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 डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया शीर्षक महाकथा में जो लेखन रहता है

गिरिराज किराड़ू का यह लेख बहुत पुराना है। उन दिनों का जब वे हिंदी के आधुनिक लेखकों के लेखन के मिथ को समझने-समझाने का प्रयास कर रहे थे। बड़ी-बड़ी बहसों को समझने का प्रयास कर रहे थे। निर्मल वर्मा आधुनिक हिंदी की एक बड़ी बहस रहे हैं। उनके आत्म और अन्य को लेकर लिखा गया यह लेख पढ़िए-

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 डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया शीर्षक महाकथा में जो लेखन रहता है

 

[यह लेख पहली बार 2001 में स्पिक मैके की पत्रिका ‘थाती’ (सम्पादक यतींद्र मिश्र) में प्रकाशित हुआ था.इस लेख में मैं, कम-से-कम अपने लिए, यह पहचान कर सका था कि कैसे परवर्ती निर्मल में आत्म और अन्य की पहचान बदल गयी थी. बाद के सालों मेरी मान्यता यह बनी है उनके परवर्ती लेखन में पहचान आधारित एक स्पष्ट [सांस्कृतिक] राजनीति आकार ले चुकी थी]

To me as a child the India that had produced so many of the persons and things around me was featureless and I thought of the time when the transference was made as a period of darkness darkness which also extended to the land. As darkness surrounds a hut at evening, though for a little way around the hut there is still light. The light was the area of my experience, in time and place and even now, though time has widened, though space has contracted, and I have travelled lucidly over that area whivh was to me the area of darkness, something of darkness remains, in those attitudes. those ways of thinking and seeing, which are on longer mine.

– सर वी. एस. नैपाल1

निर्मल वर्मा अपने एक निबंध में यह तथ्य पूर्वमान्यता की तरह प्रयुक्त करते हैं कि उनके लिए (भारतीयों/भारतीय संस्कृति के लिए) अपनी अस्मिता की पहचान का संदर्भ कभी कोई अन्य नहीं रहा, आत्म हमेशा आत्संदर्भी स्वीकारा गया. इसे हम इस दूसरे तथ्य के साथ रखना चाहते हैं कि निर्मल वर्मा के लिए बतौर एक भारतीय लेखक-बुद्धिजीवी और मनुष्य अपनी अस्मिता पहचान का संदर्भ सदैव एक अन्य रहा है. इसीलिए भारतीयों की दूसरी संस्कृतियों के प्रति प्रारूपिक ‘चुप्पी’ और ‘उदासीनता’ के बरक्स निर्मल वर्मा इन ‘दूसरी’, ‘अन्य’ संस्कृतियों – योरोपीय या बौद्ध या वामपंथी संस्कृति (?) – के विषय में उल्लेखनीय रूप से मुखर हैं. इस अर्थ में एक भारतीय लेखक और मनुष्य के रूप में अपनी अस्मिता की खोज की उनकी चेष्टाएं जैसे एक स्व-परिभाषित अ-भारतीय विधि एवं अवधारणा पर आधारित हैं. निर्मल वर्मा का संस्कृति-चिंतन अर्थात् उनका आत्म चिंतन ऐसे ही स्पष्ट अंतविर्रोधों के कारण उस अवस्था व बुनावट का एक स्पष्ट प्रतिनिधि है जिसे हम उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय बुद्धिजीवी के साथ संबंद्ध करते हैं. (ऐसा ही स्पष्ट अंतर्विरोध तब भी उभरता है जब वे भारतीय उपन्यास की अवधारणा निर्मित करते हुए यह पहचानते हैं कि स्वयं उनके उपन्यास किस कदर एक स्वपरिभाषित विधि, मानक से अ-भारतीय है) निर्मल वर्मा के लेखन में प्रतिनिधित्व के प्रति जो सघन विराग और संतप्त सम्मोहन है, उसकी रोशनी में इसे पढ़ने व स्थापित करने का प्रयास करना बहुत दिलचस्प और दुरूह हो सकता है पर इस निबंध में हमें उस अन्य की रिहाइश देखनी है जिसे संदर्भ बनाए बिना वे अपने आत्म की कोई तस्वीर नहीं बना पाते हैं. दूसरे और अब तक इस निबंध में पहले ही कहे जा चुके शब्दों में हमें उस स्व-परिभाषित अ-भारतीय विधि का विवरण पाना है जिस पर उनके परवर्ती लेखन में भारतीय होने की खोज का, भारत की खोज का, अपने आत्म की खोज का वृत्तांत टिका है.

दो

निर्मल वर्मा के पूर्ववर्ती लेखन में आत्म और अन्य दोनों की एक समग्रीकृत, एकनिष्ठ, रेनेसां-निर्मित, सेकुलर और आधुनिकतावादी छवि है. यह समग्रीकृत और एकनिष्ठ अन्य ‘योरोप’ है और यह समग्रीकृत और एकनिष्ठ आत्म ‘भारतीय’ है. इस अन्य के साथ उनके एनकाउंटर की शुरूआत चीड़ों पर चांदनी में होती है. अन्य के इलाके में पहली यात्रा.

इस दृष्टि से वह मेरी पहली यात्रा-पुस्तक चीड़ों पर चांदनी से बहुत भिन्न है, जिसमें मैंने भोले उल्लास में पहली बार योरोप की संस्कृति को चखा था, वहां भोगने का सुख था, शंका करने की गुंजाइश नहीं थी.3

यह स्थापित करना मुश्किल नहीं कि यह भोला उल्लास ‘अन्य’ से विमोहित एक औपनिवेशिक कलाकार-बुद्धिजीवी की आत्म-छलना है. निर्मल वर्मा इस पूरी पुस्तक में एकवर्णी सांस्कृतिक अनुभव –योरोपीय सांस्कृतिक अनुभव – की संरचना निर्मित्त करते हैं जिसमें कोई दूसरा नहीं. लेकिन दस वर्ष बाद जब इसे पहचानते हैं तो,

आज दस वर्ष बाद मेरे लिए पश्चिमी संस्कृति का संकट कोई बाहर की बीमारी नहीं है, जिससे पल्ला झाड़कर मैं अपनी पवित्र और शाश्वत परंपरा में सुरक्षित रह सकूं. न ही भारतीय संस्कृति सिर्फ मेरे संस्कारों की उपज है जिसका दूसरों से कोई वास्ता नहीं.4

इसके साक्ष्य से क्या हम यह कह सकते हैं कि निर्मल वर्मा का अन्य के साथ पहला एनकाउंटर कुछ ऐसा है कि वे अन्य के अंदर, जहां शंका करने की गुंजाइश नहीं है, इस तरह रहते हैं जैसे वह अन्य खुद अभी आंतिरिकीकृत नहीं हुआ है, बाहरी है.

तीन

हम भारतीयों की इस आत्मतुष्टि और आत्मविडंबना के गहरे ऐतिहासिक कारण हैं. जिस स्वतंत्र व्यक्ति का जन्म योरोप में रेनेसां के दौरान हुआ था, उसकी परिकल्पना भारत के अर्द्ध-सामंतवादी समाज में असंभव लगती है.5

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चूंकि मानसिक आलस्य और हीन भाव हमें खुली दुनिया में जाने से रोकता है, हम अपने अतीत के अंधे प्रेतों से चिपके रहना ही सुविधाजनक समझते हैं…. इस कटु सत्य को निगल नहीं पाते कि सभ्यता के जो जीवंत तत्व सदियों पहले हममें मौजूद थे, इतिहास-चक्र ने उन्हें किन्हीं दूसरे देशों और सभ्यताओं को हस्तांतरित कर दिया है.6

इन दिनों निर्मल वर्मा की जो वैचारित पोजिशन है, उसमें इन शब्दों को पढ़ना हैरान करता है. यह निर्मल वर्मा का अपने समग्रीकृत, एकनिष्ठ अन्य से दूसरा एनकाउंटर है. विमोहन का खिंचवा और प्रश्नांकन की चेष्टाएं इस दूसरी दफा को बहुत यातनापूर्ण बनाती है. अन्य और आत्म की सन्निधि की संरचनाएं बननी यहीं शुरू होती हैं. इसमें निर्मम आत्म साक्षात्कार की जो उप-निर्मित्तियां हैं, वे स्वयं निर्मल वर्मा के परवर्ती लेखन में अनुपस्थित हैं जिसमें अतीत के इन्हीं अंधे प्रेतों को गौरवमय छायाओं में परिवर्तित किया जाता है. ठीक इस बिंदु पर उनका आत्म-साक्षात्कार भी एक ऐसे बुद्धिजीवी का विमर्श है जो अपनी औपनिवेशिक सीमाओं और एक दूसरी औपनिवेशिक संतति – भारतीय आधुनिकतावाद – के केंद्रवादी, समग्रतावादी, गैर-राष्ट्रीयतावादी मूल्यों के बीच नाजुक संतुलन बनाता हुआ सच्चे अर्थों में ‘आधुनिक’ और कुछ-कुछ प्रतिशील हो उठता है.

केवल इस रास्ते से ही हम पहली बार उस ‘भारतीय आत्मा’ को भी सूरज की रोशनी में उबार सकेंगे जिस पर सदियों से झूठी जातीयता और अंधविश्वासों की राख जमा होती गई है. यह कुछ लोगों को तार्किक असंगति जान पड़े, किंतु यह सत्य है कि स्वयं अपनी ‘जीवंत आत्मा’ को खोजने के लिए भी आज हमें पश्चिम की वैज्ञानिक संस्कृति से गुजरना होगा.7

और एक ऐसी संरचना बनती है जिसके केंद्र में एक सार्वभौमिक, सार्वदेशिक आधुनिकतावादी मनुष्य का जन्म होता है.

इसमें संदेह नहीं कि पश्चिमी सभ्यता के अपने अंतर्विरोध और संकट हैं, किंतु महत्वपूर्ण चीज यह है, जिसे मैं यहां रेखांकित करना चाहता था (और जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं), कि आज का कोई भी कलाकार, चाहे वह फ्रेंच. हो या जापानी या भारतीय, अपने को उन अंतर्विरोधों और संकट से अछूता नहीं रख सकता. इसे योरोप की ‘विशेष स्थिति’ कहकर टाला नहीं जा सकता, क्योंकि वह बीसवीं शताब्दी की केंद्रीय मानवीय स्थिति है.8

 

यह केंद्रीय मानवीय स्थिति का महारूपक किस तरह उस सांस्कृतिक वर्चस्वशीलता का मानवीय चेहरा भर है, इसे वे बहुत बाद में, एक दूसरे तरीके से और हमेशा की तरह दूसरे शब्दों में पहचानते हैं हालाँकि इसका दबाव निर्मल वर्मा हमेशा महसूस करते हैं.

चार

निर्मल वर्मा निबंध के जिस गैर-अभिजात और लोकतांत्रिक ‘खुलेपन’ में सांस्कृतिक को अवस्थित करते हैं, उसका निर्वासन जब उपन्यास या कहानी की ‘गहराई’ में होता है तो यह लगभग एक स्वायनशासी निकाय हो जाता है: निबंध और फिक्शन की दो भिन्नताओं, सत्तामूलक श्रेणियों ‘गहराई’ और ‘खुलेपन’ के बीच सक्रिय एक निकाय. चीड़ों पर चांदनी का निर्वासन वे दिन में होता है. हर बारिश में का लाल टीन की छत में. कला का जोखिम का रात का रिपोर्टर में. कुंभ पर संस्मरण सुलगती टहनी का कव्वे और काला पानी में. भारत और योरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र व अन्य परवर्ती निबंध लेखन का अंतिम अरण्य में.

पांच

निर्मल वर्मा के कथा-लेखन पर अपनी विचारोत्तेजक किताब ‘कथापुरुष’ में मदन सोनी एक महत्वपूर्ण पद ट्रांजिट स्टेशन को बहुसंकेतक व्यवस्था की तरह प्रयोग करते हैं. हम इस निबंध में बिना ठीक से स्पष्ट किए परवर्ती और पूर्ववर्ती जैसे पदों का व्यवहार करते रहे हैं. यदि मदन सोनी से यह पद उधार ले कर हम निर्मल वर्मा के कुंभ के मेले पर लिखे यात्रा संस्मरण को उनके लेखन के ठीक बीच में मौजूद एक ट्रांजिट स्टेशन कहें तो यह दोनों पद स्पष्ट हो सकते हैं. परवर्ती को एक टर्मिनस – अन्य विमोहन का टर्मिनस – की तरह पढ़ा जा सकता है. दूसरा टर्मिनस (आत्मविमोहन?) अभी कुछ मुकम्मिल पढ़ा नहीं जा सकता. उसको पढ़ने का, उसकी तरफ जाते संकेतों को देखने का प्रयत्न ही यह निबंध है. हां उधार लेते ही इस पद-ट्रांजिट स्टेशन का अपना अर्थ भी वहीं नहीं रहा, कोई दूसरा हो गया है.

मैं जहां कहीं भी होता हूं, वह अपनी फैली फटी-फटी आंखों से मुझे निहारता है- मैं क्या हूं, यह वह नहीं समझ पाता – मैं तीर्थयात्री लगता हूं, न कल्पवासी – मैं उसे आधा हिप्पी, आधा जिप्सी-सा दिखाई देता हूंगा – जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है.9

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अब मैं देख सकता हूं – अचानक उजाले में! पूर्व में एक छोटा-सा लाल पिंड, एक सुर्ख आंख-सा डिस्क. उसे देखकर मैं उसी तरह चैंक जाता हूं जैसे पहली बार बाइबिल में यह वाक्स पढ़कर रोमांचित हो उठा था- लेट दियर बि लाइट एंड देयर वॉ लाइट. मैंने कभी ऐसा आलोक नहीं देखा- और तब मुझे सहसा महसूस हुआ कि यह आज का दैनिक उजाला नहीं, कोई प्रागैतिहासिक आलोक है, जब दुनिया पहली बार अंधेरे से बाहर आई थी.10

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हिंदू-मानस में कोई ऐसा बिंदु नहीं जिस पर अंगुली रखकर हम कह सकें, यह शुरू है, यह अंत है. यहां कोई आखिरी पड़ाव, ‘जजमेंड डे’ नहीं, जो समय को इतिहास के खंडों में बांटता है.11

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ये कुंभ मेले अस्थायी आश्रम हैं, चारों तरफ छोटी-छोटी आरामदेह कुटियों के भीतर एक ठंडी छांह बिछी रहती है. उन्हें देखकर योरोप की मध्यकालीन मानिस्टरी की कोठरियां याद आती हैं, जिनमें भिक्षुक अपना समूचा जीवन बिता देते थे.12

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वे इस अखाड़े के साधु नहीं थे – किंतु भिखारी भी नहीं जान पड़ते थे – एक किस्म के धार्मिक प्रोलितारियत-जिन्होंने अपनी दुनिया छोड़ दी थी, किंतु जिन्हें अभी तक किसी मठ या संप्रदाय की दुनिया में स्थान नहीं मिला था.13

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उन दिनों सूनी दुपहरों में अखाड़ों के चक्कर लगाता हुआ मैं अक्सर ‘त्याग’ के बारे में सोचा करता था- जिसे कृष्ण ने, बार-बार दुहराया है. जीसस क्राइस्ट के ये शब्द अक्सर झिंझोड़ जाते थे: सब कुछ छोड़कर मेरे पीछे चले आओ – एक ऊंट सूई के छेद से बाहर निकल सकता है, किंतु एक धनी पुरुष स्वर्ग नहीं जा सकता, किंतु साधुओं, महंतों, मठाधीशों की भीड़ में मुझे लगता था कि वे एक दुनिया के बंधन काटकर दूसरी दुनिया के जंजाल में इतना फंस गए हैं कि ईश्वर का वहां कहीं पता नहीं चलता था.14

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एक बार मैंने अपनी यह जिज्ञासा एक उदासी बाबा के सामने रखी थी. उनका उत्तर बहुत कुछ कैथोलिक चर्च के अनुयायियों से मिलता-जुलता था. ‘‘यदि मठ नहीं रहेंगे तो ईश्वर और सांसारिक लोगों के बीच कौन कार्यकलाप करेगा? हम एक तरह से मिडलमैन हैं-लौकिक और पारलौकिक के बीच.15

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शायद अंत में स्मृति के ये अंक बचे रह जाते हैं; न इस धरती के, न ईश्वर के किंतु दोनों को एक ‘एपिक’ गाथा में बांधते हुए.16

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बहुत देर तक राख ओर लपटों के बीच उनका स्वर मेरे कानों में गूंजता रहा, जैसे वह बार-बार मुझसे कह रहे हों, लो यह लकड़ी, पेड़ की एक शाख, जिसे सलीब बनाकर जीसस अपने कंधे पर ढोते हुए गोलगोथा के टीले पर चढ़े थे. यह टहनी है, एक शाख, राख और चिंगारियों में मनुष्य की शाश्वत वेदना में सुलगती हुई … जिस पर कृष्ण बैठे थे, पैर पर तीर से बिंधे हुए, लहूलुहान, क्षत-विक्षत, हवा में झूलती अनेक शाखाओं के बीच समूची गीता का मर्म खून के कतरों में बूंद-बूंद टपक रहा था…17

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मेरे लिए कुंभ मेला अपने में एक बहता, अनलिखा महाकाव्य था, गरीबी, गौरव, सुख, यातना को एक कड़ी में पिरोता हुआ, बालू पर मनुष्य की भाग्यरेखा को अंकित करता, मिटाता हुआ-रिल्के ने जिस देवदूत (एंजिल) से ईष्र्या की थी, जो ईश्वर के पास है, क्या उसका प्रतिरूप इस दुनिया में लेखक नहीं है: एक रिपोर्टर, एक खबर देने वाला हरकारा-दोतरफा दूत – जो ईश्वर की खबर मनुष्य को और धरती का सौंदर्य कहीं दूर ईश्वर को देता रहता है एक ऐसा ईश्वर जो शायद नहीं है, किंतु जिसे वह सुलगती लकड़ी की तरह कंधे पर रखकर चलता है. मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं इस पर विश्वास करना चाहूंगा, इस विश्वास के सहारे जीना चाहूंगा.18

इस विस्तृत उद्धरण- श्रृंखला से आप यह स्पष्ट ही लक्ष्य कर सकते हैं कि प्रत्येक अनुभूति-सांस्कृतिक अनुभूति के सादृश्य के लिए एक अन्य सांस्कृतिक अनुभूति का विधान है [जैसे जीसस और कृष्ण, टहनी और गोलगोथा, उदासी बाबा और कैथलिक चर्च, भिक्षुक और धार्मिक प्रोलेतरियात, कुम्भ के अस्थायी आश्रम और मध्यकालीन मानिस्टरी की कोठरियां आदि]. इसे ही हमने पूर्व में आत्म और अन्य की सन्निधि की सरंचनाएं कहकर पुकारा था. यहां निरंतर आत्म को अन्य के संदर्भ से न सिर्फ पहचाना जाता है, बल्कि स्वीकार किया जाता है. हम इस शब्द स्वीकार पर जोर देना चाहेंगे क्योंकि सुलगती टहनी के आख्याता का स्वर कुछ-कुछ पाप-स्वीकार जैसा है.

मेरा रिश्ता अपनी संस्कृति से वैसा ही है जैसा किसी व्यक्ति का यातनापूर्णग् प्रेम में दूसरे से होता है-चाहना और घृणा से भरा हुआ-घृणा जो धीरे-धीरे एक उदासीन, सुन्न किस्म की वितृष्णा में बदल जाती है. इससे छुटकारा पाने के लिए ही मैं यहां चला आया हूं-जैसे दूसरे को देखने से ही अपने को पा जाऊंगा, एक दर्शक, संवाददाता, कुंभ के मैदान में भटकता हुआ एक रिपोर्टर!19

इस ट्राजिंट स्टेशन – कुंभ – पर उतरते चढ़ते आत्म और अन्य के एनकाउंटर को यह यात्रा, ‘तीर्थयात्रा’ हो जाती है.

एक तरह से सिंगरौली की यात्रा भी उस ‘तीर्थयात्रा’ की अंधेरी परिणति है, जिसकी शुरूआत इलाहाबाद के कुंभ मेले में हुई थी.20

छह

डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया लिखने के दो तरीके हैं. एक वह जिसमें एक औपनिवेशक चेतना अन्य के साथ समन्वय का स्पेस बचाते हुए निर्मित करते हुए, अपने आत्म की खोज के लिए अतीत और इतिहास से होकर अपने को सांस्कृतिक को उपलब्ध करती है जैसा जवाहरलाल नेहरू करते हैं. एक लिखित दस्तावेज की शक्ल में. दूसरा वह जिसमें यथार्थान्वेषण – खुले भूलोक में यथार्थान्वेषण – अपनी सहज परिणति में सांस्कृतिक के उद्घाटन में फलित है, जैसा महात्मा गांधी करते हैं. गांधी की इस खोज का ‘जिक्र’ वे अन्य और आत्म के इस संबंध की कहानी लिखते हुए करते हैं: भारत और योरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र. और नेहरू तक पहुंचते हैं सिंगरौली21 में जहां से कोई वापसी नहीं. (इसे वे कुंभ की तीर्थयात्रा की अंधेरी परिणति बताते हैं तो यह संगत ही है, सिंगरौली नेहरू के स्वप्न का भूगोल है, एक ‘नया तीर्थ’) सिंगरौली में तकनीक और प्रौद्योगिकी – ‘पश्चिम की वैज्ञानिक संस्कृति’ – के जिस ‘सत्य’ को वे पहचानते हैं, वह वही है जो महात्मा गांधी हिंद स्वराज्य में लिखते हैं. निर्मल वर्मा की डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया का एक महत्वपूर्ण उप-चक्र यहीं पूरा होता है.

सात

निर्मल वर्मा अन्य के साथ अपने एनकाउंटर की सर्वाधिक ‘तार्किक’ रिपोर्ट भारत और योरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र में लिखते हैं. वे उपनिवेशकालीन इतिहास को गल्प में परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं और इतिहास-लेखन और गल्प-लेखन की शक्तियां एक दूसरे को इस तरह प्रतिक्रमित और प्रतिसंतुलित करती हैं कि यह न इतिहास –सार्वजनिक – रहता है और न ही गल्प – व्यक्तिगत – रह पाता है. यह रिपोर्ट व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की विधा22 में एक सार्वजनिक अभिव्यक्ति हो जाती है. निर्मल वर्मा पहली बार रिर्पोटर हो पाते हैं. उपनिवेशवादी अंधेरी रात के रिपोर्टर.

पिछले तीन हजार वर्षों में शायद ही ऐसा कोई समय रहा हो जब भारत को ‘यवनों’ और ‘मलेच्छो’ ने न घेरा हो; पहले यूनानियों और हूणों ने, फिर इस्लाम और उसके ठीक बाद ईसाई मिशनरियों और योरोपीय विजेताओं ने.23

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बौद्ध धर्म हिंदूओं को एक दार्शनिक चुनौती मालूम देता था, जिससे वे निपट सकते थे-वे पराए होते हुए भी अपने थे और अंनत वे बिल्कुल अपने हो गए और बौद्ध धर्म भारत में लिप्त नहीं, लीन हो गया. दूसरी और इस्लाम और ईसाई धर्म अपने असंदिग्ध पराएपन के कारण आज तक संस्थाबद्ध रूप में भारत में अस्तित्ववाद हैं.24

जैसे ही यह यात्रा “तीर्थ यात्रा” में परिवर्तित होती है उस संघटना का जन्म होता है जिसके आधार पर हमने एक ट्रांजिट स्टेशन को आविष्कृत करते हुए निर्मल वर्मा के लेखन का लेखा परवर्ती और पूर्ववर्ती जैसे पदों में किया है: आत्म और अन्य दोनों की अब तक उपस्थित छवियों का विखंडन. निर्मल वर्मा के लेखन में आत्म और अन्य की जिन समग्रीकृत, एकनिष्ठ, रेनेसा-निर्मित, सेकुलर और आधुनिकतावादी छवियों को हमने पूर्व में प्रस्तावित किया था, वे कुंभ के इस ट्रांजिट स्टेशन से गुजरकर विखंडित हो जाती है. अब निर्मल वर्मा का समग्रीकृत, एकनिष्ठ आत्म-भारतीय-वह नहीं है जो उसे आधुनिकतावाद और रेनेसां के गैर-राष्ट्रीयतावादी, सांस्कृतिक-केंन्द्रिकतावादी विमर्श में उपलब्ध हुआ था. अब यह भारतीय विखंडित होकर कुछ कुछ उस आत्म में परिवर्तित होता है जिसे शु़द्ध भारतीय आत्म या उपनिवेश पूर्व का मूल भारतीय आत्म भारत कहा जाता है. यह बहुसांस्कृतिकतावादी विकेंद्रीकरणवादी गैर-आधुनिक, उत्तर आधुनिक विखंडन है.

     यह विलक्षण विखंडन है. निर्मल वर्मा का अन्य अब एक समग्रीकृत और एकनिष्ठ योरोप नहीं रहा. वह अब बौद्ध, हूण, यूनानी, इस्लामी आदि कई रूपों में विखंडित, विकेंन्द्रित हो गया है. यह विलक्षण इस अर्थ में है कि यही अवयव-बौद्ध, हूण, यूनानी, इस्लामी उनके समग्रीकृत एकनिष्ठ आत्मा के भी संघटक अवयव थे. इस तरह आत्म और अन्य उभय सामान्य अवयवों के स्थानांतरण से भिन्न और अभिन्न होते हैं. यही पर निर्मल वर्मा के लेखन में डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया लिखने के एक तीसरे तरीके की पहचान होती है. यह तीसरा तरीका विवेकानंद का तरीका है.

आठ

निर्मल वर्मा के संस्कृति चिंतन, जिसे हम कुछ जोर के साथ पहले ही आत्मचिंतन कह चुके हैं, मैं इस इस दूसरे टर्मिनल परवर्ती में स्थित, को आत्मविमोहन कहा जा सकता है कि नहीं यह अभी भी हमारे सम्मुख स्पष्ट नहीं है. यह भी प्रस्तावित किया जा सकता है कि यह दूसरा टर्मिनस सिर्फ आत्मविमोहन का ही नहीं, आत्मवियोजन और अन्यवियोजन का भी टर्मिनस है. निर्मल वर्मा डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया किसी एक तरीके से कभी नहीं लिख सकते, यह उनके अब तक के लेखन के आधार पर कहा जा सकता है, बल्कि ये कभी भी कुछ भी किसी एक तरीके से नहीं लिख सकते. उनके लेखन में अपने ही संहार की सर्वाधिक सामग्री है और यह भी उनकी लिखने की शैली की ही एक युक्ति है जिसमें संहार और आहार निर्विकल्प रूप से परस्पराश्रयी शक्तियां हो जाती है. हमने शायद उस अन्य की रिहाइश की कथा कुछ कही है जो उनके लेखन में रहता आया है. शायद कुछ कथा उस महाकथा – डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया – की भी कही है जिसे लिखने की महत्वाकांक्षा उनके लेखन में रहती है.

गिरिराज किराड़ू

 

 

 

 

 

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संदर्भ

  1. वी. एस. नैपाल, एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस, पेंग्विन पेपरबैक्स, पृ.9
  2. निर्मल वर्मा, भारत और योरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1991, पृ. 31
  3. निर्मल वर्मा, भूमिका, हर बारिश में, राधाकृष्ण प्रकाशन द्वितीय आवृति, 1981
  4. वही

5-8.   निर्मल वर्मा, ‘केंद्रीय मानवीय स्थिति’, हर बारिश में, वहीं पृ. 31, 32, 32, 33

9-19. निर्मल वर्मा, ‘सुलगती टहनी’, कला का जोखिम, राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, पृ. क्रमशः 105, 107, 109, 110, 116, 117,126, 127

  1. निर्मल वर्मा, भूमिका, ढलान से उतरते हुए, राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1988
  2. निर्मल वर्मा, ‘सिंगरौली: जहां कोई वापसी नहीं, वही पृ. 94, 104
  3. निर्मल वर्मा, ‘सुलगती टहनी’ वही. एक जगह निर्मल वर्मा लिखते हैं कि वे हमेशा ही अपने को लेखक न कह पाकर रिपोर्टर बताते है. यह उनके उस संकोच से मिलता जुलता है जिससे वे प्राग में अपने लेखक होने को छुपाते थे. (साक्षात्कार, पूर्वग्रह का निर्मल वर्मा पर केंद्रित अंक)

23.-24. निर्मल वर्मा, भारत और योरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, वहीं, पृ. 30, 32

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