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स्वरांगी साने की कहानी ‘फाइटर’

स्वरांगी साने की कहानी ‘फाइटर’ पढ़िए-

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काव्या ने लगभग भागते हुए आँगन का फाटक खोला, घर के दरवाज़े से एक कदम अंदर रखते हुए वही से चिल्ला कर पूछा- आंटी स्वप्निल कहाँ है? ऊपर अपने कमरे में है क्या? और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए दौड़ते हुए ऊपरी मंजिल की सीढ़ियाँ चढ़ गई। कमरा पूरा बिखरा पड़ा था। काव्या ने एक बार आवाज़ लगाई- स्वप्निल! कोई जवाब न पा, वह कमरा समेटने में लग गई। जींस पेंट पलंग पर पड़ी थी, उसे खूँटी पर टाँगा, गीला तौलिया भी वैसे ही पड़ा था, उसे सुखाने डाल दिया, मेज पर पड़ी उल्टी-सीधी किताबों को सलीके से रखा। पैन का ढक्कन तक खुला पड़ा था, उसने वह भी बंद कर पैनस्टैंड में रख दिया।

तभी नीचे से स्वप्निल की आवाज़ आई- माँ काव्या आई है क्या? वह भी जवाब सुने बिना ‘नो, नो, नो, नो’ कहते हुए अपने कमरे की ओर भागा। उसका कमरा समेटा हुआ था। काव्या वहाँ नहीं थी, वह लगभग झल्लाया- काव्याsss

काव्या दरवाज़े के पीछे छिपकर खड़ी थी, उसने बाहर निकलकर स्वप्निल की पीठ पर हल्की-सी चपत लगाई।

  • तुम भी काव्या, ये क्या बचपना है! कितनी बार तुमसे कहना पड़ेगा कि मेरी चीज़ों को हाथ मत लगाया करो। स्वप्निल ने भुनभुनाते हुए कहा।
  • एक बार और कह दो। काव्या ने हँसते हुए जवाब दिया और पूछा- तुमने कैसे जाना, मैं आई हूँ।
  • आपकी पादुकाएँ घर के बाहर दिख गई थीं न देवी। स्वप्निल अभी भी चिढ़ा हुआ था।

काव्या ने उसके बाल बिखेरते हुए कहा- बहुत ही इंटिलिजेंट हो, तुम्हें तो इंटिलिजेंस सेवाओं में जाना चाहिए।

  • फालतू की तारीफ़ करना बंद करो। जब मैंने कह दिया कि मेरी चीज़ों को हाथ मत लगाया करो, तो मत लगाया करो। तुम्हें समझ नहीं आता क्या?
  • नहीं आता, तुम्हें भी तो समझ नहीं आता?
  • मुझे क्या समझ नहीं आता?
  • कुछ नहीं, तुम तो चिढ़ते ही रहो। इतना फैला हुआ कमरा अच्छा लगता है क्या? दूसरा कोई होता तो धन्यवाद कहता और तुम…
  • तो उसी किसी दूसरे के पास चली जाओ, यहाँ क्यों आती हो?
  • मेरी मर्जी, मैं स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नागरिक हूँ, जब मर्जी, जहाँ मर्जी, आ-जा सकती हूँ, तुम मुझे टोकने वाले कौन होते हो?
  • हाँ, वहीं कह रहा हूँ, कोई नहीं होता न, फिर क्यों बार-बार यहाँ आ जाती हो? तुम्हें अपने घर पर कोई काम नहीं होता क्या?
  • होता है न, वहाँ भी काम करूँ, यहाँ भी काम करूँ, हाय मैं बेचारी काम के बोझ की मारी।
  • नौटंकी बंद करो और फुटो यहाँ से, मुझे पढ़ना है।
  • तो पढ़ो न, पर कुछ भी फैलाया तो समेट भी देना, मैं फिर आकर देखूँगी। या मैं भी अपनी किताबें यहाँ लेकर आ जाऊँ, दोनों मिलकर पढ़ेंगे।
  • नहीं, तुम यहाँ आओगी, तो न खुद पढ़ोगी, न मुझे पढ़ने दोगी। तुम्हारी अजीब-अजीब, ऊटपटाँग हरकतें चलती रहेंगी। यह दसवीं बोर्ड का साल है और मुझे सीरियसली पढ़ना है, तुम तो कल शादी होने के बाद किसी के यहाँ भी चली जाओगी। सुंदर हो, कोई भी तुम्हें ब्याहकर ले जाएगा, फिर वह कमाएगा, तुम खाना आराम से। मुझे तो खुद कमाना है, तब किसी सुंदरी से ब्याह कर पाऊँगा।
  • ओहह तो सरजी किसी हूर से शादी करने के लिए पढ़ाई कर रहे हैं।
  • देखा, ये, इस तरह तुम बड़बड़ाती रहोगी, पढ़ने नहीं दोगी, फुटो यहाँ से अब।
  • जा रही हूँ, पर इज़्ज़त से बात करो, नहीं तो कल इसी इज़्ज़त के लिए तरस जाओगे।
  • जा रही हो या…

काव्या खिलखिलाते हुए तेजी से सीढ़ियाँ उतरते हुए चली गई।

दसवीं की परीक्षा हुई, दोनों को अच्छे अंक मिले, दोनों ने विज्ञान संकाय चुना और फिर बारहवीं की परीक्षा भी हो गई। काव्या इसी तरह स्वप्निल के यहाँ आती रही, हँसती रही, खिलखिलाती रही। दोनों कॉलेज में पहुँच गए। दोनों के कॉलेज अलग-अलग थे, उनका टाइमिंग अलग-अलग था। तब भी दिन में एक बार काव्या आ ही जाती। किसी दिन काव्या नहीं आती तो दूसरे दिन स्वप्निल इस बात पर झल्लाता- कल क्या हो गया था, क्यों नहीं आई?

  • नहीं आ पाई।
  • कहाँ बिज़ी थी?
  • तुम्हें उससे क्या?
  • ऐसे ही पूछ रहा हूँ।
  • मैं भी वैसे ही कह रही हूँ। कॉलेज से आने में देर हो गई, इसलिए फिर नहीं आई।
  • कल माँ ने पकौड़े बनाए थे, मैंने सोचा था दोनों साथ बैठकर खाएँगे पर तुम्हारा तो कोई पता ही नहीं था, फ़ोन भी नहीं उठा रही थी।
  • ओहह, कॉलेज में फ़ोन साइलेंट पर डाला था, फिर वॉइस मोड पर डालना भूल गई।
  • ऐसे कैसे भूल जाती हो, कल को मुझे भी भूल जाओगी।
  • तुम्हें क्यों भूलूँगी?
  • तुम्हारा क्या भरोसा?
  • तो मत करो भरोसा, तुम्हें किसी ने जबर्दस्ती थोड़े की है।

कहते हुए काव्या गुस्से में दनदनाती हुई सीढ़ियाँ उतरती हुई चली गई। स्वप्निल को भी गुस्सा आ गया, उसने भुनभुनाते हुए कहा- शी इज़ वेरी डिफिकल्ट टु अंडरस्टैंड, क्रेज़ी।

दोनों अलग-अलग कंपनियों में नौकरियाँ करने लगे थे। दोनों की ज़िंदगी भाग-दौड़ रही थी। काव्या और स्वप्निल अधिकतर शनिवार-रविवार ही मिल पाते थे, उसमें भी कभी काव्या को  कभी ऑफ़िस कलिग्स के साथ कहीं जाना होता और कभी स्वप्निल अपने दोस्तों के साथ आउटिंग पर गया होता। दोनों की मेल-मुलाकात कम हो रही थी लेकिन जब भी मिलते फिर बचपन की तरह नोंक-झोंक, कट्टी-बट्टी हो जाती। एक शनिवार शाम काव्या हमेशा की तरह फुर्ती से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए स्वप्निल के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा आधा धकेला हुआ था, पूरी तरह बंद न होने काव्या ने उसे पूरा धकेलकर खोल दिया। अंदर स्वप्निल के साथ कोई और लड़की भी बैठी हुई थी। अचानक काव्या के इस तरह आ जाने से तीनों एक क्षण के लिए असमंजस में पड़ गए कि क्या करना है। स्वप्निल ने स्थिति सँभालते हुए कहा- आइए मोहतरमा, मैं आपके बारे में ही बताने वाला था और थिंक अबाउट डेविल एंड डेविल इज़ देयर।

काव्या को स्वप्निल का किसी और के सामने इस तरह कहना अच्छा नहीं लगा, उसने फीकी मुस्कान दे दी। स्वप्निल ने फिर कहा- मीट काव्या, काव्या शी इज़ सुमेधा। मेरे साथ ऑफ़िस में काम करती है। हम लोग शादी करने वाले हैं और सुमेधा इस तूफ़ान के लिए तैयार रहना, यह बचपन से इसी तरह किसी भी समय धड़धड़ाते हुए आ जाती है या तो दरवाज़ा ठीक तरीके से पूरा बंद रखना नहीं तो यह आकर कमरा भी समेटकर चली जाएगी और बाद में ढूँढते बैठना कि कहाँ क्या रख गई है। यह कहकर स्वप्निल हँस पड़ा।

काव्या ने कहा- नहीं अब थोड़े ऐसा करूँगी, अब यह शिकायत सुमेधा से रखना।

सुमेधा ने कहा- चलो अच्छा हुआ कोई तो तुम्हें बचपन से जानता है, अब तुम्हारे इनर चाइल्ड को जानने में यह मेरी मदद करेगी? विल यू?

काव्या ने श्योर किया और कहा – चलो, अभी चलती हूँ, फिर मिलेंगे।

स्वप्निल और सुमेधा अपनी बातों में खो गए, काव्या धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगी।

जैसे स्वप्निल और सुमेधा की शादी हुई वैसी काव्या की भी शादी हो गई। काव्या दूसरे शहर चली गई। बीच-बीच में स्वप्निल को काव्या की याद आ जाती तो वह फ़ोन कर लेता, काव्या भी अच्छे दोस्त की तरह बात करती। ज़िंदगी अपनी गति से दौड़ती रही। स्वप्निल के बच्चे स्कूल जाने लगे और काव्या के भी। एक दिन स्वप्निल के फ़ोन पर अननोन नंबर शो हो रहा था, उसने उठाया- येस, हू?

  • स्वप्निल?
  • येस स्पीकिंग, हू इज़ देयर?
  • तुम मुझे नहीं जानते, मैं प्रिया, यहाँ स्थानीय अख़बार में काम करती हूँ। रोड ऐक्सीडेंट हुआ है और उस महिला के फ़ोन पर पहला डायलिंग नंबर यह दिखा, इसलिए कॉल किया। दुर्घटना हाई वे पर हुई है, मैंने पास के अस्पताल से एम्बुलेंस मँगवा ली है। आप आ सकते हैं या इनके किन्हीं परिचितों को जानते हैं तो क्या उन्हें इत्तला कर देंगे?
  • पर मैं आप पर भरोसा कैसे करूँ?
  • समझ सकती हूँ। लोग झूठे कॉल भी करते हैं, पर विश्वास कीजिए मैंने जेनुइली कॉल किया है, जिनका ऐक्सीडेंट हुआ उनके मोबाइल की बैटरी ऑफ़ हो गई है, मैं यही एक नंबर ट्रेस कर पाई। आपको अस्पताल का नंबर भेजती हूँ, आप चाहें तो अस्पताल में फ़ोन करके पूछ लीजिए कि ऐसा कोई केस आया है क्या, या ऑन द वे है क्या? आप चाहें तो मेरे इस नंबर पर फ़ोन कर सकते हैं। मैं अभी अस्पताल ही जा रही हूँ, मामला क्रिटिकल है। पत्रकार होने से मदद हो सकती है, अस्पताल वाले थोड़ा जल्दी ध्यान देंगे। आप मेरे इस नंबर से मेरे अख़बार में फ़ोन कर भी मेरी सत्यता की जाँच कर सकते हैं, वो सब करने के बाद तसल्ली हो जाए तो प्लीज़ इनके घरवालों को जल्दी सूचना दीजिएगा, प्लीज़

कहते हुए प्रिया ने फ़ोन रख दिया।

अस्पलात में प्रिया भागदौड़ कर रही थी। ऐक्सीडेंट होने से पुलिस केस था। पुलिस भी आ चुकी थी। आधार कार्ड, वोटर आईडी से पता चल रहा था कि दुर्घटनाग्रस्त महिला का नाम काव्या रस्तोगी और उसके साथ वाले का नाम सुंदरचंद्र रस्तोगी है। प्रिया, काव्या के साथ ही थी। काव्या के सिर से बहुत ख़ून बह चुका था, वह लगभग बेहोश थी लेकिन जैसे ही थोड़ा होश में आती- स्वप्निल कह उठती।

लेकिन स्वप्निल का उधर से अब तक कोई फ़ोन नहीं आया था। प्रिया ने फिर स्वप्निल को फ़ोन लगाया- हैलो

  • येस, येस मैंने उनकी फ़ैमिली को बता दिया है, ऐक्चुअली हम लोग दूसरी सिटी में रहते हैं तो फ़ैमिली को वहाँ पहुँचने में शाम हो सकती है। बाई द वे हाऊ इज़ शी?
  • बेहोश है, लेकिन ज़रा होश में आती है तो आपका नाम ही लेती है। लास्ट डायल कॉल भी आपको था।
  • नहीं पर मुझे तो कोई कॉल रिसीव नहीं हुआ था। स्ट्रेंज!
  • हो सकता है, दुर्घटनाग्रस्त होते हुए फ़ोन किया हो और फ़ोन लगने से पहले ही कॉल कट हो गया हो?
  • हाँ यह भी हो सकता है।

स्वप्निल का मन नहीं लग रहा था। वो और सुमेधा एक पार्टी में थे। यहाँ से निकलना मुश्किल था। काव्या…उसने एक गहरी पीड़ा में नाम लिया और पार्टी फ्लोर पर लौटा। उसने सुमेधा से धीरे से बाहर आने को कहा।

  • तुम्हें मेरी बचपन की सहेली याद है, काव्या, उसका ऐक्सीडेंट हो गया है अभी।
  • तुम्हें कैसे पता चला?
  • किसी रिपोर्टर ने फ़ोन किया था
  • पर तुम्हें ही क्यों?
  • अब यह मैं कैसे बता सकता हूँ?
  • तो क्या हम पार्टी छोड़कर घर जा रहे हैं?

सुमेधा के पूछने का अंदाज़ कुछ इस तरह था कि स्वप्निल को कहना पड़ा- नहीं, मैंने उसकी फ़ैमिली को बता दिया है। शायद अब तक अंकल-आंटी निकल चुके होंगे।

पार्टी ख़त्म हुई और वे लोग घर लौट रहे थे। बच्चे बैक सीट पर लगभग ऊँघ रहे थे। सुमेधा साइड सीट पर बैठी थी। वह स्वप्निल के चेहरे के उतार-चढ़ाव को भाँप रही थी। स्वप्निल पूरी तरह अपने ज़़़ज़्बात छिपाने की कोशिश कर रहा था। घर पहुँचकर स्वप्निल ने कहा- मैं देखकर आता हूँ अंकल-आंटी चल पड़े हैं या नहीं।

-अभी इस वक्त, घड़ी तो देखो, रात के बारह बज चुके हैं। कल फ़ोन पर पूछ लेंगे। यदि अभी निकल भी गए होंगे तो रास्ते में होंगे, मे बी फ़ोन न उठाएँ।

स्वप्निल मन मसोसकर रह गया। काव्या का मुस्कुराता चेहरा उसकी आँखों के सामने से नहीं जा रहा था।

अस्पताल में परिवार से कोई नहीं पहुँचा था। प्रिया ने ऑफ़िस में फ़ोन कर दिया था कि इमरजेंसी में अटक गई है। देर से आफ़िस पहुँचेगी। सिस्टर ने आकर बताया- ख़ून की ज़रूरत है, यदि परिवार वालों के आने तक रुके तो देर हो सकती है।

प्रिया ने कहा- मेरे ख़ून की जाँच कर लीजिए। मैं ख़ून देने को तैयार हूँ।

प्रिया और काव्या का ब्लड ग्रुप मैच हो गया। प्रिया ने एक बोतल ख़ून दिया और अपने मोबाइल से ऑफ़िस में लीव की ऐप्लिकेशन सेंड कर दी। उसे पता था खून देने पर केजुअल लीव ली जा सकती है और संस्थान के लिए ऐसे समय छुट्टी देना अनिवार्य होता है। प्रिया वहीं रुकी थी। काउंटर पर काव्या के परिवार वाले काव्या के बारे में पूछ रहे थे। प्रिया तुरंत अपनी जगह से उठी और उन लोगों तक पहुँची- मैं प्रिया।

बुजुर्ग व्यक्ति ने धन्यवाद दिया। प्रिया ने बताया- कपल आईसीयू में है, लेकिन स्टेबल है।

बुजुर्ग महिला ने चिंता दर्शाई, प्रिया ने सांत्वना दी। वे लोग आईसीयू में देखकर लौटे, तो प्रिया ने कहा- अच्छा अब मैं चलती हूँ। आपको कोई भी ज़रूरत हो तो मुझे फ़ोन कर सकते हैं।

  • आप इतने समय तक रुकी रहीं, थोड़ा रुकिए चाय पीते हैं। आपने ब्लड दिया है, कमज़ोरी हो सकती है, नाश्ता कर लेते हैं।
  • नहीं, नहीं कोई दिक्कत नहीं। अस्पताल ने खून देने के तुरंत बाद मौसंबी का जूस दिया था। मैं घर जाकर थोड़ा आराम करूँगी।

उतने में बुजुर्ग व्यक्ति ने एक लिफ़ाफ़ा प्रिया की ओर बढ़ाया।

– इसमें क्या है?

– बेटा तुमने सही समय पर जो मदद की, उसे तो थैंक्यू कहकर भी नहीं लौटा सकते। ये थोड़े सी नकद राशि है, आशीर्वाद समझ कर रख लो।

– आशीर्वाद ही देना है तो एक रुपया दे दीजिए, उतना ही बहुत है।

प्रिया ने विनम्रता से लिफ़ाफा अस्वीकार कर दिया और घर के लिए चल पड़ी।

दूसरे दिन प्रिया ने फ़ोन पर पूछा, अस्पताल से अलग और परिवार वालों से अलग। परिवार वालों ने कहा स्टेबल है लेकिन अस्पताल से पता चला क्रिटिकल है। उसने अस्पताल में कहा कि उसे अपडेट देते रहें। अपडेट्स आ रहे थे काव्या की हालत नहीं सुधर रही थी। काव्या का पति ज़रूर कोमा से बाहर आ गया था।

अगले दिन प्रिया सुबह घर से जल्दी निकली और अस्पताल पहुँची। वह अनुमति लेकर काव्या को देखने गई। काव्या बेहोश ही थी लेकिन कुछ बुदबुदा रही थी, उस दिन भी वह यही नाम ले रही थी इसलिए प्रिया एकदम समझ गई कि वह स्वप्निल का नाम ले रही है।

वह बाहर आई। काव्या की माँ के साथ थोड़ी देर बैठी और उनसे कहा- आप नीचे तक आएँगी, मुझे ऑफ़िस के लिए निकलने में देर हो रही है। लिफ़्ट तक चलिए थोड़ी बात हो जाएगी।

वे मान गईं। प्रिया ने थोड़ा आगे बढ़ने पर पूछा- क्या स्वप्निल आ गया?

काव्या की माँ हकबका गई- स्वप्निल, आपको कैसे पता? आप जानती हैं? अरे हाँ, स्वप्निल का ही हमें फ़ोन आया था, उसने ही तो बताया था। पर आप उसे कैसे जानती हैं?

  • नहीं, मैं नहीं जानती। काव्या के लास्ट डायल में वह नंबर था, बाद में उसका फ़ोन स्विच ऑफ़ हो गया था तो दूसरे नंबर नहीं देख पाई। एक ही नंबर मिला था, इसलिए मैंने उसी पर फ़ोन किया था। पर लगता है स्वप्निल को बुला लेना चाहिए।
  • क्यों ऐसा लगता है?
  • काव्या उस दिन भी स्वप्निल का नाम ले रही थी, आज भी मैं उससे मिलने गई तो उसके मुँह से अस्पष्ट-सा यही नाम आ रहा था।
  • हाँ। उससे पूछती हूँ, आ सकता हो तो आ जाएगा।

प्रिया समझ गई कि वे स्वप्निल को फ़ोन नहीं लगा पाएँगी। उन्हें नमस्ते कहकर प्रिया थोड़ी आगे बढ़ गई और फ़ोन लगाया- हैलो स्वप्निल

  • जी मैं आपके फ़ोन की ही राह देख रहा था, काव्या कैसी है?
  • अरे तो खुद भी कर लेते, कोई दिक्कत नहीं थी।
  • पता नहीं, आप कहाँ, किस परिस्थिति में हों, इसलिए फ़ोन नहीं किया, हाऊ इज़ काव्या नाऊ?
  • शी इज़ इन क्रिटिकल स्टेज, आपका ही नाम ले रही थी, आप आ जाएँगे तो शायद वह तसल्ली से इस दुनिया से विदा हो पाएगी।
  • ऐसा क्यों कह रही हैं, वह फ़ाइटर है, ऐसे इतनी जल्दी नहीं जा सकती।
  • फ़ाइटर है शायद इसीलिए मौत से जंग लड़ रही है, मुझे नहीं पता आपका-उसका रिश्ता क्या है पर उसकी साँस आपमें अटकी है, इतना पक्का।
  • हम बचपन के दोस्त हैं। यह कहते हुए स्वप्निल की आवाज़ भर्रा गई, उसकी आवाज़ की कंपकंपाहट प्रिया को साफ़ महसूस हुई।

प्रिया ने कहा- तो क्या बचपन की दोस्त से मिलने नहीं आ सकते? शायद फिर कभी मुलाकात न हो पाए।

  • एक शहर में होता, तो आ भी जाता, इतनी दूर कैसे आऊँ?
  • क्यों जैसे उसके परिवार वाले आए हैं और वह तब भी आपका नाम ले रही है, आप नहीं आ सकते? इस दुनिया के पार चली जाएगी तब उतनी दूर मिलने जा पाएँगे क्या?

– मैं हारा हुआ हूँ, कभी उससे हारता था और बहुत पहले उसे भी हार चुका हूँ, कैसे आऊँ? कहाँ से वो हिम्मत लाऊँ?

 – कोई आपके लिए मौत से लड़ रहा हो तो उसके लिए दुनिया से नहीं लड़ सकते? फ़ाइटर के लिए फ़ाइट नहीं कर सकते?

इस पर उधर से कोई आवाज़ नहीं आई। प्रिया ने फ़ोन रख दिया। प्रिया अस्पताल की सीढ़ियाँ उतर रही थी।

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2 comments

  1. मेरी मर्जी, मैं स्वतंत्र देश की स्वतंत्र नागरिक हूँ, जब मर्जी, जहाँ मर्जी, आ-जा सकती हूँ, तुम मुझे टोकने वाले कौन होते हो?

    बहुत ही संवेदनशील कहानी के लिए बधाई

  2. पूरी शिद्दत से ‘फाइटर’

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