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मैं ‘बसंती हवा’ होना चाहती हूँ

आज पढ़िए रक्षा गीता का यह लेख। बसंत को स्त्री संदर्भों से जोड़ता हुआ। रक्षा गीता दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिन्दी कॉलेज में पढ़ाती हैं। लेख पढ़कर राय दीजिएगा-

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जी हाँ, मैं बसंती हवा बनना चाहती हूँ और इसके लिए मुझे बसंत की दरकार नहीं है, ऋतुओं के राजा बसंत और उसकी बसंती हवा की साहचर्यता सदियों से मानव में उमंग और ऊर्जा का संचार करती आ रही है, साहित्य में भी बसंत को बहुत महत्व दिया है लेकिन ‘बसंत’ की संगिनी ‘बसंती हवा’ ! उसकी बात करें, तो मुझे मेरी स्मृतियों से जुड़ी पाँचवी या छठी में पढ़ी ‘बसंती हवा’ कविता ही याद है, गूगल बाबा से पूछा तो उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए , मुझे तो वे भी ‘बसंत’ के ही प्रशंसक दिखे, बाबाजी जो ठहरे ! बसंती हवा वहाँ भी उपेक्षित ही लगी ,  संभव हो मुझे न पता हो यदि आपको बसंती हवा पर कोई कविता मालूम है तो कृपया बताइयेगा। लेकिन सूक्ष्म मानवीय संवेदनाओं व प्रकृति के कवि केदारनाथ अग्रवाल जब ‘बसंती हवा’ की चंचलता, चपलता और उसकी अठखेलियों को काव्य -फ़लक पर बिखेरते हैं तो बहुत सुन्दर व आकर्षक वह मनमोहक चित्रफलक आँखों पर छा जाता है, जो भी लड़की इसे पढ़ती होगी एकबार को तो लगता ही होगा ; मुझे तो हमेशा लगता है कि-‘मैं भी बसंती हवा होना चाहती हूँ’ क्योंकि हर लड़की बिना किसी रोक-टोक के बेधड़क बिना भय के स्वच्छंद विचरण करना चाहती है , केदार जी लिए प्रकृति न तो  ‘उद्दीपन मात्र’  है, न ही ‘मैं शैली’ को व्यक्त करने का माध्यम बल्कि उनके लिए  ‘प्रकृति और मानव सहचर हैं’। स्त्री भी यही इच्छा रखती है न, सहचरी होना ! ‘पुरुष की सहचरी’ जो स्वाभाविक ही है । प्रकृति और स्त्री दोनों ही पूँजी केन्द्रित वर्चस्ववादी पितृसत्ता की शोषण का शिकार होती रहीं हैं, पुरुष ने बाहुबल के दम पर, दोनों को जड़ संपत्ति मान, मात्र उपभोग किया, अधिकार जताया, मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया इसलिए तो दोनों विनाश की कगार पर विद्रोह करने को आतुर हैं  ‘इको फेमिनिस्ट’ में प्रकृति और स्त्री शोषण में समानता बताते हुए इस बात पर जोर दिया गया है कि दोनों को सम्मान और संरक्षण की ज़रुरत है, लेकिन अफ़सोस!!

इस वर्ष भी बसंत आया है, सभी ने वसंत-पंचमी मना ली और पता भी न चला ! ये हवा की-सी तीव्र गति लिए डिजिटल मीडिया का ही कमाल है सभी त्योहार नेटवर्क तंत्र में उलझे, हवा में ही आकर ,हवा में ही विलीन हो जाते हैं । फिर आभासी पटल पर स्पर्श-अनुभव का ईजाद भी कहाँ हुआ है अभी !! ‘बसंत आ गया’ है, ‘बसंती हवा’ बौरा रही है…मस्ती से नहीं,  भय से!! चारों ओर नफरत की बयार जो बह रही है। तभी शायद ‘बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं’!! कैसे ये कहे कोई ‘सखि वसंत आया’! इसे विडंबना ही कहें कि आज परिवेश में वसंतोत्सव के विपरीत होली-सा हुडदंग चालू है, ‘रंगभेद’ से विभेद का खेल अपने शबाब पर, नहीं-नहीं उन्माद पर है, कहने वाले इन खिलाड़ियों को ‘दंगाई’ भी कह रहें हैं, कहा करे, फिर होली में ‘लड़के-लोग’ दंगा किया ही करते हैं और माफ़ भी कर दिए जातें हैं, ठीक ही तो है गलतियाँ तो लड़कों से ही हुआ करती है, देवी-तूल्य लडकियों का भला गलती से क्या लेना देना, देवी जो ठहरी ! ‘मैन मैड’ इन लड़कियों को गलती करने के लिए बनाया भी नहीं गया कठपुतली – सी , जैसा चाहा वैसा नचाया और खेला’  लेकिन रंगोत्सव के इस खेल में न तो सूखे रंगों से हवा गुलज़ार है, न ही गीले रंगों की ठंडक; स्नेह-भीगे रंगों की तो कल्पना भी नहीं कर सकते। मौसम के प्रतिकूल अब के  बसंत की इन ‘गर्म हवाओं’ ने पूरे भारत को भ्रमित किया हुआ है, कुल मिलाकर कहें कि बसंत की मस्ती, बसंती हवा का मस्तमौलापन दोनों सिरे से गायब है, सच ही है जब रंगों पर ‘राजनीति की छाया’ पड़ जाए तो कालिमा के अलावा क्या ही दिखाई देगा। हालाँकि ये सहज ज्ञान सभी को है कि ‘काले रंग पर बसंती रंग’ भला कैसे चढ़ सकता है ? हर रंग का अपना महत्व होता है, हाँ, रंग-ज्ञान से अपरिचित बालक अगर रंगों का घालमेल करे, उसे मटमैला करे तो समझ भी आता है लेकिन समझदारी तो रंगों के विरोधाभासी चरित्रों (कंट्रास्ट) को समझ उनके भीतर से नई चमक खोजने में हैं, पर रंग-शोध की सृजनात्मकता तो विध्वंसक धमाकों में परिवर्तित हो चुकी है, ‘तोड़-फोड़-गठजोड़’ और नवनिर्माण में भला क्या नाता !  बस वही कहावत चरितार्थ रही है “मैं और मेरा नाता दूजा आये तो फोड़ू माथा” अपने ‘भेजे’ में कुछ है नहीं और दूसरे का ज्ञान लेना नहीं बस तले जा रहें हैं भजिया, कुछ और काम धंधा भी तो नहीं!! हम्म…

‘बसंत’ क्या रूठ गया इस बार ! रूठा करें!! लेकिन वर्तमान  बसंत ऋतू के स्वभाव के प्रतिकूल इन गर्म हवाओं में अगर कोई सबसे ज्यादा झुलस रहा है तो वह है स्त्री,  जिसने अपनी ‘अस्मिता’ को बचाने के लिए ‘हिजाब’ का सहारा लिया है। हम जानते हैं, प्रकृति की उपेक्षा से जब असंतुलन उत्पन्न होता है तो वह प्रलयंकरी हो जाती है, इसी प्रकार स्त्री की उपेक्षा उसे विद्रोही बना देती है तब दोनों आक्रामक हो विध्वंसक भी हो सकतीं है,होती हैं । प्रकृति जब-तब अपना रौद्र रूप दिखा   चेतावनी ही तो देती है । केदारजी अपनी एक अन्य कविता ‘वीरांगना’ में नारी को शक्ति-स्वरूपा मानते है, उनके अनुसार स्त्री जो विषम परिस्थितियों में कल्याण हेतु विविध रूपों में खुद को ढालती है, तो कठोर ‘गोली’ बनकर विद्रोह भी कर सकती है “मैंने उसको जब जब देखा, लोहा देखा, लोहे जैसे तपते देखा, गलते देखा, ढ़लते देखा, मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा”, अब आप ही बताइए कि माँ चाहे धरती हो या अपनी माँ, प्रकृति हो या स्त्री, कितनी कद्र करतें हैं हम उनकी ?? ऐसा ही एक दृश्य हमने कर्नाटक में नज़र आया, विषम परिस्थितियों में  एक छात्रा को बन्दूक की गोली-सा चलाते देखा और उस गोली से ‘कुछ लोग’ आहत हुए पर लक्षण पूरे देश में नज़र आ रहे हैं। वो लड़की बसंती हवा सी उन्मुक्त भयरहित उड़ान भरना चाहती है, लेकिन पितृसत्ता और राजनीति का गठजोड़ उसे जकड़ने को तैयार, घेराव किये खड़ा है । डिजिटल तंत्र ने यदि स्त्री को स्वतंत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है तो  इसी डिजिटल तंत्र को पितृ व्यवस्था अपने तंत्र में समाहित करने को अमादा है। सोशल मीडिया हमें पल-पल की सूचना देता है, तो हिजाब प्रकरण का एक नकारात्मक पक्ष ये भी हुआ कि दूरदराज़ गाँव या शहर की, हिजाब से मुक्ति पा चुकी सैकड़ो महिलाएं अपना विरोध दर्ज करने भर के लिए पुन: हिजाब पहनने को विवश हुई, जो गंभीर चिंता और चिंतन का विषय है कि विकास आगे कि ओर ले जाता है या पीछे की ओर?

वसंत की देवी, माँ सरस्वती क्या अब भी अपने पुत्रों पर ही कृपा दृष्टि बरसाएगी ! लड़कियों को आशीर्वाद न देगी?  पर माँ भेदभाव कैसे कर सकती है? पहले किया करती थी, लेकिन आज भी 21वीं सदी में, विद्यालय के मंदिर में अपनी बेटी को प्रविष्टि देगी न वो ! पर पुत्री को रोका जा रहा है, क्यों ? लेकिन अब वस्तुस्थिति यह है कि अब जब हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का ‘वसंत आ गया’ तो उसकी ‘बसंती हवा’ का आना कौन रोक सकता है, वैसे भी हवा को कौन रोक सका है? ये जानकार भी कि इस बसंती हवा’ के साथ ही सारी सृष्टि का हँसना संभव है’ ! पुरुष अपने लाभ के लिए, स्त्री को घरों के सुरक्षा घेरे में एयर टाइट डब्बे की तरह बंद करके रखना चाहता रहा है, पितृसत्तात्मक तंत्र में कैद ताज़ी हवा के अभाव में स्त्री-शक्ति और संवेदना घुट-घुटकर जीती रही है । अब ‘वसंती हवा’ होकर, स्त्री स्वछंद विचरण करना चाहती है, स्वच्छंदता उसकी प्रकृति भी है और बसंती हवा की प्रकृति तो स्वछन्द ही होती है, लेकिन मानव ने तो ऑक्सीजन को भी सिलेंडर में कैद कर लिया है लेकिन जिस प्रकार ‘बसंत आता नहीं, ले आया जाता है, जो चाहे अपने पर ले आ सकता है’  फिर सब को अपना संघर्ष स्वयं करना पड़ता है अकेले ‘प्रकृति’ उसमे बदलाव नहीं कर सकती। अत: ‘बसंती-हवा’ ने ठान लिया कि बसंत का इंतज़ार नहीं करेगी, भले घर की भली लड़कियों की भाँति वो समझदार न सही, पर निडर और मस्तमौला है,बावली ही सही !  बिना किसी बात की फ़िक्र किये, स्वच्छंद, स्वतंत्र जहाँ चाहे वहां घूमेगी।

केदार जी की कविता ‘बसंती हवा’ की स्त्री संदर्भो में व्याख्या हुई या नहीं, नहीं जानती लेकिन बसंतमाह में जब एक लड़की को शिक्षा-मंदिर के लिए संघर्ष करते देखा तो लगा कि केदार जी की ‘बसंती हवा’ ही ‘वीरांगना’ बन गई जो कह रही है कि ‘मैं ही इस गगन और धरा की प्राण वायु हूँ, मैंने ही तो अपने कष्टों और श्रम से इस धरा में प्राण फूंक रखें हैं, मेरे ही संगीत की गति-यति की लय से जीवन का मधुर संगीत निर्मित हुआ है, मैं ही तो प्रेम-आसन जिलाए हुए हूँ अर्थात् वसंतोत्सव में जो प्रेम का उत्सव है, रसोल्लास है, नवयौवन के इस उत्साह में ऊर्जा का संचार करने वाली मैं ही तो हूँ , इसलिए चाहती हूँ कि मैं इतनी निडर बनूँ कि बिना फ़िक्र के बिना किसी डर के आज़ादी से घूम फिर सकूँ, मुझे कैद कर घर में रखने का किसी के पास कोई बहाना न बचे , मेरी निडरता से ही मेरा परिवार और समाज निश्चिन्त रह सकता है , इसलिए निडर होना ज़रूरी है। न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन; यानी पुरुष की भाँति मेरी कोई बड़ी महान महत्त्वाकांक्षाएं नहीं हैं, क्योंकि मैं तो ‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’ वाली प्रकृति की हूँ , किसी के प्रति मेरा कोई दुराग्रह या पूर्वाग्रह नहीं है, मेरा स्वभाव ही ऐसा ही उदार है कि जिस किसी के संपर्क में रहूँगी, उन्हें भी झूमाती-झूलाती चली जाऊँगी, वे मेरे समान मस्तमौला, बेफिक्र हो जाएँगे । मेरी चंचलता, शरारती स्वाभाव आपको न पसंद आये, न सही ! मैं तो बस आपके कान में शरारत से ‘कू’ की आवाज़ कर अपना लक्ष्य बताऊंगी और  चिढ़ाकर आगे बढ़ जाऊंगी, जैसे बसंती हवा महुआ और आम के पेड़ को हिलाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की कोशिश करती है और वे टस से मस नहीं होते तो वह उन्हें चिढ़ाती आगे बढ़ जाती है ।इसी तरह आज की स्त्री कह रही है जो भी रूढ़िवादी परम्पराओं व पूर्वाग्रहों की अकड़ लिए, मेरी राह में आएगा तो मैं भी उनकी उपेक्षा कर आगे बढ़ जाऊँगी, आगे बढ़ती चली जाऊँगी। इसलिए तो “मैं बसंती हवा होना चाहती हूँ’ , बसंत साथ दे अथवा नहीं !!!

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One comment

  1. जय प्रकाश

    स्त्री प्रकृति और बसंत.. के माध्यम से लेखिका ने वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक सरोकारों को जीवंत कर दिया हुआ है

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