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ऐसी-कैसी औरत है जिसका होना इतना सुंदर है!

अनुकृति उपाध्याय का पहला उपन्यास ‘नीना आँटी’ जब से आया है उसकी चर्चा लगातार बनी रही है। राजपाल एंड़ संज से प्रकाशित इस उपन्यास पर युवा लेखिका प्रदीपिका सारस्वत की टिप्पणी पढ़िए-

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किसी सिनेमा, कहानी या कई बार किसी तस्वीर के पात्र को देखकर ऐसा लगता है न कि आप उसे जानते हो. कब, कैसे, कितना ये कहा नहीं जा सकता. पर आपका ज़हन उस पात्र से मिल चुका होता है. शायद किसी आकांक्षा में, किसी स्वप्न में, किसी व्यक्ति में, किसी दूसरी किताब में या फिर शायद अपने ही अंतर्मन के किसी अमूर्त हिस्से में. नीना आँटी वैसी ही लगीं मुझे.

अनुकृति को पढ़ना मुझे प्रिय है. पर किताब पढ़ते वक्त हम क्या अनुभव करेंगे, वह किताब के साथ-साथ हमारी मनस्थिति और हमारे वातावरण पर भी बहुत निर्भर करता है. मुझे याद नहीं कि गौरा पंत के बाद कब मैंने किसी लेखिका को ऐसे पढ़ा था कि मैं उसकी रची दुनिया में सदेह भीतर चली गई होऊं. गौरा पंत को मैंने बचपन के दिनों में पढ़ा. स्कूल की छुट्टियों में, 13-14 की स्वप्नमयी वय में. मुझे अब भी तिला की ठोड़ी का वह सुचिक्कन तिल ऐसे याद है जैसे वो तिल मेरी माँ की ठोड़ी पर था. मुझे माँ याद नहीं पर न जाने क्यों मैं सोचती हूँ कि शायद उसकी ठोड़ी तिला की ठोड़ी जैसी होती.

शिवानी की कहानियाँ अब मुझे याद नहीं, पर उनमें बसी एक नर्म सी गर्माहट अब भी कभी-कभी कोई किताब उठाते हुए ऐसे याद आती है जैसे गाँव के पुश्तैनी मकान का वो पुराना, अंधेरा कमरा जहां घर-भर का कबाड़ और पिछली दो पीढ़ियों की पुरानी किताबें भरी होती थीं.

कल न जाने क्या सोचकर मैंने अनुकृति की यह उपन्यासिका उठा ली. गुलाबों का अर्क निकालती उस सुंदर, सुलझी, सुभाषिणी औरत से मिली तो मैं वापस उसी पुराने कमरे में पहुँच गई जहाँ गर्मी की दोपहरों में मैंने न जाने कितनी किताबें पढ़ डाली थीं. कैशोर्य के दिनों का सा इतना हल्कापन, इतनी उजली उत्सुकता इन बीते पंद्रह सालों के बाद कैसे संभव हुई, किताब को बीच में छोड़ शाम को टहलते वक्त मैं सोचती रही.

उस उम्र में किताबें पढ़ने के अनुभव इस उम्र से बहुत अलग रहा है. तब किताबें पढ़ते हुए मैं खो जाया करती थी. उन दिनों किताबें पढ़ने का कोई मक़सद नहीं हुआ करता था, सिवाय खो जाने के. पर इन पिछले सालों में पढ़ना भी मैला हुआ है. किताबें चुनते वक्त दिमाग फ़ैसले लेने लगा कि किस लेखक को पढ़ना मेरे लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा, किस विषय पर पढ़ने से मेरा आकाश थोड़ा और विस्तृत होगा. और फिर पढ़ते वक्त भी जैसे कोई सर पर सवार रहता. ज़्यादा से ज़्यादा समझ लेने की इच्छा ने पढ़ने की नैसर्गिकता छीन ली.

फिर कल नीना आँटी मिलीं. भीड़ भरे घर की छत पर शेक्सपियर पढ़ती हुई. नैसर्गिकता का मूर्त रूप. यह विश्वास जगाता और दृढ़ करता हुआ एक व्यक्ति कि तुम जो हो, जैसे हो उनके पास जा सकते हो, अपने पास जा सकते हो. पढ़ते वक्त में सोचती रही कि काश मेरे पास भी एक नीना आँटी होतीं, काश हर लड़की-हर लड़के के पास एक नीना आँटी होतीं.

पर थोड़ा और देर नीना आँटी के पास ठहरने के बाद समझ आया कि इस किताब का तुम्हारे पास होना नीना आँटी का तुम्हारे जीवन में होना ही तो है. न जाने कितने लोगों को अनुकृति को शुक्रिया कहना होगा इस किताब, इस पात्र के लिए.

आप उत्सुक हो उठे होंगे यह जानने के लिए कि ये नीना आँटी ऐसी-कैसी औरत है जिसका होना इतना सुंदर है. पर मैं सोचती रही कि उस औरत को कैसे गढ़ा जा सका होगा, क्यों वह इतनी जानी-पहचानी है और क्यों इतनी प्रिय? पिछले दिनों में कई सुंदर स्त्रियों के बारे में सोचती रही हूँ, उनके जीवन के बारे में सोचती रही हूँ. सुंदर यानी सत्य यानी शुभ. वे स्त्रियाँ जो अपने सत्य को जान रही हैं. वे जो शुभ हैं, शुभ चाहती हैं. सत्य, सुंदरता और शुभ आडंबर में संभव नहीं. वे स्त्रियाँ जो आडंबर से रिक्त हो रही हैं, मुक्त हो रही हैं. मुक्त हो रही, इन्हीं सुंदर स्त्रियों में मैं नीना आँटी से मिली हूँ. इसीलिए नीना आँटी इतनी परिचित लगीं. और ऐसी ही किसी स्त्री के लिए नीना आँटी को काग़ज़ पर उतार सकना संभव था.

शिवानी से लेकर अनुकृति तक की औरतों को देखने के बाद भीतर की पाठक को एक सुंदर संतुष्टि मिलती है. कि स्त्री ने बढ़ती छुद्रताओं और उथलेपन के इस समय में, अपने तमाम संघर्ष के बाद भी अपनी सुंदरता, अपनी स्थिरता नहीं खोई है. वह सबकुछ देखते हुए, जो सही है वैसा करते हुए, मुस्कुरा रही है. वह चोटिल होती है पर किसी चोट को वह अपने अस्तित्व पर ओढ़ नहीं लेती. न उसमें किसी की दया के लिए कोई जगह है, न किसी के प्रति कोई कटुता. चंद्रकांता और मन्नू भंडारी की स्त्रियों में मैंने यह शुभता नहीं देखी. उनकी कहानियों में और बहुत कुछ है. मेरे भीतर का पाठक उन कहानियों को सराहता है, पर मेरे भीतर का व्यक्ति अनुकृति की स्त्री पर मोहित भी होता है और नतमस्तक भी.

प्रदीपिका सारस्वत

कुछ किताबों की समीक्षा नहीं की जानी चाहिए, उन्हें सिर्फ अनुभव किया जाना चाहिए. कुछ किताबें सतह से नीचे जाकर पढ़ने के लिए लिखी गई होती हैं. और नीना आँटी एक किताब नहीं, एक अनुभव है, एक व्यक्ति है, जिससे मिलना शुभ और बहुत सुंदर है.

 

 

 

 

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One comment

  1. Alok Kumar Mishra

    खूबसूरत टिप्पणी, नीना आँटी इसी भाव से पढ़े जाने की हकदार है। साधुवाद

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