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हिंदी बाल साहित्य का इतिहास: प्रकाश मनु

आज बाल दिवस है। इस मौक़े पर पढ़िए वरिष्ठ लेखक प्रकाश मनु का यह लेख। प्रकाश जी ने हिंदी बाल साहित्य का इतिहास भी लिखा है-

हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना मेरे लिए किसी तपस्या से कम न था

प्रकाश मनु

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हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना था। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते बहुत अधिक विस्तीर्ण और व्यापक हो चुके हिंदी बाल साहित्य का यह पहला इतिहास है। एक बृहत् इतिहास, जिसे लिखने में मेरे जीवन के कोई बीस-बाईस वर्ष लगे। पर एक धुन थी, एक बहुत गहरी-गहरी सी धुन—कृष्ण के अलौकिक वंशीनाद सी, जिसने इस काम में एक के बाद एक आती गई सैकड़ों बाधाओं के बावजूद, मुझे इस काम से विरत नहीं होने दिया। शायद इसलिए कि यह न सिर्फ मेरे जीवन का बड़ा सपना था, बल्कि हिंदी बाल साहित्य के सैकड़ों लेखकों का भी सपना था कि हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखा जाए, जिसमें पिछले कोई सवा सौ वर्षों में लिखी गई बाल साहित्य की बहुविध रचनाओँ की सम्मानपूर्वक चर्चा हो, और अलग-अलग कालखंडों की जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, प्रतिनिधि और पूरे बाल साहित्य की धारा को सार्थक मोड़ देने वाली कालजयी रचनाएँ हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से रेखांकित किया जाए। बल्कि उन्हें केंद्र में रखकर ही यह समूचा इतिहास लेखन हो।

इस इतिहास-ग्रंथ की भूमिका में मैंने अपने मन की उन भावदशाओं का वर्णन किया है, जिनसे इतिहास लिखने की प्रक्रिया में मुझे गुजरना पड़ा। पर इसके बावजूद इस कार्य के पूरा होने का अहसास इतना आनंदपूर्ण और सुखदायी था कि मैं अपने सारे कष्ट भूल गया। याद रहा तो बस, इतना ही कि बरसोंबरस की रात-दिन की मेहनत से आखिर यह यज्ञ संपन्न हुआ। इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ की भूमिका की प्रारंभिक सतरें कुछ इस तरह हैं—

“इक्कीसवीं सदी हिंदी बाल साहित्य के बहुमुखी विकास और चरम उत्कर्ष की सदी है, जब कि उसकी प्रायः हर विधा में लीक को तोड़ता हुआ नया निराला साहित्य लिखा जा रहा है और संभावनाओं के असंख्य नए द्वार खुल गए हैं। कोई सवा सौ बरसों से निरंतर अपनी जीवंत उपस्थिति का अहसास कराता हिंदी बाल साहित्य का कारवाँ इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे शतक में अप्रत्याशित सक्रियता और धमक के साथ अपनी मौजूदगी साबित कर रहा है। यहाँ तक कि ज्ञान का भारी-भरकम टोकरा उठाए हिंदी साहित्य के बहुत से विद्वान जो अभी तक बाल साहित्य की विकास-धारा, जीवंत हलचलों और गूँजों-अनुगूँजों को जान-बूझकर अनसुना करते रहे, अब अपनी गलती स्वीकार कर रहे हैं और बाल साहित्य की अजस्र सृजनात्मकता, सक्रिय ऊर्जा और जिजीविषा को समझने की कोशिश कर रहे हैं।…

“मेरे लिए यह खुशी और राहत की बात है कि जिस बाल साहित्य के इतिहास लेखन के लिए मैं पिछले दो-ढाई दशकों से निरंतर खट रहा था, उसकी पूर्णाहुति ऐसे सुखद काल में हुई, जब बाल साहित्य की दमदार उपस्थिति पर कोई सवाल नहीं उठाता। बाल साहित्य की यह विकास-यात्रा बड़े-बड़े बीहड़ों से निकलकर आई और अब एक प्रसन्न उजास हमें चारों ओर दिखाई देता है। बेशक यह यात्रांत नहीं है। होना चाहिए भी नहीं। अभी तो एक से एक बड़ी चुनौतियाँ बाल साहित्य के आगे मुँह बाए खड़ी हैं। संभावनाओं के नए से नए पुष्पद्वार भी। पर इतना सच है कि बाल साहित्य ने अपना ‘होना’ साबित कर दिया है। अब पहले की तरह कोई भी ऐरा-गैरा मुँह उठाकर सवाल नहीं दाग देता कि क्या हिंदी में भी बाल साहित्य है?…”

यह एक यज्ञ के पूर्ण होने की खुशी थी। मेरा बहुत लंबा और बीहड़ वाङ्मय तप सफल हुआ था। पर यह कोई आसान काम न था। मेरे लिए तो यह जीवन भर की तपस्या ही थी, जिसमें मैं तन, मन, धन से जुटा था। कुछ इस कदर तन्मयता से, कि देह का भी होश न था। बस, सामने एक पहाड़ है, यह नजर आता था। पिछले सौ-सवा सौ सालों में हिंदी बाल साहित्य की प्राय सभी विधाओं में इतना काम हुआ है, कि उस सब को एक ग्रंथ में समेटना किसी पहाड़ को उठा लेने से कम न था। कई बार लगता था कि काम इतना बड़ा है कि मेरे इस जीवन में तो पूरा न होगा, और मैं इसके बोझ के नीचे दब जाऊँगा। पर सौभाग्य से मेरी पत्नी सुनीता जी ने किसी आत्मीय दोस्त की तरह हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया। सुख-दुख में वे चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ी रहीं। कुछ मित्रों ने भी समय-समय पर सामग्री जुटाने में मेरी मदद की, और निरंतर प्रीतिकर चर्चाओं से मेरे आत्मविश्वास को सँभाले रखा।

आज याद करता हूँ तो आँखें फैलती हैं। कोई सौ से ज्यादा प्रारूप इस इतिहास-ग्रंथ के बने। आज यह बात कहना-सुनना आसान है, पर उसे समझ पाना उतना ही मुश्किल। इसलिए कि कोई एक प्रारूप बनाने में ही छह-आठ महीने लग जाते। फिर प्रिंट लेने पर हमेशा कुछ न कुछ नया जुड़ जाता, और यह इतिहास-ग्रंथ बहुत अधिक फैल न जाए, इसलिए बहुत कुछ नए सिरे से संपादित भी होता। कई बार तो पूरा का पूरा प्रारूप ही बदल जाता, और नई दृष्टि से फिर से काम शुरू करना पड़ता। बाल साहित्य के सैकड़ों दुर्लभ ग्रंथों की खोज तो साथ ही साथ चल रही थी। वे मिलते तो फिर से एक नई और व्यापक दृष्टि से पूरी सामग्री को संपादित करना आवश्यक हो जाता। कई बार तो चीजों को बिल्कुल नए सिरे से लिखना पड़ता।

मेरे लिए तो यह एक तप ही था। जीवन भर का तप। इसे आप वाङ्मय तप कह सकते हैं। पर जब यह बृहत् इतिहास-ग्रंथ सामने आया तो पूरे बाल साहित्य जगत ने जिस तुमुल उत्साह से इसका स्वागत किया, उसने जैसे मेरी सारी थकान को धो डाला। मेरे लिए यह अकल्पनीय है। अद्भुत! अपूर्व…!!

मेरे जीवन के ये सर्वाधिक यादगार पल थे। बाल साहित्यकारों के इतने उत्साह भरे पत्र मुझे मिले कि लगा, यह तप अकारथ नहीं गया। अब जबकि इसका पहला संस्करण लगभग समाप्ति की ओर है, हिंदी का शायद ही कोई महत्त्वपूर्ण बाल साहित्यकार, या फिर बाल साहित्य का अध्येता हो, जिसके पास बाल साहित्य का यह गौरव ग्रंथ न हो। बाल साहित्य के शोधार्थियों के लिए तो यह सर्वाधिक प्रतिनिधि और प्रामाणिक आधार सामग्री के रूप में, एक बड़ा विश्वसनीय ज्ञान-स्रोत बन गया। और उन साहित्यकारों या साहित्य के अध्येताओं से हुई उत्साहपूर्ण फोन-चर्चाओँ की बात करूँ तो शायद कई पन्ने भर जाएँगे।

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अब मुझे इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ की रचना-प्रक्रिया की भी कुछ बात करनी चाहिए। इस लिहाज से सबसे पहले मैं यह स्वीकार करूँगा कि निश्चित रूप से मेरे इतिहास लेखन के पीछे ‘नंदन’ पत्रिका की बड़ी भूमिका और योगदान है। अगर मैं ‘नंदन’ पत्रिका से न जुड़ा होता, क्या तब भी मेरे मन में इतिहास लेखन का सपना उत्पन्न होता, और वह होते-होते इतना महत्त्वपूर्ण हो जाता कि मैं इस तरह बरसोंबरस तक जुटे रहकर इस इतिहास-ग्रंथ को आकार दे पाना। मेरे लिए कह पाना कठिन है। इस इतिहास-ग्रंथ के लिखे जाने के भगीरथ प्रयत्न में ‘नंदन’ पत्रिका का योगदान बेशक बड़ा है, और इतना ही ‘नंदन’ के उत्साही संपादक भारती जी का भी, जिनके मन में बच्चों और बाल साहित्य के लिए अपरंपार प्रेम था। वे बार-बार मुझसे कहते थे, “चंद्रप्रकाश जी, हिंदी बाल साहित्य में अच्छे संदर्भ ग्रंथ नहीं हैं। और जिस साहित्य में अच्छे संदर्भ ग्रंथ न हों, उसका सम्मान नहीं होता!”

कई बार वे मुझे अपने पास बैठाकर कहते, “चंद्रप्रकाश जी, कविता, कहानी तो सब लोग लिख लेते हैं। पर कोई अच्छा और बड़ा संदर्भ ग्रंथ तैयार करने में बहुत समय और श्रम लगता है। इसलिए कोई इधर आना नहीं चाहता।”

उनकी बातें सुनकर मेरे भीतर एक सुगबुहाहट सी पैदा हो जाती, और मैं अपने पंख तोलने लगता। मन ही मन अपने आप से कहता, ‘जो काम कोई और नहीं कर सका, उसे तुम क्यों नहीं करते प्रकाश मनु? आगे बढ़ो और करो…!’ और मैं महसूस करता कि अपनी उत्तेजना को सँभालने में मुझे बहुत शक्ति लगानी पड़ रही है।

निस्संदेह बाल पत्रिका ‘नंदन’ से जुड़ने पर ही मुझे पता चला कि बाल साहित्य का विस्तार कितनी दूर-दूर तक है। साथ ही उसमें बचपन की ऐसी खूबसूरत बहुरंगी छवियाँ हैं, कि उनका आनंद लेने के लिए आप फिर से बच्चा बन जाना चाहते हैं।… ‘नंदन’ में काम करते हुए जब भी मुझे फुर्सत मिलती, मैं पत्रिका की पुरानी फाइलें उठा लेता और पढ़ने लगता। मुझे यह बड़ा आनंददायक लगता था। इसलिए कि उन्हें पढ़ते हुए बरसों पहले ‘नंदन’ में छपे रचनाकारों से मेरी बड़ी जीवंत मुलाकात हो जाती और मैं अभिभूत हो उठता।…फिर ‘नंदन’ के शुरुआती अंक देखे तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। उनमें ऐसा अपूर्व खजाना था कि मैं झूम उठा। वहाँ अमृललाल नागर के ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी-नौरंगी’ ऐसे जबरदस्त उपन्यास थे कि पढ़ते हुए मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच गया। जैसे मैं बाल पत्रिका का सहयोगी संपादक नहीं, एक छोटा, बहुत छोटा सा बच्चा हूँ, जो नागर जी के उपन्यास के नायक बजरंगी पहलवान के साथ ही दुश्मन के किले में जा धमका हैं, और दुश्मन की सेना को बुरी तरह तहस-नहस करने में जुट गया हूँ। अद्भुत थे वे भावोत्तेजना के पल! मैं कैसे कहूँ, शब्द साथ नहीं देते।

इसी तरह ‘नंदन’ के प्रारंभिक अंकों में छपी कमलेश्वर की ‘होताम के कारनामे’ एक विलक्षण कहानी थी। उसमें पुराने जमाने के चमत्कारी होताम को नए जमाने के माहौल में इस कदर हैरान-परेशान और ठिठका हुआ सा दिखाया गया था, कि उस महाबली होताम की बेचारगी पर हँसी आती थी। मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘आओ करें चाँद की सैर’ भी ऐसा ही अद्भुत था। यहाँ तक कि राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और मोहन राकेश की बड़ी दिलचस्प कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। मोहन राकेश ने बच्चों के लिए कुल चार कहानियाँ लिखी हैं, और वे चारों आपको ‘नंदन’ के पुराने अंकों में मिल जाएँगी। हरिशंकर परसाई, वृंदावनलाल वर्मा, रघुवीर सहाय, सबने बच्चों के लिए लिखा और जमकर लिखा। इनकी रचनाएँ मुझे ‘नंदन’ के पुराने अंकों में पढ़ने को मिलीं।

मैं अकसर सुना करता था कि हिंदी में बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए नहीं लिखा, पर यह तो उलटा ही मामला था। यानी मैं देखता कि भला कौन बड़ा साहित्यकार है जिसने बच्चों के लिए नहीं लिखा!…यह एक विलक्षण चीज थी मेरे लिए। मुझे लगता, यह बात तो किसी को पता ही नहीं। तो किसी न किसी को तो यह सब लिखना चाहिए। इसी संकल्प के साथ मैंने बाल साहित्य पर विस्तृत लेख लिखने शुरू किए जिनमें इन सारी बातों का जिक्र होता। ये ऐसे लेख थे, जिनमें कई महीनों का लंबा श्रम होता, पर उनमें बहुत कुछ ऐसा होता जो बहुतों को ज्ञात न होता। यहाँ तक कि बहुत सारे जाने-माने बाल साहित्य अध्येता और दिग्गज साहित्यकार भी उनसे अवगत न होते। वे मुझसे इन नए और अभी तक अनुपलब्ध रहे तथ्यों के स्रोत के बारे में पूछते, और विस्मय प्रकट करते।

धीरे-धीरे मुझे लगा कि हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने के लिए जमीन खुद-ब-खुद तैयार हो गई है और फिर मैं इस काम में जुट गया। तो इसमें शक नहीं, कि मैं ‘नंदन’ में था, इस कारण हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिख पाया। नहीं तो शायद मेरे लिए इतना बड़ा काम कर पाना कतई संभव न हो पाता। बेशक हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में बहुत लंबा वक्त लगा, और यह मेरे ‘नंदन’ से मुक्त होने के कोई आठ बरसों बाद आया। हालाँकि इस इतिहास की ही एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में मेरा लिखा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ तो सन् 2003 में ही मेधा बुक्स से बड़े सुंदर और आकर्षक कलेवर में छपकर आ गया था।

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31 जनवरी 1986 को मैं हिंदुस्तान टाइम्स की प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग से जुड़ा और सन् 2010 में ‘नंदन’ पत्रिका के सहायक संपादक के कार्यभार से मुक्त हुआ। ये पच्चीस बरस मेरे जीवन के ऐसे आवेग भरे उत्फुल्ल सृजन-वर्ष हैं, जिनमें बड़ों के लिए बहुत कुछ लिखने के साथ ही बाल साहित्य के अगाध सिंधु में भी मैंने बहुत गहरी डुबकियाँ लगाईं। न सिर्फ बच्चों के लिए लीक से हटकर कविता, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, जीवनियाँ और किस्से-कहानियों वाले अंदाज में बहुत रोचक और रसपूर्ण ज्ञान-विज्ञान साहित्य लिखा, बल्कि साथ ही साथ बाल साहित्य पर आलोचनात्मक और इतिहासपरक नजरिए से भी बहुत कुछ लिखा गया। कहना न होगा कि समूचे बाल साहित्य जगत ने बड़े उत्साह से इनका स्वागत किया। जयप्रकाश भारती, हरिकृष्ण देवसरे, डा. श्रीप्रसाद, दामोदर अग्रवाल, डा. शेरजंग गर्ग और बालस्वरूप राही समेत बाल साहित्य के दिग्गज रचनाकारों ने अपनी उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मेरा मनोबल बढ़ाया। यह सब मेरे लिए बहुत मूल्यवान था।

ये ऐसे उत्साही क्षण थे, जब पहलेपहल हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखने का विचार मन में आया। हिंदी बाल कविता पर केंद्रित मेरे बहुत सारे विस्तीर्ण लेख थे, जिनसे बहुत मदद मिली। खासकर साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में हिंदी बाल कविता पर केंद्रित मेरा लंबा लेख छपा, तो उस पर चिट्ठियों की लगभग बारिश ही हो गई। एक से एक शीर्षस्थ साहित्यकारों के सराहना भऱे पत्र मुझे मिले। इनमें द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी और डा. श्रीप्रसाद के लिखे बधाई पत्र भी शामिल हैं। जाहिर है, इसने मुझे बहुत उत्साहित भी किया। और मैं जी-जान से अपने काम में जुट गया।

सन् 2003 में मेरा लिखा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ मेधा प्रकाशन से छपकर आया, जिसकी चतुर्दिक प्रशंसा हुई। लगभग हर पत्र-पत्रिका में इस पर समीक्षात्मक लेख छपे। रेडियो और दूरदर्शन के विशेष कार्यक्रम हुए। बाल साहित्यकारों ने बड़े मुक्त मन से इसका स्वागत किया। तभी मैंने मन ही मन पक्का संकल्प कर लिया था कि अब समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना है। हालाँकि तब नहीं जानता था कि यह काम इतना बड़ा है कि सिर पर पूरा एक पहाड़ उठा लेने से कम नहीं है।

यों एक राहत की बात यह थी कि हिंदी बाल साहित्य की अलग-अलग विधाओं पर मेरे लंबे शोधपूर्ण इतिहासपरक लेख बहुत छपे थे। और हिंदी बाल कविता के इतिहास पर तो मैं विधिवत काम कर ही चुका था। लिहाजा इसके बाद बाल कहानी, बाल उपन्यास, बाल नाटक, बाल ज्ञान-विज्ञान सहित्य, बाल जीवनियाँ और बाल पत्रिकाएँ—इन पर व्यापक रूप से काम शुरू हुआ। इसके बाद तो प्रकाशन विभाग की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘आजकल’ समेत अपने जानी-मानी पत्रिकाओं में मेरे दर्जनों लेख छपे। साथ ही इतिहास लेखन का कार्य भी निरंतर चलता रहा। सन् 2018 में प्रभात पकाशन से बड़े खूबसूरत कलेवर में हिंदी बाल साहित्य का इतिहास छपकर आया।

कहना न होगा कि यह हिंदी बाल साहित्य का विधागत इतिहास है। यानी हर अध्याय अपने में एक विधा का समूचा इतिहास है। अगर किसी की बाल कहानी में रुचि है तो उसे हिंदी बाल कहानी की पूरी विकास-यात्रा और बाल कहानी का मुकम्मल इतिहास उसी एक अध्याय में मिल जाएगा। यही बात बाल कविता, बाल नाटक, बाल उपन्यास आदि अध्यायों के बारे में कही जा सकती है। इतिहास-ग्रंथ के प्रारंभ में काल-विभाजन तथा उसके पीछे अंतर्हित साहित्यिक, सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों की बहुत विस्तार से चर्चा है, जिससे इस काल-विभाजन का आधार पुष्ट होता है। साथ ही, अपने इतिहास के लिए यह काल-विभाजन क्यों मुझे सुसंगत और मौजूँ लगा, इस पर भी मैंने प्रकाश डाला है।

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अलबता बाल साहित्य के इतिहास पर बात करने से पहले थोड़ा बाल साहित्य की परिधियों और उसकी विकास-यात्रा पर डाल ली जाए। मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी का प्रारंभिक काल ही बाल साहित्य के प्रारंभ का समय भी है। तब से कोई सौ-सवा सौ बरसों में बाल साहित्य की हर विधा में बहुत काम हुआ है। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, बाल जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य—सबमें बहुत साहित्य लिखा गया है और उनमें कुछ कृतियाँ तो इतनी उत्कृष्ट और असाधारण हैं कि चकित रह जाना पड़ता है।

बाल साहित्य के इतिहास की भूमिका में मैंने लिखा है कि बाल साहित्य जिसे एक छोटा पोखर समझा जाता है, वह तो एक ऐसा अगाध समंदर हैं, जिसमें सृजन की असंख्य उत्ताल तरंगें नजर आती हैं। बीच-बीच में बहुत उज्जवल और चमकती हुई मणियाँ भी दिखाई दे जाती हैं। एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि हिंदी साहित्य के बड़े से बड़े दिग्गजों ने बाल साहित्य लिखा और उस धारा को आगे बढ़ाया है। बहुत से पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा, कि हिंदी का पहला बाल उपन्यास प्रेमचंद ने लिखा था। ‘कुत्ते की कहानी’ उस बाल उपन्यास का नाम है, और वह प्रेमचंद ने तब लिखा, जब वे ‘गोदान’ लिख चुके थे और अपने कीर्ति के शिखर पर थे। क्या पता, अगर वे और जीते रहते तो कितनी अनमोल रचनाएँ बच्चों की झोली में डालकर जाते।

प्रेमचंद के समय बाल साहित्य में मौलिक उपन्यास तो न थे, पर अनूदित उपन्यास बहुत थे। पर प्रेमचंद को उनसे संतोष न था। उन्हें लगा कि पराई भाषा के उपन्यासों से बच्चों का उतना जुड़ाव नहीं हो पाता, और उन्हें सही परिवेश भी नहीं मिल पाता। इसलिए हिंदी में बच्चों के लिए कोई ऐसा उपन्यास लिखना चाहिए, जो उन्हें बिल्कुल अपना सा लगे। और तब लिखा उन्होंने बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’, जिसका नायक एक कुत्ता कालू है। उपन्यास में उसके कमाल के कारनामों का वर्णन है, पर इसके साथ ही प्रेमचंद ने भारतीय समाज की जाने कितनी विडंबनाएँ और सुख-दुख भी गूँथ दिए हैं। यहाँ तक कि गुलामी की पीड़ा भी। उपन्यास के अंत में कालू कुत्ते को हर तरह का आराम है। उसे डाइनिंग टेबल पर खाना खाने को मिलता है। तमाम नौकर-चाकर उसकी सेवा और टहल के लिए मौजूद हैं। पर तब भी वह खुश नहीं है। वह कहता है, मुझे सारे सुख, सारी सुविधाएँ हासिल हैं, पर मेरे गले में गुलामी का पट्टा बँधा हुआ है और गुलामी से बड़ा दुख कोई और नहीं है।

ऐसे कितने ही मार्मिक प्रसंग और मार्मिक कथन हैं, जो प्रेमचंद का बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ पढ़ने के बाद मन में गड़े रह जाते हैं। यह है प्रेमचंद के उपन्यास-लेखन की कला, जो उनके लिखे इस बाल उपन्यास में भी देखी जा सकती है।

पर अकेले प्रेमचंद नहीं हैं, जिन्होंने बच्चों के लिखा लिखा। अमृतलाल नागर, रामवृक्ष बेनीपुरी, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभदाकुमारी चौहान, दिनकर, जहूरबख्श, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद यादव, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, बच्चन, भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय—सबने बच्चों के लिए लिखा और खूब लिखा। तो जैसे-जैसे मैं बाल साहित्य के इस अगाध समंदर में गहरे डूबता गया, बाल साहित्य की एक से एक सुंदर और चमकीली मणियों से मैं परचता गया। और बहुत बार तो लगा कि ऐसी दमदार कृतियाँ तो बड़ों के साहित्य में भी नहीं हैं, जैसी बाल साहित्य में हैं।

तब मुझे लगा कि यह बात तो दर्ज होनी चाहिए, कहीं न कहीं लिखी जानी चाहिए। पर मैं देखता था कि ज्यादातर बाल साहित्यकार इस चीज को लेकर उदासीन थे, या कम से कम वैसी व्याकुलता उनमें नहीं महसूस होती थी, जैसी मैं महसूस करता था और भीतर-भीतर तड़पता था।

तो उसी दौर में कहीं अंदर से पुकार आई कि प्रकाश मनु, तुम यह काम करो। बेशक यह काम बहुत चुनौती भरा है, पर तुम इसे कर सकते हो, तुम्हें करना ही चाहिए। और मैं इसमें जुट गया। मैं कितना कामयाब हो पाऊँगा या नहीं, इसे लेकर मन में संशय था। पर जैसे-जैसे काम में गहरे डूबता गया, यह संशय खत्म होता गया। मुझे लगा कि यह तो मेरे जीवन की एक बड़ी तपस्या है. और सारे काम छोड़कर मुझे इसे पूरा करना चाहिए। तो सारे किंतु-परंतु भूलकर मैं इस काम में लीन हो गया।

ऐसा नहीं कि बाधाएँ कम आई हों। मेरे पास कुछ अधिक साधन भी न थे। फिर भी किताबें खरीदना तो जरूरी था। बिना इसके इतिहास कैसे लिखा जाता? इन बीस बरसों में कोई डेढ़-दो लाख रुपए मूल्य की पुस्तकें खरीदनी पड़ीं। जो सज्जन कंप्यूटर पर मेरे साथ बैठकर घंटों कंपोजिंग और निरंतर संशोधन भी करते थे, वे बहुत धैर्यवान और मेहनती थे। पर उन्हें उनके काम का मेहनताना तो देना ही था। कोई बीस बरस यह काम चला और दो-ढाई लाख रुपए तो कंपोजिंग आदि पर खर्च हुए ही। हर बार नई किताबें आतीं तो मैं उन्हें बीच-बीच में जोड़ता। इतिहास का विस्तार बहुत अधिक न हो, इसलिए बार-बार उसे तराशना पड़ता। लिखना और संपादन, काट-छाँट…फिर लिखना, फिर संपादन, यह सिलसिला बीस बरस तक चलता रहा।

इस पूरे महाग्रंथ के कोई सौ के लगभग प्रिंट लिए गए। हर बार काट-छाँटकर फिर नया प्रिंट।…सिलसिला कहीं रुकता ही न था। कभी-कभी तो लगता था कि मैं मर जाऊँगा और यह काम पूरा न होगा।…पर अंततः पिछले बरस यह काम पूरा हुआ और लगा कि सिर पर से कोई बड़ा भारी पहाड़ उतर गया हो। काम पूरा होने के बाद भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैंने सच ही इसे पूरा कर लिया है।

यहीं एक बात और स्पष्ट कर दूँ कि मेरा मकसद केवल इतिहास लिखना ही न था। बल्कि मैं चाहता था कि इस इतिहास-ग्रंथ की जो परिकल्पना मेरे मन में है, यह ठीक उसी रूप में पूरा हो। इस बृहत् कार्य में किसी भी तरह का समझौता मैं नहीं करना चाहता था। ऐसा भी हुआ कि लाखों रुपए खर्च करके जो पुस्तकें मैं खरीदकर लाया, उनमें से किसी पर सिर्फ दो-चार लाइनें ही लिखी गईं, किसी पर मात्र दो-एक पैरे। पर मुझे संतुष्टि थी कि हर पुस्तक को मैंने खुद पढ़ा और अपने ढंग से अपने विचारों को दर्ज किया। दूसरों के विचार मैं उधार नहीं लेना चाहता था, और वह मैंने नहीं किया। पुस्तकें खुद पढ़कर राय बनाई और फिर उसे उचित क्रम में तसल्ली से लिखा। इससे काम कई गुना बढ़ गया, पर इसी का तो आनंद था। इसीलिए जब यह इतिहास-ग्रंथ पूरा हुआ तो लगा, मेरी जीवन भर की तपस्या पूरी हो गई, और मेरी आँखों से आनंद भरे आँसू बह निकले।

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इस इतिहास-ग्रंथ की जितनी चर्चा हुई, उतनी ही चर्चा इसके काल-विभाजन को लेकर भी हुई, जिसमें मैंने एक बिल्कुल अलग पद्धति का इस्तेमाल किया। कई मित्रों और आलोचकों ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास के काल-विभाजन से उसकी तुलना की है, पर कहना न होगा कि मैंने शुक्ल जी की तरह प्रवृत्तिगत काल-विभाजन न करके, एक अलग ही पद्धति अपनाई, जिसका बहुत सीधा संबंध बाल साहित्य की उत्तरोत्तर आगे बढ़ती और निरंतर विस्तीर्ण होती विकास-धारा से है।

जाहिर है, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में जो काल-विभाजन किया है, उससे मेरा काल-विभाजन बहुत भिन्न है। इसलिए भी कि हिंदी साहित्य की परंपरा कई सदियों पुरानी है, जबकि हिंदी में बाल साहित्य की शुरुआत मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी से ही हुई। तो मुझे केवल सौ-सवा सौ साल की कालावधि में ही वर्गीकरण करना था। शुक्ल जी ने अलग-अलग कालखंडों में हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों के अनुसार काल-विभाजन किया, जबकि मेरा काल-विभाजन हिंदी बाल साहित्य की विकास-यात्रा या उसके ग्राफ को लेकर था। इसलिए बीसवीं सदी के प्रारंभ से आजादी हासिल होने तक के कालखंड, यानी स्वतंत्रता-पूर्व काल को मैंने हिंदी बाल साहित्य का प्रारंभिक दौर या आदि काल माना।

आजादी के बाद हिंदी बाल साहित्य की ओर बहुत से प्रतिभाशाली साहित्यिकों का ध्यान गया और इस कालखंड में बहुत उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आईं। खासकर छठे दशक से आठवें दशक तक का बाल साहित्य बड़ी ही अपूर्व कलात्मक उठान वाला बाल साहित्य है, जिसमें बाल साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में एक से एक उम्दा रचनाएँ लिखी गईँ। इसलिए इस दौर को मैंने हिंदी बाल साहित्य का गौरव काल कहा।

सन् 1981 से लेकर अब तक के बाल साहित्य में बहुत विस्तार है। बहुत से नए लेखकों का काफिला बाल साहित्य से जुड़ा और काफी लिखा भी गया गया। पर इस दौर में वह ऊँचाई नहीं है, जो विकास युग में नजर आती है। इस कालखंड को मैंने विकास युग का नाम दिया। इस तरह हिंदी बाल साहित्य के इतिहास में मेरा काल- विभाजन प्रवृत्तिगत न होकर, बाल साहित्य की विकास-यात्रा को लेकर है।

मोटे तौर से यह अध्ययन की सुविधा के लिए है। इस पर कोई बहुत अधिक मताग्रह मेरा नहीं है कि इन कालखंडों के नाम और कालावधि बस यही हो सकती है। पर मैं देखता हूँ कि सामान्यतः सभी बाल साहित्य अध्येताओं ने इसे खुले मन से स्वीकार कर लिया है, और इसी आधार पर बाल साहित्य के अध्ययन की परंपरा चल निकली है। मुझे निश्चित रूप से यह सुखद लगता है। इसलिए कि काल-विभाजन पर निरर्थक विवाद के बजाय हमारा ध्यान तो बाल साहित्य की विकास की गतियों को जाँचने और आँकने में होना चाहिए।

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मुझे इस बात की खुशी है कि मेरे इतिहास-ग्रंथ के आने पर बाल साहित्य में खासी हलचल हुई। इस ग्रंथ के आते ही पाठकों और बाल साहित्यकारों की प्रतिकियाओं की मानो बाढ़ आ गई। ज्यादातर साहित्यकारों ने मुक्त कंठ से इसकी सराहना की, और इसे बाल साहित्य में ‘एक मील का पत्थर’ कहा। एक वरिष्ठ साहित्यकार ने तो आचार्य रामचंद शुक्ल के इतिहास से इसकी तुलना करते हुए कहा कि मनु जी, जिस तरह आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखकर एक बड़ा और ऐतिहासिक काम किया, उसी तरह हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखकर आपने भी ऐसा काम किया है, जिसका महत्त्व समय के साथ निरंतर बढ़ता जाएगा। आज से सौ साल बाद भी लोग इतनी ही उत्सुकता और जिज्ञासा भाव के साथ इसे पढ़ेंगे।

इसी तरह एक और बड़े साहित्यकार की टिप्पणी थी कि मनु जी, आपने बाल साहित्य के विशाल समंदर को मथकर उसकी सबसे उज्ज्वल मणियाँ और दुर्लभ खजाना खोज निकाला है और उसे इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया है।…ऐसी और भी ढेरों प्रतिक्रियाएँ थीं। पर सच तो यह है कि मैं खुद को आचार्य शुक्ल के पैरों की धूल भी नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर है कि आचार्य शुक्ल के इतिहास समेत हिंदी साहित्य के अन्यान्य इतिहास-ग्रंथों को मैंने बड़ी गभीरता से पढ़ा है, और उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। बाल साहित्य का इतिहास लिखते हुए वह मेरे बहुत काम आया।

इस इतिहास-ग्रंथ पर दर्जनों आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएँ लिखी गईं, जिनमें अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों की लेखनीय टिप्पणियाँ भी शामिल हैं। इनमें से प्रायः सभी लेखकों ने इस बात को जरूर रेखांकित किया कि यह इतिहास-ग्रंथ आलोचना या विवेचन की बनी-बनाई जड़ीभूत दृष्टि से बहुत अलग है। यह एक तरह की सर्जात्मक भाषा में लिखा गया है, जिसमें इतना है कि कोई चाहे तो इस इतिहास को इतिहास के साथ-साथ एक रोचक उपन्यास या महागाथा के तौर पर भी पढ़ सकता है, और उसे इसमें वाकई आनंद आएगा।

कुछ लेखकों ने लिखा कि इस इतिहास-ग्रंथ को पढ़ते हुए, किसी संवेदनशील पाठक को लगेगा वह एक ऐसी फुलवारी से गुजर रहा है, जिसमें तरह-तरह के रंग और गंधों वाले बेशुमार फूल खिले हैं और तरह-तरह की मोहक वीथियाँ हैं। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य—बाल साहित्य की ये अलग-अलग विधाएँ ही जैसे उस सुंदर उद्यान की अलग-अलग सरणियाँ हैं। इनमें घूमते हुए पाठक एक रचनात्मक आनंद से भीगता है और उसका मन प्रफुल्लित होता है। इसलिए कि हर विधा की शक्ति और खूबसूरती को मैंने जगह-जगह बड़े आत्मीय ढंग से उजागर किया है।

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हिंदी बाल साहित्य के इतिहास लेखन के कारणों और जरूरत की चर्चा मैं पहले कर चुका हूँ। पर एक और कारण भी था, जिससे बाल साहित्य के इतिहास का लिखा जाना मुझे बेहद जरूरी लगा। वह यह कि बाल साहित्य के प्रति हमारे आलोचकों का रवैया शुरू से ही दुराग्रहपूर्ण रहा है। मेरे लिए यह दुख और हैरानी की बात है कि हमारे आलोचक इतने पूर्वाग्रही हैं कि जब वे रामनरेश त्रिपाठी, दिनकर, महादेवी वर्मा, रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर के रचनाकार व्यक्तित्व की चर्चा करते हैं तो उनके बाल साहित्य को एकदम ओट कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि बाल साहित्य की चर्चा के बगैर इनमें से किसी भी साहित्यकार के व्यक्तित्व और संवेदना को वे ठीक से समझ ही नहीं सकते। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदी की आलोचना अपनी पिछली भूल-गलतियों और सीमाओं से उबरेगी और बाल साहिय के महत्त्व को स्वीकारेगी।

हालाँकि आज बाल साहित्य इस बुलंदी पर पहुँच चुका है कि आलोचक स्वीकारें या नहीं, इससे हिंदी बाल साहित्य की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। वह तो है और अपने मीठे रस से लाखों बालकों को आनंदित कर रहा है, उनके व्यक्तित्व को दिशा दे रहा है। यह अपने आप में बड़ी बात है। आज आलोचना भूल कर रही है तो यकीनन कल वह भूल-सुधार भी करेगी, और तब उसे समझ में आएगा कि जिस बाल साहित्य को वह छोटा पोखर समझ रही थी, वह तो एक महासिंधु है। बस, आँखें खोलकर उसे देखने, समझने और सराहने की जरूरत है।

सच कहूँ तो वर्तमान दौर बाल साहित्य की सर्वांगीण उन्नति और बहुमुखी विकास का दौर है, जब कि उसकी पताका आसमान में ऊँची लहरा रही है। ‘नंदन’ के यशस्वी संपादक जयप्रकाश भारती जी बड़े जोर-शोर और उत्साह से इक्कीसवीं सदी को बालक और बाल साहित्य की सदी कहा करते थे। तब उनकी बात हमें ज्यादा समझ में नहीं आती थी। पर यह एक सुखद आश्चर्य है कि समय ने इसे सच कर दिया है। निस्संदेह इक्कीसवीं सदी बाल साहित्य के असाधारण उत्कर्ष की सदी है। इसे आज बड़ों के साहित्यकार भी महसूस कर रहे हैं और वे खुद बड़ी जिम्मेदारी के साथ बच्चों के लिए लिख रहे हैं। अगर कोई खुली आँखों से देखे तो उसे आज बाल साहित्य की विजय-गाथा हवाओं के मस्तक पर लिखी हुई नजर आ सकती है। जो लोग आज इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे, वे कल इसे स्वीकार करेंगे। इसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।

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हिंदी बाल साहित्य के इतिहासकार के नाते एक सवाल मुझसे बार-बार पूछा जाता है कि बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य और बाल साहित्य की तुलना करें, तो क्या दोनों के विकास के ग्राफ में कोई बड़ा अंतर है। इसका जवाब यह है कि मोटे तौर से देखा जाए, तो बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य के समकालीन परिदृश्य में कोई बहुत अंतर नहीं है। दोनों ही रचनात्मक दृष्टि से खासे समृद्ध हैं और एक उत्साह भरा माहौल दोनों में ही नजर आता है। जिस तरह बड़ों के लिए लिखी जा रही कहानियों, कविताओं, उपन्यासों आदि में नई पीढ़ी बहुत प्रचुरता से हिस्सा ले रही है और एक ताजगी भरी फिजाँ दिखाई देती है, लगभग वही मंजर बाल साहित्य में भी है, जिसमें एक साथ तीन या चार पीढ़ियों के साहित्यकार निरंतर लिख रहे हैं और हर ओर खासी सक्रियता नजर आती है।

शायद बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य का ही बाल साहित्य पर यह प्रभाव पड़ा कि अभी तक उपेक्षित रही विधाओं संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, आत्मकथा आदि में भी अब खासी हलचल दिखाई देती है। और यहाँ तक कि जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य में भी बहुत कुछ नयापन और कलातमक ताजगी नजर आती है। खासकर युवा पीढ़ी की सक्रियता दोनों ही जगह उत्साह भरा मंजर उपस्थित करती दिखाई देती है। इससे कई जगह तो पुरानी पीढ़ी के अंदर भी थोड़ी सक्रियता और कुछ नया करने की ललक पैदा हुई है। इसे मैं शुभ संकेत मानता हूँ।

इसी तरह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य, दोनों ही जगह अगर एक ओर उत्कृष्ट साहित्य नजर आता है तो दूसरी ओर बहुत सी साधारण चीजों की बाढ़ भी है, जिनके बीच से श्रेष्ठ और उत्कृष्ट को निरंतर अलगाने की जरूरत है। पर बड़ों के साहित्य को समीक्षा, आलोचना आदि के जैसे सुअवसर मिल जाते हैं, वैसा बाल साहित्य में बहुत कम है, और इसका कुछ खमियाजा भी उसे सहना पड़ता है। इसके कारण बाल साहित्य में जो श्रेष्ठ है, उस पर हमारा ध्यान नहीं जाता, और कई बार औसत साहित्य इतनी जगह घेर लेता है कि बहुत लोग पूछते हैं कि मनु जी, क्या यही है वह बाल साहित्य, जिसके आप इतने गुण गाते हैं? तब उन्हें समझाना पड़ता है कि देखिए, बाल साहित्य में बहुत सी साधारण चीजें भी हैं। जैसे कोई भूसे से भरी कोठरी हो, जिसमें बीच-बीच में बहुत मीठे रसभरे दाने भी नजर आ जाते हैं। पर किसी भी साहित्य का मूल्यांकन तो उसकी श्रेष्ठ रचनाओं से ही होना चाहिए। यह जितना बड़ों के साहित्य के बारे में सच है, उतना ही बाल साहित्य के बारे में भी।

तो कुल मिलाकर हिंदी में बड़ों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य और बाल साहित्य—ये दोनों दो समांतर चलती निरंतर प्रवहमान नदियाँ हैं, जो एक-दूसरे को भी कुछ न कुछ प्रेरणा देती हैं। मैं समझता हूँ, यह किसी भी भाषा के लिए बड़े गौरव की चीज है।

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फिर इतिहास लिखते समय एक और महत्त्वपूर्ण बात जो मैंने रेखांकित की, वह हिंदी बाल साहित्य की अनवरत विकास-धारा है, जो किसी अचरज की तरह निरंतर फैलती हुई आगे बढ़ती रही, और निरंतर समृद्ध होती रही है। इसके साथ ही हिंदी का बाल साहित्य हर दौर में बच्चों से और अपने समय से करीबी तौर से जुड़ा रहा है और उसमें लगातार आशा, जिजीविषा के स्वर सुनाई देते रहे हैं, जिनसे बच्चों में कुछ कर दिखाने का हौसला पैदा होता है।

ऐसे ही एक बड़ी बात है, बाल साहित्य की शाश्वत अपील की। आज से साठ बरस पहले की पीढ़ी जिस बाल साहित्य को पढ़कर बड़ी हुई, उसे उनके बच्चों ने और आगे चलकर नाती-पोतों ने भी पढ़ा और वही आनंद हासिल किया। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि बाल साहित्य हमारी भाषा और हमारे देश-समाज की स्थायी धरोहर है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे देश के बचपन को सँवार रहा है। बच्चों को बचपन की उत्फुल्लता से जोड़ने के साथ-साथ बाल साहित्य उनके अनुभव-क्षितिज का भी निरंतर विस्तार करता है और उनकी आत्मा को उजला करता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर निश्चित रूप से देश के बहुत सजग, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनेंगे और बड़े-बड़े काम कर दिखाएँगे।

और सबसे बड़ी बात तो यह है कि बाल साहित्य हमें अच्छा मनुष्य बनाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर इंजीनियर बने तो वे अच्छे और कुशल इंजीनियर साबित होंगे, डाक्टर बने तो अच्छे और सहानुभूतिपूर्ण डाक्टर बनेंगे और अध्यापक बने तो बड़े स्नेहिल और जिम्मेदार अध्यापक बनेंगे। मैं समझता हूँ, बाल साहित्य की यह बहुत बड़ी सेवा है। यह इतिहास लिखते हुए मैंने पाया कि ऐसा सुंदर, कल्पनापूर्ण और सुंदर भावों से भरा बाल साहित्य हमारे देश में हर काल में लिखा गया और उसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बचपन को सँवारा। इसका सीधा मतलब यह है कि इस देश को समृद्ध करने और सही दिशा में आगे बढ़ाने में बाल साहित्य की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह निस्संदेह बड़ी सुखद और रोमांचित करने वाली बात है, जो हमारे भीतर आशा और उम्मीदों का उजाला भर देती है।

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मेरे गुरु देवेंद्र सत्यार्थी जी, जो लोकगीतों के यशस्वी संग्रहकर्ता और यायावर थे तथा वर्षों तक गाँधी जी और गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के सान्निध्य में रहे थे, एक बात अकसर कहा करते थे कि “याद रखो मनु, अगर तुम किसी कृति को रचते हो तो वह कृति भी तुम्हें जरूर रचती है।” अगर इस लिहाज से अपने लिखे बाल साहित्य के इतिहास पर बात करूँ, तो कहना होगा कि सिर्फ मैंने ही इस इतिहास को नहीं रचा, बल्कि इस इतिहास ने भी मुझे रचा है।

यही कारण है कि बाल साहित्य का इतिहास लिखने के बाद मेरे विचारों में एक बड़ा परिवर्तन आया है। बल्कि एक नहीं, कई परिवर्तन। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि इतिहास लेखन के बाद बाल साहित्य की शक्ति, रचनात्मक समृद्धि तथा बच्चों के भीतर भाव और संवेदना के विस्तार की उसकी अपरिमित सामर्थ्य को लेकर मेरे भीतर आस्था कहीं अधिक गहरी हुई है। मुझे लगता है कि आज जब हमारे समाज में चारों ओर निराशा का पसारा है, तो ऐसे माहौल में बाल साहित्य एक बड़ी संभावना है, जो हमारे दिलों में उम्मीद के दीए जलता है। यहीं एक बात और जोड़नी जरूरी लगती है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए तो जरूरी है ही, पर वह केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बड़ों के लिए भी उतना ही जरूरी है। बड़े उसे पढ़ते हैं तो उन्हें अपना भोला बचपन याद आता है। बचपन की उस निश्छल दुनिया में पहुँचना उन्हें कहीं अंदर से निमज्जित करता है और पवित्र बनाता है।

इसी तरह बाल साहित्य के वर्तमान दौर की एक बड़ी उम्मीद भरी स्थिति यह भी है कि आज का बाल साहित्य बच्चों के कहीं अधिक नजदीक आया है। बल्कि कहना चाहिए कि बच्चे ही उसके केंद्र में हैं। और यह बात बाल कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास सभी विधाओं में देखी जा सकती है। आप पाएँगे कि इन सभी में बच्चों की उपस्थिति बहुत अधिक बढ़ी है और आज की बाल कहानी हो, नाटक या उपन्यास, सभी में मुख्य या केंद्रीय पात्र बच्चे ही हैं। इतना ही नहीं, आज के बच्चों के सुख-दुख और समस्याएँ, उनका नटखटपन, शरारतें, यहाँ तक कि बड़ों की दुनिया से उनकी शिकायतें भी बड़ी प्रमुखता से आज के बाल साहित्य में मिल जाएँगी। इससे वर्तमान पीढ़ी के बच्चों का उससे सीधा रिश्ता जुड़ता है।

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आज जब कि इतिहास लेखन का कार्य संपन्न हो गया है, मैं कभी-कभी बाल साहित्य के इतिहास लेखन के शुरुआती पलों को याद करता हूँ, तो बड़ा रोमांच सा होता है। एक बात बहुत साफ तौर से नजर आती है कि जब इस दिशा में मैंने अपना पहला झिझकता कदम उठाया, तब वाकई मुझे पता नहीं था कि यह काम इतना बड़ा है कि इसे करते हुए मैं खुद इसके नीचे दब जाऊँगा…और बाकी सब कुछ छूट जाएगा। पर काम करता गया, आगे बढ़ता गया और महसूस होता गया कि यह काम कितना गुरुत्वपूर्ण है। मुझे बाल साहित्य के इतिहासकार के रूप में अपनी जिम्मेदारी का पूरा अहसास था और बार-बार एक ही बात मन में उठती कि यह हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास है तो कोई कसर बाकी न रहे। लगता था, मैं अपनी आखिरी बूँद तक इसमें निचोड़ दूँ, ताकि यह सच में मुकम्मल हो, अद्वितीय भी।…

हालाँकि यह काम संपन्न हो जाने के बाद भी यकीन नहीं आता कि सचमुच मैंने इसे किया है। मैं तो कहूँगा कि कोई अज्ञात शक्ति थी, जिसने मुझसे इतना बडा काम करवा लिया, जो एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी एक टीम के लिए भी खासा टेढ़ा और दुश्वार काम था। यह इतिहास लिखते हुए हर क्षण मुझे महसूस होता, जैसे बाल साहित्य में अपना समूचा जीवन अर्पित करने वाले बहुत से बड़े और दिग्गज साहित्यकारों का आशीर्वाद मेरे सिर पर बरस रहा है और देश भर के हजारों बाल साहित्यकों की शुभकामनाएँ हर पल मेरे साथ हैं। वे न होतीं तो यह काम पूरा हो ही नहीं सकता था। इसलिए मैं मन ही मन उन सभी कृपालु मित्रों और दिग्गज साहित्यकारों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता से सिर झुकाता हूँ। कुछ मित्र और वरिष्ठ साहित्यकार तो इस काम से इस कदर उत्साहित थे कि लगातार दरयाफ्त करते रहते कि मनु जी, काम कहाँ तक पहुँचा? कब आ रहा है आपका इतिहास…? अफसोस, यह इतिहास सामने आ पाता, इससे पहले ही वे चल बसे। उनका प्यार और विश्वास याद करता हूँ तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं।

आज इस खुशी की वेला में जब कि यह इतिहास सामने आ चुका है और पूरे देश भर में फैले हिंदी के बाल साहित्यकारों की ओर से सराहा गया है, मैं अपने उन मित्रों और अग्रज साहित्यकारों को याद करना चाहता हूँ जो इसकी प्रतीक्षा करते-करते चले गए। इसी तरह ऐसे बहुत से प्यारे मित्र हैं, जिनका स्नेह-संबल इस काम में मेरे लिए पाथेय बन गया। मैं कृतज्ञता से भरकर उन सभी को धन्यवाद देता हूँ। सच पूछिए तो यह इतिहास-ग्रंथ केवल मेरी सृष्टि नहीं, हम सभी के साझे उद्यम का फल है, और आज यह मेरे हाथों से निकलकर समूचे हिंदी बाल साहित्य की अनमोल निधि बन चुका है।

बरसों पहले मेरे एक स्नेही मित्र श्याम सुशील ने मुझसे एक लंबा इंटरव्यू किया था, जिसमें इस इतिहास-ग्रंथ पर भी काफी बातें हुई थीं। उन दिनों यह इतिहास लिखा जा रहा था, और मैं आपादमस्तक इस काम में डूबा था। तब इस इतिहास की चर्चा करते हुए मैंने भावोत्तेजना में जो बातें कही थीं, वे आज भी मेरी स्मृति में तैर रही हैं। हिंदी बाल साहित्य के इतिहास पर अपने आत्मकथ्य का अंत मैं उन्हीं शब्दों से करना चाहूँगा, जो बरसों पहले मैंने भाई श्याम सुशील से कहे थे—

“…ऐसे एक नहीं पचासों कवि-लेखक हमारे यहाँ हैं, जिन्होंने बच्चों से जुड़कर, बच्चों के सपनों और इच्छा-संसार से जुड़कर इतना अच्छा लिखा है, इतना प्यारा लिखा है और इतनी ऊँची जमीन पर लिखा है कि कई बार मैं यह सोचकर अकुलाता हूँ कि ऐसे अपने कद्दावर शख्सियत वाले बाल साहित्यकारों के लिए हम क्या कर रहे हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही बाल साहित्य के लिए समर्पित कर दिया! अपने जीवन-काल में उन्होंने निर्धनता और अपमानों के धक्के खाए, उन्हें समझा नहीं गया और आज भी जब वे चले गए हैं, उन्हें समझने और मूल्यांकन की कोशिश कोई नहीं कर रहा। सिर्फ हवा में चिल्ल-पों और चीखों का शोर है और आश्चर्य है, इसी को वे विचार या विचार-गोष्ठियाँ कहते हैं। मेरे भाई, मुझे तो इससे बड़ी चिढ़ है। और अगर मैं पिछले कुछ वर्षों में इस सबसे उपराम होकर बाल साहित्य का इतिहास लिखने में जुटा हूँ—और अपने ढंग से अथाह कष्ट पाते हुए भी सुख महसूस करता हूँ तो इसका कारण भी शायद यही है कि मैं यह महसूस करता हूँकि हिंदी बाल साहित्य अब वहाँ आ गया है, जहाँ सचमुच कुछ ठोस काम करने की जरूरत है…

“इसे लिखते हुए मैं किन-किन दुस्सह अनुभवों से गुजरा और कैसी मर्मांतक चोटें खाई, इनकी चर्चा रहने दीजिए, फिर कभी…! हाँ, यह पूरा हो जाए और हिंदी साहित्य का यह पहला इतिहास लिखा जा सके, तो मुझे ऐसा जरूर लगेगा कि आकाश में बैठे तमाम देवता मेरे ऊपर फूल बरसा रहे हैं! लेकिन भाई सुशील जी, ये आकाश के देवता वो देवता नहीं है जिन्हें दूसरे समझेंगे। मेरी दुनिया के ये आकाश के देवता तो हरिऔध, स्वर्ण सहोदर, विद्याभूषण विभु, रामनरेश त्रिपाठी, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान या सर्वेश्वर सरीखे वे बाल साहित्य के प्रदीप्त रचनाकार हैं जिनके जाने के बाद भी उनका प्रकाश क्षीण नहीं हुआ, वह क्षण-क्षण और निरंतर बढ़ता ही जाता है।”

आज जब मैं अपने इतिहास-ग्रंथ पर चंद सतरें लिखने बैठा हूँ, तो मेरी आँखें सचमुच भीगी हुई हैं, और मैं बड़ी विनम्रता और आदर से हाथ जोड़कर अपना अपना यह महत् ग्रंथ इन्हीं साहित्यिक देवताओं के चरणों में अर्पित करता हूँ।

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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,

मो. 09810602327,

ईमेल – prakashmanu333@gmail.com

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