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प्रियदर्शी ठाकुर ‘ख़याल’ की ग़ज़लें

प्रियदर्शी ठाकुर ख़याल इन दिनों अपने उपन्यासों के कारण चर्चा में हैं लेकिन वे मूलतः ग़ज़लगो रहे हैं। आइए उनकी कुछ चुनिंदा ग़ज़लें उनके आत्मकथ्य के साथ पढ़ते हैं-
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पेशलफ्ज़
सन् १९७५ से शेर कहता आ रहा हूँ , और इस बरस पचहत्तर का हो जाऊँगा l मेरे परिवार के लोगों और कुछ क़रीबी दोस्तों ने मेरे पचहत्तर साल पूरा करने की मुबारकबाद के तौर पर मेरी नौ चुनिन्दा ग़ज़लों का एक वेब-ऑडियो गुलदस्ता मंज़रे-आम लाने की पेशकश की तो वह प्रस्ताव मैंने बा-ख़ुशी क़ुबूल कर लिया … अब और नये कपड़े-लत्तों का क्या करता, सो भी इस आलम-ए-वबा में !
कविताएँ लिखते-लिखते १९७० के दशक में अचानक मैं ग़ज़लों की जानिब कैसे मुड़ गया यह एक दिलचस्प वाक़या है जिसके बारे में कुछ अरसा पहले अपने एक अदबी सफ़रनामे में तफ़सील से लिख चुका हूँ l तो लीजिए उन नौ ग़ज़लों से पहले उस आत्मगत के कुछ प्रासंगिक हिस्सों पर निगाह कर लीजिए :
 
“आइ.ए.एस परीक्षा की तैयारी, नयी नौकरी, प्रशिक्षण के सिलसिले में बारम्बार स्थान परिवर्तन और सरकारी तंत्र-मन्त्र सीखने की आपाधापी वाले इन सात वर्षों में अन्दर का कवि गहरी निद्रा में चित; और नई गृहस्थी के सुख में मस्त – बेटी जया और बेटे भुवन के आगमन से मसूरी जाने से पूर्व ही हम दोनों प्राणी दो से चार हो चुके थे.
हाँ, फ़िल्में देखने और पुराने गाने सुनने के शौक़ में इस बीच ग़ज़लें और जुड़ गयी थीं.
सन् 1974 में पदोन्नत होकर बतौर ज़िला कलेक्टर डूंगरपुर आ गया – ज़िला पहाड़ियों, जंगल-तालाबों से भरा आदिवासी क्षेत्र और मुख्यालय एक छोटा-सा शांत शहर. वहाँ माहौल कुछ ऐसा बना कि सोये हुए कवि ने उठ कर अंगड़ाई ली, आखें मलने लगा: स्थानीय गवर्मेन्ट कॉलेज के कुछ व्यख्याता-गण से अच्छी मित्रता हो गयी; उनमे से दो ग़ज़लें अच्छी गाते थे. तबला-हर्मोनियम लेकर घर आ जाते और फैज़ और जिगर की ग़ज़लों का अच्छा समाँ बँध जाता. धीरे-धीरे मुझसे भी अनुरोध होने लगा – आप भी कुछ सुनाएँ. झिझकते हुए मैंने अपनी बरसों पुरानी बयाज़-बहियाँ निकालीं, कुछ कविताएँ पढ़ कर सुनाईं – कुछ बहुत सराही गयीं: अरे साहब! ये तो छपने लायक़ हैं, कहीं भेजिए इन्हें. छपास जग उठी !
उन दिनों सबसे प्रतिष्ठित लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका थी ‘धर्मयुग’ – बड़े-बड़े लेखक-कवियों की रचनाएँ छपती थीं उसमें; किसी नये लिखनेवाले की एक रचना भी छप गयी, तो रातोंरात छोटे-मोटे सेलेब्रिटी का दरजा हासिल हो जाया करता – आजकल के मुहावरे में कहें तो ख़बर ‘वायरल’ हो जाती. तय हुआ कि निशाना साधना ही है, तो ऊँचा साधो ! कुछ कविताएँ भेज दीं. दो ही हफ़्ते में जवाब आ गया – लम्बा-सा लिफ़ाफ़ा. स्वीकृति की कुछ ख़ास उम्मीद नहीं थी. खोला तो बस एक छोटा-सा हस्तलिखित परचा. अप्रत्याशित जवाब पर एक क्षण को तो विश्वास ही न हुआ, फिर मारे ख़ुशी के दिमाग़ सातवें आसमान पर ! लिखा था:
 
प्रिय भाई.
कविता ‘ओ पाँच वृक्षो!’ अच्छी लगी. ‘धर्मयुग’ में छपेगी.
अपनी एक पासपोर्ट साइज़ तस्वीर भेज दें.
ह. धर्मवीर भारती.
 
छूटते ही ‘धर्मयुग’ में स्वीकृति और सो भी भारती जी की दस्तख़ती ! सन् ’75 के उत्तरार्ध में कभी वह कविता ‘ओ पाँच वृक्षो !’ मेरे फोटो के साथ छपी, और मित्र-परिजनों में ख़ासी धूम मची उसकी. बाद में तीस रुपयों के मानदेय का चेक आया तो पेशेवर मित्रों ने कुछ हँसी भी उड़ाई – काका को हर पेड़ के छः-छः रुपये मिले !
बहरहाल, उस प्रकाशन की बदौलत कवि महाशय बिलकुल सजग हो उठे – धड़ाधड़ नयी कविताएँ होने लगीं, पुराना ज़खीरा जो था सो तो था ही. नयी कविताओं में से कई-एक राजस्थान साहित्य अकादमी की मुख-पत्रिका ‘मधुमती’ में छपीं, जिनमें से एक विशेष कर याद है – ‘साक़िन बस्सी पाल’, क्योंकि पत्रिका का वह अंक मैंने भारती जी को डाक से भेजा था; जवाब में शाबाशी आयी – आदिवासी जीवन का जीवंत चित्रण किया है आपने, लिखते रहें.
सन् 1976 में स्थानातरित होकर टोंक में कलेक्टर तैनात हो गया. कुछ अरसे की ढील दे कर चार-पाँच कविताएँ फिर ‘धर्मयुग’ को भेजीं, और सुखद आश्चर्य कि पहले की तरह एक बार फिर उनमें से दो भारती जी की निजी चौकोर पर्ची से स्वीकृत होकर ‘धर्मयुग’ में छपीं.
उस देस-काल के परिदृश्य में मुझ जैसे अट्ठाईस-उनतीस साल के पार्ट-टाइम कवि के लिए यह उपलब्धि कुछ ऐसी विलक्षण थी की क़ायदे से मुझे भारती जी के प्रासंगिक पत्रों (यानी पर्चों) तथा ‘धर्मयुग’ के उन अंकों की प्रतियाँ धरोहर की तरह सम्भाल कर रखनी चाहिए थीं, लेकिन अफ़सोस अब मेरे पास उन कविताओं की मात्र कतरनें ही शेष रह गयी हैं.
मध्य राजस्थान में स्थित टोंक ज़िला आज़ादी से पहले नवाबों की रियासत हुआ करता था, और टोंक शहर में लगभग पचास प्रतिशत जनसंख्या मुसलामानों की है. लखनऊ, अलीगढ, हैदराबाद आदि की तरह टोंक भी उर्दू भाषा और साहित्य का गढ़ माना जाता रहा है, और अख़्तर शीरानी, सौलत टोंकी, बिस्मिल सईदी, बज़्मी साहब, मख़मूर सईदी जैसे मशहूर शायर उस सरज़मीन की पैदाइश हैं.
उन दिनों बिस्मिल सईदी साहब दिल्ली छोड़ कर टोंक में रहने लगे थे. वहाँ दो-तीन कमरों का एक इदारा था – अरबी-फ़ारसी रिसर्च इंस्टिट्यूट. उसके इंचार्ज थे शौकत अली ख़ान साहब. बिस्मिल साहब के भतीजे डा. सईदी हमारे फैमिली डॉक्टर थे – उन्होंने परिचय करा दिया. शौकत साहब और स्थानीय गवर्मेंट कॉलेज के प्रिंसिपल ए.एफ़ उस्मानी साहब को साथ लेकर बिस्मिल साहब शाम को अक्सर मेरे घर आ जाते और बातचीत के दौरान अपने अशआर सुनाते. धीरे-धीरे माहौल बना – हिंदी कविताओं और ग़ज़लों के आदान-प्रदान का. उठते-उठते बिस्मिल साहब हमेशा कहते – कलेक्टर साहब, आपकी तबीयत बड़ी शायराना है, माशाल्लाह अगर ग़ज़ल के शेर कहें, तो बहुत बेहतर कहेंगे. असर होने लगा बुज़ुर्गवार की बातों का. एक-दो ग़ज़लें हुईं – बड़ी सराही गयीं. ख़ुद मुझे भी बड़ी भायी बहरों की क़ैद !
कुछ ही अरसा पहले ‘धर्मयुग’ में दूसरी बार इकट्ठे दो कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. शायद उन्हीं दिनों एक कविता ‘दिनमान’ में भी छपी थी – हौसला बुलंद था. कुछ ग़ज़लें ‘धर्मयुग’ में विचारार्थ भेज दीं – लगा कि सूर्यभानु गुप्त की तरह मेरी ग़ज़लें भी छप जाएँगी. दो ही हफ़्ते बाद फिर भारती जी का परचा आ गया, किन्तु इस बार लिखा था:
 
प्रिय भाई.
यह आप कहाँ ग़ज़लों-वज़लों के चक्कर में पड़ गए. नयी कविताएँ भेजिएगा.
ह. धर्मवीर भारती
कुछ धक्का-सा लगा जी को – उसके बाद न मैंने कविताएँ भेजी कभी न ग़ज़लें. धर्मयुग बीत गया.
लेकिन मुझ पर उस आख़िरी पर्चे का कुछ विशेष असर न हुआ. जब तक टोंक में रहा, ग़ज़लें भी लिखीं और कविताएँ भी, जिनमें से कुछ ‘मधुमती’ में छपीं और बाद में राजस्थान पत्रिका की ‘इतवारी’ में भी, जहाँ ओम थानवी साहब संपादक थे. उन दिनों की एक कविता और एक ग़ज़ल विशेष रूप से याद हैं – ‘गुनगुनी धूप की ढलान पर’ जो ‘मधुमती’ में छपी थी, और मेरी ‘मेडेन’ ग़ज़ल ‘रात गये’ जो कई सालों बाद मेरी ग़ज़लों के पहले संकलन का शीर्षक बनी.”
(जयपुर से प्रकाशित ‘सम्प्रेषण’ पत्रिका के ‘ख़याल’ विशेषांक ‘लफ्ज़ का इंतख़ाब’ / मार्च २०१९ में शामिल आत्मगत ‘ख़याल …कौन ख़याल’ से )
 
तो लीजिए, पेश हैं “ख़याल@75” की वो नौ ग़ज़लें l
एक ज़ाविये से देखा जाए तो मेरी शायरी मेरी डायरी भी रही है, इसलिए ग़ज़लों के नीचे मैंने इनके लिखे जाने का साल और संकलन का नाम / प्रकाशन वर्ष दर्ज कर दिया है l संगीत के दृष्टिकोण से मैंने ख़ुद ही कुछ ग़ज़लों में चंद तब्दीलियाँ कर दी हैं, उनका भी संक्षिप्त उल्लेख कर दिया है l
 
प्रियदर्शी ठाकुर ख़याल // 12 जनवरी 2021
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1
मेरा अंदाज़ा ग़लत हो तो बता दे मुझको
तुझपे इल्ज़ाम सिवा हो तो सज़ा दे मुझको
 
उसने आँखों में जगह दी भी तो आँसू की तरह
शायद इक हल्की-सी जुम्बिश भी गिरा दे मुझको
 
मैं उजाला हूँ तो तन्वीर मुझे अपनी बना (तन्वीर : चमक, लौ)
और अँधेरा हूँ, तो ऐ शम’अ मिटा दे मुझको
 
तेरी नज़रों में मोहब्बत भी है इक खेल, तो आ
मैं करूँ तुझपे भरोसा तू दग़ा दे मुझको
 
दिल सँभाले से मेरे आज सँभलता ही नहीं
तू ही यादों के दरीचे से सदा दे मुझको (दरीचा : खिड़की)
 
कितनी देर और रुआँसा मुझे रक्खेगा ‘ख़याल’
अब रुलाना है तो फिर साफ़ रुला दे मुझको
 
 
***
 
1977// ‘रात गये’ (पंचशील प्र. 1989)
 
2
गरचे ये शाम भी मुझ पर तो बहुत भारी है (गरचे : हालाँकि)
इससे बढ़ कर भी कहीं ख़ौफ़े-सहर ता’री है (ख़ौफ़े-सहर : सुबह का भय)
 
हर नफ़स सोचता हूँ अबके मिरी बारी है (नफ़स : साँस)
ये सफ़र है कि ये तैयारी ही तैयारी है !
 
दुख हुआ होगा तुम्हें भी तो इसे देख के अब
मेरी आँखों में जो ये चुप-सी समझदारी है
 
बज़्म तो बज़्म, मेरा घर भी अँधेरा न हुआ
ज़िन्दगी मौत से इस तरह कभी हारी है !
 
माँ ये बाज़ी तो हरेक रंग में हारेगी ‘ख़याल’
भाइयों में ही अगर जंगे-फ़ना जारी है (जंगे-फ़ना : मौत तक का युद्ध)
 
***
 
 
1980// ‘रात गये’ 1989)
 
3
डूब जाना है रवा अब तू ठहरता क्यूँ है (रवा : सही, उपयुक्त)
मुझपे आया है तुझे प्यार तो डरता क्यूँ है
 
वो ख़फ़ा है तो रहे, इतना बता दे मुझको
मेरे आने की ख़बर सुन के सँवरता क्यूँ है !
 
एक क़तरा भी बहाने की नहीं ताब तो फिर
मेरी आँखों में अबस ख़ून उतरता क्यूँ है (अबस : बेकार)
 
इन दिनों इतनी नवाज़िश है, करम है उनका
सोचता हूँ कि मेरा वक़्त गुज़रता क्यूँ है
 
अब तो फ़रियाद-ए-रिहाई भी नहीं लब पे ‘ख़याल’
जाने सैय्याद मेरे पंख कतरता क्यूँ है !
 
 
***
 
1988// ‘रात गए’ (पंचशील प्र. 1989)
संगीत के लिए तब्दीलियाँ की हैं l
4
दे रहा है मुझे सज़ा लेकिन
तू ख़ता तो मिरी बता लेकिन
 
क़ुर्बतों की मिसाल थे हम-तुम
रह गया कितना फ़ासिला लेकिन
 
हाल पर मेरे छोड़ देते मुझे
उनसे ये भी न हो सका लेकिन
 
आँख रुसवाइयों से डरती रही
दिल मेरा खुल के रो लिया लेकिन
 
दिल का कुछ मोल तो नहीं है ‘ख़याल’
आपके नाम कर दिया लेकिन
 
***
 
1987// ‘रात गये’ (पंचशील प्र. 1989)
चंद तब्दीलियाँ की हैं l
 
 
5
वादा वफ़ा तो दूर कि वादा न हो सका
मेरा भरम भी उनको गवारा न हो सका
 
बस तेरे आस्ताने पे सर रख के रो दिए
कुछ हमसे आज इसके अलावा न हो सका
 
साये की शर्त थी कि रहे रौशनी भी साथ
तनहा तो अपना साया भी अपना न हो सका
 
हर-दिल-अज़ीज़ शख़्स की क़िस्मत तो देखिए
ऐसा हुआ वो सबका किसी का न हो सका
 
ख़्वाजा ‘ख़याल’ जान से अब जाएगा अगर (ख़्वाजा : अजमेर वाले)
तुझसे भी उसके दुख का मदावा न हो सका (मदावा : इलाज)
 
***
 
1987 // ‘रात गये’ (पंचशील प्र. 1989)
 
 
6
फ़ासिला दैर-ओ-हरम के दरमियाँ रह जाएगा (दैर-ओ-हरम : मंदिर और मस्जिद)
चाक सिल जाएँगे ये, ज़ख़्म-ए-निहाँ रह जाएगा (ज़ख़्म-ए-निहाँ : छिपा हुआ घाव)
 
हाथ से अपने तो धो लेगा लहू के दाग़ तू
देवता का पाक दामन ख़ूँ-फ़िशाँ रह जाएगा (ख़ूँ-फ़िशाँ : रक्तरंजित)
 
चाँद थोड़ी देर में चल देगा अपने रास्ते
फिर सितारों के सहारे आसमाँ रह जाएगा
 
जानेवाले को मयस्सर हो गई ग़म से नजात (नजात : मुक्ति)
ग़म तो उसके हो रहेंगे जो यहाँ रह जाएगा
 
दोज़ख़ो-जन्नत की इतनी फ़िक्र क्या करनी ‘ख़याल’ (नरक-स्वर्ग)
बाद मरने के भी कुछ सूदो-ज़ियाँ रह जाएगा ! (नफ़ा-नुक़सान)
 
***
1992// ‘ये ज़बान भी अपनी है’ – (कि.घ. 1995)
मक़ते को तब्दील किया है l
 
7
तिरे ग़मों से मिरी जाँ नजात पाने का
कोई इरादा नहीं है तुझे भुलाने का
 
तिरी निगाह तो आग़ाज़ करके छोड़ गई (शुरुआत)
फ़क़त हमीं पे है अंजाम अब फ़साने का
 
जो लाइलाज है ख़ुद ही वो चारागर ठहरा
अजीब हाल है कुछ इन दिनों ज़माने का
 
मैं अपनी ज़ात में ढूँढूँगा सारी उम्र उसे (ज़ात : अस्तित्व)
वसीला और नहीं कोई उसको पाने का (वसीला :साधन)
 
चमन की सैर को निकले तो मर मिटे गुल पर
‘ख़याल’ ही न रहा कुछ भी आशियाने का
 
***
1994// ‘ये ज़बान भी अपनी है’ (कि.घ. -1995)
 
 
8
 
दुनिया नई बसाने में मेरा भी हाथ था
शायद तुझे भुलाने में मेरा भी हाथ था
 
अच्छा ख़ुदा बना लिया ! वो भूल ही गया
उसको ख़ुदा बनाने में मेरा भी हाथ था
 
जो तीर दिल पे आ लगा, वो था तिरा ज़रूर
लेकिन तिरे निशाने में मेरा भी हाथ था
 
ज़ालिम थे ख़ैर यार भी पर मैं भी कम न था
इस दिल के टूट जाने में मेरा भी हाथ था
 
मैं भी ‘ख़याल’ था वहाँ आतशज़नों के साथ
बस्ती के घर जलाने में मेरा भी हाथ था
 
***
 
2007// ‘यादों के गलियारे में’ (भा.ज्ञान – 2016)
 
9
 
इजाज़त ही नहीं लाज़िम उन्हें आँखों में आने की
अब अश्कों को ज़रूरत क्या किसी झूठे बहाने की
 
तुम्हें भी इल्म है तर्के-तआल्लुक़ अब नहीं मुमकिन (सम्बन्ध-विच्छेद)
न यूँ बातें करो हमसे हमेशा दिल दुखाने की
 
यही हम थे कि जी साहिब, वही हम हैं : अजी साहब !
अजी मत पूछिए मेह्रो-वफ़ा हमसे ज़माने की ! (स्नेह-प्रेम)
 
अब एक-इक हर्फ़ दिल पर नक़्श पहले से भी गहरा है
बड़ी उल्टी रवायत है पुराने ख़त जलाने की
 
ज़बाँ कट जाए गर अपनी तो ऐसा ही सही यारो –
ये क़ीमत कुछ नहीं आज़ादज़ह्नी को बचाने की
 
‘ख़याल’ अश्आर ये मेरे नहीं, उस दर की बख़्शिश हैं
जबीं पर ख़ाक है मेरी किसी के आस्ताने की
 
***
2018 // अप्रकाशित
प्रियदर्शी ठाकुर ख़याल // 12 जनवरी 2021
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