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विजय आनंद के बारे में ‘गोल्डी’ बातें

आज विजय आनंद की पुण्यतिथि है। उनके ऊपर अनिता पाध्ये की लिखी किताब ‘एक था गोल्डी’ पर वरिष्ठ लेखिका गीताश्री की यह सुंदर टिप्पणी पढ़िए। किताब का प्रकाशन मंजुल प्रकाशन से हुआ है-

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“पल पल दिल के पास तुम रहते हो …” ये गाना संगीत प्रेमियों के दिल और ज़ुबान पर हमेशा रहता है. पीढ़ी दर पीढ़ी इस गाने के जादू में है और इसकी जादूगरी कम नहीं होती. किशोर कुमार की गायकी, कल्याण जी- आनंद जी का संगीत और गाने के बोल ….. बस ! यहाँ पर रुकिए ज़रा -सा. सब कहेंगे कि गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने लिखे हैं. अब तक मैं भी यही समझ रही थी. कुछ समय से गीतकार राजेन्द्र कृष्ण पर काम भी कर रही थी. लेकिन एक दिलचस्प खुलासा -आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इस गीत की पहली पंक्ति , मुखड़ा राजेंद्र कृष्ण ने नहीं, ब्लैकमेल फ़िल्म के निर्देशक विजय आनंद उर्फ़ गोल्डी ने लिखी है और गीत पूरा किया गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने.

वाकया यूँ हैं कि गोल्डी नयी फ़िल्म के निर्माण के बारे में सोच ही रहे थे कि निर्माता विनोद दोषी ने उन्हें एक फ़िल्म निर्देशित करने का ऑफ़र दिया. गोल्डी तब तक इतने नामवर बन चुके थे कि धर्मेंद्र जैसे स्टार भी उनके साथ काम करने को इच्छुक थे.

ब्लैकमेल फ़िल्म की योजना बनी जिसमें धर्मेंद्र को चुन लिया गया. 1970 में धर्मेंद्र -राखी की जोड़ी सराही जा रही थी. जीवन मृत्यु फ़िल्म के बाद से ये जोड़ी सराही जाने लगी थी. बतौर नायिका राखी चुन ली गईं . कलाकारों के चयन के बाद गोल्डी ने फ़िल्म के संगीत पर काम करना शुरु किया. फ़िल्म के संगीतकार थे कल्याणजी-आनंदजी . फ़िल्म “ जॉनी मेरा नाम “ की तरह इस फ़िल्म के अधिकतर गीत गोल्डी ने आनंद जी के साथ बैठ कर तैयार करवाए. आशा … मैं आशा … गाना हो या डूब जाता हूँ… , मिले दो बदन… आदि गीत एक के बाद एक बनते चले गए. गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण. इन गीतों के बावजूद गोल्डी एक प्रेमगीत भी चाहते थे और उसे कैसे फ़िल्माया जाएगा, यह भी उन्होंने तय कर लिया था. इस गीत की सिचुएशन के बारे में समझाते हुए गोल्डी ने कल्याणजी-आनंदजी से कहा – नायक एक युवती को चाहता तो है पर वह प्यार का इज़हार नहीं कर सकता. वह शर्मीला है और मुलाक़ात होने पर भी उससे साफ़-साफ कुछ कह नहीं पाता. अपने मन की बात वह रोज़ एक ख़त में लिखता है, पर खत पोस्ट नहीं करता. एक दिन हिम्मत करके वह सारी चिट्ठियाँ प्रेमिका को दे देता है. और कहता है कि उन्होंने अपने मन की बात इन चिट्ठियों में लिख दी है. प्रेमिका जब चिट्ठियाँ पढ़ने लगती है तो मानों चिट्ठियाँ गाने लगती हैं.

“पर चिट्ठियाँ कैसे गा सकती हैं ? “ कल्याणजी ने गोल्डी से पूछा.

“यही तो मज़े की बात है. मैं यहाँ एक गीत चाहता हूँ, नायक नायिका नहीं. लेकिन चिट्ठियाँ गीत गाती हैं.”

गोल्डी का यह आयडिया कल्याणजी के पल्ले नहीं पड़ रहा था और आनंदजी भी किसी धुन का सुझाव नहीं दे पा रहे थे. कई बार इस गीत के सिलसिले में बैठके हुईं, पर धुन नहीं बनाई जा सकी. फ़िल्म की शूटिंग शुरु हो चुकी थी. गोल्डी ये गीत ऊटी की मनोरम वादियों में फ़िल्माना चाहते थे. ऊटी के लिए रवाना होने से पहले गोल्डी फिर एकबार आनंदजी के साथ धुन बनाने बैठे. शाम से रात हुई, रात गुजरने वाली थी , मगर धुन नहीं बनी.

“यार आनंदजी, आज तो धुन बन ही जानी चाहिए. गीत के बोल छोटे-छोटे हो, पर भावपूर्ण हों. गीत सुनकर दर्शकों को ऐसा महसूस होना चाहिए कि ये भाव नायक के हृदय से निकले हैं.”

तब तक गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने गीत के बोल नहीं लिखे थे. रात ढलने वाली थी , आनंदजी धुन बनाने में लगे थे. तभी गोल्डी ने आनंदजी से कहा – पल-पल दिल के पास तुम रहती हो… “ गीत ऐसा हो तो कैसा रहेगा? “

आनंदजी ने तुंरत गीत को धुन में बांधते हुए आगे एक पंक्ति जोड़ दी – जीवन मीठी प्यास ये कहती हो …”

इस तरह गीत का मुखड़ा तैयार. अगले दिन गोल्डी और आनंदजी की बैठक हुई . बैठक में राजेन्द्र कृष्ण भी शामिल हुए. गोल्डी ने कहा -“ राजेन्द्र जी, माफ़ कीजिएगा, मैं गीतकार तो नहीं हूँ पर इतना जानता हूँ कि मेरी फ़िल्म के चरित्र क्या संवाद बोल सकते हैं. कौन -सा गीत गा सकते हैं. मैं शुरु से ही गीतकार को बता दिया करता हूँ कि मुझे कैसा गीत चाहिए. लेकिन इस बार मुझसे एक बदतमीज़ी हो गई है . रात को ही हमने मिलकर गीत का मुखड़ा तैयार किया और उसकी धुन भी तैयार हो गई है. अब उसे रखना है या नहीं, आप ही तय कीजिए. “

गोल्डी की बात सुन कर राजेन्द्र कृष्ण चुप रहे थोड़ी देर। देर तक चुप रहे, सोचते रहे। गुमसुम अपने खयालों में खोए…शायद भीतर कहीं गीत का अंतरा बन रहा होगा। भीतर जब गीत बनते हैं तो बाहर चुप्पी छा जाती है। घंटे, दो घंटे बाद अचानक उन्होंने गोल्डी से कहा- गोल्डी, गीत का मुख़ड़ा वही रहने दो, आगे गीत मैं लिख देता हूं। फिर गीत पूरा लिखा गया।

गीत की रिकाडिंग पूरी नहीं हुई थी कि गोल्डी को शूटिंग के लिए ऊटी जाना पड़ा। जिस गीत की रिकाडिंग न हुई हो, उसे कैसे फिल्माया जाए। पर जो दूसरे नहीं कर सकते , उसे गोल्डी कर डालते थे। उन्होंने धर्मेंद्र को गीत के बोल गुनगुनाने को कहा और गीत फिल्मा लिया।

रुपहले परदे पर इतना रोमांटिक गाना दूसरा न हुआ। ये अलग बात है कि कई वजहों से फिल्म ब्लैक मेल कई कारणों से बनने में देर हुई, फिल्म उतनी नहीं चली लेकिन ये गाना दर्शको की जुबान पर तब जो चढ़ा, आज तक उतरा नहीं है। पीढ़ियां गुनगुना रही हैं। गीत के मुखड़े का जादू है और कल्याणजी-आनंदजी की धुनों का कमाल। राजेन्द्र कृष्ण ने उसमें अपना जादुई संस्पर्श देकर इस गीत को अमर बना दिया। आज की भाषा में कहे तो इस गाने जितना कोई एक गाना वायरल नहीं हुआ कि पीढ़ियां इसकी रुमानियत के साये में पनाह ले सके।

ये प्रसंग पढ़ने के बाद यकीनन आप यू टयूब पर इस गाने को सुनने-देखने का लोभ आप संवरण नहीं कर पएंगे। चिट्ठियों को गाते हुए सुनने का सुख अब कहां। चिट्ठियों में फूलों की सूखी पंखुरियां कहां मिलती हैं अब। कहां कोई चेहरा हौले से माथे पर बोशा देते हुए गाए कि – जैसे कह रही थी तुम कि मुझे बांध लो बंधन में…। जैसे स्कूल की कॉपी से मोरपंख गायब हो गए, उसी तरह बिला गए प्रेमपत्र।

पीढ़ियां याद रखेंगी- एक था गोल्डी।

एक था गोल्डी जो हमेशा रहेगा … अपनी अदाकारी में, अपनी फ़िल्मों में, अपने किरदारों में , अपने विजन में और अपने दर्शकों के मन में. कलाकार मरते नहीं हैं. उनकी दैहिक अनुपस्थिति दाहक वियोग पैदा करती जरुर है मगर सांत्वना बन कर रुपहले पर्दे पर जीवित हो उठते हैं.

गोल्डी को चाहने वाले जानते हैं कि वो किसका नाम है और वो कौन था.. जो है अभी भी.

रुपहले पर्दे का यह नायाब सितारा -फ़नकार अब किताब में भी जी उठा है. जो मिलना चाहता हो, उसे ये किताब पढ़ना पड़ेगा. पहले यह किताब आई मराठी में , एक होता गोल्डी “ नाम से फिर इसका हिंदी अनुवाद “ एक था गोल्डी”

मुंबई की प्रख्यात पत्रकार -लेखिका अनिता पाध्ये ने बहुत श्रम से फ़िल्मकार-अभिनेता गोल्डी यानी विजय आनंद की जीवन -कथा लिखी है. उनके प्रशंसकों के लिए ये किताब बेहतरीन तोहफ़ा है.

किताब में इतनी दुर्लभ जानकारियां हैं, उससे पता चलता है कि लेखिका ने कितना समय दिया, कितनी मेहनत की और गोल्डी की संगत में कितना समय दिया। उनसे लंबी-लंबी बातें की। गोल्डी बिल्कुल अनजान थे अनिता से। अनिता जिद में थीं कि उनसे मिल कर बात करेंगी ताकि किताब में सिर्फ उनका सच सामने आए। अनुमानों पर या गप्पो पर आधारित सच की तरफ न ले जाए किताब। इसीलिए इस किताब में सारी जानकारियां गोल्डी की दी हुई हैं। एक ऐसा इतिहास लिखा गया है जिसका किरदार खुद बैठ कर सुना रहा है अपनी दास्तां। बड़े गौर से सुन रही थी लेखिका कि गोल्डी चले गए। किताब उनके जाने के बाद आई। लेकिन जाते-जाते गोल्डी ने अपने वक्त के सिनेमा का पूरा इतिहास बयां कर दिया। ये किताब सिर्फ एक फिल्मकार की जीवन गाथा नहीं, बल्कि उस वक्त का सिनमा, सिनेमाई संसार, गीतकार, संगीतकार, अभिनेता, अभिनेत्री सबका इतिहास है। ओ टी टी के जमाने में बैठ कर उस वक्त का इतिहास जानना जब क्लासिक फिल्में बना करती थीं और ऐसे जुनूनी फिल्मकार होते थे जो अपनी शर्त्तो पर सिनमा बनाते थे। किताब में गजब की किस्सागोई है। लगता है, दास्तानगो उस दौर के एक अनूठे फिल्मकार की रोचक दास्तां सुना रहा है। अनिता ने किस्सागोई शैली में गोल्डी और उस दौर का इतिहास लिखा है।

थोड़ा लेखक के बारे में बताते चले कि अनिता पाध्ये मुंबई में रहती हैं और पिछले 33 वर्षो से मराठी, अंग्रेजी, हिंदी समाचार पत्रों में फिल्म पर लिखती रही हैं। उन्होने न्यूज चैनलों में भी रिसर्चर के रुप में काम किया और पटकथा लेखन भी किया है। इनकी कुछ मराठी पुस्तको का हिंदी में अनुवाद हुआ है जिनमें दस क्लासिक्स और इश्क का जहर भरा प्याला किताबें हैं।

लेखिका के बारे में दिलचस्प बात ये कि जब ये पहली बार विजय आनंद से मिलीं तो उन्होंने पहला सवाल दागा था- “क्या तुम वही लड़की हो, जिस पर देव ने केस दाखिल किया है ?”

उस समय देव आनंद के विरोध में उनके सहयोगी निर्माता का इंटरव्यू छापने के कारण देव साब ने अनिता पर और पत्रिका के संपादक पर एक करोड़ रुपये का मानहानि का दावा दाखिल किया था। तब वह केस चल रहा था। अनिता से जब ये सवाल पूछा तो उनके सामने एक दुविधा हो गई कि सच बताना जरुरी है और सच बताया तो गोल्डी साक्षात्कार देने से मना भी कर सकते हैं। सच छिपाना उचित न था। अनिता ने सिर हिलाकर हामी भर दी। गोल्डी थोड़ी देर चुप रहे। अनिता को लगा, बिना इंटरव्यू के यहां से निकलना होगा। वह मन ही मन खुद को तैयार कर चुकी थी। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद गोल्डी ने अनिता से कहा- चलो, बातचीत शुरु करते हैं। पूछो, तुम्हें जो कुछ पूछना है। पहली मुलाकात बहुत लंबी चली और खुल कर बातें हुईं । पहली मुलाकात कई बार पहली नहीं रह जाती जब आप आत्मीय ढंग से बातचीत करते हैंष ऐसा लगता है, मानो बरसो से जानते रहे हों एक दूसरे को। इससे किसी के व्यक्तित्व का अंदाजा लगा सकते हैं आप। महान लोग अपने से छोटे को भी इतना सहज बना देते हैं कि वो खुल कर उनसे बातें कर सके। इतिहास में जगहें यूं ही नहीं बना करती किसी की।

आखिर गोल्डी को भी पहली मुलाकात में ये कहना पड़ा- “अनिता, पता नहीं क्यों, पर तुमसे बात करके मुझे बहुत अच्छा लगा, अपनापन महसूस हुआ। देखो, दो व्यक्तियों के वेवलेंथ आपस में मेल खा जाए तो शरीर से कंपन निकलने लगते हैं।“ ऐसा कहते हुए गोल्डी ने अपनी हथेलियों से अपना हाथ छू लिया था। उस कंपन का यकीन दिलाने के लिए, उसे महसूस करने के लिए।

अनिता ने किताब से इतर भूमिका में कई दिलचस्प बातें बताई हैं जिनसे गोल्डी के सौंदर्य बोध का पता चलता है। जैसा कि हम सभी पत्रकार करते हैं, किसी से इंटरव्यू करने जाएं तो जैसे हैं, वैसे ही उठ कर चले जाते हैं। कोई साज सिंगार नहीं, बस आंतरिक तैयारी पर ध्यान रहता है। “प्रिंट मीडिया में रहते हुए मैंने भी जाना कि सजना संवरना फिजूल काम था तब। गोल्डी ने एक बार कहा था- “अनिता, यू आर प्रीटि गर्ल। तुम्हें अच्छी तरह बन संवर कर रहना चाहिए।“ लिपिस्टिक और नेल पॉलिश का रंग तक वे बात सकते थे कि कौन-सा लगाए जिससे सुंदर दिखा जा सके। पहली मुलाकात में अगर दो लोगो की केमिस्ट्री मैच कर जाए तो ही ऐसी किताब संभव हो पाती है। अनिता का गोल्डी से आत्मीयता न बढ़ होती तो गोल्डी का इतिहास कहां से खुल कर सामने आता। इतनी बातें वे किससे कहते। सिनेमा का कई सच उनके साथ ही चला जाता। ऐसी किताब लिखने के लिए सिर्फ साक्षात्कार नहीं, गहरी आत्मीयता, अपनापन बहुत जरुरी होता है जहां आप भरोसे के साथ अपना जीवन खोल सकें। गोल्डी ने सबकुछ बताया। अपना पाप, पुण्य कुछ नहीं छुपाया। अपने दुख-दर्द, अपनी कमियां, अपने विचार और अपनी लड़ाईयां सब खुल कर बताईं।

लेखिका ने भी उनके जीवन को पूरी तरह खोला है । कई ऐसे सच उदघाटित हुए हैं जिन्हें कोई नहीं जानता। कोई जान भी नहीं पाता। गोल्डी का दुख ये है कि उन्होंने कभी जीवन में पैसा नहीं कमाया। गोल्डी की किसी भी फिल्म को रिलीज होने के तुरंत बाद लोकप्रियता हासिल नहीं हुई। केवल जॉनी मेरा नाम इसका अपवाद रही। गोल्डी ने कभी व्यवसायिकता के मद्दे नजर काम नहीं किया। इस बात वे खुश होते थे कि दशको बाद भी दर्शक उनकी फिल्म को याद करते हैं और उन्हें पहचानते हैं । कितना मामूली खुशी उस महान फिल्मकार की जिसने सिनेमा जगत को एक से बढ़ कर एक फिल्में दीं। कौन भूल पाएगा उनके द्वारा निर्देशित – तीसरी मंजिल, तेरे घर के सामने, गाइड, हमदोनों, जॉनी मेरा नाम, तेरे मेरे सपने, छुपा रुस्तम, ब्लैकमेल जैसी फिल्में भला कौन भूल सकता है। इन फिल्मों की चर्चा के बिना सिनेमा का इतिहास अधूरा है। उनके अभिनय की बात करें तो कोरा कागज ( 1974) का वह पुरुष पात्र कहां भूलता है। मारधाड़ और चालू मसाले वाली फिल्मों के दौर में एक ऐसी फिल्म आई जिसमें पारिवारिक ढांचे में दांपत्य संबंधों को बारीकी से समझा गया। प्रोफेसर सुकेश दत्ता ( विजय आनंद) का पौरुषेय अहंकार में डूबा चेहरा नहीं भूलता जो अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों का आज तक प्रतिनिधि चेहरा बना हुआ है।

देव आनंद के भाई होते हुए भी वे अपनी अलग पहचान बनाते हैं। एक साथ कई-कई रुपों में गोल्डी दिखाई देते हैं, निर्माता, निर्देश, अभिनेता और पटकथा लेखक। गीत-संगीत में उनका हस्तक्षेप कितना अमर हो सकता है, हम ऊपर देख चुके हैं। अपने आखिरी दिनो में गोल्डी ने फिल्मों से संन्यास ले लिया था। लेखिका ने विस्तार से बताया है कि अगर रजनीश उनके जीवन में न आए होते तो वे कभी संन्यास नहीं लेते। रजनीश के आश्रम से लौटने के बाद उनके भीतर का निर्देशक समाप्त हो गया था। उनकी महत्वाकांक्षाएं भी ध्वस्त हो गई थीं। वे कभी कहा करते थे कि आप पूरे दिल से किसी चीज को चाहो तो अपनी किस्मत बदल सकते हो। पर गोल्डी अपने ही जीवन से नकारात्मक घटनाओं को न बदल सके। जीवन के अनेक बुरे अनुभवों ने उन्हें बदल दिया था। ये अनुभव इतने मारक होते हैं कि इच्छाशक्ति को नष्ट कर देते हैं। उनके साथ भी यही हुआ था। अपने जीवन के कई वर्ष उन्होंने निराशा में बिताए। उनके लिए सबसे बुरा दौर था अभिनेत्री प्रिया राजवंश की हत्या। इस हत्याकांड में उनके भाई चेतन आनंद के दोनों पुत्रों केतन आनंद और विवेक को पुलिस ने संदिग्ध मानते हुए गिरफ्तार कर लिया था। यह हत्या जायदाद के विवाद के कारण हुई थी। उस वक्त चेतन आनंद की जायदाद का सारा काम गोल्डी देख रहे थे। भाई के दोनों पुत्रों को रिहा कराने के लिए गोल्डी ने कड़ी मेहनत की थी। देव आनंद ने खुद को इस विवाद से दूर रखा लेकिन गोल्डी ऐसा नहीं कर सके। वे अपने भाई और उसके परिवार को अकेला नहीं छोड़ सकते थे।

गोल्डी को हर कदम पर चोट लगती , क्योंकि वे गलत बात से समझौता नहीं करना चाहते थे। सत्तारुढ़ दल से करीबी होने के कारण जिन दिनों वे सेंसरबोर्ड के अध्यक्ष बने , वहां भी उन्हें कम दिक्कते न हुईं। सेंसर बोर्ड के सदस्यो की मनमानी देखकर, फिल्म निर्माताओं से उनका दुर्व्यवहार देखकर वे अत्यंत क्षुब्क्ष हुए और इसे ठीक करना चाहते थे कि इसी बीच एक और मामला हो गया। गोल्डी का तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज से कुछ मुद्दों पर मतभेद हो गए। गोल्डी उनके प्रस्तावों से सहमत न थे, लिहाजा उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। किसी के सामने झुकना उन्हें मंजूर न था। न ही उनके मन सरकारी पद, पैसा या पावर का मोह था। उन्हें इस्तीफा देने के बाद बहुत निंदा का सामना करना पड़ा था। वे शांत, अविचल बने रहे। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अनचाहे विवाद में घसीटे जाते हैं या सारे विवादों को, तकलीफो को उनका पता याद रहता है। सीखने वाली बात ये है कि हम उन परिस्थितियों में कैसे शांत और अविचल बने रहे। असली जीत यही होती है कि कीचड़ से कीचड़ को साफ न करें। उसे दामन में सूखने दें, सूख कर झड़ जाती है गंदगी। उन्होंने कीचड़ को झड़ जाने दिया।

लेखिका ने कई खुलासे किए हैं जिसमें एक घटना है विजय आनंद के लम्हाज चैनल का सर्वेसर्वा बनने की कथा। उन्होंने इनकार कर दिया कि चैनल कहीं प्रारंभ ही न हुआ तो कहीं उनका नाम न खराब हो जाए। और कुछ कमाया हो न कमाया हो, गोल्डी ने नाम तो जरुर कमाया था। इसे खराब नहीं होने देना चाहते थे। जो लोग सिर्फ नाम कमाते हैं, वे अपने नाम के प्रति बहुत सजग रहते हैं। असली पूंजी यही होती है किसी रचनात्मक इंसान की।

ऐसा नहीं कि गोल्डी ने जीवन में असफलताओं का दौर नहीं देखा। कुछ फिल्में असफल रहीं। दर्शकों ने नकार दिया। उनकी सारी असफलताओं को ढंकने के लिए उनकी एक फिल्म गाइड की काफी है। हिंदी सिनेमा का इतिहास बिना गाइड के अपूर्ण है। दस महान हिंदी फिल्मों में इसका नाम लिया जाता है। एक नहीं, कई बिंदुओं के लिए, कई कोणों से यह फिल्म अविस्मरणीय है। चाहे राजू गाइड हो या वहीदा रहमान हों या स्त्री-मुक्ति का उदघोष करना गाना है…आज फिर जीने की तमन्ना है, आज पिर मरने का इरादा है….। इस गाने के बनने के पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है। इस गाने को बनाने से पहले गीतकार शैलेंद्र को सिचुएशन समझाई गई। साथ में संगीतकार सचिन दा भी थे। गोल्डी ने समझाया – “नायिका के पति ने उसके जीवन से नृत्य और संगीत को निकाल बाहर किया है। जब उसे पता चलता है कि कला को त्यागकर उसने भूल की है तो जिद करके फिर से घुंघरु बांध लेती है। घुंघरु उसकी स्वतंत्रता, उसके जीवन में बदलाव का प्रतीक है। वह घुंघरु छमकाती लाज-शर्म छोड़कर चलती नाचती, दौड़ती जाती है…।“

कुछ देर बाद गीत तैयार हुआ। गोल्डी को एक पंक्ति सुनाई गई- “आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है…”

“बहुत बढ़िया…आगे….”

आगे शैलेंद्र कुछ लिख नहीं पा रहे थे। शैलेंद्र दो तीन दिनों तक आगे लिखने को लेकर उलझे रहे। तब गोल्डी ने पूछा- “आपको हो क्या गया है?”

शैलेंद्र ने जवाब दिया- “मैं खुद समझ नहीं पा रहा हूं। उलटी बात हो रही है। आज फिर जीने की तमन्ना है, आज मरने का इरादा है…।“

“तो फिर आप लिखिए कि क्यों जीने की तमन्ना है, क्यों मरने का इरादा है…कोई भी पूछ सकता है कि क्यों जीने की तमन्ना है, क्यों मरने का इरादा है…क्या कारण है। यह गीत का अंतरा है। अंतरें में हम बताएंगे कि यह हुआ और वह हुआ…तभी आज जीने की तमन्ना है….।“

इस तरह यह गाना तैयार हुआ जो आज भी सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है और एक पंक्ति तो मुहावरे की तरह इस्तेमाल होती है। जीने और मरने की तमन्ना कैसे एक साथ जग सकती है किसी स्त्री में, ये महान लोग ही सोच सकते थे। हिंदी सिनेमा ने पहली बार साठ के दशक में स्त्री-मुक्ति को ठीक से व्यक्त किया और यह गाना स्त्रीमुक्ति का प्रथम गान बन गया- दिल है कहीं, तो हूं कही मैं…जाने क्या मेरी जिंदगी ने हंस कर कहा…हा हा हा हा…। कुछ लोग इसे विवाहेत्तर संबंधो का, विवाह-मुक्ति का गान बताते हैं। ये है इस गाने की अमरता। कितना जोखिम रहा होगा, इस गाने को लेकर कि भारतीय समाज की परवाह किए बिना साहसिक गाना फिल्माया गया। इसे ही कहते हैं व्यवसियक जोखिम, जो गोल्डी खूब उठाते थे।

“कल के अंधेरो से निकल के, देखा है आंखें मलते-मलते….फूल ही फूल, जिंदगी बहार है, तय कर लिया…”

इस पंक्ति में स्त्रियों की पीड़ा का पूरा इतिहास, स्वप्न और संकल्प और भविष्य झांक रहे हैं।

नि:संदेह सिर्फ एक गाइड ही विजय आनंद को अमर कर देने के लिए काफी है। इस फिल्म के निर्माण का इतिहास अलग से लिखा जाना चाहिए कि कैसे गोल्डी ने निर्माता और वितरको के दबाव में आने से इंकार कर दिया था। उनके दबाव के वाबजूद फिल्म का अंत नहीं बदला। वे चाहते थे कि राजू गाइड की मौत न दिखाई जाए। उनमें आत्मविश्वास का दरिया ठाठें मारता था तभी गाइड ने सिल्वर जुबली मनाई। इस किताब में लेखिका ने विस्तार से गाइड फिल्म के निर्माण के किस्से लिखे हैं। इस पर पूरा अध्याय है जिससे गोल्डी के जिद्दी निर्देशक, अपनी शर्त्तो पर काम करने वाले फिल्मकार की छवि बनती है।

वे शुरु से सबसे अलग, लीक से हट कर दिखना और करना चाहते थे। यही किया। उनका मन कोरा कागज था, जिस पर अपनी इबारत वे खुद लिखते थे, किसी को लिखने नहीं देते थे।

यह किताब उनको समझने में बहुत मदद करेगी- एक व्यक्ति के तौर पर, एक पारिवारिक इंसान के रुप में, एक उम्दा फिल्मकार के रुप में जो अपने समय का क्लासिक रच गया।

गाइड जैसी फिल्म सिनेमा जगत के लिए एक फिनोमिना, सुघटना की तरह है जिसे सदियां याद रखेंगी।

……..

 
      

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