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‘कोसी का घटवार’ के बहाने प्रेम पर चिंतन

प्रसिद्ध लेखक सूरज प्रकाश जी ने कुछ चर्चित कहानियों के पात्रों को लेकर एक सीरिज़ लिखी है। सबसे पहले पढ़िए शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ के अमर पात्र सैनिक नायक गुसाईं सिंह के बारे में-

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वरिष्ठ कहानीकार शेखर जोशी की एक कहानी है ‘कोसी का घटवार’। इस कहानी का पात्र एक भूतपूर्व सैनिक नायक गुसाईं सिंह है। वह फौज की पंद्रह बरस की नौकरी के बाद रिटायर होकर गांव आया है। मन बहलाने और अकेलेपन से बचने के लिए उसने कोसी नदी के किनारे पनचक्की लगा ली है। दृश्य यह है कि पहाड़ी नदी में पानी का बहाव कम है और चक्की धीमी चल रही है। तीन दिन का पिसान जमा हो गया है। वह अपनी घिसी हुई पुरानी पैंट को देखकर याद करता है कि इस पैंट ने ही उसको इतना अकेला कर दिया था। वह पैंट की चमक और शान को देख कर फौज में भर्ती हो गया था और आज तक उससे मिले अकेलेपन की सजा भुगत रहा है। वह नदी पार गांव की लछमा से प्यार करता था। दोनों ने एक साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं। लेकिन लछमा के बाप ने कहा था कि जिसके आगे-पीछे भाई-बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेश में बंदूक की नोक पर जान रखनेवाले को छोकरी कैसे दे दें हम?

वह फौज में लौट गया था और फिर रिटायर होने तक कभी भी घर नहीं आया…।

कथानक में अतीत से वर्तमान की आवाजाही दिलचस्प है। दृश्य बदलता है। नया दृश्य यह है कि एक औरत पिसान के लिए गेहूं लेकर आयी हुई है। गुसाईं पहचान लेता है कि वह तो लछमा है। वह देखता है कि लछमा विधवा होकर मायके लौट आयी है। वह बताती है कि घर में रात के लिए आटा नहीं है। वह लछमा का गेहूं सबसे पहले पिसान के लिए डाल देता है। उसके लिए चाय बनाता है। रोटी बनाना चाहता है, लेकिन लछमा उसके हाथ से

सामान लेकर खुद रोटी बनाने लगती है।

गुसाई जिंदगी में पहली बार औरत के हाथ की बनी रोटी खाता है। वह कुछ पैसे देकर लछमा की मदद करना चाहता है, लेकिन वह मना कर देती है। उसे समझ नहीं आता कि अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की कैसे मदद करे। उसके प्रति अपना पुराना प्रेम, अपनापन कैसे दर्शाए। इसी उलझन में अंदर बाहर होता रहता है। थोड़ी देर बाद वह लछमा के पिसान के आटे में अपने खुद के आटे में से दो-तीन किलो आटा डाल देता है। वह राहत महसूस करता है।

शेखर जोशी की इस बेहद खूबसूरत कहानी में कहीं पर भी प्रेम शब्द नहीं आया है। कहीं पर भी दोनों पात्रों ने आंखें नहीं मिलायी हैं। दोनों ने एक दूसरे को छुआ भी नहीं है। न ही कोई वादा किया है और न किसी किस्म की कसमें ही खायी हैं। उसके बावजूद यह प्रेम की अद्भुत कहानी लगती है।

ओशो ने कहा है कि जब आप प्रेम में होते हैं तो दरअसल आप प्रेम में नहीं होते, आप खुद प्रेम हो जाते हैं। यहां गुसाईं सिंह खुद प्रेम हो गया है। वह लछमा से शादी न कर पाने के अफसोस में खुद को सज़ा देता रहा। उसे

कभी भूल नहीं पाया और न ही किसी और से शादी करने के बारे में सोच पाया। वह धन देकर उसके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। उसे नहीं पता कि अब दोबारा दोनों का जीवन एक साथ जुड़ पाएगा या नहीं। वह इन सारी बातों के बारे में नहीं सोचता। वह यही सोचता है कि लछमा के घर में दो दिन चूल्हा चले। दरअसल लेखक की

यही सोच कहानी को कालजयी बनाती है।

आज के आपाधापी वाले जीवन में हम यह सब सोच भी नहीं सकते कि कोई अपनी भूतपूर्व प्रेमिका के लिए इतना कुछ करेगा। आज हम देखते हैं कि सोशल मीडिया पर, और खासकर फेसबुक पर सबसे ज्यादा बोला जाने वाला शब्द ‘लव’ है। यहां लोग दिन में पचास बार ‘आई लव यू’ और ‘आई लव यू टू’ बोल रहे हैं। जीवन में भी हम बार-बार ‘लव यू’ की गुहार लगाते रहते हैं। यह शब्द बेशक हजार बार बोला जाए, लेकिन इस शब्द से कोई झनझनाहट नहीं होती, कोई रोमांच नहीं होता, कोई स्मृति नहीं उभरती। ऐसी कोई भी इमेज लव’ शब्द से

नहीं बनती है।

एक वक्त था, जब प्यार शब्द कहने के लिए हमें बरसों लग जाते थे और हम यह शब्द नहीं कह पाते थे। तब प्यार शब्द के कहने-सुनने भर से दिल की धड़कन तेज हो जाया करती थी। वे सारी संवेदनाएं, भावनाएं और कोमल एहसास आजकल के लव शब्द में नहीं हैं। दरअसल तब दिल एक मंदिर’ हुआ करता था, फिर ‘दिल पागल होने लगा और आजकल ‘दिल बदतमीज हो गया है। लेकिन शेखर जोशी ने बिन कुछ कहे, बिना किसी संवाद के दोनों पात्रों के बीच में प्रेम के जिस उच्च शिखर को छुआ है, हमारी आंखें नम हो जाती हैं। हम कहानी के नायक गुसाई सिंह के साथ हो जाते हैं। हम सोचने लगते हैं कि अगर हम उसकी जगह होते, तो हम भी यही करते। अगर हम लछमा होते तो हम वही करते, जो उसने किया है।

यही दुर्लभ प्रेम है। यही जीवन का वह सबसे अनमोल एहसास है, जो जीवन को खूबसूरत बना देता है। मैं यह कतई नहीं कहना चाहता कि आज की पीढ़ी प्रेम करना नहीं जानती या यह पीढ़ी प्रेम नहीं करती है।

दरअसल इस मैकेनिकल युग में प्रेम करने के तरीके बदल गए है। आपाधापी में प्रेम से जुड़े वैसे सुखद अहसास, चिंता, रोमांच, अपनेपन की वह खूबसूरती टेक्नोलॉजी के आने से बदल चुके हैं। अब प्रेम पत्र रहे नहीं। आज के नायक के पास प्रेम प्रदर्शन के अपने तरीके है, जो व्हाट्सऐप या फेसबुक पर एसएमएस या ऑडियो-वीडियो चैट के जरिए अपनाए जा रहे हैं। बेशक, आज के प्रेमियों के पास अपने प्रेम प्रदर्शन के ज्यादा पात्र हैं और तरीके भी अधिक हैं, लेकिन सोशल मीडिया के अपने खतरे है। प्रेम में कितनी ही बार ऐसा होता है कि हम जिस दरवाजे पर खड़े होकर दस्तक दे रहे होते हैं, भीतर खबर नहीं होती। कहीं और कोई किसी बंद दरवाजे के पीछे हमारी राह देख

रहा होता है और हमें खबर नहीं होती।

जीवन में प्रेम हमेशा था और प्रेम हमेशा रहेगा। हर युवा हृदय में हमेशा प्रेम की सुगबुगाहट होती रहेगी, प्रेम शब्द आज भी किसी के दिल में घंटियां बजाता होगा। लेकिन क्या हम आज यह सोच भी सकते हैं कि कोई प्रेमी गुसाई सिंह जैसा होगा, जो बिना एक भी शब्द बोले अपने तरीके से चुपचाप भीषण अकेलेपन से लड़ते हुए भी प्रेम के इजहार का तरीका ढूंढ रहा हो। प्रेम का जो खत शेखर जोशी जी ने गुसाई सिंह और लछमा के जीवन के पन्नों पर लिखा, वह अदभुत है।

आखिर प्रेम क्या है? प्रेम की परिणति क्या है? विवाह होना या विवाह न होना प्रेम की परिणति है? दुनिया में जितनी भी बेहतरीन प्रेम कहानियां हैं, वे पति-पत्नी के प्रेम की कहानियां नहीं है। वे उन जोड़ों की कहानियां हैं, जो विवाह नहीं कर सके और किसी न किसी वजह से वे अलग रह गए। उनकी प्रेम कहानियां अमर हो गई।

एक रोचक बात है कि शेखर जी की इस कहानी का अंत नहीं है। यह खुली और पाठकीय सहभागिता

की कहानी है। पाठक जैसा चाहे उसे आगे बढ़ाए। यही खासियत शेखर जी को एक बेहतरीन कहानीकार बनाती है और इस कहानी को अमर प्रेम कहानी बना देती है।

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2 comments

  1. लगभग एक साल पहले ये कहानी पढी थी .लेखक कौन है ये भी याद नही था.आज कहानी पर सूरज जी की कलम चली तो अचानक पूरी कहानी जीवंत हो उठी पुन:’..कहानी भी पढिये ओर कहानी के सन्दर्भ मे प्रेम पर लिखा गया आलेख भी.

  2. Durgaprasad Agrawal

    सूरज प्रकाश ने ‘कोसी का घटवार’ का बहुत संवेदनशील विश्लेषण करते हुए बदलते समय में प्रेम के बदलते स्वरूप पर भी बहुत मानीखेज़ बातें कही हैं. इस बेहतरीन लेख को प्रकाशित करने के लिए जानकी पुल का आभार.

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