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यशपाल और प्रकाशवती -अद्भुत सच्ची प्रेम कथा

पढ़ने लिखने वाला आदमी पढ़े लिखे नहीं तो क्या करे? यतीश कुमार इन दिनों किताबें पढ़ रहे हैं और उसके ऊपर लिख रहे हैं। यशपाल की किताब ‘सिंहावलोकन’ पढ़कर उन्होंने यह सुंदर प्रसंग लिखा है –

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हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा में यशपाल और प्रकाशवती  के प्रेम का ज़िक्र था। इनके बारे में पढ़ते हुए मैं इन दो किरदारों की ओर जबरदस्त आकृष्ट हुआ। इनक बारे में दूसरी किताबों में ढूंढने लगा। बच्चन की आत्मकथा प्रथम भाग  “क्या भूलूँ क्या याद करूँ” में दोनों का जिक्र संक्षिप्त में सही पर बहुत ईमानदारी से किया गया है।

यशपाल जब जेल गए तो प्रकाशवती दिल्ली में बच्चन के मित्र श्री कृष्ण सूरी  के घर पर थीं और बाद में बच्चन जी के घर पर महीने भर रहीं। यूँ तो प्रकाशवती बिल्कुल साधारण सीधी-सादी महिला थीं क्रांतिकारी आंदोलन की बड़ी भारी कार्यकर्ता थी। देशभक्ति का आलम ये था कि प्रकाशवती बम बनाने से लेकर घर के गहने चुराकर क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद करती रहीं और बाद में वो “कामरेड सुपरिंटेंडेंट” कहलाने लगीं।

सिंहावलोकन पढ़ते हुए आरंभ से ही मैं प्रकाशवती को ही ढूँढ रहा था, पर ज़िक्र भगतसिंह, सुखदेव, भगवतीचरण, बिस्मिल, यशपाल, जयचंद का आता रहा।  दो सौ पन्नों के बाद बच्चन के संस्मरण से उपजी नॉस्टेलजिया के साथ ही उनका पदार्पण हुआ। एक बार ‘आज़ाद’ यशपाल से पूछते हैं कि, ‘तुम प्रेम करते हो, फिर शादी कर लोगे तो सशस्त्र आंदोलन में कैसे समर्पित व सक्रिय रहोगे?’ उसके जवाब में यशपाल इंद्रपाल का जवाब दोहराते हैं कि ‘जंग में जो सिपाही शहीद होते हैं वे क्या शादी नहीं करते?’ आज़ाद फिर मुस्कुरा देते हैं। क्रान्ति और प्रेम का साथ-साथ का यह सफर काफी रोचक रहा है। दोनों के लेकर कई किस्से भी मशहूर हैं।

सभी बड़े क्रांतिकारियों को जेल जाने के बाद दल ने लाहौर में बम बनाने की फैक्ट्री का निर्माण किया और यह बात भी आश्चर्यजनक लगी कि दल में बम बनाने की विधि का पूरा ज्ञान यशपाल को ही था। बम बनाने के लिए मर्करी फलमिनेट का निर्माण करना पड़ता था और यह कार्य बहुत कठिन था। इसका स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता था फिर भी यशपाल इस यातना को सहते रहे। एक बार कच्चे रंग के रह जाने से बम भगवती के हाथ में छूटते ही फट गया और उनकी मृत्यु हो गयी। इस बात का यशपाल को ताउम्र अफसोस रहा। हालांकि लाहौर में फैक्ट्री अधिक दिन तक नहीं चल सकी। पुलिस ने छापा मारा जिसमें कई साथी पकड़े गए। यशपाल किसी काम से बाहर गए थे अत: अब इनके फरारी के दिन शुरू हो गए। इन्हीं फरारी के दिनों में उनकी मुलाकात प्रकाशवती कपूर से हुई।

संस्मरण में आज़ाद का चरित्र बहुत ही इम्पलसिव और इमोशनल सा लगता है। किसी के कहने भर से उतावलेपन में निर्णय ले लेते थे बाद में प्रायश्चित भी करते है।  जयचंद्र  के कहने पर भगवती को मुखबिर मान लेना। ऐसी ही एक गलतफहमी प्रकाशवती और यशपाल को लेकर भी हुआ था। यशपाल का अंतिम कारनामा वायसराय को मारने का षडयंत्र रहा। पर कोहरे की वजह से वायसराय वाले डिब्बे की जगह एक खाली डिब्बा उड़ गया। इसी घटना के बीच आजाद के कानों में उड़ती उड़ती खबर पहूँची कि यशपाल प्रकाशवती के प्रेम में दल का पैसा उड़ा रहा। बिना सोचे-समझे आजाद ने यशपाल को गोली मारने का आदेश दे दिया। गोली मारने के आदेश के बाद जब यशपाल उनसे किसी तरह मिलते हैं और अपना पक्ष रखते हैं तो आजाद के आँखों से झर-झर आँसू बहने लगते हैं, कहते हैं हम अपने सबसे बेहतरीन लड़ाके को खो देते। यशपाल और प्रकाशवती का प्रेम दल के काममें बाधा नही बना। यशपाल को एक और रोचक बात आज़ाद के बारे में बताई गई है कि वे शाकाहारी थे, तुरंत गुस्सा, तुरंत प्यार वाली हालत रहती । अपनी ग़लती मानने में कभी कोई हिचक नहीं करते थे। सबके शीर्ष अभिभावक। माँस, खिचड़ी या सब्जी आलू के साथ बनने पर भी वे माँस को हटाकर सब्जी या फिर खिचड़ी खा लेते!

संस्मरण में ‘स्व’ और ‘मैं’ की गूंज बहुत कम है, सच को बस सच की तरह परोसा गया है। एक-एक किरदार की चर्चा अलग-अलग अध्याय में उसके भीतरी और बाहरी गुणों के साथ विस्तार से की गयी है। यशपाल को मैं बतौर लेखक ही जानता था, विभाजन पर आधारित कई शानदार कहानियाँ और ‘झूठा सच’ जैसा बेहतरीन उपन्यास हिंदी साहित्य को दिया। लेकिन सिंहावलोकन में तो एक अलग ही व्यक्तित्व सामने आता है। निडर क्रान्तिकारी भगतसिंह और सुखदेव के साथ पढ़े, लड़े और फिर आगे चलकर आज़ाद से भी जा मिले।  आज़ाद की मृत्यु के बाद संस्था के दोबारा गठन होने पर संचालक बने। मेरे लिए तो कई आश्चर्यों से भरा संस्मरण है ‘सिंहावलोकन’।

16-17 साल की उम्र में ”सविनय-कानून भंग आंदोलन” में भाग लेने पर अदालत ने बारह बेंत लगाने की सजा सुनाई। बेंत लगाने का तरीक़ा ऐसा था कि पहले बेंत में ही खून छलछला जाता। आज़ाद उस उम्र में भी बारहों बेंतों पर वंदे मातरम् और महात्मा गाँधी की जय कहते रहे। वहाँ से निकलने पर और उग्र हो गए और काकोरी के ऐतिहासिक रेल डकैती कांड में सरकारी खज़ाना लूटने में भाग लिया। वे इतने फुर्तीले थे कि उन्हें “क्विक सिल्वर” यानी पारा कहा जाता। शुरू में दल में स्त्रियों को रखने के विरोधी आज़ाद ने जब प्रकाशवती के समर्पण और नेतृत्व क्षमता को देखा तो बाद में (1928) कहने लगे, ‘मुझे ऐसे स्त्री की तलाश है जो मेरे साथ कंधों पर राइफल लेकर चले, जहाँ घिर जाऊँ वो मुझे कारतूस भर-भर कर दे और एक दिन अंग्रेजों से हम दोनों साथ-साथ लड़ते हुए शहीद हो जाएँ।’

अज्ञेय का भी एक स्थान पर जिक्र है। जब भगवतीचरण के हाथ में बम फट गया तो ढँकने के लिए चादर अज्ञेय से लिया गया। दुर्गा भाभी, सुशीला जी और प्रकाशवती ही क्रांतिकारियों के लिए धन का स्त्रोत थीं। बाद  में 1930 में आजाद ने गाड़ोदिया के यहाँ डकैती की और 17,300 रुपये लुटे।

इस पूरे संस्मरण में ” हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सेना” का निर्माण और विघटन दोनों को विस्तार से समझाया गया है। भगतसिंह का विधानसभा में सुरक्षित तरीके से बम फेंकना ताकि किसी को चोट न लगे और अपनी जगह से न हिलना इस बात का सबूत था कि जो अधिनियम वायसराय वोटिंग के बाद भी अपने विशेष शक्ति से पारित करने जा रहे हैं वो जनहित में नहीं है और यह एक विरोध का प्रतीकात्मक पहलू है। भगवतीचरण की पत्नी दुर्गा भाभी का चरित्र कइयों से बहुत समर्पित देशभक्त का लिखा गया है। दल को अपनी पूरी कमाई देना तो उनके लिए आम था पर खुद कई वारदातों में भाग लेना और एक वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारी को खुद गोली मारना जबकि उन दिनों उनपर पर महराष्ट्र के गवर्नर को गोली मारने का भूत सवार था ।

इन्द्रपाल एक जीवट इंसान था और कई मायने में भगत सिंह या किसी भी अन्य से कम नहीं था। जेल जाने पर भी मुखबिर नहीं बना और अपने सिद्धांतों तथा दलीलों की वजह से और वकील लाला श्यामलाल के निर्भीक प्रयास से छूट कर आया, हालाँकि जेल से बाहर आने पर उसकी टांगे और हाथ टेढ़े पाए गए । वकील श्यामलाल ने अदालत को साफ लिख कर कह दिया कि इस अदालत पर मुझे विश्वास नहीं है। अदालत ने उसे मानहानि समझा और माफी मांगने को कहा। वकील श्यामलाल ने कहा- मैं इन्द्रपाल और सत्य के साथ हूँ माफी का सवाल ही पैदा नहीं होता। पूरे भारत के वकीलों में हड़ताल की नौबत आ गयी और अंत में अदालत ने श्यामलाल को चेतावनी देकर छोड़ दिया।

यह संस्मरण अत्यंत पठनीय है जहाँ महात्मा गाँधी के नीतियों में स्वाभाविक त्रुटियों (1921-22) का बखूबी ज़िक्र बार-बार है और वहीं से सशस्त्र आंदोलन ने अपने डायने पूरे भारत में फैलाए। इस पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता । भगतसिंह की रिहाई के लिए जब आज़ाद नेहरू से मिले और गाँधी जी से दरख्वास्त करने को कहा। भगतसिंह को छुड़ाने के लिए महात्मा अंग्रेजों से बात करें, तो नेहरू जी ने कहा- गाँधी जी ऐसा नहीं करेंगे! बाद में इस भेंट का ज़िक्र करते हुए नेहरू जी ने अपनी किताब में आज़ाद और उसके संगठन को फासिस्ट कहा। आज़ाद को यह कलंक की तरह चुभा और वो बहुत क्रोध में आ गए। आज़ाद ने यशपाल को नेहरू जी के पास भेजा कि उनसे साफ-साफ बात करके आएँ। यशपाल जब नेहरू जी से मिलने गए तो निर्णय हुआ कि वे रूस चले जायेंगे । यशपाल ने नेहरू जी से छः हजार रुपये मांगे ताकि रूस जाया जा सके पर नेहरू जी ने 1500 रुपये भिजवाए और वे रुपये तीन लोगों यशपाल, आजाद और सुरेंद्र पांडेय ने 500-500 सौ अलग-अलग अपने पॉकेट में रखे।  सरोजिनी नायडू की बहन सुहासिनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रेसिडेंट रही हैं और यशपाल उनसे भी मदद माँगने गए थे।

जब दूसरे दिन तीनों एल्फ्रेड पार्क में गए, रास्ते में बाहर जाने के लिए यशपाल और सुरेंद्र पांडे स्वेटर खरीदने के लिए रुक जाते हैं। इसके बाद ही एल्फ्रेड पार्क में वह ऐतिहासिक भिड़ंत होती है। अंतिम गोली अपनी कनपटी में मार कर आज़ाद शहीद हो गए। आज़ाद के साथ सुखदेवराज था जो कि डर कर भाग गया। इस किताब में सुखदेवराज का चरित्र काफी संदिग्ध दिखाया गया है।  “मैं अंग्रेजों का जासूस था” में धर्मेन्द्र गौड़ ने इसका खुलासा किया है कि आज़ाद कैसे मरे इसकी खबर उसे कैसे मिली थी। दुःख इस बात का है कि मुखबिर भी हिंदुस्तानी और आज़ाद को गोली मारने वाला भी हिंदुस्तानी, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को हथकड़ी से फाँसी तक ले जाने वाला भी हिंदुस्तानी, जेलर खान साहिब अकबर भी हिंदुस्तानी, क्या विडंबना है!

आजाद की शहादत के बाद दल ने यशपाल को नया चीफ बना दिया। चीफ कमान्डर बनने के एक वर्ष के भीतर ही सन् 1932 में यथपाल गिरफ्तार कर लिए गए। यशपाल पर मुकदमा चला और 14 वर्ष की लंबी कैद की सजा सुनाई गई। प्रकाशवती यशपाल से सच्चा प्रेम करती थी, इसलिए यशपाल को लंबी कैद के बावजूद भी उन्होनें कैदी यशपाल से जेल में विवाह कर लिया। यह संभवतः उस जमाने में पहली बार ही हो रहा होगा कि जेल में इस तरह शादी की गयी। यहाँ प्रेम का सर्वोच्च मान देखा जा सकता है। हालाँकि बच्चन की आत्मकथा में प्रकाशवती के और रूपों का जिक्र भी है । यशपाल उन्हें पुकारने के लिए रानी भी कहते थे।

जेल में यशपाल का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। प्रकाशवती जी ने यशपाल को जेल से मुक्त करवाने का खुब प्रयत्न किया और भाग्य से उसी समय कांग्रेस सरकार सत्ता भी  प्राप्त हुई। इस बात के कई प्रमाण मिलते हैं कि प्रकाशवती ने कांग्रेस के नेताओं को काफी पत्र लिखे। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंत जी और जेल मंत्री रफी अहमद किदवई से इतनी बार मिलीं। अंत में उन्हें गवर्नर से अपील करना पड़ा और अंततः प्रेम की जीत हुई। 2 मार्च 1938 को यशपाल को रिहा कर दिया गया। यह एक स्त्री के सावित्री रूप की जीत थी। प्रेम, शक्ति बनकर समाधान बना । जेल के भीतर यशपाल ने ‘पिंजरे की उड़ान’ जैसा कहानी संग्रह लिख डाला।

मैंने अब तक जितनी संस्मरणात्मक किताबें पढ़ी हैं उनमें ज्यादातर संस्मरण, आत्मकथा या जीवनी रही हैं और मैं  हमेशा समकालीन लिखी जीवनी में कुछ समान सच्चाई ढूँढने की कोशिश करता हूँ। काशीनाथ सिंह की लिखी “याद हो कि न याद हो” या डॉक्टर तुलसी राम की लिखी  “मुर्दहिया और मणिकर्णिका” में, खासकर धूमिल को लेकर या बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के बारे किये गए उल्लेख एक समान दिखते हैं। ऐसे ही रविन्द्र कालिया की लिखी किताब ” ग़ालिब छूटी शराब” में दूधनाथ जी और इलाहाबाद का जिक्र और काशीनाथ सिंह की किताब में दूधनाथ जी का जिक्र काफी कुछ मिलता सा रहा। ये सारा कुछ एक नॉस्टेलजिया की तरह मन को स्पंदित करता रहता है।

मैंने जिस संदर्भ से सिंहावलोकन पढ़ना शुरू किया, वह थी बच्चन जी की आत्मकथा (भाग -1 ) जिसमें यशपाल और प्रकाशवती का जिक्र है।  साथ ही साथ दिल्ली में श्री कृष्ण के साथ उनकी नजदीकियाँ और बच्चन के घर पर प्रकाशवती का महीनों रुकना। पैसे की कमी के बावजूद बच्चन परिवार ने उन्हें पूरा आश्रय दिया पर मेरी आशा के विपरीत इस संस्मरण में इन सभी बातों का कोई जिक्र नहीं मिला और मेरी आँखें  इस कड़ी को जोड़ने के लिए व्यग्र थीं तो थोड़ी निराशा तो जरूर हुईं । हालाँकि श्रीकृष्ण सूरी बच्चन के संपर्क में थे जिनके यहाँ प्रकाशवती का दिल्ली में ठहरने का जिक्र दोनों संस्मरण में बराबर से है। सूरी बहनों का जिक्र भी है और धन्वंतरि का भी जिससे बाद में यशपाल की नहीं बनी ।

बच्चन और यशपाल के संस्मरण में वाक्या समान ढंग से मिलता है कि जिस दिन यशपाल को बच्चन के यहाँ ठहरना था वे सावित्री देवी, जो कि एक आइरिश महिला थीं, के यहाँ ठहरे और वहीं से पकड़े भी गए। बच्चन की आत्मकथा में प्रकाशवती को कभी प्रकाशो या रानी कहा गया है। श्री कृष्ण सूरी,  प्रकाशवती का ख्याल रखते रखते उनके प्रेम में गिरफ्त हो गए। बच्चन जब उन दोनों से मिलने जाते तो खुद को कर्कल, चम्पा और बच्चन वाली स्थिति में पाते और बच्चन को रानी, चम्पा दिखने लगी ।

बच्चन लिखते हैं, “श्री कृष्ण और रानी के साथ बैठे कभी झुटपुटे में, कभी मंद प्रकाश में, कभी अंश-चंद्र अथवा तारों की छाँह में इस बात को मैं बिल्कुल भूल जाता कि यह दिल्ली है, यह कृष्ण है, यह रानी है या यह मैं हूँ; लगता जैसे यह नाम-स्थिति हीन अधर में कोई जगह है और कर्कल ,चम्पा और मैं अपने धुएँ -धुएँ से शरीर में वहाँ मौजूद हैं -एक दूसरे की अभिन्नता का अनुभव करते, देश काल में जहाँ कहीं कुछ भी हो रहा है उससे नितांत निरपेक्ष उसकी ओर से एक दम निश्चिंत और अब लगता है सब नशा था ऐसा जादू जो उन पर अपने को आरोपित कर अपने में खो जाता था”

वे उनसे मिलने बार-बार दिल्ली जाने लगे और एक दिन प्रकाशवती को इलाहाबाद अपने घर भी ले आये। श्यामा तब जिंदा थीं और तबियत खराब होने पर भी प्रकाशवती को बहुत मान और ध्यान देती थीं। मैंने इन अजीबोगरीब रिश्तों के जालों को सुलझाने की कोशिश में दोनों आत्मकथाओं को दो बार पढ़ा और लगा जैसे यशपाल ने इस पक्ष को दबा दिया है या संभवतः प्रकाशवती ने इसका जिक्र यशपाल से नहीं किया होगा।

जिस दिन यशपाल को पकड़ा गया वे कृष्ण सूरी के घर से ही दिल्ली से इलाहाबाद आये थे और कृष्ण श्रीवास्तव ने उन्हें बच्चन के घर के बजाय आइरिश महिला के घर ठहराने का प्रबंध किया जबकि यशपाल ने बच्चन को एक किताब भिजवाई थी भेंट स्वरूप, सांकेतिक कि मैं तुम्हारे पास ठहरूँगा। कृष्ण श्रीवास्तव ने उनकी ओरिजिनल नई  पिस्टल लेकर एक पुरानी पिस्टल उन्हें दे दी। अब यह प्रश्न रह जाता है कि यशपाल के सावित्री देवी के घर में रहने की खबर किसने दी ? श्री कृष्ण सूरी प्रकाशवती से प्रेम करते थे या कृष्ण श्रीवास्तव ने ? सच चाहें जो भी हो सिंहावलोकन एक शानदार पठनीय संस्मरण है जिसमें कई  रहस्यों से पर्दा उठता है।

अंततोगत्वा यशपाल के क्रांतिकारी जीवन को देखते हुए कोई यह विश्वास नही कर सकता कि पिस्तौल और बम चलानेवाला युवक इतनी धारदार कलम भी चला सकता है। महादेवी वर्मा ने एक बार यशपाल के बारे में लिखा है –“जब यशपाल पीढ़ी के साहित्यकार सरस्वती की साधन में लगे थे तब यशपाल किसी बन्द कमरे में बैठ बम बना रहे थे और जब कई वर्ष बाद यशपाल सरस्वती के मंदिर पहुँचे तो सरस्वती का ध्यान सब से अधिक यशपाल पर हो गया” (सं- सरोज गुप्त)

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10 comments

  1. एक आत्मकथा पढ़ना एक ज़िंदगी को समझने जितना होता है। सिंहावलोकन पढ़ने का मुझे कभी मौका नहीं मिला इसलिए यशपाल जी के जीवन से रूबरू कराने के लिए आभार। एक और किताब का इतना खूबसूरत सारांश लिखने के लिए बधाई!

  2. अनिल अनल हातु

    अद्भुत लिखा यतीश भाई। आपके इस आलोचनात्मक आलेख में गजब की ईमानदारी और सच्चाई है। बहुत प्रांजल और पारदर्शी भाषा। बच्चन की आत्मकथा तो पढ़ी है ,यशपाल की अन्य पुस्तकें तो पढ़ी हैं,यह पुस्तक नहीं पढ़ी थी। यह आलेख पढ़कर इस पुस्तक को पढ़ने की इच्छा तीव्र हो गई।

  3. सिंहावलोकन मेरे पास भी है ।10 वर्ष पहले पढ़ी थी ।आपने चंद्रशेखर आजाद और सभी के बहुत महत्वपूर्ण बातों को याद दिलाया है ।हिंदी में एक से एक बेजोड़ किताबें मौजूद हैं ।बस अंग्रेजी का जो शाप स्कूल कॉलेजों पर पड़ा है, इतना अमूल्य हिंदी साहित्य कुछ दिनों के बाद कहीं दिखाई नहीं देगा और उसके अपराधी मौजूदा भारत के बुद्धिजीवी प्रोफेसर नौकरशाह होंगे जिन्होंने कभी स्कूल कॉलेजों में अपनी भाषा में पढ़ने की बात ही नहीं उठाई। अफसोस कि इन्हें शर्म भी नहीं आती।

  4. Garima Srivastava

    बहुत सी नई जानकारियां मिलीं।विश्लेषण भी रोचक है।शुक्रिया प्रभात जी

  5. बेहतरीन आलेख। सिंहावलोकन पढ़ने की इच्छा जागृत हो गयी। आभार।

  6. दुर्लभ जानकारी को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है ।

    बहुत-बहुत बधाई ।

  7. ज्योति रीता

    अद्भुत जानकारी,प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत हेतु शुक्रिया।

  8. रचना सरन

    यतीश कुमार जी ने “सिंहावलोकन ” का इतना प्रभावी दिग्दर्शन किया है कि इसे पढ़ने की तीव्र लालसा जागृत हो उठी है । समीक्षा बहुत सटीक है ; इसमें वर्णित सभी तथ्य और घटनाएं इतने स्पष्ट रूप से व्यक्त किये गये हैं कि लगता है हमने जैसे मूल कृति ही पढ़ ली है । पात्रों का ईमानदार चित्रण और तमाम घटनाक्रम बहुत सहज व सुबोध भाषा में प्रस्तुत किये गये हैं जो इसकी रोचकता को द्विगुणित कर देते हैं ।
    इस शानदार आलेख के लिए यतीश जी को साधुवाद !

  9. यतीश कुमार ने सिंहावलोकन बड़ी एकाग्रता से पढ़ी है।हमने 3 खण्डों में खरीदी थी इलाहाबाद में।में कभी आद्यन्त नहीं पढ़ पाई।
    समग्र इतिहास दिया है पुस्तक में।यह समीक्षा एक गाइड का काम करेगी

  10. Jayshree Purwar

    यतीश जी ने बहुत ध्यान से पढ़ा और विस्तार में लिखा ।नयी जानकारियाँ मिली । बधाई और शुभ कामनाएँ ।

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