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मेरा ब्लेजर किसी की उतरन नहीं है: श्वेता सिंह

श्वेता सिंह अपने जीवन अनुभवों को कहानी की शक्ल में लिखती हैं। रेडियो जॉकी रही हैं. बीबीसी, ऑल इंडिया रेडियो आदि संस्थानों में ब्रॉडकास्टिंग का अनुभव. इन दिनों The Energy and Resources Institute (TERI) के साथ जुड़ी हैं. अब जानकी पुल के लिए नियमित लिखा करेंगी। आज उनकी यह कहानी पढ़िए-

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अक्सर बड़े लोग कूड़े में अपने बच्चों के टूटे और पुराने खिलौने फेंक दिया करते थे या कोई रसोई का पुराना ​डिब्बा या चप्पलें. कूड़े में से हम इन क़ीमती चीज़ों को अलग कर घर ले जाया करते थे. मुझे इस कूड़े में से कई कीमती खिलौने मिले हैं. एक बार एक टूटा हुआ काले रंग का डिब्बा मिला था, उसमें एक छोटी सी चाबी थी, उस चाबी को घुमाने पर एक धुन बजती. मैं अक्सर उस चाबी को बार बार घुमा कर अकेले में उस धुन को सुनती थी. वो धुन मुझे एक अलग दुनिया में ले जाती, जिसमें मैं एक सफ़ेद रंग का गाउन पहने सीढ़ियों से उतरती हूँ और सब लोगों की नज़रे मुझ पर टिकी हैं. बड़े होकर पता लगा कि वो धुन मोज़ार्ट की थी.

“ए चंद्रा कौन है ये लड़की” ये सुनकर कूड़े के ढेर पर टकटकी लगाए मेरी आँखें लाल साड़ी वाली उस औरत पर गई जो अपनी बोहें चढ़ाए मुझे देख रही थी। वो मुझे ऐसे घूर रही थी जैसे साफ़ सुथरे कपड़े पहनकर मैंने कोई बड़ा पाप कर दिया है।वैसे पाप ही था क्योंकि कूड़ा इकट्ठा करने वालों से साफ़ सुथरे कपड़े पहनने की उम्मीद नही की जाती अगर हम साफ़ सुथरे कपड़े पहन भी लें तो इसका मतलब है कि हमारे पास इतना पैसा है कि जिन घरों से हम कूड़ा इकठ्ठा करते हैं उनसे ज़्यादा पैसों की मांग न करें।

अक्सर लोग हम सड़को और गलियों में कूड़ा चुगने वालों को फटेहाल और बदहाल पाते हैं, थेकली (कपड़े फटने के बाद अलग से लगाया गया कपड़ा जिसे हम मॉडर्न रफ़ू कहते हैं) लगे हुए घिसे मैले बदबू वाले कपड़े, घिसी हुई टूटी चप्पलें या कूड़े के ढेर से उठाए गए फटे जूते और उसमें से झाँकते हमारे अंगूठे। लेकिन मुझे बचपन से ही उजले साफ़ सुथरे कपड़े पहनने का शौक़ था हालांकि वो शौक़ बड़ी कोठियों में रहने वालों की उतरन पूरी करते थे। जब भी इन बड़ी कोठियों में रहने वालों के कपड़े घिस जाते तो वे हमें उनके घरों के टॉयलेट साफ़ करने के बदले में अपनी उतरन दे देते, कूड़ा उठाने के बदले में हमें पैसे मिलते। हम इन्ही कपड़ो को पहनकर इतराते थे। लाल साड़ी वाली उस औरत की आवाज़ नानी नही सुन पाई। बड़ी कोठी की बालकनी में खड़ी उस औरत ने फिर कहा “ए चंद्रा कौन है ये लड़की” नानी सभी घरों का कूड़ा इक्कठा कर, कूड़े में से प्लास्टिक अलग कर रही थी। प्लास्टिक को हम कूड़े से अलग करके बेचते थे। नानी ने उस औरत को देखा और कहा “बिजी मेरी बड़ी बेटी की दूसरे नंबर की लड़की है”। अमीर मोहल्लों में काम करने वाले दलित, बड़े घरों की इन औरतों को सम्मान देने के लिए बिजी कहते थे यानी बीबीजी। लाल साड़ी वाली बिजी “अच्छा तेरी बड़ी को तो उसके पति ने छोड़ दिया न”। नानी “हाँ बिजी, हरामियों के घर ब्याही गई थी मेरी बेटी” लाल साड़ी वाली बिजी “तो तू चंद्रा अपनी बेटी के बच्चों को पालती है” नानी “हाँ बिजी अब तो मैं ही संभाल रही हूँ बड़ी बेटी की दिमागी हालत ठीक नही, उसके ससुराल वालों ने बहुत सताया है उसे” बीजी “तो ये लड़की पढ़ती है या फिर ये भी अब तेरे साथ कूड़ा उठाने आया करेगी?” नानी ” अभी तो तीसरी जमात (कक्षा) में पढ़ती है, ज़्यादा नही पढ़ाएंगे, लड़का देख ब्याह देंगे” बिजी “हाँ ठीक है वैसे भी तुम लोग अपने बच्चों को न पढ़ाया करो, क्यों पढ़ाई पर पैसा खर्च करना, उठाना तो तुम लोगों को कूड़ा ही है”

लाल साड़ी वाली उस बिजी के शब्द सुनकर नानी नीचे गर्दन कर फिर से कूड़े में काम की चीज़ें ढूंढने लगी। अक्सर बड़े लोग कूड़े में अपने बच्चों के टूटे और पुराने खिलोने फेंक दिया करते थे या कोई रसोई का पुराना डब्बा, चप्पलें। कूड़े में से हम इन क़ीमती चीज़ों को अलग कर घर ले जाया करते थे। मुझे इस कूड़े में से कई कीमती खिलोने मिले हैं।

एक बार एक टूटा हुआ काले रंग का डिब्बा मिला था, उसमें एक छोटी सी चाबी थी, उस चाबी को घुमाने पर एक धुन बजती। मैं अक्सर उस चाबी को बार बार घुमा कर अकेले में उस धुन को सुनती थी। वो धुन मुझे एक अलग दुनिया में ले जाती, जिसमे मैं एक सफ़ेद रंग का गाउन पहने सीढ़ियों से उतरती हूँ और सब लोगों की नज़रे मुझ पर टिकी हैं, बड़े होकर पता लगा कि वो धुन मोज़ार्ट की थी। लाल साड़ी वाली उस औरत के शब्द सुनकर मैं मायूस हो गयी, मेरा मन हुआ मैं उस औरत के बाल नोच लूँ। मेरे मासूम मन में खूब पढ़ने का जो सपना था उस सपने पर जैसे उस बीजी ने थप्पड़ जड़ दिया था और साथ में चुनौती भी दे दी।

मैंने गुस्से में नानी को कहा ” ए माँ, तू बोल उस औरत को हम हमेशा कूड़ा नही उठाएंगे.” नानी ने कूड़े के ढेर पर नज़रें गढ़ाए कहा “ठीक ही तो कहती है वो, कुछ समय बाद ब्याह देंगे तुझे, क्या करना है पढ़के, ये पढ़ना लिखना बड़े घरों के चोचले हैं.” वो औरत अभी भी मेरी ही तरफ़ देख रही थी। मैंने लाल साड़ी वाली उस औरत की आंखों को तरेरा लेकिन मेरा मुँह न खुल सका। खुलता भी कैसे हम उनके घरों से कूड़ा उठाते थे अगर कुछ बोलते तो एक घर छूट जाता और माँ के पैसे कम हो जाते। लेकिन उसे देखते हुए मेरे छुटकू मन में ये शब्द फुदक पड़े ” मेरा भाग्य कूड़ा उठाना नही होगा, मैं खूब पढूंगी!” ख़ैर ये सब मुझे इसलिए याद आ रहा है क्योंकि हमारा एक इंटरनेशनल इवेंट शुरू हुआ है WSDS (The World Sustainable Development Summit )। यह समिट हमारी टेरी (द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट) का फ्लैगशिप इवेंट है। मैं आईने के सामने खड़ी, खुद को निहार रही थी, मैंने काले रंग का खूबसूरत ब्लेजर पहना है। ऑफिस में कहा गया है कि हमें फॉर्मल कपड़े पहनने हैं। मैं खुश हूँ मेरा ब्लेजर किसी की उतरन नहीं है।

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