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मानव कौल के उपन्यास ‘अंतिमा’ की काव्यात्मक समीक्षा

मानव कौल के उपन्यास ‘अंतिमा’ की अपने खास कविताई अन्दाज़ में समीक्षा की है यतीश कुमार ने। यह उपन्यास हिंद युग्म से प्रकाशित है-
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पहली बार हिंदी में शब्दों का जादुई वितान फैंटेसी/फंतासी विनोद कुमार शुक्ल रचित ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ पढ़ी तब समझा शब्दों से जादू बिखेरना किसे कहते हैं और आज जब अंतिमा पढ़ रहा था तो मुझे फिर से ऐसा ही लगा।लगा जैसे एक अलग तरह की फंतासी के शिल्प से रू- ब-रु हो रहा हूँ। मानव कौल के शब्द मख़मली, कोमल, और मन को छूने वाले हैं।
 
मानव सपनों में तैरने वाले लेखक हैं, वो लिखते समय अपनी बनायी दुनिया में तैरते हैं और आप पढ़ते हुए उनके सपनों की दुनिया में सैर करने निकल पड़ते हैं । वे रिश्तों की मिठास से परागकण चुराते हैं आपकी जिह्वा पर एक-एक कर धरते चले जाते हैं, स्वाद और अनुभूति में तिरते उनके उपन्यास में खो जाते हैं। पढ़ते हुए लगता है गद्य स्वाभाविक रूप से कविता बन इन्द्रियों में एक लय पैदा कर देती है और फिर आहिस्ता-आहिस्ता काव्य- गंध की जुगलबंदी आपको कभी नदी में गोते लगवाती है, कभी उन्मुक्त नीलांबर में उड़ने को तो कभी घने जंगल में खो जाने,छुप जाने को बाध्य कर देती है ।
 
वर्तमान और भूतकाल के बीच के फ़्लिप-फ़्लॉप में आगे बढ़ते हुए इस उपन्यास का अपना एक ख़ास रिदम है, एक सूफ़ी संगीत, जिसकी थिरकन भीतर हृदय तल में आपको महसूस होगी।अलौकिक संसार बुनते हैं मानव कौल और पहले उपन्यास में ही ऐसा जादू चलाया है जैसे नयी वसंत की धानी खलिहान से आती सोंधी हवा बह रही हो। प्रेम की डाल पर नहीं बैठते जड़ तक जाते हैं, प्रेम पेड़ की तरह ही विस्तार पाता है, प्रस्फुटन से फलों के आने तक का विस्तार। आप उनकी पंक्तियों की शिराओं पर बैठे- बैठे जटिल रिश्तों की गम्भीरता को बड़ी सरलता से समझते हैं ।
 
आदम की भावनाओं का अबूझ,अनसुलझा जाल समझना, समेटना, और सहेजना इतना आसान नहीं पर लेखक अपने कथ्य, शिल्प, और शब्दों की जादूगरी से एक मधुर संगीत पैदा करने में सक्षम हुआ है जो इन मकड़जालों को बड़ी आसानी से आपके सामने सुलझाता है और उन पंक्तियों के धागों का गोला तैयार करता है जिसे नए सिरे से बुनकर पैरहन बनाता है । किताब पढ़ने के बाद आप भी उसे पहन लेते हैं। किताब आपकी उतनी ही हो जाती है जितनी लेखक की थी यह जुड़ाव का जादू है जो पाठक और लेखक को संवेदनाओं के धरातल पर एकमय कर देता है।
 
इसे पढ़ते हुए उपजी कुलबुलाहट को अपनी कविताई में समेटने की कोशिश की है मैंने जो अब आपकी है :
 
1.
 
मुझे तिड़कना सुनाई पड़ता है
दर्द का सहना सुनाई पड़ता है
 
खुद के खर्च हो जाने के डर से
बचपन की चवन्नी बचाए फिरता हूँ
 
गुज़रते धड़कते पुल पर एक दिन
वही चवन्नी उछालता हूँ
ट्रेन का धकधकाना नहीं सुन पाता
भीतर साँकल खुलने की आवाज़ सुनता हूँ
 
टालना तो एक फ़ॉर्म्युला है
सुख को टालने का मन नहीं
और दुःख टाला जाता नहीं
 
जीवन और मृत्यु
दोनों को टालना
किसी के वश में नहीं
 
2.
 
एक खुला अनंत है
ठीक सामने!
और हम चौखट पर
सर नवाए बैठे हैं
 
“उसे उड़ने की भूख है
और पिंजड़े में खाना रखा है .”
 
गिरने से उसे डर लगता है
शब्दों का सहारा खोजता है
असल में बिना शब्दों के
वह तीन टांग का स्टूल है
 
संवाद के तहख़ाने में
कीमती वक़्त की क़ब्रें हैं
और वो कब्र की मिट्टी
अपने पेड़ों की जड़ों में डालता है
 
उन्हीं पेड़ों के नीचे
संवाद की छाया टहल रही है
पर छाया ज़रूरी नहीं
कि हमेशा डरावनी ही हो
 
डर से भी कभी बतियाना चाहिए
डर भी आप- सा दयनीय हो सकता है
 
3.
 
अच्छे संवादों को ढूँढ़ने में
पल नाराज़ होते हैं
उन पलों को जब ढूँढ़ता हूँ
तो आज नाराज़ हो जाता है
 
नाराज़गी एक मास्क है
चेहरे से चिपक गयी है
वज़ूद खुद छुप गया है
और अक्स भी लापता है
 
सच आज का सूरज है
आनेवाला दिन कार की हेडलाइट
और भविष्य की मीनारों की नींव
पाँव के साथ लापता है
 
अकस्मात् की तैयारी नहीं होती
पर मृत्यु एक अकस्मात् क्षण है
फिर भी मानुस मासूम मुँह लिए
क्षणभंगुर बना घूम रहा है
 
4.
 
हमारे-तुम्हारे संवाद के बीच
दो दीवारें उल्टे मुँह खड़ी हैं
बीच में है तो बस निर्वात
और मैं भेदने की इच्छा से चूक गया हूँ
 
चुप्पा बन उसने फ़ोन किया
और फिर काट दिया
उसे अब मैं नहीं जानता
उसकी चुप्पी को पहचानता हूँ
 
ऐसा होता है अक्सर
कुछ बोल देता हूँ
फिर लंबे अंतराल तक नुकीली चुप्पी बोलती है
और मन ग़ुबारों का ग़ुब्बारा होता चला जाता है
 
फ़ोन पर मानो
अनगिनत सिसकियाँ चिपकी पड़ी हैं
हूक मेरे मुँह का सीवन है
और मैं अबोले हेलो का ग़ुबार लिए बैठा हूँ
 
 
5.
 
सोचा तुम्हें कह दूँ
थोड़ी देर को ठहर जाते हैं
पर रास्ता चौराहे में बदल गया
हताशा वहीं कोने में खड़ी मिली
 
मौन का घेरा यूँ खिसक आया
कि संवाद ज़ुबान पर फिसलने लगें
चेहरा अब घंटी खोया हुआ घंटा है
जिसके पास बस अनुरणन की एक लय बची है
 
टोह अविश्वास का बढ़ा हुआ हाथ है
जिसमें काँटे उगे हैं
मैं नागफनी के फूल की तलाश में
हर बार खरोंचा जाता हूँ
 
एक शीशमहल-सा सपना है
ख़ुद पत्थरों से खेलता हूँ
सपने और यथार्थ की बनती क्यों नहीं
अब मेरे हथेली में बस तिड़कन है
 
6.
 
सीपियों की कहानी है लिखनी उसे
पर लहरों से वह डरता है
लिखने और जीने में फर्क है
और वह दूरी मिटाने का कातिब है
 
मैं चल कम रहा हूँ
बह ज़्यादा रहा हूँ
टहलता धीमे हूँ सवालों के बोझ लिए
कि जवाब कहीं पड़ा मिल ही जाये
 
जब समय ठहर जाता है
शब्दों के पैरहन ओढ़ता है
लिखे की आँच सेकता है
धड़ी फिर से टिक-टिक करती है
 
दालचीनी की ख़ुशबू फिर से बिखरेगी
और `छाया मत छूना मन’ कहेगा वह एक दिन
भीतर और बाहर क़िस्से का पौधा उगता है
जबकि कहानियों का बरगद बनाना है उसे
 
7.
 
बुख़ारी जल रही है
ख़ालीपन कोरेपन से बातें कर रहा है
पर तुम आईं
तो धूप शाम में बदल गयी
 
बच्चे सी शरारत है भीतर
और जब तुम्हें सोचता हूँ
तो और बच्चा-सा हो जाता हूँ
 
सपनों की पेंटिंग बनाता हूँ
बड़ी ऊँचाई से गिराकर
चकनाचूर कर देता हूँ
 
दूरबीन से उसके टुकड़े देखता हूँ
पहचानने की कोशिश करता हूँ
कि वह सुख है या दुःख !
 
कराहते सपनों की कहानी लिखता हूँ
फिर सोचता हूँ
लिखने और जीने के बीच का फ़ासला
घट रहा है कि नहीं
 
8.
 
वह उससे बात कर रहा है
मानो मूर्ति बना रहा हो
तल्लीनता आदम को
कितना खूबसूरत बनाती है
 
वह पलट कर देखती है
तो आइना बन जाती है
अपना चेहरा देखता हूँ
जिसे पहचानने से इनकार है मुझे
 
घिसा हुआ काग़ज़ है कोरापन
रबड़ की छाया पसर रही है
खरोंचों की खुरचन उभर आयी है
वो काग़ज़ दरअसल मेरे अंतस का प्रतिबिम्ब है
 
बूढ़े चेहरे पर जवान आँखें
भ्रम नहीं हो सकतीं?
भीतर का बच्चा भी दुत्कार रहा है
कहता है तुम्हारी आँखें बस प्रश्न हैं ?
 
9.
 
शून्य हमेशा धरातल पर ले जाता है
अभी लिफ़्ट के बटन दबाते हुए मैंने कहा
 
एक गीली आशा ने डुबाया उसे
ज़ेहन गीला है
इंतज़ार उसकी धूप है
और उसे अपने सूखने का इंतज़ार
 
कहानी अब बाज़ार में है
कतरनें बची हैं बस
छिपाकर रखी कतरनों की कहानी
अब मेरा हासिल है
 
सपनों और स्मृतियों के झूले में झूलता हूँ
कतरनों से बना पैरहन पहनता हूँ
एक नयी कहानी को जामा पहनाता हूँ
जिससे दालचीनी की ख़ुशबू फिर से आती है।
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13 comments

  1. समीक्षा से आभास हो रहा है कि आपने एक अच्छी प्रेमकहानी पढ़ ली है।उच्छवास की स्थिति में काव्य रचना की है।आपकी शिद्दत की तारीफ पर पहले उपन्यास पढ़ना पड़ेगा।कहाँ से आया है

  2. आप बहुत अच्छी समीक्षा लिखते हैं। आपके लेखन में उदारता एवं ईमानदारी दोनों है। कोई लेखक किसी अन्य की कृति की उन्मुक्त भाव से प्रशंसा नहीं करता है। आपकी भाषा में अद्भुत प्रवाह है। बधाई।

  3. निगम राज़

    बहुत सुंदर समीक्षा

  4. एक नई तरह की समीक्षा पढ़ने को मिली। जिस पुस्तक को पढ़ने के बाद इतनी अच्छी कविता बन सकती है तो निश्चित ही पुस्तक बेहतरीन होगी। सुन्दर और नायाब समीक्षा ।हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ 💐 💐

  5. किरण सिंह

    एक नई तरह की समीक्षा पढ़ने को मिली। जिस पुस्तक को पढ़ने के बाद इतनी अच्छी कविता बन सकती है तो निश्चित ही पुस्तक बेहतरीन होगी। सुन्दर और नायाब समीक्षा ।हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ 💐 💐

  6. राकेशरेणु

    एक उपन्यास पढ़कर इतनी कविताएँ ! उपन्यास पढ़ने के लिए विवश कर रहे हैं आप ।

  7. राकेशरेणु

    एक उपन्यास पढ़कर इतनी कविताएँ ! उपन्यास पढ़ने के लिए विवश कर रहे हैं आप ।कविता में समीक्षा नायाब विचार है लेकिन इससे उपन्यास के साथ न्याय हो पाता है क्या ?

  8. आप जिस तल्लीनता से जो पढ़ते हैं,
    उसकी खूबसूरत चीजों को अपनी सहजता,सरलता से
    शब्दों में उकेर देते हैं.
    यह लगता सरल है पर है नहीं
    आप अपने शब्दों प्रतीकों के माध्यम से इसे सहज और
    पठनीय बना देते हैं.
    अद्भुत समीक्षा
    शुभकामनाएं

  9. अद्भुत समीक्षा

  10. फिर से एक नयी किताब की खुशबू, फिर से एक नयी काव्यात्मक समीक्षा। मैं मानव कौल को एक अच्छे अभिनेता के तौर पर जानता हूँ, एक लेखक के तौर पर उनका मुझसे ये पहला परिचय है, उनको बहुत बधाई। अभी किताब नहीं पढ़ी है पर जब समय मिलेगा तो ज़रूर पढूंगा।
    अब रही बात समीक्षा की- हर बार की तरह इस बार भी किताब पर कवितायेँ हैं या ये कवितायेँ ही एक किताब है, कहना मुश्किल है 🙂
    जो बहुत गहरी लगीं वो यहाँ लिख रहा हूँ-

    “उसे उड़ने की भूख है
    और पिंजड़े में खाना रखा है .”

    “डर से भी कभी बतियाना चाहिए
    डर भी आप- सा दयनीय हो सकता है”

    “अकस्मात् की तैयारी नहीं होती
    पर मृत्यु एक अकस्मात् क्षण है”

    “शून्य हमेशा धरातल पर ले जाता है
    अभी लिफ़्ट के बटन दबाते हुए मैंने कहा”

    हार्दिक बधाई मानव को और यतीश आपको और इस साहित्यिक यात्रा में अगर मेरी स्नेहिल शुभकामनाएँ कुछ काम आ सके तो वही भेज रहा हूँ!

  11. आपके लेखनी की धार नित्य निरंतर तीक्ष्ण होती जा रही है जितनी बार साक्षात्कार होता है एक नयी समीक्षा के साथ मैं सोचने लगती हूँ आपके हृदय में भावों का एक फलदार बारहमासी वृक्ष है जिसपर सदैव उगने और पकने की प्रक्रिया जारी है। जैसे ही आप किसी किताब को पढ़ते हैं उसके स्पंदन से भरभरा जाते हैं भाव के सारे पके फल । कविताएं बिखर जाती हैं स्वत:।
    बहुत सुंदर सार्थक समीक्षा।

  12. आपके लेखनी की धार नित्य निरंतर तीक्ष्ण होती जा रही है जितनी बार साक्षात्कार होता है एक नयी समीक्षा के साथ मैं सोचने लगती हूँ आपके हृदय में भावों का एक फलदार बारहमासी वृक्ष है जिसपर सदैव उगने और पकने की प्रक्रिया जारी है। जैसे ही आप किसी किताब को पढ़ते हैं उसके स्पंदन से भरभरा जाते हैं भाव के सारे पके फल । कविताएं बिखर जाती हैं स्वत:।

  13. खुद के खर्च हो जाने के डर से
    बचपन की चवन्नी बचाए फिरता हूँ

    टालना तो एक फ़ॉर्म्युला है
    सुख को टालने का मन नहीं
    और दुःख टाला जाता नहीं

    उसे उड़ने की भूख है
    और पिंजड़े में खाना रखा है
     
    असल में बिना शब्दों के
    वह तीन टांग का स्टूल है

    अकस्मात् की तैयारी नहीं होती
    पर मृत्यु एक अकस्मात् क्षण है
    फिर भी मानुस मासूम मुँह लिए
    क्षणभंगुर बना घूम रहा है

     
    हमारे-तुम्हारे संवाद के बीच
    दो दीवारें उल्टे मुँह खड़ी हैं
    बीच में है तो बस निर्वात
    और मैं भेदने की इच्छा से चूक गया हूँ

    मैं चल कम रहा हूँ
    बह ज़्यादा रहा हूँ
    टहलता धीमे हूँ सवालों के बोझ लिए
    कि जवाब कहीं पड़ा मिल ही जाये

    बूढ़े चेहरे पर जवान आँखें
    भ्रम नहीं हो सकतीं?
    भीतर का बच्चा भी दुत्कार रहा है
    कहता है तुम्हारी आँखें बस प्रश्न हैं ?

     शून्य हमेशा धरातल पर ले जाता है
    अभी लिफ़्ट के बटन दबाते हुए मैंने कहा

    एक गीली आशा ने डुबाया उसे
    ज़ेहन गीला है

    इंतज़ार उसकी धूप है
    और उसे अपने सूखने का इंतज़ार

    कितना कुछ है इस समीक्षा में सहेजने के लिए … बहुत ही खूबसूरत भाई जी

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