Home / Featured / नमन नारायण की कहानी ‘टाइमपास’

नमन नारायण की कहानी ‘टाइमपास’

21 वर्षीय नमन नारायण की टिप्पणियाँ हम पहले भी जानकी पुल पर पढ़ते रहे हैं। इस बार उसकी एक छोटी सी कहानी पढ़िए। किशोर जीवन के अनुभवों को लेकर हिंदी में कम कहानियाँ लिखी गई हैं। यह एक दिलचस्प कहानी है-
==============================
 
मैं रोज़ आता हूँ यहाँ, स्कूल के बाद। जय माँ तारा स्वीट्स आना हमारा रिवाज़ था। तुझे विश्वास नहीं होता तो बेलू दा से पूछ लो, हमारा ऑर्डर अभी भी याद है उन्हें, चार सिंघाड़ा और दो संदेश। मैं और छोटा हाथी रोज़ यहाँ आते थे। हाँ, उसके पापा के पास दो टाटा ऐस थी और पता नहीं क्यों, एक दिन वो उसे टाटा ऐस में स्कूल छोड़कर गए। उस दिन के बाद से, हमारी क्लास क्या, हमारी बैच का हर लड़का उसे “छोटा हाथी” बुलाता था। हम दोनों एक ही क्लास में थे, 9 A, एक ही बेंच पर बैठते थे। पूरे स्कूल में हम एक-दूसरे के अलावा सिर्फ टीचर्स से बात करते थे वो भी तब जब वो हमें क्लास में बात करने के लिए, बाहर निकालते थे। मुझे हमेशा से इरशाद कामिल बनना था और उसे नेवी में जाना था। ये बातें हमने सिर्फ एक-दूसरे को बताई थीं और आपस में ही हमने सारे फैसले भी ले लिए थे, मुंबई में बड़ा घर लेंगे, समुंदर के साइड में, ऊपर मैं रहूँगा, नीचे वो, शादी नहीं करेंगे, बस काम करेंगे और पार्टी। पार्टी जैसी रनबीर कपूर “वेक अप सिड” में करता है वैसी। हमारी बातें कभी ख़तम ही नहीं होती थी, पूरा दिन स्कूल में बातें करते थे फिर यहाँ बैठकर टाइम-पास करते थे और फिर घर जाकर सोचते थे, कल क्या बताएंगे एक-दूसरे को। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, पर फिर प्रो-कबड्डी आ गया।
2014 में प्रो-कबड्डी की सफलता के बाद, कोलकाता पर कबड्डी का बुखार चढ़ा हुआ था। हमारा स्कूल फीस हसोतने के सिवा हर काम में धीरे ही चलता था पर उस साल हमारे स्कूल ने भी एक इंटर स्कूल टूर्नामेंट में अपनी कबड्डी टीम भेजने का फैसला किया। उस दिन असेंबली में हमें ऋतुराज सर से मिलवाया गया जो कबड्डी टीम को ट्रेनिंग देने आए थे। ऋतुराज सर लम्बे थे, 6’3″ होंगे, और उनकी बॉडी स्पोर्ट्स वालों जैसी थी, क्या कहते हैं? पता नहीं, टोंड समझ ले। उन्होंने अपनी टूटी-फूटी इंग्लिश में कुछ मोटिवेशनल कोट कहा, व्हाट्सऐप वाला, और फिर बोले कि अगले हफ्ते ट्रायल्स होंगे। जनता उत्साहित थी पर इस उत्साह का असर मेरे और छोटा हाथी जैसे लोगों पर नहीं पड़ेगा, ऐसा मैंने सोचा था।
छोटा हाथी, उस दिन, रिसेस में गायब था। वो वापस आया तो मुझे बोलने लगा कि आज से वो मेरे साथ वापस नहीं चलेगा, उसे ट्रायल्स की तैयारी करनी है। पहले तो मुझे लगा कि वो मज़ाक कर रहा है पर घर जाते समय वो ग्राउंड की तरफ मुड़ने लगा। मैंने उससे कहा था, बेकार में क्यों जा रहा है, एक तो वो खुद फुटबॉल था, मेरे जैसे, हम स्पोर्ट्स के लिए बने ही नहीं थे! दूसरा, सब को पता था कि इस साल भी सिलेक्शन सिर्फ सांड और उसके दोस्तों का होना है। समर सिंह या “सांड” हमारे स्कूल की हर स्पोर्ट्स टीम का कप्तान था, क्योंकि वो लम्बा-चौड़ा था, किसी को भी पीट देता था। कभी-कभी तो मैंने अपने पुराने स्पोर्ट्स टीचर की आँखों में भी उसका डर देखा था। खैर, छोटा हाथी, मेरी बातों में इंटरेस्टेड नहीं था। वो चला गया। उसके बाद हफ्ते-भर वो गायब ही रहा।
सुबह जल्दी स्कूल आ जाता, सीधा ग्राउंड चले जाता, फिर पूरा दिन ऋतुराज सर के पीछे-पीछे घूमता रहता और स्कूल के बाद वापस ग्राउंड चले जाता। उसने बेलू दा से कहा था, ‘अगर मैं सिंघाड़ा खरीदने भी आऊं तो मुझे भगा देना, मैं डाइटिंग कर रहा हूँ, नहीं खा सकता’। एक बार मिला था, या ऐसा कह ले मैं उससे मिलने स्कूल जल्दी आ गया, हम ने कुछ पाँच मिनट बात की होगी, साढ़े चार मिनट सिर्फ वही बोला और ऋतुराज सर के गुण गाता रहा फिर मुझसे झेला नहीं गया और मैं बाय बोलकर आ गया।
ट्रायल्स वाले दिन, मैं भी गया था ग्राउंड। ये देखने कि हफ्ते-भर की डाइटिंग और ऋतुराज सर ने मेरे छोटा हाथी को टस्कर बनाया है या नहीं। वहाँ सब वैसा ही हुआ जैसा मैंने सोचा था। ट्रायल्स शुरू हुए, दो टीमें बनाई गई, छोटा हाथी को घेरकर मारा गया। जब वो रेड करने जाता तो सांड उसे धक्का मारकर बाहर फ़ेंक देता या कभी पटककर ज़मीन पर रगड़ देता। जब सामने वाली टीम का रेडर आता तो जान-बुझकर छोटा हाथी को ही ज़ोर से लात मारता। रेडर की लात खाने के बाद उसको अपनी टीम वालों से भी टपलियाँ मिलती। मुझे तो बिलकुल भी दुःख नहीं हो रहा था, मैंने तो कहा ही था यह होगा। मैच के हाफ-टाइम तक यानी दस मिनट में ही छोटा हाथी की हालत खराब कर दी गई और फिर उसे ऋतुराज सर ने खुद बाहर निकल जाने के लिए कहा।
वो रोता-रोता बाहर आया। मैंने उसे चिढ़ाना शुरू कर दिया, उसे बता रहा था कि आज उसकी कैसी धुलाई हुई है, वो मेरी तरफ देख भी नहीं रहा था। लेकिन फिर मैंने ऋतुराज सर का नाम लिया और कुछ कहा, क्या कहा ठीक याद नहीं, गाली-वाली दी होगी कुछ। छोटा हाथी ने तुरंत पलटकर मेरे मुँह पर थूक दिया। मैंने ये बिलकुल एक्सपेक्ट नहीं किया था। मैंने भी एक थप्पड़ खींचकर लगा दिया। उसके बाद हमारी लड़ाई शुरू हो गई। एक-दो लड़के सीटियाँ मारने लगे, मेरा नाम लेकर चीयर करने लगे। मैंने भी छोटा हाथी को ज़्यादा ही मार दिया। इतना नहीं मारना चाहिए था। वो ज़मीन पर पड़ा हुआ था, रो रहा था, मैंने उठने के बाद उसको दो लातें और मारी, अपनी आत्मा की शान्ति के लिए, फिर अपने रास्ते चलने लगा। उसके बाद क्या हुआ कुछ पता नहीं। क्योंकि छोटा हाथी ने मेरी सर पर ईंट मार दी थी। मेरा सर फट गया था।
मैं कुछ दिनों बाद स्कूल गया, पता चला, छोटा हाथी को निकाल दिया गया है। अब मैं बेंच पर अकेले ही बैठता हूँ और रोज़ स्कूल के बाद यहाँ आ जाता हूँ। अगर तुझे कहीं छोटा हाथी दिखे तो उसको बोल देना, सांड का टूर्नामेंट में वही हाल हुआ जो उसने इधर उसका किया था, और ऋतुराज सर परमानेंट हो गए हैं लेकिन, और, और पूछ भी रहे थे उसके बारे में, उसको बोल देना मैं बिलकुल गुस्सा नहीं हूँ और रोज़ जय माँ तारा स्वीट्स आता हूँ, उसका वेट करता हूँ, जिस दिन वो स्कूल नहीं आया मैंने उस दिन से पैसे बचाकर रखे हैं, उसको बोल देना आ जाए, पार्टी मेरे पर है –
अनिकेत ने मुझे अपना फूला हुआ वॉलेट दिखाया, वो दस-दस के नोटों से भरा था। मेरी बारह रूपए वाली कोक ख़तम हो गई थी और बढ़िया टाइम-पास भी हो गया था। मैं, ‘हाँ बोल दूंगा’, कहकर चला गया।
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

देश छूटकर भी कहाँ छूट पाता है

वरिष्ठ लेखिका सूर्यबाला के उपन्यास ‘कौन देस को वासी: वेणु की डायरी’ की यह समीक्षा …

Leave a Reply

Your email address will not be published.