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  सारंग उपाध्याय की कहानी ‘अकेली मुंबई, अजनबी कोलकाता’ 

सारंग उपाध्याय पेशे से पत्रकार हैं और बहुत संवेदनशील लेखक। हाशिए के लोगों के जीवन के सुख-दुःख को लेकर यह एक मार्मिक कहानी है। आप भी पढ़कर बताइएगा-

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बारिश काले बादलों में अब भी अटकी थी. उमस लोगों के चेहरे से टपक रही थी. सुबह के 7 बजे थे. दूधवाला आज फिर छाछ की थैलियां ज्यादा बांट गया था. नींद में डूबे बच्चे स्कूल के लिए बसों और ऑटो में ठूंसे जा रहे थे. लड़कियां कानों में ईयर फोन डाले कुत्तों को टहला रही थीं. पार्क प्राणायाम में डूबा था और अधेड़ लोग ध्यान में. औरतें हाथों से पेट की चर्बी नाप रही थीं. बाबा साहेब कुलकर्णी बिल्डिंग के दूसरे माले पर अभंग सुनते पत्नी के ध्यान में डूबे थे. रतनलाल अभी तक कंबल में आंखे खोले दुबका था.

मुंबई से सटे वसई वेस्ट के शनशाइन अपार्टमेंट में उस सुबह सबकुछ वैसा ही था जैसा रोजाना होता था. सिवाय बारिश और रतनलाल की जिंदगी को छोड़कर.

बारिश जैसे घुट रही थी, वैसे ही रतनलाल बीकानेरी अंदर से घुट रहा था. आंखों में गहरी काली रात समाई हुई थी. आधी रात उसने वॉट्सएप्प पर कुछ रंग-बिरंगे वीडियो के साथ काटी थी और आधी शोर-शराबे में. उसके दिलो-दिमाग में एक डर तैर रहा था. देर रात की चीख-चिल्लाहट अब भी कानों में गूंज रही थी. बीड़ी फूंकने के चक्कर में वह दहशत पी गया था और उसका दिल बैठा हुआ था. रोजाना सुबह 5 बजे दुकान खोलने वाले रतन से आज कंबल भी नहीं छूटा था.

वह अब भी घबराया हुआ था. कल रात स्ट्रीट लाइट के झुटपुटे का दृश्य देखते ही उसकी पेशाब छूट गई थी. दिल हड़बड़ाकर सीने से बाहर आने को था. रात साढ़े ग्यारह बजे भागते हुए आकर उसने शटर नीचे की और दुकान में काउंटर से लगे कंबल में ऐसे छिपा था मानों बाहर गोलियां चल रही हों. उसके शरीर से पसीना पेशाब की धार जैसा बहता रहा था. दुकान में लगी छोटी सी मोरी (बाथरूम) में उसने रात भर पांच से छह बार पानी निकाला था और कई बार डर.

हालांकि अब रात बीत चुकी थी. कंबल के अंदर रतनलाल को गरम सांसें सहला रही थी. शटर से छनकर आ रही रौशनी का उसे आभास था. सुबह उसके कानों से टकरा रही थी. लेकिन वह मुंह से कंबल हटाना नहीं चाहता था. घंटा भर बाद जब धूप शटर के कोनों और सामने दीवार की खिड़की से छनकर बंद दुकान में फैली और कंबल में घुसी तो सांसों की गरमाहट बेचैनी भरने लगी. उसने कंबल से मुंह बाहर निकाला और एक लंबी गहरी सांस ली. फिर छत से लगे पंखे को घूमते हुए देखा. दीवार से सटती उसकी निगाहें एकाएक सामने फोटो पर जा टिकीं, जिसमें एक गोरा, चिकता मूंछों वाला तराशा हुआ चेहरा देखकर उसने गहरी सांस ली और आंखें फिर बंद कर लीं. लेकिन आंखें अभी ठीक से बंद भी नहीं हुईं थी कि किसी ने शटर खड़खड़ाई और आवाज लगाई.

रे रतन बाहर निकल. चाय पत्ती दे..!
आवाज सुनते ही रतन घबरा गया उसने झटके से आंखें खोली, तब तक आवाज दोबारा गूंजी
रे रत्नयाss आज बहुत देर हो गई
रतन पहचान गया- राम्या है कपड़े वाला.
आया राम्या-उसने बिस्तर से लेटे-लेटे ही आवाज लगाई.
रात की नौटंकी ज्यादा हो गई मेवाड़ी, राम्या ने पलटकर कहा.
हां क्या हुआ. क्या फिर आए थे? रतन कंबल से खुदको समेटते हुए बाहर निकला. उसने अपनी लुंगी को थोड़ा और ऊपर सटाकर कमर से बांधा और शटर उठाई. सामने हल्की दाढ़ी, तीखी नाक और घुंघराले बालों वाला राम्या मुस्कुरा रहा था.

वह दांत निपोरते हुए बोला- वॉट लागली रे रत्न्या. साले सबके सब अंदर. चचाओं के पिछवाड़े रेड-रेड झाले आणि तुझी पंखुड़ी भी गेली रेss!

राम्या हंसते हुए दोनों हाथों से रतन के कंधों को हिलाते हुए बोला.
रतन खामोश था. फिर सामने देखते हुए बोला- पुलिस गई कि है?
किधर गई, बगा तिथे, सर्किल पर..!
रतन सहम गया. उसने देखा एक काले रंग की स्कॉर्पियो अब भी वहीं थी.
रतन उन्हें देखते ही बोला- ये गए नहीं.
गए नहीं इधर हीच हैं. रात झाली सगड़ी आणि वॉट लावली बांड्या ची.  राम्या दुकान में रखे मटके में लोटा डुबाकर पानी निकालते हुए बोला.
फिर उसने काउंटर से चॉकलेट-नमकीन की बर्नियों पर रखी बीड़ी उठाकर सुलगाई और सामने अंडरकंस्ट्रक्शन बिल्डिंग्स को देखते हुए बोला- वो साले अग्रवाल बिल्डर्स की हैं ये. पूरा अपार्टमेंट बन गया लेकिन येइच् साली अटकी है. उसने ऊपर देखते हुए कहा- साले को परमिशन तीन माले की थी और खींच डाली आठ.
राम्या ने बीड़ी खींचते हुए पूछा- तेरे को भी मारा क्या मेवाड़ी?
रतन के हाथ में लोटा था और वह अपना गला तर कर रहा था. हलक में पानी उतरते ही बोला- कोई सावंत था मेरे पीछे दौड़ा. मैं तो क्या रोजाना की तरह ताश खेल रहा था और ऊपर से छलांग लगा दी और दुकान की ओर भागा. उधर पीछे से तीन गाड़ियां रुकीं और औरतों, बच्चों के चीखने की आवाज आई. मैं समझ पाता उधर से साला डंडा ही फेंककर पैरों में मारा हरामी ने, मेरी पिंडली फोड़ डाली कुत्ते ने. रतन ने राम्या को बांए पैर की पिंडली दिखाई, जो सूजकर लाल हो रही थी.

पिंडली को हाथ से सहलाते हुए रतन बोला- वो तो भला हो स्ट्रीट लाइट का, बंद था सो अंधेरे में उन्हें पता नहीं लगा कि मैं किधर गया. तेजी से अंदर घुसा और शटर नीचे कर दी. अच्छा हुआ ताला मारकर नहीं गया. कुछ समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ. एकाएक आवाजें आनी शुरू हुईं. कुछ लोग थे जोर-जोर के चिल्लाए- ये सबको डालो अंदर, गांडूss भैनssचो. लोगों पास काम नहीं है और यहां खा रहे हैं. तुमचा माइला..!

मैं तो पुलिस देखकर ही उल्टे पैर भागा. वो पहला माला है ना, रतन ने सामने की बिल्डिंग की ओर उंगली दिखाते हुए कहा- मैं उधर से सीधे कूदा. साला मैं भी लुंगी पर था सो कूद गया. ये देख पैर कैसा छिला. रतन ने फिर राम्या को दाएं पैर का पंजा दिखाया.

राम्या पैर देखकर बोला- साले मुसड्डे थे, लेकिन समझ नहीं आया कि ये कुतरा लोग अचानक रेड कैसी मार डाले. यहां कहां से आ गए. रात को रेड मारी वो भी 12 बजे. उधर एक कांता अन्ना को भी लेके गए. रद्दी तौलता था. उसकी बीबी आई थी, आई के पास. मेरे को बोला कि लेके जा थाने इसको. रात से ही उसकी बीबी चक्कर काट रही है घर के. आई से बोल रही है कि राम्या से बोलो उधर से साब लोगों की पैचाण है तो छुड़ा के लाएगा. अभी जाएगा मैं उसकी बीबी को लेके. साला लुंगी की भी पुंगी बजा डाली बांडों के चक्कर में. राम्या हंसते हुए बोला.

राम्या ने आधी बीड़ी नीचे फेंकी और बाल पर हाथ फिराते हुए बोला- कई को अंदर लेकर गए इधर. मैं तो खोली में जो गया तो बाहरेइच नहीं आया. अभी आई बोली कि उधर से चायवाले, पान ठेलेवाले और वो उधर के मटन वाले जमीर को भी लेके गए.

ला इधर चाय पत्ती दे. उसने रतन के सामने लटका एक चाय पत्ती का पाउच तोड़कर हाथ में लिया और बोला- इसको हिसाब में लिख.

अरे किसको हिसाब में लिखूं और किसको रखूं. रतन चिढ़ते हुए बोला. साढ़े नौ हजार की उधारी थी. वो गई राम्या, हरामी बांग्लादेशी वो भी ले गए. पैसा कैसा आएगा.

तेरे को मैं समझाया था येड़े. बांग्लादेशी हैं साले, उधार नहीं करने का. अता काय पण भुगत. ठाणे भी गया तो पैसा मिलने का नहीं. और सुन मेरी- तू अच्छा हुआ इधर आ गया. अभी बाहर भी एक गाड़ी खड़ी है पुलिस की. राउंड पर है. केवल इधरिच् नहीं, नवी मुंबई, सानपाड़ा, जुइगांव, कई जगह छापे मारे. कई बांग्लादेशी पकड़ाए हैं. दुकान खोलने का नहीं. शाम को देखते हैं. और तेरी कहानी भूल जा तू. ये मुंबई है जास्ती राड़ा लेने का नहीं. पैसा-गिसा गया परवाह नहीं, तू यहीं है शुक्र मना. उधर सबका आधार चेक कर रेले हैं. आधार-गिधार कार्ड रख तेरे पास. सारा टेंशन आइडेंटीटी का है बाबा. अगला तेरे को ही उठाएंगा. जास्ती सेंटी होऊ नका. संध्या काड़ी कॉल करतो तुला.

राम्या रतन को बोलकर हंसता हुआ सामने निकल गया, जहां उसकी लॉन्ड्री थी.

रतन सामने बिल्डिंग की ओर देख रहा था. खुली हुई अंडरकंस्ट्रक्शन बिल्डिंग के पहले तल में अंदर से उसे टूटे गत्ते, कपड़े और फटी हुई बरसाती दिखाई दे रही थी. लकड़ी के टट्टों की दीवारें धराशायी थीं, अंदर इमारत में 8 से 9 अधखुली चादरों और टाट से बनाईं झोपड़ियां थीं, जिसके अंदर का सामान बिखरा पड़ा था. टीन के टूटे पतरे, तार, फटे प्लास्टिक के टुकड़े, चप्पलें, बैग, बाल्टियां, तगारियां, फावड़े और टूटी हुई रस्सियों में फंसी साड़ियां, पैजामे, सूट और बच्चों के कपड़े, लोहे की पेटियां, बर्तन-भांडे, थालियां और खिलौने सब बिखरे हुए थे.

उस नजारे को देख रतन सिंहर गया. उसने एक बार फिर नजर ऊपर दौड़ाई जहां सामने दूसरे माले पर सीढ़ियां जाती हुई दिखाई दे रही थीं. वहां केवल टूटे हुए बल्ब का होल्डर लटका हुआ था. उसे याद आया जब रात को वह उसी जगह सीढ़ियों पर बैठकर ताश खेल रहा था. फिर अचानक शोर-शराबे, चिल्लाने और पुलिस के सायरन की आवाज आई तो वह वहीं से छलांग लगाकर दुकान में अंदर घुस गया था. बाकी क्या हुआ उसे कुछ याद नहीं. बस दुकान में अंदर जाते ही उसने अधखुली शटर पैर से नीचे गिरा दी एक कोने में घबराया हुआ सा खड़ा रहा. उसका दिल घबरा रहा था. बाहर से चीखने चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. रातभर दुकान में अंधेरा ही रहा. पुलिस का सायरन लगातार बज रहा था.

सुबह हो चुकी थी लेकिन रतन के अंदर अब भी अंधेरा था जिसमें वह घुट रहा था. पूरे नौ हजार से ज्यादा की उधार थी, जिसके लौटने की कोई उम्मीद नहीं थी. सामने का उजड़ा दृश्य देखकर उसे लग रहा था मानों उसकी ही दुनिया उजड़ गई हो. उसे गुस्सा आ रहा था कि उसने उधार की ही क्यों? उसके सामने बशीर, जैना, शौकत मिर्जा सहित कई चेहरे घूम रहे थे. उसका सिर चकराने लगा. पैसे और उधारी के बारे में सोचते-सोचते अचानक उसका दिल भर आया. वह सामने बिल्डिंग की ओर एकटक देखने लगा. रात का मंजर उसकी आंखों में घूम रहा था. उसकी आंखें डबडबा गईं, मन भारी हो गया, आंसू की बूंदें ढलकर गालों पर गिरने लगी, फिर कानों से एक तेज हवा का झोंका गुजरा. लगा जैसे किसी ने उसे आवाज दी.

रतन शादी करेगा मुझसे…!
सोचता क्या है बोल
मांड्या से पूछ
मांड्या फिर से बेचने वाला था मेरे को मीरा रोड पे
फिर तू इधर कैसे आई
आगई बस ऐसे ही
ऐसे ही आगई..!
तेरे को फिर नहीं बेचा मांड्या
मांड्या रहम दिल है रे
मांड्या क्या रहम करेगा, हरामी. पता है कौन सा रहम देता है.
तरस तो खाया पर कीमत ली, बेचा तो नहीं
साला हरामी इसको कीमत बोलता है. क्या फैलाकर रखा है तूने सब पता है मेरे को
लिया-दिया एक रहा लेकिन कवर किया. बोला सामने की बिल्डिंग में झाड़ू-पोछा कर और सेठ लोगों को खुश रख.
तेरे को बिंदणी बनाऊंगा मैं. सपना मत देख सलमा..!
क्यों चाहता नहीं मेरे को. रात को दुकान में ऐसे पकड़ता है कसकर मुझे और क्या बोलता है पता है..?
क्या बोलता है? यही न मुझे भी देगी? रतन की आंखों में शरारत थी.
सलमा मुस्कुराई और रतन ने उसे अपनी बाहों में खींच लिया. समुंदर की तेज हवा के झोंके गहराने लगे..!
उस दिन रात के अंधेरे में हर बार की तरह पूर्व-पश्चिम मिल गए.
मुंबई कोलकाता को बांहों में लेकर घूमती रही..!

गहरी सोच में डूबे रतन की आंखें भर आईं और एक चेहरा बार-बार घूमने लगा. डबडबाई आंखों से उसने फिर सामने देखा. आधी बनी बिल्डिंग में आज सबकुछ उजाड़ था जबकि कल तक जिंदगी चहक रही थी. उसकी आंखों में सलमा घूमने लगी. बड़ी-बड़ी आंखों वाली कोलकाता की सलमा. गेहुंआ रंग, तीखी नाक, उसमें चमकती लौंग, हरे सलवार सूट में चांद की तरह दिखती थी सलमा. हंसती हुई बांग्ला और मुस्कुराती हिंदी बोलने वाली. बतियाती ऐसी कि मानों एक-एक शब्द साफ-सुथरा, धुल-पोंछकर निकला हो.

रतन को लगा रोजाना की तरह बिल्डिंग से झाड़ू-पोंछा कर उसके पास आ रही हो और बस पूछने वाली हो. कि रतन स्टेशन जा रहा हो तो मेरे वास्ते छतरी लेकर आएगा क्या. धूप बहुत होती है एकदम चक्कर आ जाता है. या पूछ रही हो रतन स्टेशन जा रही हूं दुकान का कोई सामान लाना है तो बोल. फिजूल ही तू चक्कर लगाएगा. पिछले संडे जिद करके रतन के साथ आक्सा बिच गई थी. कुछ देर एकटक लहरों को देखती रही फिर रतन के कंधे पर सिर रखकर बोली-
शादी कर ले रतन. सोच मत. तू भी अकेला और मैं भी.
जिंदगी ऐसी ही है. अफवाहों पर आवारगी करती-
तेरे साथ मैं नहीं रूह सोती है मेरी, तन को छोड़, मन की साफ हूं.
तू रह नहीं सकता अब मेरे बिना.
देख सलमा थारी बिंदणी. सलमा सिर पर चुन्नी रखकर रतन को देखती और रतन मुस्कुराकर उसे बांहों में भर लेता..!

सलमा की याद में खोए रतन के भीतर सामने फैली उजाड़ मायूसी फैल रही थी. उसके हाथ-पैर कांप रहे थे और रात की दबी हुई घबराहट अब बाहर निकल रही थी. उसका सिर घूम रहा था. एक ओर 9 हजार की उधारी में डूब दिल डूब रहा था और सलमा की याद उसकी आत्मा को दो फाड़ कर रही थी. रतन की इच्छा हुई कि वह उस उजाड़ में जाकर देखे कि कहीं सलमा छिपकर ना बैठी हो, या पीछे दूर-दूर फैले खेतों में कहीं छिपी ना हो. क्या पता रात वहां बन रही उन बिल्डिंग के पिंजरों में छिपी हो और मेरा इंतजार कर रही हो. उसकी आंखों में सलमा का चेहरा घूम रहा था. उसने उस शाम को आखिरी बार देखा था. गुलमोहर विंग से खाना बनाकर 8 बजे लौटी थी. फिर बाद में आखिरी बार बिल्डिंग के नीचे वाले तल्ले में बर्तन धो रही थी. रात को कुछ बोली नहीं.

अचानक शून्य में तकता रतन अफसोस से झल्लाया- रांड कुतियां म्हारे कने ही आ जाती. वटने काई कर रही थी. रोज रात आ जाती है दुकान में, कल कायणे रह गई सलमा.

उसने दो कदम सामने बन रही बिल्डिंग की ओर बढ़ाए कि वह सलमा को कम से कम देख तो आए, लेकिन उस तहस-नहस दुनिया में उसके जाने की हिम्मत नहीं हुई, उसे राम्या की याद आई- “गश्ती पर हैं पुलिस वाले, ना बाहर दिखना और ना किसी को फोन लगाना. कहीं वहां देख लिया तो उठा ले जाएंगे तेरे को भी.”

रतन सलमा के लिए बेचैन हो रहा था और डूबती उधारी का सोचकर उसका दिल बैठ रहा था. लेकिन गरीब की बेचैनी और लाचार की मजबूरी के बारे में उसे पता था. वह तो मौत के साथ ही मिटनी थी. वह लंगड़ाता हुआ डबडबाई आंखों और भरे दिल से दुकान में लौटा. उसे समझ नहीं आ रहा था कि दबे-छिपे मुंह जिन लोगों के  बांग्लादेशी होने के बारे में वह बात सुनता था, वह थे तो सामान्य लेकिन एक रात में उनके चलते ऐसा कुछ हो जाएगा उसे भरोसा ना था.

वसई वेस्ट के 60 से 70 बिल्डिंगों वाले और तकरीबन 1 हजार एकड़ में फैले उस बड़े से शनशाइन अपार्टमेंट में ड्रीम वर्ल्ड बिल्डिंग के ठीक नीचे 17 दुकानों में गेट से सटी रतन की ढाई गज की किराने की दुकान थी. वह छोटी सी दुकान ही रतन की पूरी दुनिया थी. काउंटर के उस पार दुकान में छोटा सा बाथरूम था, जहां रतन का नहाना-धोना होता था और सब्जियां और चावल भी वहीं धुलते थे.

बाथरूम से ठीक सटा एक छोटा सा गैस सिलेंडर था और उसके ठीक बगल में लकड़ी की अलमारी में प्याज, आलू और चकला-बेलन, तवा थालियां, लाइटर और मसाले के डिब्बे करीने से सजे थे. खाना भी वहीं बनता था.

दुकान की दहलीज से अंदर झांकते ही रतन की रुलाई फूट गई..

सलमा के हाथों से बसी गृहस्थी उसे उजाड़ लग रही थी. ऐसा लगा मानों पुलिस वाले उसकी ही दुनिया उजाड़ गए हों.

अचानक उसकी नजर सामने दीवार पर गई. सामने के छज्जे पर सूटकेस थी और सूटकेस से सटे बीम की छाती में ठुंकी थी एक खूंटी. इस खूंटी से एक लंबी रस्सी बंधी थी जो दूसरे छोर पर दुकान के शटर के कुंदे में अटकी रहती थी. ये रस्सी दुकान के इस पार से उस पार का लाइफ ब्रिज था जो सुबह होते ही बंद हो जाता और रात होते ही शुरू. रस्सी पर उसके ही कपड़े रात को सूखते थे और दिन में सूटकेस में होते थे.

सूटकेस सलमा की थी और वह रोज रात को रतन के साथ होती थी.

लेकिन कल नहीं थी..!

रतन फफक पड़ा. करमजली कल मेरे साथ यहां मर जाती तो आज ब्याह लाता.

रतनलाल राजस्थान के बीकानेर की गलियों से मारवाड़ियों की किस्मत बनाने वाली मुंबई में तीन साल पहले आया था. मां सात साल पहले नहीं रही और उसके गम में दो साल पहले पिता चले गए. एक छोटा भाई था श्याम जो कुछ दिन पहले मर गया और उसकी मौत रतन के लिए कभी ना भूलने वाला सदमा बन गई.

रतन छोटे भाई श्याम को सबसे ज्यादा चाहता था. मां-बाबूजी के जाने के बाद दुनिया में केवल श्याम ही उसका सबकुछ था. श्याम जिंदा होता तो वह बीकानेर कभी ना छोड़ता. लेकिन एक दिन श्याम मर गया.

रतन के छोटे भाई श्याम की कहानी अजीब थी. श्याम लड़का होते हुए भी लड़कियों की तरह हरकतें करता था और लड़कों के ज्यादा करीब रहता था. लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं और अफवाहें थीं कि श्याम के अंदर एक लड़की की आत्मा है जो लड़कों के जरिये अपने शरीर की प्यास बुझाती है. उसी लड़की ने श्याम के अंदर औरतों वाले गुण भर दिए थे.

वह जिस गली से गुजरता लोग उसे
श्याम रंगीला
छैल छबीला.
चटक चाल है
गुड़ का ढेला  
कहकर बुलाते थे.

श्याम का इलाज कई दिन चला, कभी झांड़फूंक हुई, तो कभी सांकलों से बांधकर पीटा गया, कभी उसके लिंग का इलाज चला तो कभी शहर के नीम-हकीम उसे मर्दानगी के तेल पिलाते रहे. लेकिन जानें वह कौन सी चुड़ैल थी कि उसका साया श्याम से नहीं हटा और वह ठीक नहीं हो पाया.

श्याम अजनबी और अकेला यहां-वहां घूमता था, वह अकेला था इसलिए अफवाहों की कई दास्तानें उसके साथ चला करतीं. वह सिगरेट में कब गांजा भरने लगा पता ही नहीं चला. एक दिन जंगल की तरफ ऐसा गया कि सालों नहीं लौटा. कई लोग बोलते कि शहर के बाहर जाने वाले हाइवे पर रात को नंगा घूमता दिखाई देता, तो कई बोलते ज्यादा गांजा पीकर नाली में पड़ा रहता है. कइयों ने कहा कि वह जयपुर में कहीं काम करने लगा. एक दिन श्याम की लाश ने उसे लेकर फैली सारी अफवाहें दूर कर दीं. छह महीने पहले हाईवे पर एक होटल के सामने मोबाइल चुराने की अफवाह में वह मारा गया. कुछ लड़कों ने उसे पीट-पीटकर मार डाला. बढ़ी हुई दाढ़ी-मूछों और कंबल में लिपटी उसकी लाश को पहचानना मुश्किल था.

खुद रतन भी नहीं पहचान पाया था.

पुलिस वालों ने रतन को श्याम का कंबल और फटी अंडरवियर दी थी. बताया था कि एक पोटली बंधी रहती थी उसके कंधे पर, जिसमें अखबार के टुकड़े, हनुमान जी की फोटो, ब्रह्मचर्य के नियमों की एक किताब, कुछ जड़ी बूटियां, गिलास-कटोरी, एक थाली, एक चादर और कपड़े थे. घटनास्थल पर उसकी पसलियां पूरी टूटी थीं और जांघे, पैर-हाथ जगह-जगह से नोचे गए थे. पीठ पर पत्थर और लकड़ी के टुकड़े अटके थे. आंखों से लेकर पेट तक फाड़ डाला था भीड़ ने क्योंकि वह मोबाइल ढूंढ रही थी. और मोबाइल मिला नहीं था.

पोस्टमार्टम में पता चला कि श्यामलाल वल्द केदारनाथ दीक्षित तीन दिनों से भूखा था और उसके पेट में कागज के कुछ टुकड़े मिले थे.

सलमा और रतन ने कुछ दिन पहले ही श्याम के सामान को कपड़े में बांधकर समंदर में बहाया था. उसके थैले में मर्दानगी जगाने वाली और ताकत देने वाली कई जड़ी बूटियां मिलीं थीं. एक हनुमान जी की फोटो थी जिसे रतन ने कुछ दिन पास रखा, लेकिन बाद में उसे भी चलती लोकल ट्रेन से भायंदर की खाड़ी में फेंक दिया. उसके पास एक रतन की फोटो भर थी जिसे उसने फ्रेम करवा कर पिछले हफ्ते ही दीवार पर टांगा था.

रतन दुकान की दहलीज पर खड़े होकर डबडबाई आंखों से सामने दीवार पर श्याम की फोटो देखे जा रहा था. उसे लगा कि मां चली गई, मां-बाबूजी नहीं रहे, श्याम नहीं है और आज सलमा भी चली गई. वह इस दुनिया में अकेला हो गया है.

उसके कानों में सलमा की बातें गूंजने लगीं- “रतन अजनबी आदमी की कोई पहचान नहीं होती और ना ही नागरिकता, लेकिन अकेला आदमी नागरिकता, पहचान और शिनाख्त के बाद भी जिंदगी भर अजनबी बना रहता है और मरते वक्त उसकी निशानदेही नहीं होती. वह जिंदगी अकेला जीता है और मरता अजनबी की तरह है.”

रतन अक्सर सोचता था कि सलमा गांव, शहर, मोहल्ले और देश के लिए अजनबी थी, लेकिन अकेली नहीं थी. और वह भी अकेला नहीं था क्योंकि उसके साथ सलमा थी.

रतन को नागरिकता, शिनाख्त और पहचान से ज्यादा डर अकेलेपन से लगता था. सलमा के साथ वह अकेला नहीं था और सलमा उसके साथ अजनबी नहीं थी.

लेकिन सलमा थी कौन? कोलकाता से आई थी या बांग्लादेशी थी? और इधर मुंबई में कब से थी?

वसई के शनशाइन अपार्टमेंट में पिछले तीन सालों से गुमठियों, चाय की दुकानों, पान के ठियों पर बांग्लादेशी, पाकिस्तान, राष्ट्रीयता, नागरिकता-मूलनिवासी, आधार-कार्ड, पहचान-पत्र वगैरह-वगैरह की बहस के बीच रतन को राम्या ने बताया था सलमा के बारे में.

मस्त माल है. एक बार सोके देख. क्या बात करती है, पूरा दर्द ले लेती है, दिल-दिमाग दोनों का. प्यार हो जाता है सलमा से. कल का मेरा फिक्स था लेकिन आई को गौरी पूजा में लेके जाना था. साला बाथरूम में मार के रह गया.
मांड्या ठेकेदार बोलता था-
सलमा उधर बॉर्डर पार करके आई है पाकिस्तान से. बोले तो रोंहिग्या-गिंग्या कुछ तो है जो अखबार में छप रेला है इन दिनों. बांग्ला बोलती है. लेकिन अपुन को लगता है बांग्लादेशी नहीं है वो. इधर बिहार से बंगाल माइग्रेट हुई है. बाप्पा कसम बिस्तर पर बीबी की माफिक प्यार करती है. भाव नहीं देती. बहुत अफवाह है उसके बारे में लेकिन लड़की एकदम खालिस है, अच्छे-अच्छों को फटकार कर रखती है, जिसने उसकी डांट खाई, साला वही उसके साथ सोने की कहानी सुनाता है.

कभी-कभी लगता है इंडियन हीच है. अपने को तो साली मुस्लिम भी नहीं लगती. हिंदू औरत की बू आती है उसके पास से. लेकिन अपने को क्या? अपने को जो मांगता दिया. उधर बहुत ब्यूटी है. अक्खी जन्नत. मीरा रोड से लाया अपुन उसको जन्नत बार से. इधर कवर करके रखा और उधर बांग्लादेशी मजूर बस्ती में डाल दिया. काम जमा नहीं तो झाड़ू पोंछा करती है. अपने को क्या है, पड़ी है उधर हीच. हफ्ते में एक बार ब्यूटी देखने का..!

सलमा पहली बार आई थी रतन की दुकान पर. विम साबुन लेने. जैसी हिंदी में बोली रतन को लगा इधर वड्डर मराठियों और भोजपुरी भैयाओं के बीच किसी की जुबान फिसल गई. विम बॉर चाहिए. साफ-सुथरी, छनी हुई भाषा और मीठी बोली. रतन सुनता रह गया और सलमा को देखता रह गया.

राम्या पास ही था- बोला- अपने रत्न्या से मिलने का सलमा. एकदम कुंवारा मारवाड़ी है. इधर वसई में नया है. जरा रौनक बनाना इसकी. सलमा हंसी और राम्या को फटकारते बोली- काम धाम नहीं है क्या तेरे पास. फिर चली गई, लेकिन रतन की आंखों में ठहर गई. ठहरी भी ऐसी कि आज ना दिल से निकल रही है ना दिमाग से, बस आंसु बनकर बहे जा रही है.

रतन खामोश दुकान के अंदर खड़ा हुआ था. आंखे भरी हुईं थी और दिन चढ़ रहा था. चहल-पहल बढ़ रही थी. पूरा प्रिमाइसेस रोजाना की तरह अपने काम में व्यस्त था कि इस बात से कोसो दूर कि सामने बन रही उस बिल्डिंग में रात को क्या हुआ? पुलिस का सायरन क्यों देर रात बजता रहा और चीख-चिल्लाहट बढ़ती रही. एक ढलती रात में 50 से 70 लोग अचानक कहां गायब हो गए. इसे जानने की किसी को फिक्र नहीं थी.

जैसे-तैसे वह दुकान के अंदर आया और शटर नीचे कर लाइट जला ली. दुकान खोलने का उसका मन नहीं कर रहा था. उसने पहले हिसाब का रजिस्टर उठाया और अग्रवाल बिल्डिंग उधारी के नाम के शीर्षक वाला पन्ना खोला. तकरीबन 40 से 50 नाम थे जिनके आगे आटा, बीड़ी, तंबाकू, बिस्किट, साबुन जैसी जानें कितनी चीजें  लिखी हुईं थी. वह पन्ने पलटता रहा और उसके माथे पर बल पड़ते रहे. एक जगह आकर वह रुक गया, जहां लिखा हुआ था सिलग बाकी—9670 रुपए. उसका सिर घूमने लगा.

फिर अचानक जोर के चिल्लाया- सलमा तू ठीक कहती थी. म्हारी मति मारी गई थी जो दिलेरी से उधार बांटता गया. तू तो उनके साथ रहती थी फिर भी म्हारे को समझाती रही कि पहले थोड़ी वसूलता जा वरना या उधार थारे को ले डूबेगी, देख यही हुआ सलमा.

रतन ने हाथ में रखा रजिस्टर गुस्से में सामने दीवार पर दे मारा. मर गए हरामी के जने..! अरे मुसड्डो बांग्लादेश से मरे क्यों यहां. और आना ही था तो मेरे पैसे तो दे जाते. रतन की आंखों में आंसू थे. दोपहर ढल रही थी और दूर से समंदर किनारे की ठंडी हवा दुकान में घुल रही थी. सांझ होने के संकेत थे. बाहर का सन्नाटा पार्क से आ रही बच्चों के खेलने की आवाज से भर रहा था.

रतनलाल कई घंटों से दुकान के अंदर ही था. सुबह से वह केवल बीड़ी के बंडल फूंक रहा था, ना कुछ खाया था ना चाय पी थी. बाहर निकलने की उसकी इच्छा नहीं थी और सलमा उसके अंदर से निकल नहीं रही थी जबकि नौ हजार रुपए के बारे में वह 9 लाख बार सोच चुका था. दिन भर में वह 5 से 6 बार राम्या को फोन लगा चुका था, लेकिन बेचैनी थी कि कम होने का नाम नहीं ले रही थी. बाहर शाम के झुटपुटे को महसूस कर उसने धीरे से शटर ऊंची कि और तभी राम्या का फोन बज उठा.

रतन ने फोन उठाया-

ऐ रत्न्या- मैं इधर थाने में हूं.
खालिक, रहमान, सल्या, सुलतान सारे चोर इधर हीच हैं. तू आजा इधर, उधारी निकाल तेरी. अपुन का एक साब है पेचान का. बोले तो बात करुं. आएंगा क्या इधर.
कौन से थाने लेके गए. किधर आऊं मैं- रतन घबराया हुआ था. पैसे की बात सुनकर उसकी आंखों में चमक आ गई.
वह राम्या से बोला. ओ साहेब से बोल ना. आधा पैसा चाहे तो वो रख लें, लेकिन मेहरबानी होगी पैसा आएगा तो किराया भर जाएगा दुकान का.
कांता अन्ना और जमीर मटन वाले की बात की है मैंने. मैं तेरी बात करता है. तू आजा इधर. फोर्ट आ. राम्या उधर से चिल्लाया. वसई फोर्ट की तरफ. कोरट के पास है थाणा. आ जा फटाफट. राम्या ने फोन काटते हुए कहा- लेकिन वह फोन रख पाता कि रतन चिल्ला पड़ा-
राम्या- उधर सलमा को भी डाला क्या अंदर. दिखी क्या तेरे को उधर. पूछ ना जरा. रतन आगे कुछ कह पाता- राम्या फोन पर चिढ़ गया- क्या रे मेवाड़ी येड़या, रात गई बात गई. किधर तू रंडी में ब्यूटी खोज रहा है. छोड़ ना उसको. पुलिस वाले लेके गए उधर उसको हनीमून मनाने को.
ऐ राम्या- ब्याह करुंगा उससे मैं. तेरी वईनी है, उसको छुड़ाने का है अपने को. रतन की जबान लड़खड़ा रही थी. तू रुक उधर मैं अभी आया ऑटो पकड़कर. बस अभी.

फोन रखते ही मानों में रतन की बेचैनी फड़फड़ाने लगी. उसने नीचे पैंट पहना और दुकान के काउंटर में ड्रॉज में रखे 2 हजार रुपए जेब में डाले. फिर तेजी से शटर गिराकर बाहर निकल आया. वह अपार्टमेंट के आखिरी छोर से निकलकर आ रहा था जहां बिल्डिंगें अभी बन रही थीं. आखिरी कोने में कई झुग्गी झोपड़ियां थीं जो दूर तक फैली हुई थीं. ये अपार्टमेंट में काम कर रहे मजदूरों की थी.

रतन जब बाहर निकला तो उसका मन बैठा हुआ था. उसकी निगाह एक बार फिर बिल्डिंग के उजाड़ पड़े हिस्से पर पड़ी, वह सहम गया. वहां घुप्प अंधेरा था जबकि रोजाना लाइट जलती थी और कूकर की सिटियां बजती थी. उसने पीछे घूमकर देखा तो सामने की बस्ती में आज शाम थकी और उदास दिखाई दे रही थी. 60 से 70 झोपड़ियों के इलाके में लाइटें जलीं नहीं थी; अंधेरा सन्नाटे के साथ पसर रहा था, जो रौशनी आ रही वह स्ट्रीट लाइट की थी. रोजाना की तरह वहां चहल-पहल कम थी.

उसने एक निगाह सामने की ओर डाली जहां ढलती शाम के झुटपुटे में दूर-दूर तक खेत साफ नजर आते थे. कहीं बरगद, पीपल और नीम के पेड़ थे जिनकी डूबते सूरज में परछाइयां नजर आ रही थीं. दूर लाइन से नारियल के पेड़ थे. कई सीधे तने तो कोई आड़े-तिरछे और झुके नजर आ रहे थे. वहीं से कुछ किलोमीटर दूर मछुआरों की बस्ती थी और समंदर दिखाई देता था जहां से आती हवा बिल्डिंगों के जंगल की खिड़कियों को सहला रही थी. लगता था बादलों से घिरा आकाश छंटकर हल्का हो रहा था.

रतन तेज गति से पैर बढ़ाते हुए गेट से बाहर की बढ़ने लगा, लेकिन पैर के एक घायल पंजे और दूसरी सूजी पिंडली से उससे चला भी नहीं जा रहा था. उसके भीतर एक गहमा-गहमी और घबराहट तैर रही थी, लेकिन अपार्टमेंट रोजाना की तरह सांसे ले रहा था. अचानक रतन ने अपार्टमेंट के बीच में बनें सर्किल पर पुलिस की एक वैन खड़ी हुई देखी और उसका दिल बैठ गया. उसे लगा कि पुलिसवाला अब उसे भी बुलाएगा. लेकिन वह आंख बचाते हुए धीरे-धीरे चलता रहा और कुछ ही देर में बड़े से गेट के बाहर था.

गेट पर पहुंचते ही उसने बाहर रफ्तार से दौड़ती सड़क पर ऑटो को इशारा किया. एक ऑटो उसके ठीक सामने आकर रुका और उसने कहा- वसई फोर्ट पुलिस थाने जाने का है. ऑटो वाला मीटर डाउन करता इससे पहले ही रतन धप्प से अंदर बैठ गया. ऑटो अभी चलना शुरू ही हुआ कि रतन ने अपने जेब टटोले. कुछ तो हल्का लग रहा था. पैसे तो अपनी जगह थे पूरे 2 हजार, लेकिन जेब में हमेशा भार लगने वाली दुकान की चाभी नहीं थी. वह असमंजस में था कि दुकान का ताला लगाया या नहीं, लगाया होता तो चाभी का झुक्का पास होता और नहीं लगाया तो क्या दुकान की शटर आधी खुली ही छोड़ आया.

दुकान में ताला ना लगाने की बात ध्यान आते ही उसका माथा फिर घूम गया. उसने गुस्से में गाली, गांडू बन गया हूं मैं हट्ट इसकी मां की..! उसे डर लगा कहीं दुकान में पुलिस वाले ना घुस जाएं और वैसे ही सबकुछ उजाड़ दे जैसे कल उजाड़ा था. वैसे भी एक बार जब राम्या के साथ वह खुली दुकान छोड़ गया था तो झुग्गी के लड़कों ने गल्ला साफ कर डाला था, वह तो सलमा आ गई थी वरना सामान भी साफ था. एक बार तो कुत्ते हगकर चले गए थे.

ऑटो वाला शाम के ट्रैफिक में धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था वह आगे बढ़ता, रतन ने उसे रोक दिया और अपार्टमेंट में ही अंदर चलने को कहा- भाई दुकान में ताला लगाना भूल गया मैं. अंदर डाल, ताला डालकर वापस आते हैं.

लंबा-चौड़ा और ऊंची बिल्डिंगों वाला सनशाइन अपार्टमेंट किसी छोटे से गांव से कम नहीं था. पूरे प्रिमाइसेस में 60 से 60 बिल्डिंगें थीं जिनमें एक हजार से ज्यादा फ्लैट थे और 5 हजार से ज्यादा लोग रहते थे. बाहर से अंदर आने का मतलब था आधे किलोमीटर का रास्ता तय करना, लेकिन रतन ऑटो से था. कुछ ही मिनट में वह अपार्टमेंट के अंतिम छोर पर था, जहां से वह आया था. उसने ऑटो खड़ा किया और सामने दुकान को देखा. दुकान की शटर पूरी गिरी थी, ताला नहीं लगा था, लेकिन लाइट चालू था. वह मोटे सरियों और तारों के बंडल पार करता और गिट्टी पर लंगड़ाते हुए चलकर दुकान के पास आया और शटर उठाकर चाभी लेने अंदर घुसा. जल्दबाजी में उसने शटर पूरी उठाई और हड़बड़ाते हुए काउंटर के ड्रॉज में चाभी ढ़ंढने लगा. चाभी हाथ में आते ही वह लाइट बंद करने को हुआ तो अचानक बाथरूम से आवाज आई- रतन लाइट ना बंद करना..!

आवाज सुनते ही- रतन का दिल कुछ सेंकेड के लिए बैठ गया और फिर फास्ट लोकल की तरह धड़धड़ाता स्पीड पकड़ गया. वह जोर के चिल्लाया- सलमा. कठे थी तू. वह आगे कुछ बोल पाता कि लाल सूट में चुन्नी डाले सलमा बाथरूम से निकलकर उसके गले जा लगी और फफक पड़ी. रतन ने चाभी जमीन पर फेंकी और रतन को जोरदार झापड़ गाल पर मारा और चीखा- हरामजादी कहां चली गई थी म्हारे को छोड़कर, कल मर जाती यहां तो जान ना निकलती मेरी. रोज तो तने बुलावा ना भेजता और जो तू है कि कल कोनी आई..! रतन रोते-राते चांटा मारने वाले हाथ से ही उसे सहलाते हुए बड़बड़ाता रहा- अब बाहर कोनी जाना, लुगाई है तू म्हारी..!  थप्पड़ खाई सलमा कि रुलाई और फूट गई और रतन ने उसे बांहों में भर लिया.

दुकान में खामोशी छाई रही. रतन देर तक सलमा को चूमता रहा और सलमा रतन में समाती चली गई. सलमा ने आंसु भरी आंखों से सामने की ओर देखा. बस्ती में लाइट आ गई थी…!

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3 comments

  1. पंकज कौरव

    एक सांस में पढ़ गया। बहुत अच्छी कहानी। बधाई सारंग जी को।

  2. हृदय स्पर्शी कहानी!!

  3. बहुत ही अच्छी कहानी है, इसे इतनी अच्छी तरह से पेश किया गया है जैसे मानों जैसे कहानी पढ़ते हुए ऐसा कि लगता है कि दृश्य आंखों के सामने ही चल रहा है।

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