मैं कह सकता हूँ कि इसमें कहीं- कहीं ही कल्पना है। कोरा सच है ये। यहाँ मेरे विभाग और मेरे जानने वाले भी पचासों बच्चे बैठे हैं आप ऐसे ही हमें नहीं भगा सकते हैं…

फिर क्या था…हल्ला हो गया। शिवप्रसाद जी जिंदाबाद के नारे लगने लगे। आर कमल गुप्त जी से भी संबंध अच्छे बन गए। उस समय नीरजा जी असिस्टेंट हुआ करती थीं। कमल गुप्त जी आएं और कहा- तुम इस पर लिख कर दो। फिर मैंने लिखा… उस सुखदेव जी ने प्रतिक्रिया दी। मैंने फिर सामानांतर उत्तर दिया। उसके बाद सुखदेव जी ने कान पकड़ लिए कि ये तो बनारस में मुश्किल कर देगा।

इसके बाद शिवप्रसाद जी ने मुझे अलग बुलाकर कहा – इधर आओ! तुम ऐसे भीड़ा मत करो नहीं तो लोग तुमसे भीड़ जाएंगे।

सर, क्या करूं? सत्य तो सत्य है, उसके लिए तो भीड़ ही जाऊंगा।

देखो… लोग तुम्हारा नुकसान कर देंगे। तुम चुपचाप साहित्यिक मीटिंग में आओ और सुनकर चले जाया करो।

शिवप्रसाद जी के बाद त्रिभुवन जी ने भी मुझे रोका।  इसके बाद मैं चुप हो गया लेकिन साहित्य और शिवप्रसाद जी को लेकर लिखता रहा।

इसके बाद की कहानी तो और भी दिलचस्प है मित्र!

शीघ्र कहो आटविक…

सुनो!

इसके बाद  ‘गली आगे मुड़ती है’ पर जब नामवर जी ने लिखा कि “ घर की चारदीवारी में बंद होकर कल्पना की उड़ान से ये बताना कि गंगा में छलांग कैसे लगती है – यही उपन्यास है।”

तब  जानते हो राणा ने क्या कहा ?

क्या?

राणा से ही सुनो।

तब मैंने ८४-८५ की पत्रिका “साहित्यकार” में लिखा- “ दिल्ली की ऊँची अट्टालिकाओं पर बैठकर फाइव स्टार होटल में शराब पीकर करके हिन्दी साहित्य को दुर्दांत रूप में भ्रष्ट करने वाले साहित्यकार बता देते हैं कि गंगा में डूबकी लगायी कैसे जाती है ? काश ! ऐसे इंसान होते जो गंगा में डुबकी लगाते- लगाते डूबते रहते और डूबने के बाद निकलते तब उनको पता चलता कि माँ मृत्यु को कैसे रोकती है? माँ के कितने रूप होते हैं और माँ का एक रूप ‘वेश्या’ भी है। ( मार्कंडेय पुराण ) माँ वेश्या बनकर भी संसार की रक्षा करती है। उसके सत्ताईस रूप हैं, सत्ताईस नक्षत्र हैं और ‘गली आगे मुडती है’ ये ऐसी पहली रचना है जिसमें सत्ताईस रंग हैं।”

उसके बाद नामवर जी मानने लगे कि यह भारी पाजी, बदमाश पागल लड़का है। जबकि काशीनाथ जी से राणा की अच्छी बनती रही है। उन्हें जब कुछ होता तो कहते- ‘आ जाओ थोड़ा…झगड़ा- वगड़ा हो जाए। उनके बेटे सिद्धार्थ ने एक दिन राणा से कहा – अरे चाचाजी, आप एक बार बड़े बाबूजी से तो मिल लीजिए।

राणा- नहीं, आपके बड़े बाबूजी बहुत बड़े वाले हैं। वो अट्टालिकाओं वाले हैं और मैं कुटिया वाला। मैं कुटिया में रहने वाला, तू महलों की रानी… बता फिर तेरा- मेरा प्यार?

लेकिन सिद्धार्थ अड़े रहे।  नामवर जी से जाकर कहा। उन्होंने सीधे कहा – अजीब पागल है। साहित्य पढ़ा ही नहीं है और ऐसे लिख देता है।

बस ऐसे ही एक दिन भेंट हो गयी। काशीनाथ जी ने कहा- भैया! वो जो महलों वाली …अट्टालिकाओं वाली बात नहीं आई थी…

नामवर सिंह – छोड़ो उस पागल को। उसका नाम सुनते दिमाग गरम हो जाता है।

काशीनाथ सिंह – भैया, सुनिए न…मिलिए तो उससे कौन है ?

नामवर सिंह – अरे छोड़ो …

काशीनाथ सिंह – भैया, वो आये है …ये जो सामने खड़ा है, यही है राणा पी. बी. सिंह।

अब नामवर जी अवाक् हो गये। अरे नहीं! नहीं…ये तो बहुत अच्छा है…बहुत अच्छा लिखता है…

राणा – नहीं सर, जो सच है वो तो कहना ही पड़ेगा। मैं भले ही बदमाश हूँ, मवाली हूँ बाक़ी जो सच है और यदि वह कड़वा भी है तो उसको सुनकर आप जैसे महारथी सुनकर उसे नहीं आशीर्वाद देंगे तो सत्य तो दब जाएगा।

फिर उन्होंने कहा – इधर आओ…आज मेरा मन शांत हो गया। इसके बाद मैंने पैर छुआ तो पैर नहीं छुने दिया बल्कि गले लगा लिया।

 इसके बाद नामवर जी ने कहा – आज से तुम मेरे दिल में हो।

कहना यह है कि आप आलोचक हो और फील्ड देखे नहीं हो। शिवप्रसाद जी बड़े घुमक्कड़ प्रवृत्ति के  थे। उनका संस्कृत, पर कमांड था, अवधी, ब्रज, पाली पर कमांड था। वो अनेक भाषाओं को जानने वाले थे। किताबों का अम्बार हुआ करता था उनके घर में…ऐसे थे शिवप्रसाद जी। कैसे कोई ऐसे लेखकों की सस्ती आलोचना कर सकता है? शायद उन्होंने अंग्रेजी में लिखी होती तो वे आज नोबेल मिला होता…।

 कुल मिलाकर मित्र यह कि हम अब काशी पहुँच गए हैं और मित्र! जाते- जाते मेरी एक बात गांठ बांध लो। विश्वेश्वर की इस नगरी में घूमो-फिरो सब करो लेकिन अब सत्य कहना छोड़ दो…सत्य किसी को बर्दाश्त नहीं होता।

प्रियंका नारायण

 

( ५ नवम्बर २०१९ को भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और वाराणसी पर महत्वपूर्ण कार्य करने वाले राणा पी.बी. सिंह के साक्षात्कार के आधार पर )

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