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इस आवाज़ की अपनी एक कशिश है: प्रयाग शुक्ल

कवयित्री पारुल पुखराज की डायरी ‘आवाज़ को आवाज़ न थी’ पर यह टिप्पणी लिखी है जाने-माने कवि, कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल जी ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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 पिछले दिनों पारुल पुखराज की पुस्तक ‘आवाज़ को आवाज़ न थी’’ (डायरी) मिली। तो स्वयं डायरी-विधा को लेकर कईं बातें ध्यान में आयी; डायरी, एक कहानी (कहानियाँ) भी होती ही है, वह कविता (जैसी) भी हो सकती है। उसमें जीवन-कथा-आत्मकथा के अंश होते ही हैं, सो वह उन प्रसंगों-अंशों के कारण थोड़ी-बहुत आत्मकथा भी होती है। कुछ डायरियाँ, दिनचर्या को सहेजने वाली होती है  – उसे तथ्यात्मक ढंग से दर्ज करने वाली। और वैसी डायरियाँ/ टीपें भी लिखी गयी हैं, जैसी ‘अज्ञेय’ ने लिखीं, जिन में किसी तिथि-स्थान के प्रसंग से, या उनसे स्वतंत्र भी, कुछ विचार आंके-टांके गये हैं, और जो विमर्श बताने वाली होती हैं। कुछ वैसी भी होती हैं जो दिनचर्या के साथ, यह बताते हुए कि अमुक तिथि को कौन कहाँ मिला या किस आयोजन में उसने लेखक से क्या सुना-बुना और उस सब पर उसकी सोची-विचारी या फौरी भी क्या और कैसी प्रतिक्रिया हुई। ऐसी डायरियाँ हैं रमेशचंद्र शाह की। ऐसी डायरियाँ भी हैं जो तथ्य-परक होती हैं, और विचारशील भी, जैसी कृष्णबलदेव वैद ने लिखी हैं। ज़ाहिर है कि डायरी के इन रूप-प्रकारों में और भी कई डायरियाँ ऐसी होती हैं, जो अपनी विधि स्वयं तय करती हैं, खोजती बनाती हैं, और इस ओर संकेत करती हैं कि डायरी-विधा की संभावनाएँ अनेक हैं, और उन्हें हमेशा तलाशा जा सकता है। कृष्णनाथ जी ने तो यात्रा-वृत्तांतों में डायरी की विधि पिरो दी, कितने अचूक ढंग से। मुझे पारुल पुखराज की डायरी ऐसी ही लगी, जो मानों संस्मरण भी बुनती है, कभी-कभी दिनचर्या जैसी कोई चीज़ भी। वह कोई ललित टिप्पणी भी बन जाती है। यह डायरी, मानो हर बार, हर टीप में एक ‘नयी’ विधि भी तलाश करती है। हर बार एक नयी शुरूआत करती है। और कभी-कभी वह समीक्षा का रूप ले लेती है। किसी किसी तिथि को कोई पुस्तक पढ़ते हुए, उसको लेकर होने वाली सोच-विचार की प्रक्रिया (समीक्षा) बन जाती है।

तीन शुरूआतें देखिए –  यह पहली:-

‘बाहर जा रहा है जैसे आज सदा के लिए कीरो परिवार’

‘सदा के लिए चले जाना’… कैसा हृदय-विदारक जुमला है। जो कभी न दिखे वह सदा के लिए चला गया है ऐसा मान लिया जाता है, जबकि बाज़ दफ़ा निगाह के दायरे में रहते हुए भी  कुछ लोग ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वे सदा के लिए जा चुके हों।…. अपनी कहूँ तो मेरे लिए वे पिछले जाड़ों की एक अनमनी साँझ ही विदा हो गये थे, जब सड़क पर टहलते हुए उन्होंने बताया था कि इन गर्मियों में रिटायर हो रहा हूँ और उनकी जगह अब ऊपर फ्लैट में कोई नया बाशिंदा आयेगा, कोई नया परिवार।…..’

और यह दूसरी:-

‘आहिस्ता जाते हैं कुछ लोग तो कुछ यक-ब-यक।

मिसेज देसाई अपना सब कुछ छोड़ कर एक दिन बेटे के पास यक-ब-यक दुबई चली गयी थीं। उनकी देहरी, घर, हरसिंगार, दुर्गापूजा सब यहीं कलपते रह गये थे। पलक झपकते ही देश परदेश हो गया और वे पति के निधन के बाद बस अचानक ही चली गयीं, जबकि मिस्टर कीरो एक अरसे से बेहद आहिस्ता-आहिस्ता दृश्य से ओझल हो रहे हैं।’

और यह तीसरी शुरूआत:-

‘सुबह हुई तो देखा बिना शोर-शराबे के तमाम रात एक ही सुर में बारिश होती रही है। मॉर्निंग ग्लोरी की लतर जिसने अपनी नाजुक जान मई की तपिश में लगभग गँवा दी थी यक-ब-यक हरिया उठी है, साथ ही पीछे क्यारी में लगा फालसे का वृक्ष और मुरझाया हुआ कोचिया का पौधा भी। इनके अलावा आस-पास और भी कई मंज़र हैं जिन्हें बारिश के स्पर्श ने बहला दिया है। इनमें सूख चुके पठारी नदी-नाले भी शामिल हैं।’

तो, चाहे किसी का आना-जाना हो या रात में हुई बारिश के प्रभाव को सुबह देखना हो, डायरी ‘उस पर’ भी लिखी जा सकती है, उसे समेटते हुए। और तारीख की जरूरत वाली ‘डायरी’ यह नहीं है। यह दरअसल किसी सामान्य गतिविधि से, किसी सामान्य-से दृश्य से ‘अर्थ’ और मर्म टटोलने वाली डायरी है। कौन-से अर्थ और मर्म, किसके अर्थ और मर्म? ज़ाहिर है जीवन मात्र के; वह जीवन जो दैनिक है। जो सामाजिक है। सांसारिक है। लौकिक है और जिस में ‘अलौकिक’ की एक लालसा-सी है। जीवन-जो ‘एक स्मृतिलोक’ भी है, बचपन का, दादी-नानी का, स्कूलों का, छुट्टियों का। प्रहरों का। ऋतुओं का। पक्षियों-पशुओं का। कहे-अनकहे का। नाम-अनाम पात्रों का।

 

(दो)

पढ़ते-पढ़ते यह डायरी मुझे प्रिय हो उठी। एक पाठक के नाते। लगा कि यह बड़े सहज ढंग से, लयपूर्ण स्वर में लिखी जाती हुई स्वयं को बाँच रही है- सबसे पहले, कोई और बाँचे उससे पहले! तो हम जो बाँच रहे हैं, उसे हमारे बाँचने-से पहले, स्वयं लिखी गयी पंक्तियों ने बाँच लिया है- यहाँ तक कि उस बाँचे जाने को मानो हम ‘देख’ भी पाते हैं, और यह भी देख पाते हैं कि लिखे जाने, और बाँचे जाने की प्रक्रिया के बाद उसे कुछ सकुचाये, दुविधापूर्ण ढंग से हमारी (पाठक की) ओर सरका दिया गया है, यह कहते हुए मानों कि, ‘देखिये, यह हमने देखा, जिया, लिखा, बाँचा पर अंततः यह है क्या! कुछ-कुछ तो समझ में मेरी आ रहा है, पर एक बार आपके साथ मिलकर भी इसे बाँचना है।’

हाँ, यह इसी शैली में है।

उसी प्रतीति के साथ।

किसी दृश्य, प्रसंग, गतिविधि, छवि या घटना में जहाँ कुछ रुचिकर, मन-भावन, मनहर या भावपूर्ण दिखता है उसे पंक्तिबद्ध करने का मन करता है पारुल का। यह(स) रस डायरी है। इस में  कुछ नाट्य है, रंगकर्म जैसा- जिस में दर्शकों के सोचने-विचारने के लिए कोई ‘दृश्य’ बुना जाता है और जिसे पहले तो निर्देशक ही अपने संज्ञान में लेता है। तो इस डायरी की जितनी टीपें हैं उनमें किसी दृश्य-घटना को संज्ञान में लिये जाने का भाव भी है। उसे जाँचने-परखने के लिए। और आगे सरका देने के लिए ।

यह डायरी जानती है कि जीवन-सूत्र, और किसी के निजी जीवन के (भी) सूत्र, बिखरे हुए ही होते हैं। उन्हें ढूँढ़ना-जोड़ना-परखना- यहाँ तक कि ‘गढ़ना’ भी पड़ता है। और इसके लिए पास जाना पड़ता है पुरखों के, उनकी और उनसे सुनी कथाओं के पास, सृष्टि के नियमों और  सृष्टि-जनित ‘आश्चर्य लोक’ के पास। तभी पारुल लिखती हैं एक दिन, ‘किसी अपरिचित रास्ते से होकर न जाने किसके घर के सामने आकर खड़ी हो गयी हूँ। रोज़ की सैर में पड़ने वाली न तो ये सड़क है ना ही गली। राग यमन कानों में धारे उतर आयी गाढ़ी शाम के भीतर जिस दृश्य में विचर रही हूँ वह मेरी आँखों के लिए बिल्कुल नया है। पुरानी किसी जगह के बिछड़े हुए मकान से शायद मिलता-जुलता है इस घर का नीला रंग, मेरी गति जिसके सामने धीमी होते-होते विराम ले चुकी है।…. कोई तरंग अवश्य है जो इस पल बेहद आत्मीयता से मेरा रास्ता रोक रही है।….

टटोलूँ तो शायद यह तमाम पीलापन मेरी स्मृतियों की खुरचन निकले जिस में एक जीर्ण लैम्ब्रेटा दीवाल के सहारे कुछ सोचता-सा अपनी देह अटकाये खुद में गुमशुदा खड़ा है। सीमेंट का बड़ा सूरजमुखी फूल जड़ा है बाहर बाउंड्री पर।

  सोचती हूँ इस फ्रेम में कौन हूँ?

   इस शाम में कौन?’

 कितनी सुंदरता से रचा गया है यह वाक्य, ‘सोचती हूँ इस फ्रेम में कौन हूँ?’

अगर वाक्य यह होता ‘सोचती हूँ इस फ्रेम में मैं कौन हूँ?’ तो बात न बनती। ‘मैं’ का हट जाना ज़रूरी था। आकर भी हट जाना।

यही नहीं, हम पाते हैं कि ‘मैं’ इस डायरी में, टीपों में, आता है पर, आकर हट-सा जाता है, उस बहुत कुछ को राह देता हुआ, जिसकी तलाश डायरी लिखने वाले को स्वयं है।

सामान्य साधारण चीज़ें भी रहस्यमयी होती हैं। कभी- कभी तो जादुई। कभी-कभी वे बहुत विस्मय जगाती हैं। हमारे अस्तित्व के अनेक भेद उन में छिपे होते हैं।

उन रहस्यों को, भेदों को, टटोलने की एक कोशिश और कशिश है इन टीपों में, जो लंबी नहीं हैं, डिमाई आकार के एक या दो पृष्ठों में समा गयी हैं। कभी-कभी तो बस आधे पन्ने में। इन में से किसी को, अचानक कोई पन्ना खोलकर कहीं से भी पढ़ा जा सकता है। कोई शीर्षक नहीं। बस शुरूआत का ड्राप-लेटर ही हर टीप की अलग पहचान है।

डायरी-विधा का यह एक नया रूप है। लय-भरा। ललित। सरस। पर किंचित तना हुआ भी…. ‘शहर में घूमता आईना’ की तरह किसी न किसी प्रसंग को झलकाता हुआ, या कहें अचानक किसी स्मृति को, दृश्य को ‘टार्च’ जैसी किसी रोशनी से ‘उजागर’ करता हुआ। अपने आप आस-पास को चौकन्ना होकर दीखता हुआ। कुछ इस तरह भी कि चीज़ों पर जो झीना परदा-सा पड़ा रहता है, उसे सरका कर ‘देखा’ जाये, उसकी तस्वीर उतारी जाये, साझा करने के लिए।

हाँ, ये तस्वीरें हैं, जिन्हें उनके सभी शेड्स में ‘देखना’ है। सिर्फ पढ़ना नहीं। ये विवरण मात्र नहीं हैं, न वर्णन मात्र। इनके रेशों, स्पंदनों को पकड़ने की चेष्टा करते हुए इन्हें दर्ज किया गया है।

पारुल संगीत में प्रदीक्षित हैं। वे कवि हैं। सगीत-पारखी हैं। वे स्मृतियों का मूल्य जानती हैं। उनसे कुछ ‘सार्थक’ उगाहने की इच्छा रखती हैं; महादेवी जी की पंक्ति की याद इन टीपों को पढ़ते हुए कई बार बरबस हो आती है , ‘जाने किस जीवन की सुधि ले, लहराती आती मधु बयार।’

इन टीपों में कुछ सूत्र वाक्य भी हैं:-

‘कुछ भी ठीक नहीं होता लाख जतन के बाद भी।’

‘और फिर अनायास ही एक दिन कुछ भी बुरा लगना बंद हो जाता है।’

‘कैसा सिलेटी आकाश है। शहर जैसे कोई अरण्य इस पल।’

‘गौर करें तो बात कोई भी नहीं कहने लायक, एक अदद आवाज़ थी जिसे सुना जाना था।’

‘कितना भी निस्संग रहा जाये, कुछ जंजाल मनुष्य की सदा घेराबंदी कर उसे हल्कान करने के लिए आतुर रहते हैं।’

‘कहीं भी पहुँचो लगता है यहीं तो थे बरसों से।’

इन सबसे गुजरते हुए भीतर ही भीतर जैसे सोच-विचार की, बचपन की, छोटी-सी मिट्टी की कोई खिलौना गाड़ी भी चलने लगती है। तब से इकट्ठा हुआ कुछ सोच-विचार का सामान लादे हुए। ये टीपें बताती हैं, और उसके कई प्रसंग कि सोच-विचार की, विमर्श की धनी सिर्फ प्रौढ़ आयु ही नहीं होती- वह सिलसिला तो बहुत पहले लगभग जन्म के साथ ही शुरू हो चुका होता है। जीवन मात्र खण्ड़ों में विभाजित होकर भी, मानों खण्डों में विभाजित नहीं होता।

 सीरज सक्सेना का बनाया हुआ पुस्तक का आवरण बहुत सुन्दर है। पुस्तक की कुल प्रस्तुति भी बहुत साफ़-सुथरी है, निर्दोष। इसका अपना सम्मोहन है। पढ़ने में, देखने में, मन रमता है।

अवश्य ही ‘देखी’ जाने लायक है पारुल की यह डायरी। जिसमें ऐसा भी बहुत कुछ प्रतिबिंबित होता हुआ मिलेगा, जो इस में या इस के आस-पास नहीं है: ठीक वैसे ही जैसे किसी जलाशय के ऊपर से कोई चिड़िया उस पर अपनी छाया छोड़ती हुई गुजर जाये। या कहीं से उस पर कोई रोशनी या मेघ छाया पड़ जाये। इसकी सचमुच अपनी एक कशिश है!

प्रयाग शुक्ल

 

 

 

 

 

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