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मनोहर श्याम जोशी भाषा की हर भंगिमा में माहिर थे!

मनोहर श्याम जोशी जी की आज पुण्यतिथि है। आज उनको याद करते हुए मेरी एक छोटी सी टिप्पणी पढ़िए- प्रभात रंजन

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कुछ दिन पहले लेखक-आलोचक-पत्रकार आशुतोष भारद्वाज से बात हो रही थी। बात मनोहर श्याम जोशी के लेखन की होने लगी। मैंने कहा कि जोशी के उपन्यासों में जो सिनिसिज़्म है वह मुझे कई बार श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ की परम्परा में लगता है। आशुतोष जी ने छूटते ही कहा कि नहीं, जोशी जी के उपन्यास अपनी भाषा में रागदरबारी से भिन्न उपन्यास है। रागदरबारी की भाषा वही है जो परम्परा से चली आ रही है। मुझे कवि-आलोचक गिरिराज किराड़ू की यह बात भी अच्छी लगी थी जब उन्होंने लिखा था कि जोशी जी का कोई उपन्यास उस हिंदी में नहीं है जिसको खड़ी बोली हिंदी कहा जाता है। उनके उपन्यास हिंदी में लिखित परम्परा के लगते ही नहीं।

एक बार मैंने उनसे पूछा था उनकी भाषा के बारे में तो उन्होंने कहा था कि भाषा सुनने से आती है और भाषा सीखने के लिए एक लेखक को कोश तो देखना ही चाहिए लेकिन उपन्यास-कहानी पढ़ी हुई भाषा के सहारे नहीं सुनी हुई भाषा के सहारे लिखनी चाहिए। रेणु और प्रेमचंद में यही अंतर है। जिस लेखक में सुनकर भाषा ग्रास्प करने की क्षमता जितनी अधिक होती है उसकी भाषा उतनी ही जीवंत लगती है। यह कहते हुए वे इस बात पर अफ़सोस जताते थे कि वे अपने कथा गुरु अमृतलाल नागर की तरह भाषाग्राही नहीं हो पाए।

बहरहाल, मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है। एक बार न्यूयॉर्क में हिंदी सम्मेलन हुआ था जिसमें जोशी जी भी भाग लेने गए थे। उस आयोजन में बतौर प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी हिस्सा लिया था। जब जोशी जी अमेरिका से लौट कर आए तो मैं उनसे मिलने गया। वे मुझे यह बताने लगे कि वहाँ क्या-क्या हुआ। किस तरह वहाँ गए कवि-लेखक प्रधानमंत्री के महिमागान में लगे थे। कहते हुए उदाहरणस्वरूप उन्होंने मुझे एक तमिल कवि की कविता सनाने लगे जिसमें एक ही शब्द मुझे समझ आ रहा था- अटलां… मैं अचंभित हो गया कि जोशी इतनी अच्छी तमिल बोल लेते हैं और मुझे यह ज्ञान नहीं था। जब उन्होंने कविता सुनाकर खत्म की तो मैंने उनसे कहा कि आपको तो तमिल भी आती है। वे हँसने लगे। बोले मैं तमिल बोल ही नहीं रहा था। मैंने उसको जिस तरह पढ़ते हुए सुना था उसी लहजे को दुहरा रहा था।

बात भाषा की चल रही है तो एक और वाक़या याद आया। एक बार सुधीश पचौरी जी को प्रसिद्ध उत्तर-आधुनिक विद्वान देरिदा ने उनकी किताब पर फ्रेंच में कुछ लिखकर ऑटोग्राफ़ दिया। अब उनको फ्रेंच नहीं आती थी। उन्होंने किताब मुझे दी और बोले कि तुम कैम्पस में रहते हो किसी फ्रेंच के स्टूडेंट से पढ़वाकर बताना कि देरिदा ने लिखा क्या है! मैं सीधा जोशी जी के पास पहुँच गया क्योंकि मैंने उनके संस्मरण में पढ़ा था कि एक बार उन्होंने कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल की रिपोर्ट ‘दिनमान’ में छाप दी थी, जो कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की अंग्रेज़ी पत्रिका ‘इल्यूस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ से भी पहले हिंदी पत्रिका में प्रकाशित हो गई। जोशी जी ने लिखा था कि उन्होंने एक फ्रेंच अख़बार से वह रपट अनुवाद कर ली थी। ख़ैर, उनको मैंने पचौरी साहब की वह किताब दी और जोशी जी ने तत्काल देरिदा की फ्रेंच लिखावट को पढ़ दिया।

आज उनकी पुण्यतिथि पर याद आ रहा है कि मेरे लिए वे भाषा की हर समस्या का समाधान थे। अपने जीवन में अनेक मूर्धन्य लेखकों के संपर्क में आया लेकिन वैसा भाषाविद मुझे दूसरा नहीं मिला। वे भाषा के हर लहजे, हर भंगिमा में माहिर थे।

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