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नाटक कम्पनियों की कुम्भ यात्रा: गोपाल राम गहमरी(1927)

इन दिनों हरिद्वार में कुम्भ चल रहा है। पहले कुम्भ मेले में पारसी थिएटर कम्पनियाँ आती थीं, उनके नाटकों की धूम रहती थी। गोपाल राम गहमरी का यह लेख 1927 के कुम्भ मेले और नाटकों को लेकर है। यह दुर्लभ लेख उपलब्ध करवाया है राँची के संजय कृष्ण ने, जिन्होंने हिंदी की दुर्लभ किताबों को जुटाने के लिए हिंदी के किसी शोधार्थी से भी अधिक जतन किया है। वे पेशे से पत्रकार हैं। आप यह लेख पढ़िए-

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कुंभ की यात्रा(नाटक कंपनियां)
गोपाल राम गहमरी
1927
‘‘इस मेले के अवसर पर हरिद्वार में दो नाटक मंडलियों का आगमन हुआ था। एक बम्बई की न्यू अल्फ्रेड थियेट्रिकल कम्पनी और दूसरी पारसी अलेक्जेंडर कम्पनी। न्यू अल्फ्रेड तो स्टेशन के सामने ही अपना तमाशा दिखलाती थी ओर पारसी अलेक्जेंडर कम्पनी कनखल रोड पर थी।
न्यू अल्फ्रेड कम्पनी ने इस पुण्य स्थान के अवसर पर ‘परिवर्तन’ , ‘प्रह्लाद’, ‘चलता पुर्जा’, और ‘कृष्णावतार’ का अभिनय किया। हम भी एक दिन उस नाटक मंडली में पहुंचे। थोड़ी ही देर बाद पर ‘कृष्णावतार’ का अभिनय आरम्भ हुआ। यह नाटक सुप्रसिद्ध कविरत्न श्रीयुत पंडित राधेश्याम कथा-वाचक का लिखा हुआ है। सूत्राधार के मंगलपाठ और नटी के उपोद्घाटकर नाटक आरम्भ हो गया। अत्याचारी क्षत्रियकुल कलंक कंस का अत्याचार देव की ‘कोल्ड ब्ल्ड’ बालकों को तलवार के घाट और अन्तिम आठवीं कन्या को स्टेज पर पटककर खून करना नाटक मंडली में ने ऐसी खूबी से दिखाया कि दर्शकों का कंस की निर्दयता पर कलेजा कांप गया।
बीच-बीच में महर्षि नारद देव का पधारना और घबड़ाई हुई प्रजा को प्रबोध देना, कंस के जुल्म से जर्जित प्रजा में भी संतोष छिड़कता था। आप बार-बार यह कर रहे थे कि जो अत्याचार होता है होने दो। इधर यह प्रबोधन और उधर कंस का महाअनर्थ, प्रजा का महाकष्ट सीमा से बाहर हो गया। जो उचित बात कहता उसी पर आफत का पहाड़ गिराकर कंस उसे नेस्त नाबूद कर देता था, बाप उग्रसेन को भी इसी कारण कंस ने कैद करके अपने अत्याचार की पराकाष्ठा दिखला दी। हम तो समझते थे कि राज्य के लिए अर्थ लोलुप नरेशों का निन्द्य कर्म मुसलमानों की बादशाहत में भरा पड़ा है। औरंगजेब के भाइयों को मारकर बाप को कारागार में डालकर महाअनर्थ घटना यह सब उस नरराक्षस कंस के जुल्म के आगे बाद आए लेकिन मन में वही आया कि नाहक लोग कलयुग-कलयुग कहकर पापकर्म की बढ़ती का बयान किया करते हैं, इस कामिनी कंचन के लिए तो हम देखते हैं, अनर्थ, महाअनर्थ पातकपर पातक महापातक करने वालों से कोई भी युग खाली नहीं रहता। द्रोपदी के लिए दुःसासन ने क्या-क्या अनर्थ किए, वह युग धर्मात्मा युधिष्ठिर का था। जान पड़ता है जिस शान्ति के लिए राज्य की परसी हुई थाली सामने से हट जाने पर भी भगवान राम ने वनवास की माला पहनी उस धीर गम्भीर बु़िद्ध से सहनशीलता दिखाने वाला कोई भी वीर किसी युग में नही हुआ।
जिस राजमुख भोग के भुगवाने की कामना से केकयी महारानी (ने) महरमना भरत के लिए राज और भगवान राम के लिए अपने पतिदेव दशरथ से चैदह वर्ष वनवास मांगा उसकी कुछ भी बात या कृतज्ञता न मानकर भरत ने सिंहासन पर खड़ाऊँ  रखकर दिन बिताए। जैसी सहनशीलता भरताग्रज भगवन ने दिखालाई उससे कहीं बढ़का भरत ने जगत के सामने ला रखा।
उसी संपत्ति के लिए कुष्ण के वसुधा नहीं, मथुरापुरी में रहते हुए भी कंस ने उसी मथुरा में जो अनर्थ किए वह सब देखकर किस हृदयवान के रोंगटे नहीं खड़े होते थे। बाबा कबीर ने ठीक ही कहा हैः-
चलन चलन सब कोई कहै पहुंचे विरला कोय।
एक कनक अरु कामिनी दुर्लभ घाटी दोय।।
हमने ‘कृष्णावतार’ सब देख डाला और कंस वध तक देखकर अपेन नेत्रा सफल किए। लेकिन बम्बई में हमने गुजराती, मराठी के बहुत नाटक देखे। कलकत्ते मंे मिनर्वाक्लासिक थियेटर में बंगला भाषा के नाटक देखे। उसी कलकत्ते में हिन्दी के नाटक भी देखे हैं, जहां हिंदी के बड़े-बड़े तर्रार लेखक रहते है। वहां भी हमने हिंदी के नाटक देखे हैं लेकिन उनके पात्रों का उच्चारण ओर चरित्रा-चित्राण देखकर यही कहना पड़ता था कि अच्छे नाटक लिखे रहने पर भी हिंदी का प्रसार नाटकों के स्टेज पर होने को अभी बहुत दिन बाकी है। बयालीस बरस पहले की बात है जब काशी के भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र बलिया में ‘सत्यहरिश्चन्द्र’ नाटक स्वयं हरिश्चन्द्र बनकर खेला था जिसमें हिंदी के सुलेखक ‘दुःखिनी बाबा’ के लेखक बाबू राधाकृष्णदास सरीखे हिंदी सेवक, रविदत्त शुक्ल से कवियों ने पार्ट लिया था उस समय पर्दा ओर सीनों का सुन्दर जमाव नहीं था लेकिन जो कुछ स्टेज उस समय बना था बजाज के कपड़े तानकर जो काम भारतेन्दु जी ने कर दिया था उसकी महिमा युरोपियन लेडियों तक ने गायी थी। उस समय के कलेक्टर साहब की मेम ने आसुओं से भरा रूमाल निचोड़कर जब साहब की मारफत भारतेन्दु जी से आग्रह किया था कि रानी शैव्या का श्मशान में विलाप धीरज छुड़ा रहा है सीन बदला जाए। इसपर सत्य हरिश्चन्द्र बने हुए भारतेन्दु ने स्वयं ओवर ऐक्ट किया था और दशर्क मण्डली में करुणा के मारे त्राहि-त्राहि मच गई थी।
पात्रों का शुद्ध उच्चारण हमने उसी समय हिंदी के नाटक स्टेज पर सुना था कि आज हरिद्वार में सुना। इस नाटक मण्डली ने पात्रों की सजाव, संगीत की ठाट, पोशाक की सुन्दरता, पर्दे की सुन्दरता सब में कमाल कर दिया था। वह ठाट-बाट और सीन का सजाव तो हमने बहुत देखा था लेकिन हिंदी की शुद्ध उच्चारण ठाट काशी में भारतेन्दु नाटक मण्डली में पाया था उससे भी कई बातों में चढ़-बढ़कर हमने इस न्यू अल्फ्रेड नाटक मण्डली में पाया।
हम नारद का पार्ट अदा करने वाले की जितनी सराहना करेंगे उससे कम देवकी के विलाप की मर्यादा नहीं थी जब कंस ने लात मारकर देवकी को स्टेज पर धम से पटक दिया तब भी क्रोध के बदले करुणा भरे शब्दों में भैया! भैया! कहकर उसकी विनती करना और बक्रूर कंस को उपदेश देना उग्रसेन का बेटे के अत्याचार से कृष्ण के सामने यहां तक कह देना कि ऐसे बेटे के मरने का रत्तीभर भी दुःख हमे नहीं हो सकता। बाप के बेटों के प्रति बेलाग शब्द बतला रहे थे कि अत्याचार और प्रजा के जुल्म से सबका सिंहासन डोल जाता है। इन सब घटनाओं के बाद जब नारद ने अपनी व्याकुलता दिखलाई तब लक्ष्मी निवास का शेषनाग के फन पर दर्शन देना और अवतार लेने का प्रबोध देकर अन्तद्र्धान होना। फिर बाल कृष्ण का वंशी अधरोंपर धरे हुए अवतार लेने इस सुन्दरता से दिखाया कि सब लोग धन्य-धन्य करने और भगवान श्रीकृष्ण की बड़ी ही श्रद्धा से जय बोलने लगे।
श्रीकृष्ण का बालरूप छाछ मक्खन चुराते समय और विकट रूप केस वध के अवसर पर परम दर्शनीय था। बालकपन में श्रीकृष्ण की गौरवर्ण कालिन्दी में नागनाथन के समय जब श्याम हुआ तब उस श्याम को कंस वध तक नाटक मंडली ने जिस सुन्दरता से निबाहा उसकी बड़ाई करते हुए श्री राधेश्याम को करनी याद आई, अहा कवि का कृष्ण चरित्रा जिस निपुणता से इस राधेश्याम ने निबाहा है उसको देखकर कारीगर के हाथ चूम लेने का मन करता है। नाटक समाप्ति पर हमसे यह पूछे बिना नहीें रहा गया कि यह ‘कृष्णावतार’ हरिद्वार की तपोभूमि में ही क्यों होता है। काशी की तीर्थ भूमि में वह अवतार दर्शन नहीं होता?
कंपनी से उत्तर मिला अवश्य होगा लेकिन कविरत्न राधेश्याम ने कहा-काशी में ‘कृष्णावतार’ के संग ही द्वारका के कृष्ण भी पधारेंगे। हमने कह दिया, योगमायासा रूप योगमायासा होना चाहिए। नाटक के हाते से बाहर निकलनेपर देखा तो जिस स्टेशन के मेन गेट पर घोड़ों पर चढ़े पुलिसमैन, भीड़ पर हंटर तानकर लोगों को दिन के समय हटाते थे वहां अब खासी बिजली के लैम्प ही दीप्यमान हैं। घड़ी देखते हैं तो चार बज गए हैं, लंबे पांव ऋषिकुल पहुंचकर अपने टेण्ट में खो गए।
(‘आज’(दैनिक), 28 अप्रैल 1927, पृ06)

संजय कृष्ण

 

 

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