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आशुतोष भारद्वाज का लेख ‘मंगलेश का प्रदाय’

आज मंगलेश डबराल जी की जयंती है। उनके जाने के बाद पहली जयंती। उनके रचनात्मक अवदान पर यह लेख प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार-आलोचक आशुतोष भारद्वाज ने लिखा है।

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एक

किसी आलोचक और रचनाकार की आलोचना में एक फ़र्क यह है कि कोई कवि या कथाकार जिन मानकों को प्रस्तावित करता है, वह अक्सर उसके व्यक्तिगत मूल्यों का प्रतिबिंब होते हैं। जिस पैमाने पर वह अपनी विधा को बरतते अन्य रचनाकारों को परखता है, शायद उसी कसौटी पर वह अपनी रचना का पाठ चाहता है। मसलन कहानी को उपन्यास से किंचित् बड़ी कलात्मक उपलब्धि बतलाते हेनरी जेम्स शायद यह अपेक्षा रखते थे कि उनकी कहानियों को उपन्यासों से कमतर न माना जाए। उपन्यास का सौंदर्यशास्त्र लिखते मिलान कुंदेरा जो कसौटियाँ प्रस्तावित करते हैं, उन पर वे अपने उपन्यासों का पाठ चाहते हैं। निर्मल वर्मा कला का जो सत्य अपने निबंधों में रेखांकित करते हैं, दरअसल वे उनकी अपनी रचना की अव्यक्त आकांक्षाएँ हैं।

किसी रचनाकार की आलोचना अक्सर आत्म-वक्तव्य की तरह होती है, उन सूत्र और संकेतों को लिए रहती है जिनके भीतर वह निवास करता है। इस दृष्टि से मंगलेश डबराल की आलोचना उनकी कला-दृष्टि और राजनीति को किस तरह आलोकित करती है? मसलन शमशेर पर लिखते वक़्त क्या वह अपनी कविता के बारे में कुछ बतलाते हैं?

“शमशेर जैसे उदार कवि के बारे में ज़्यादातर आलोचक अनुदार तरीक़े से सोचते रहे हैं कि पूरा का पूरा शमशेर किसी को स्वीकार नहीं है। सवाल यह है कि हिंदी आलोचना की ख़ेमेबंदी में आख़िर शमशेर को किस जगह रखा जाए। कलावादी कहाये जाने वाले लोग उनमें वैष्णव क़िस्म का लीलाभाव या ‘कवित्व का कवित्व’ देखने और उनकी क्रांतिधर्मी कविताओं को एक भटकाव मानने की भूल करते आये हैं…दूसरी तरफ़ प्रगतिवादी और जनवादी आलोचक हैं जिनमें शमशेर की सौंदर्यपरक कविताओं को लेकर एक हिचक रही है…यह बड़ी भूल तो दोनों ही तरह के लोग करते हैं कि शमशेर जैसे सम्पूर्ण अखण्डित काव्य-व्यक्तित्व को टुकड़ों में बाँटकर प्रस्तुत करना चाहते हैं।”[i]

शमशेर की कविता को “अनुदार” आलोचकों से बचाता मंगलेश का यह निबंध “हिंदी आलोचना की ख़ेमेबंदी” के विरुद्ध खड़ा है। शमशेर के काव्य-व्यक्तित्व का निर्माण साम्यवादी चेतना और अमूर्तन के सौंदर्य ने मिल कर किया है, इसलिए किसी एक धुरी पर उन्हें केन्द्रित करना उनके प्रति अन्याय है। लेकिन शमशेर के बारे में यह अंतर्दृष्टि देते मंगलेश क्या ख़ुद इन शब्दों के बीच से झाँकते दिखाई नहीं देते? शमशेर की तरह मंगलेश की कविता भी भूलवश दो विलोम करार दिये गए पक्षों को साधती है। इस कविता की काया का निर्माण अमीर खां का संगीत और गुजरात का मृतक मिलकर करते हैं। इस कविता की देह पर “तुम्हारा प्यार पूरा गाँव है/जहाँ मैं होता हूँ” जैसी निश्चल पंक्तियाँ खिलती हैं, और अनुपस्थित माँ की कसक भी क्योंकि “जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है/ माँ घर में खोयी हुई किसी चीज़ को ढूँढ़ रही होती है।”

शमशेर का पक्ष रखते मंगलेश उन मूल्यों पर आग्रह करते हैं जिन पर शायद वे अपनी कविता के पाठ की अपेक्षा रखते हैं। इस निबंध का शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषण “उदार” है, जो मंगलेश के लेखन में बार-बार लौटता है। मसलन, कुमार गंधर्व पर उनका लेख। एक बार कुमार गंधर्व किसी महफ़िल में भूप गा रहे थे। श्रोता झूम रहे थे। करीब पौन घंटे बाद शुद्ध मध्यम का एक बारीक-सा कण भूप को छू गया। श्रोताओं को थोड़ा अचरज हुआ। कुमार भांप गए, तानपुरे की आवाज धीमी करवाई और बोले : “भाई क्या करूँ? यह शुद्ध मध्यम बड़ी देर से मुझे जरा अंदर ले लीजिये, ले लीजिये की रिक्वेस्ट कर रहा है। भूप के दरबार में उसे प्रवेश नहीं है…(लेकिन) कब तक (उसे) बाहर रखें?”

मंगलेश यह किस्सा सुनाने के बाद लेख का अंत इस वाक्य से करते हैं : “यह उदारता समूचे संगीत के बारे में कुमार गंधर्व की सोच को भी उजागर करती है।”[ii]

गौर करें, यहाँ भी मूल पद ‘उदारता’ है। कुमार ने एक ऐसे तत्व को अपने संगीत में शामिल कर लिया जिसकी वहाँ कोई जगह न थी, जिसकी उपस्थिति उनकी कला को धूमिल कर सकती थी। मंगलेश को शास्त्रीय संगीत का गहरा ज्ञान था। यह उन्हें पिता से विरासत में मिला था। उन्हें भूप में शुद्ध मध्यम का प्रवेश अनाधिकृत लग सकता था, वे कुमार से असहमत हो सकते थे — लेकिन नहीं। वे इस कथित ग़ैर-तत्व को बड़े प्रेम से जगह देते हैं, कुमार की उदारता की सराहना करते हैं।

कोई कह सकता है कि इन स्थलों पर इस पद की आवृत्ति बड़ी सरल थी, संशय-ग्रस्त नहीं थी। इन अवसरों पर बगैर किसी नैतिक दुविधा के उदार हुआ जा सकता था। शमशेर को आलोचना की ख़ेमेबंदी से बचाते वक़्त और कुमार गंधर्व को व्याख्यायित करते वक़्त मंगलेश के समक्ष कोई कठिन राजनीतिक प्रश्न नहीं था। मसलन ऐसी स्थिति जहाँ किसी कवि की कविता और उसकी राजनीति के बीच सीधा मुक़ाबला हो, जब उस कवि की राजनीति का घनघोर विरोध हुआ हो। इस स्थिति में मंगलेश की आलोचना किस तरफ़ झुकेगी? श्रीकांत वर्मा शायद इस चाक़ू-से प्रश्न की धार पर ठहरे प्रतिनिधि कवि हैं। लेकिन मंगलेश की दृष्टि यहाँ भी नहीं डिगती। श्रीकांत वर्मा पर अपने लेख में मंगलेश उनकी राजनीतिक सीमाओं को गिनाते हैं, अपनी असहमति व्यक्त करते हैं, लेकिन निष्कर्ष यह देते हैं:

“श्रीकांत वर्मा के राजनीतिक कार्यकलाप विवादास्पद रहे, पर उनकी कविता को लेकर कोई विवाद नहीं है और अंततः वे एक कवि के रूप में ही याद किये जाते रहेंगे।”[iii]

मंगलेश इस लेख का अंत इन पंक्तियों से करते हैं:

“रूसी कवि वोज़्नेसेंस्की को वे (श्रीकांत वर्मा) अपना सबसे प्रिय कवि इसलिए मानते थे कि उनकी कविता सवाल करती है:

‘नियति और आँसू को/समेटा नहीं जा सकता सपाट उत्तरों में/प्रश्न ही सत्य है/ कवि एक प्रश्न है’

श्रीकांत वर्मा की त्रासदी और विडंबना के बावजूद कविता के प्रश्न जारी रहेंगे। यह कवि श्रीकांत वर्मा की महत्त्वपूर्ण देन है।” [iv]

मंगलेश को कोई संदेह नहीं कि समूची विडंबनाओं के बावजूद “अंततः वे (श्रीकांत) एक कवि के रूप में ही याद किये जाते रहेंगे।” अपने समूचे राजनीतिक विचलन के बाद भी, एक ऐसा राजनीतिक जीवन जो आपसे प्रतिपल समझौते माँगता है और आपकी आत्मा को चकनाचूर करता है, इसके बावजूद श्रीकांत को मंगलेश की सृष्टि में बड़ी सम्मानित जगह मिलती है। यह उदारता का एक और उदाहरण है।

इस मसले को थोड़ा और जटिल करते हैं, क्योंकि यहाँ भी कहा जा सकता है कि श्रीकांत वर्मा की कविता का स्वीकार मंगलेश के लिए उतना बड़ा प्रश्न नहीं रहा होगा। श्रीकांत भले कांग्रेसी थे, विवादों में रहे, लेकिन उनका वामपंथ से कभी झगड़ा न था, न ही वाम लेखक संगठनों ने उन्हें कभी अपने शत्रु माना। दूसरे, जैसा कि मंगलेश खुद लिखते हैं, उनकी कविता को लेकर कोई विवाद न था। मंगलेश की आलोचना के समक्ष यक्ष-प्रश्न शायद उस वक़्त आएगा जब वे अपने घोषित विपक्ष को बरतेंगे — और इस समर में सबसे बड़ा नाम है अज्ञेय। वाम और अज्ञेय की शत्रुता बहुस्तरीय है, अमिट और अनिवार्य है। मंगलेश अज्ञेय को किस तरह लिखते हैं?

 “कई तरह के साहित्यिक विवादों के बीच आजीवन लगभग मौन खड़ा एक साहित्यिक व्यक्तित्व नहीं रहा। एक ऐसा आदमी नहीं रहा जो हमेशा अपनी ही शर्तों पर जीता था और जिसने अपनी मान्यताओं के लिए भले ही तरह-तरह की आलोचनाएँ झेलीं, पर समझौता नहीं किया। यह एक ऐसे कवि और शिल्पी का जाना है जिसने हिंदी कविता को छायावादी कुहासे से बाहर लाकर एक नयी भावभूमि दी, आधुनिक चेतना से उसका संस्कार किया…आज हिंदी में जो आधुनिक, विश्व-स्तर पर रख सकने लायक कविता लिखी जा रही है, वह शायद संभव न होती अगर उसके स्रोत पर वात्स्यायन का योगदान न हुआ होता।”[v]

सभी वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर मंगलेश कितनी मार्मिकता और कृतज्ञता से अज्ञेय को स्मरण करते हैं। ‘उन्होंने आधुनिक संवेदना को संभव किया’ नामक इस लेख को पढ़ते वक़्त मुझे गोर्की के तोलस्तोय पर लिखे संस्मरणनुमा निबंध की याद आती है। नास्तिक गोर्की मार्क्सवादी थे, लेनिन के करीबी थे, जबकि तोलस्तोय ईसाई धार्मिक चेतना और ईश्वरीय आस्था में अंतिम समाधान खोजने लगे थे। इस महान संस्मरण के अंत में गोर्की तोलस्तोय से उस मुलाक़ात का ज़िक्र करते हैं, जहाँ वे युवा गोर्की को ईश्वर के बारे में बतलाते हैं। एक नास्तिक लेखक की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी? क्या गोर्की तोलस्तोय को नकार देंगे? गोर्की अपने संस्मरण का अंत इन शब्दों से करते हैं :

“मैं जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, उन्हें अत्यंत सावधान होकर और किंचित् कातर भाव से देखता रहा। मैंने उन्हें देखा और मुझे लगा : “यह इंसान ईश्वर की तरह है।”

ग़ौर करें, मंगलेश के अज्ञेय पर लेख का पहला वाक्य है : “वात्स्यायन जी ने अपने बगीचे में नीम के पेड़ पर एक घर बनवाया था।” और अंतिम वाक्य है : “कोई घर न बसाने वाले एक कवि का घर शायद पेड़ पर, हवा में, हरियाली के बीच हो सकता था। पर इस घर में बैठकर कविताएं सुनने से पहले वात्स्यायन चले गए।” संयोग है कि गोर्की और तोलस्तोय की उम्र में भी अज्ञेय और मंगलेश जितना ही फ़ासला था। अपने धुर वैचारिक विरोधी को इतने स्नेह, अपनत्व और आदर के साथ स्मरण करने के हिंदी में उदाहरण बहुत कम होंगे।

उपरोक्त चारों उद्धरणों से, जो अलग-अलग समय और विषयों पर लिखे गए चार लेखों से लिए गए हैं, हम यह प्रस्तावित कर सकते हैं कि उदारता मंगलेश की आलोचना ही नहीं, उनकी रचना का भी बुनियादी चरित्र है। मंगलेश की राजनीति निर्धारित है, लेकिन उनका शब्दकोश शत्रु-तत्व की प्रतिपल तलाश में नहीं है। अगर आप मनुष्य की बुनियादी स्वतंत्रता और अधिकारों के विरोध में नहीं हैं, भले आपकी राजनीति भिन्न हो, मंगलेश का लेखन आपको शत्रु नहीं मानेगा। वे आपकी राजनीति का प्रतिकार करेंगे, लेकिन आपके लेखन के प्रति उदार जगह बनाए रखेंगे। वे पूँजीवाद और मुक्त बाज़ार के फ़रेब और नक़ाबपोश साम्प्रदायिक चेहरों के ख़िलाफ़ खड़े हैं, लेकिन अपने विरोधी पर बग़ैर प्रमाण के अभियोग नहीं लगायेंगे। वे इसी लेख में अज्ञेय को उद्धृत भी करते हैं कि “जहाँ कोई प्रमाण नहीं है और सब चुनौती देने वाले हैं, वह साहित्य स्वस्थ नहीं है। आज हिंदी की स्थिति मुझे यही लगती है।”

मंगलेश जानते हैं कि एक स्वस्थ समाज और साहित्य की रचना आरोप और षड्यंत्र से नहीं, नीतिगत निर्णयों और मूल्यवान राजनीति से होती है। लेकिन उदारता का यह अर्थ नहीं कि मंगलेश कमजोर कविता को स्वीकार करेंगे। उनके लिए राजनीति और कविता दो अलग सत्ताएँ नहीं हैं। कविता एक राजनीतिक कर्म है और राजनीति कविता की मिट्टी में आकार लेती है, लेकिन वह आश्वस्त हैं कि प्रत्येक राजनीतिक अभिव्यक्ति कविता नहीं है। मंगलेश को अपनी रचना और अपने पाठक के प्रति अपने दायित्व का गहरा बोध है। मसलन 25 मई 2005 की उनकी यह डायरी:

“राजनैतिक कविता के नाम पर ज़्यादातर जो कुछ दिखाई देता है वह शायद किसी बड़ी कविता को निर्मित कर सकने वाला कच्चा माल है। यह हम मार्क्सवादी कवियों की एक ख़ामी है कि हम कविता की सामग्री को कविता की तरह पेश करते रहते हैं और ग़ैर-कलावादी बनते हैं।”[vi]

इतना गहरा आत्मालोचन, अपनी ख़ामियों को स्वीकारने का साहस कम कवियों में होगा। लेकिन उपरोक्त शब्दों के पीछे छुपी मंगलेश की गुहार को भी समझिए — कमजोर शब्द को “पक्षधर” कविता कह कर प्रचारित न करिए। लगभग यही बात वह गौहर रज़ा पर अपने लेख में कहते हैं, पाब्लो नेरुदा के एक साक्षात्कार को उद्धृत करते हुए जिसका उन्होंने कभी अनुवाद किया था, और जो ‘आलोचना’ में नामवर सिंह ने छापा था। “नेरुदा ने नए कवियों को यह सलाह दी कि वे सियासी कविता से शुरुआत न करें बल्कि प्रेम कविता लिखें क्योंकि सियासी मसलों पर लिखने के लिए कथ्य और शिल्प का गहरा अनुभव चाहिए।”[vii]

इन शब्दों में हमें फिर से मंगलेश को पढ़ना चाहिए। क्या नेरुदा के बहाने मंगलेश ख़ुद ही तो नहीं यह कह रहे कि कविता और राजनीति की भाषा में फ़र्क़ हो सकता है? राजनीति आपको गुमराह कर सकती है, कविता आपको विचारमग्न बनाती है। राजनीति अक्सर किसी मसीहा की शरण में चली जाती है, कविता मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ती। कथा साहित्य शायद कभी निश्चितताओं का वहन कर भी ले, कविता एक निरीह अनिश्चय की राह पर चलती है। मंगलेश इन्हीं कसमसाते संशयों और झिझकती सम्मतियों के कवि थे। फ़रवरी 2001 में साहित्य अकादमी पुरस्कार स्वीकार करते वक़्त अपना अभिभाषण, “कवि का अकेलापन”, वे पाब्लो नेरुदा से शुरु करते हैं जिनकी कुछ अवसादग्रस्त कविताओं को पढ़ने के बाद एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली थी। नेरुदा का एक कविता-संग्रह उसके शव के पास पाया गया था। नेरुदा को लगा मानो उनकी कविता उस पाठक के खून से सनी थी। इसके बाद नेरुदा ने अंधकार और मृत्यु की कविताएँ लिखना बंद कर दिया।

कवि के संशय को स्वीकारते मंगलेश आगे कहते हैं : “कविता अपने समय के संकटों को पूरी सच्चाई कभी व्यक्त नहीं कर पाती, इसलिए उसमें हमेशा ही संकट बना रहता है।”

मंगलेश को मालूम था कि उनकी कविता अपर्याप्त रही आयेगी। वे इस दम्भ में नहीं थे कि उनका शब्द ही अंतिम है। इसलिए मंगलेश उन तमाम युवा कवियों के आदर्श बन पाये जो वामपंथ से प्रेरित थे, और अपनी कविता को एक विशिष्ट कलात्मक स्वर भी देना चाहते थे। उनकी मृत्यु पर उनकी परवर्ती पीढ़ी के अनेक कवियों की प्रतिक्रिया बतलाती हैं कि उन्होंने कितने कवियों को प्रेरित किया था।

दो 

कुछ बरस पहले मैंने मंगलेश डबराल के निबंध ‘एक राग के अवशेष’ का अँग्रेजी अनुवाद किया था। वे अपने बचपन के गाँव और पिता का स्मरण करते थे जो जर्मन रीड वाले सुरीले हारमोनियम पर अनेक राग बजाया करते थे। अपने गाँव को छोड़ कर शहर के लिए निकलते वक़्त जैसे ही मंगलेश ने आख़िरी पेड़ और नदी को पार किया, उनके भीतर अपने प्रिय राग दुर्गा का अभाव गूंजने लगा। “जैसे यही राग था जो जीवन को चला रहा था, उसे एक गहरी गूँज से भरे हुए था और एक घर उसकी बुनियाद पर टिका हुआ था,” वे लिखते थे।

मैंने बचपन के घर से बिछुड़ने पर तमाम कवितायें और संस्मरण पढ़े थे। व्लादिमीर नबाकोव उन्नीस बरस की उम्र में जब रूसी  सरकार के क़हर से बचते हुए अपना मुल्क हमेशा को छोड़कर जा रहे थे, उन्हें वे ख़त याद आ रहे थे जो उनकी प्रेमिका उन्हें लिखने वाली थी, लेकिन जो अपने पते पर नहीं पहुँचने थे। लेकिन मंगलेश का अभाव मेरे लिए नितांत अजनबी था। कौन था यह युवक जो किसी राग से विछोह को इतनी निष्ठा से स्मरण कर रहा था? क्या कोई राग किसी का जीवन इस क़दर निर्धारित कर सकता है? उस युवक की संवेदनशीलता पर मैं अचम्भित रह गया। मैं मंगलेश को पहले पढ़ चुका था, लेकिन उस अनुवाद को करते वक़्त मुझे उनके गद्य में वे ध्वनियाँ सुनाई और निधियाँ दिखाई दीं, जिन्हें मैं पहले नहीं थाम पाया था। मुझे एहसास हुआ कि किसी अनुवादक का कृति से संवाद पाठक या आलोचक से कहीं सघन होता है। आलोचक उस कृति की आत्मा को थामना चाहता है, जबकि अनुवादक उस आत्मा का अनुवाद करता है।

मेरी उनसे गिनी-चुनी ही मुलाकातें थीं – दिल्ली के किसी सभागार में या उसके बाद कहीं भोजन इत्यादि पर। मैंने तय किया कि उनसे अगली बार मिलने पर उस सुबह के बारे में बात करूँगा, जब वे गाँव से चल पड़े थे।

वह दिन कभी नहीं आना था।

तीन 

अब हम मंगलेश के पहले उद्धरण पर, यानी हिंदी आलोचना की उस प्रवृत्ति पर लौट सकते हैं जो किसी रचना को कलावादी और जनवादी के कटघरों में बंद कर देखना चाहती है। यह अलग है कि शमशेर की तरह मंगलेश को कभी कलावादी नहीं कहा गया, न ही चित्रकारों और संगीत पर उनके लेखों और कविताओं को जनवाद से विचलन की तरह लिया गया — शायद इसलिए कि उनके राजनीतिक लगाव आख़िर तक एकदम घोषित रहे। इसलिए भीमसेन जोशी और राम कुमार पर उनकी रचनाएँ उस वक्र भृकुटी से बची रही आयी जो कला-विषयक लेखन करते किसी ग़ैर-साम्यवादी लेखक पर अक्सर जा गिरती है। स्वातंत्रयोत्तर हिंदी साहित्य ने इस दुर्भाग्यपूर्ण मान्यता को लगभग निर्विरोध स्वीकार लिया है कि जनपक्षधर लेखक भाषा के प्रति सजग नहीं है, जबकि भाषा को धारण करता लेखक राजनीति और जनता से कटा हुआ है। इस प्रस्तावना को बड़े आराम से दोनों तरफ़ के अनेक उदाहरणों से ध्वस्त किया जा सकता है। मसलन कहानियों में ज्ञान रंजन, और कवियों में शमशेर, रघुबीर सहाय और मंगलेश। ख़ुद मंगलेश इस विभाजन को लेकर सहज नहीं दिखते हैं। ग़ौर करें, उन्होंने ‘कवि का अकेलापन’ “गद्य शिल्पियों” को समर्पित की थी, जिनमें हरिशंकर परसाई और शमशेर बहादुर सिंह के अलावा निर्मल वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल भी थे।

मंगलेश को श्रद्धांजलि देने का एक तरीक़ा यह हो सकता है कि हम लेखक की राजनीति और उसके लेखन के अंतरसंबंधों पर नया विमर्श शुरु करें — क्या शोषित और आदिवासी पर लिखने के लिए किसी वाम संगठन की सदस्यता अनिवार्य है? “कलावादी” और “जनवादी” मोर्चे शायद चालीस बरस पहले अनिवार्य रहे होंगे, लेकिन जिस पीढ़ी ने इस सदी में लिखना शुरु किया, क्या उसे इस लड़ाई का बोझा ढोने की ज़रूरत है? उस लेखक की जगह कहाँ है जो किसी पार्टी से संबंधित नहीं है, जो सिर्फ़ एक सजग मनुष्य, एक जागरूक नागरिक की तरह खुद को बरतता है, जीना चाहता है?

यह प्रश्न थोड़े असहज कर सकते हैं, लेकिन अगर हमें यह स्वीकारना होगा कि किसी संगठन की सदस्यता के बग़ैर भी घनघोर राजनीतिक लेखन और जीवन सम्भव है। बग़ैर कोई झंडा उठाए भी सांप्रदायिकता और अन्याय के विरोध में व नागरिक के साथ खड़ा हुआ जा सकता है। शायद यह ख़ेमेबंदी साठ और सत्तर के दशक का सत्य हो, लेकिन आज जब तानाशाह से लड़ाई कहीं सीधी है, साहित्य और राजनीति दोनों ही जगहों पर नए मोर्चे बनाये बग़ैर शायद काम नहीं चलेगा। आख़िर जो रास्ता हिंदी साहित्य लेगा, उसका समाज उसी राह तो चलेगा। हिंदी साहित्य अगर भीषण आंतरिक विभाजन से नहीं ग्रस्त होता, तो शायद उसके समाज पर साम्प्रदायिकता इस क़दर न टूट कर न गिरती।

मंगलेश ने कुंवर नारायण की कविताओं पर लिखा था कि उनके लिए “नैतिक ही राजनीतिक है”। मेरे ख़याल से यह हमारे समय का बीज-वाक्य, अपने पड़ोसी लेखक से संवाद करने की प्रामाणिक कसौटी हो सकता है। अगर वह नैतिक है, न्याय और पीड़ित के पक्ष में खड़ा है, भले किसी पार्टी का सदस्य हो या न हो, वह स्वीकार्य है, सम्माननीय है — सत्य और परिवर्तन की राह में अपना साथी है, दोस्त है, कामरेड है, हमसफ़र है।

शायद यही मंगलेश डबराल के लेखन का प्रदाय है।

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संदर्भ:

[i] मंगलेश डबराल, कवि का अकेलापन, पृष्ठ 23, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2008

[ii] मंगलेश डबराल, लेखक की रोटी, पृष्ठ 70, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 1998

[iii] वही, पृष्ठ 24

[iv] वही, पृष्ठ 26

[v] वही, पृष्ठ 27

[vi] कवि का अकेलापन, पेज 183-84

[vii] वही, पृष्ठ 86

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