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किंशुक गुप्ता की कहानी  ‘सबसे पहले दिल देह चाहता है*

आज पढ़िए किंशुक गुप्ता की कहानी। किंशुक मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ लेखन से कई वर्षों से जुड़े हुए हैं। अंग्रेज़ी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। द हिंदू, द हिंदुस्तान टाइम्स, द डेक्कन हेराल्ड, टाइम्स ऑफ इंडिया, द क्विंट के लिए स्वतंत्र लेखन। द अनामिका पोएट्री प्राइज़ (2022) से सम्मानित। ऑल इंडिया पोएट्री प्राइज़ (2018); श्रीनिवास रायपरोल पोएट्री प्राइज़ (2021) आदि पुरस्कारों के लिए शॉर्टलिस्टेड। हिंदी कहानियाँ हंस, वागर्थ, पाखी और समालोचन में प्रकाशित। ‘मिथिला रिव्यू’, ‘जैगरी लिट’, ‘उसावा लिटरेरी रिव्यू’ के संपादक मंडल के सदस्य। पढ़िए उनकी कहानी-

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1.

न जाने कैसे उसे दूध पिलाते-पिलाते आँखें झिप गईं और कैसे अटपटे दृश्य तैरने लगे। मुझे लगा जैसे मेरे उरोजों को शिशिर की नम जीभ सहला रही है। शरीर को ठकठकाता कोई भूकंप अंदरूनी ज़मीन पर धीरे-धीरे पैंठ कर रहा है। दोनों हाथ, जिनमें मेधा का अंडाकार चेहरा पकड़ उसे दूध पिला रही हूँ, इस तरह झनझनाने लगते हैं कि लगता है जैसे मेधा गेंद की तरह मेरे हाथों से ढुलक पड़ेगी। चौंककर मैं उसके मुट्ठी जितने चेहरे को अपने स्तनों के बीच कसकर भींच लेती हूँ।

शिशिर की छातियों का उभार, काले गुच्छेदार बाल, तनी हुई माँसल देह—उसके नीचे मैं—जैसे शरीर दो अलग भाषा की वर्णमालाएँ—दोनों एक-दूसरे की तासीर जानते-समझते, सालों के फफोलों पर आश्वस्ति भरी अँगुलियाँ फिराते, स्वरों और व्यंजनों का रसास्वादन करते हुए तृप्ति की तान तक पहुँच जाते। भाषा थी, पर मूक, उच्चारण की ज़रूरत से परे, जो हम समझ जाते थे। उन मादक क्षणों में भूलना जैसे एक नियति थी जिसमें औचक ही चौंधियाता विराट सच हमारे सामने उजागर हो जाता था।

मेधा की लपलपाती जीभ से स्तनों के बीच गीलापन महसूस होता है। मैं उसे फिर स्तनों से लगा लेती हूँ। दूध की बूँदें मुँह में जाते ही वह हाथ-पैर हिलाना बंद कर आँखें मूँद लेती है।

उसको पालने में छोड़ मैं शिशिर का खाना गर्म करने रसोई में जाती हूँ। काँच के बर्तन में दाल पलटते हुए, मैं उसे फोन मिलाती हूँ पर वह उठाता नहीं। व्हाट टाइम टूडे—मैं व्हाट्सऐप पर मैसेज छोड़ फुलके बनाने लगती हूँ।

उसका खाना प्लेट में परोसकर डाइनिंग टेबल की लेदर चेयर पर आकर बैठ जाती हूँ। दिमाग के किसी कोने में छिपा वह ख्याल फिर कुलबुलाता है। न जाने कितने दिनों से कितने सुगढ़ शरीर वाले नग्न पुरुष सपनों में मेरा शरीर उमेठते हैं। अधकचरी नींद में उठ बैठती हूँ तो लगता है जैसे सारे शरीर पर चींटियाँ रेंग रही हैं। नींद में शिशिर का सुकुमार चेहरा आकर्षक और निश्चल लगता है, और मैं अपराध-बोध से घिरी सोचती हूँ जैसे ये सारी चींटियाँ मेरे शरीर को काट खाएँ। चाहत की इन चिड़ियाओं ने कब मेरे मन में घोंसले बना लिए?

तभी एहसास होता है कि दरवाजे की घंटी बज रही है। शिशिर अपनी नीली कमीज़ और लाल टाई पहने सामने खड़ा है।

“कहाँ गुम रहती हो…” वो झींक कर कहता है।

मैं उसका चेहरा अपने हाथों में भींच उसके होठ चूम लेती हूँ, जब वो मुझसे छिटक कर अलग हो जाता है। कंधे से अपना लैपटॉप बैग उतारकर सोफे पर रखता है और भर्त्सना से भरकर कहता है, “डोंट बिहेव लाइक टीनेजर्स।”

मैं अचानक सकपकाई-सी रसोई की ओर बढ़ जाती हूँ। “चेंज कर लो। खाना लगा रही हूँ।”

मैं उसके आने का इंतज़ार नहीं करती। चम्मच को काँच की प्लेट पर जान-बूझकर ज़ोर से टकराती हुई खाने लगती हूँ। फर्श पर उसके पैरों के रगड़ने की आवाज़ होने पर सचेत होकर सिर झुका लेती हूँ।

“लुक्स डिलीशियस!” वो मेरे गालों पर हाथ रखता है और थपक देता है जैसे सांत्वना पुरुस्कार भी न मिलने पर बच्चों की पीठ थपथपाई जाती है।

मैं उसका हाथ झटक देती हूँ। वो टीवी चला देता है। इंडिया पाकिस्तान के बीच मैच के आखिरी दो ओवर्स बचे हैं। सचिन तेंदुलकर धुआँदार बल्लेबाज़ी कर रहा है।

शिशिर खाने लगता है लेकिन उसकी आँखें मैच पर ही टिकी हुई हैं।

“सुनो ना आजकल…” मैं हिम्मत कर उससे बात करने की शुरुआत करती हूँ। तभी सचिन गेंद को बा उँड्री के बाहर पहुँचा देता है।

“येय! वी विल विन! वी हेव टू!” शिशिर कुर्सी से लगभग उछल पड़ता है और उस आवाज़ में मेरी बात कहीं गुम हो जाती है।

“तुम कुछ कह रही थीं?” वो संयत होकर पूछता है।

“नहीं…कुछ नहीं…एक और रोटी दूँ?” मेरी आवाज़ लड़खड़ा जाती है।

“और नहीं, थोड़े से चावल लूँगा।” वो बेफिक्री से टीवी की ओर देखता हुआ कहता है।

सचिन एक अंतिम चौंका मारता है। भारत जीत जाता है। मैं झूठी प्लेट उठाने लगती हूँ जब वो मेरा हाथ पकड़ लेता है। “मैं जानता हूँ तुम क्या कहना चाहती थीं। अब थोड़ा मेरा भी मूड बन गया।”

“क्या?” मैं लगभग झुँझला जाती हूँ।

“अब इतनी शरीफ मत बनो…कल इंपोर्टेंट प्रेजेंटेशन है…सोचा था ब्रीफ तैयार कर लूँगा…बट आई कैन स्पेयर टेन मिनट्स। बट ओनली टेन।”

“मेरी बात तो सुनो।”

“अरे आई कैन स्पेयर सम टाइम। ये नखरे मारकर यू आर टर्निंग मी ऑन…”

वो मेरा हाथ पकड़ कमरे में ले जाता है। धक्का मार मुझे बिस्तर पर एक कनस्तर की तरह लुढ़का देता है। अपने सारे कपड़े एक झटके में खोल देता है। उसकी हल्की-सी तोंद निकल आई है, छाती के बालों में भी हल्की सफेदी है। मुझसे मेरे कपड़े उतारने की अनुमति तो माँगता है, पर मेरे सिर की हल्की-सी हरकत को ही हाँ मानकर मेरी जींस का बटन खोल देता है। होठों से जाँघों तक चूमता है, फिर मुझे घूरने लगता है। उसी मूक भाषा में कुछ पूछता है, जिसका हर हर्फ़ मैं भूल गई हूँ, जिसमें उसे मेरी टाँगें पाटने की स्वीकृति मिल गई है। आँखें बंद कर कुछ सोचने लगती हूँ, जब तक वो बिस्तर के दूसरी तरफ सरक जाता है। उसकी आँखें बंद है, साँसे गहरी हैं, दोनों होंठ खुले हुए हैं।

मैं कुछ देर तक कपड़े नहीं पहनती, वैसे ही काठ की तरह निस्पंद पड़ी रहती हूँ।

“अभी रुको।”

उसका यह कहना मुझे अंदर तक भिगा जाता है। “नहीं, मेरा शिशिर, उस मूक भाषा को ग्रीक, लैटिन नहीं होने देगा।”

थोड़ी देर में वो मेधा का डायपर बदल उसे मेरे स्तनों के पास छोड़ देता है। मैं मुँह के बल गिरती हूँ। उसकी मुस्कुराहट में ऐसा आत्मविश्वास है जैसा उन पतियों के चेहरे पर होता है जो सोचते हैं कि वे अपनी पत्नियों को गहरे तक समझते हैं।

“यह क्या इंडिया के जीतने के कारण था?” मैं मेधा को दूध पिलाती उससे पूछती हूँ, पर वो सो चुका है।

अगली सुबह मैं सबसे पहले नहाकर दीपक जलाती हूँ। हालांकि हर रोज़ भूल जाती हूँ, लेकिन ईश्वर भी तो उस मशीन की तरह ठहरा जिसमें सिक्के डालते ही सॉफ्ट टॉयज़ निकल पड़ते हैं।

मैं हाथ जोड़ते हुए यही प्रार्थना कर रही हूँ कि किसी तरह यह ख्याल रुक जाएँ। पहले की तरह मैं इस टूटे बाँध के वेग को अपनी नाज़ुक हथेलियों में समेटने में सक्षम हो जाऊँ। पहले भी तो शिशिर मुझमें भूख अकुलाकर चला जाया करता था। मन जैसे मूँज के बान वाली खाट पर लेटा रहता था—हल्की-हल्की चुभन परंतु कष्टसाध्य दर्द नहीं। तब भी तो अपने हाथों को आड़ा-तिरछा कर पूरी शरीर पर घुमाती रहती थी। लेकिन अब हथेलियाँ भी ठोस और रूखी हो चली हैं। उनमें अब वैसी कशिश कहाँ बची? मैं आँखें खोलती हूँ तो सामने विराजमान गणपति मेरी खिल्ली उड़ाते लगते हैं।

अपने आप को ही दोषी करार देने लगती हूँ। मैंने भी केवल एक बार में संतुष्टि की आहें नहीं भरीं। हमेशा और-और चाहती रही। ऐसा नहीं कि उसने कोशिश नहीं की, पर एक बार के बाद सब कुछ केवल एक एक्ट बन जाता। वह सब कुछ दोहराता जाता बिना किसी रोमांच के, एक असंपृक्त भाव से। अगर उसकी देह में कुलाँचे मारते हिरण की बजाय एक अधसोया कछुआ है, उसमें उसका क्या दोष?

शादी को ढाई महीना ही बीता था जब उसने किसी मित्र को घर बुलाया हुआ था। मैं दूसरे कमरे में बैठकर कॉलेज का कुछ बचा हुआ काम निबटा रही थी। अचानक याद आया कि चाय के अलावा तो कुछ और खाने को पूछा ही नहीं। दरवाज़ा खटखटाने ही लगी थी कि उनकी आवाज़ों की आती गूँज सुन वहीं ठिठक गई।

उसका मित्र अपनी भारी आवाज़ में शिशिर को समझा रहा था, ” तुझे तो खुश होना चाहिए ब्रो…मुझे तो अपनी वाइफ को मनाना पड़ता है।”

“मेरी अंदर से इच्छा ही नहीं होती। वो चाहती है कि मैं उसे समझूँ पर मैं भी तो उससे यही चाहता हूँ…वो भी तो मुझे इसके लिए फोर्स करना बंद कर सकती है।”

“घर में नहीं मिलेगा तो कहीं बाहर ढूँढने लगेगी। समाज

के सामने तो तेरी ही थू-थू होगी।”

मैं आसमान से गिरती हूँ—अपने दोस्त को इतनी निजी बात बिना मेरी सहमति के इतने आराम से बता दी, लेकिन मुझसे इस बात का ज़िक्र तक भी नहीं किया। क्या वो मुझसे कहेगा तो मैं नहीं समझूँगी? उस रात मन हुआ शिशिर से पूछने का कि अगर मैं उसे किसी और के लिए छोड़ दूँगी तो उसे अधिक दुख मेरे जाने का होगा या उससे बेहतर पति चुन लेने का?

सोचती हूँ कि शिशिर को सब साफ़-साफ़ बता दूँ। आज उसका मूड भी अच्छा है। सबसे अंतरंग तो वही है। बिना बात किसी तीसरे को अपने रिश्ते के सुराखों में झाँकने का मौका क्यों दूँ?

लेकिन सेक्स जैसे मुँह तक आकर ही रह जाता है। “लेट्स प्लान ए रोमांटिक नाइट टुगेदर।” मैं ऑमलेट के अंडे बीट करते हुए उससे कहती हूँ।

“तुम आजकल कमला दास पढ़ा रही हो क्या?” मैं एक बार फिर धक्क से रह जाती हूँ

“मैडम बॉवरी। पता है कौन है उसका राइटर?” मैं तुनक कर कहती हूँ।

“फ्लॉबर्ट। गुस्ताव फ्लॉबर्ट। अपने पति को इतना फुद्दू मत समझो।” उसने संजीदगी से कहा।

मेरी नाक पर तने गुस्से को देख गंभीरता से कहने लगा,

“देखो हमने डिसाइड किया था कि एक ही बेबी काफी है।” फिर आँख मारते हुए बोला, “दूसरे की मेरे अंदर कैपेसिटी नहीं! हॉस्पिटल इस टू हेक्टिक।”

उससे आगे जिरह करने का मन ही नहीं हुआ। बात खींचने से  बतंगड़ ही बन जाता। बातों-ही-बातों मैं पैन में ऑयल डालना ही भूल गई थी। ऑमलेट को मैंने जितना पैन से खुरचने की कोशिश की, उतना और-और चिपकता दिखाई दिया।

कमला दास का नाम कानों में गूँजता है। मुझे भी ड्राइव करते वक्त नीले कंचे जैसी आँखों वाले गठीले पुरुष दिखाई देते हैं। अमृता की तरह में भी चाहती हूँ कुछ दिनों के लिए साहिर। वही साहिर जो नज़्में लिखना जानता हो। जो मेरे झूठे कप को मेरे होठों के स्पर्श के कारण न धोए। जो सिगरेट जलाए, और आधी पीकर उसे बुझा दे ताकि उसके जाने के बाद मैं उसे अँगुलियों के बीच रख फिर सुलगा कर उसकी छुअन महसूस करूँ।

हाथ-में-हाथ डाले चलते प्रेमी-प्रेमिका के बीच पनपती सुगबुगाहटों से अजीब चिढ़ होती है। पार्क में बैठे, चना-ज़ोर गर्म खाते, खिसियाते, बतियाते छरहरे लड़के साँस खींचते इंसान नहीं दिखते बल्कि तीखी नाक, बदामी आँखें, लंबोतरा चेहरा लगते हैं—वो सब कुछ जो मैं सुख की चोटियों पर ले जाने वाले पुरुष से चाहती हूँ।

गाड़ी पार्क करते हुए मैं अपने कानों को छूकर देखती हूँ। भट्टी जितने तपे हुए। मेरे बाकी धुकधुकाते शरीर की तरह। मैं गहरी लंबी साँस लेती हूँ। कानों में इयरफोन डालकर बिना इधर-उधर देखे अपनी क्लास की ओर बढ़ने लगती हूँ। कोई फिलोसॉफी की बात याद करने लगती हूँ। फ्रायड, वुंग, ओरेलियस, शॉपेनहायर सबकी सेक्स और इच्छाओं पर तमाम बातें पढ़ी हैं लेकिन अब कोई सूझती क्यों नहीं? बस दिल की धड़कनें द्रुत गति से बढ़ती जाती हैं। कहीं से तैरता एक वाक्य दिमाग में कौंध जाता है—अगर किसी चीज़ को पाने में बहुत मुश्किलें हों, तो उसे कुछ समय के लिए भूल जाना चाहिए। भूल जाओ, भूल जाओ का रट्टा मारते हुए क्लास की ओर बढ़ जाती हूँ पर शायद शरीर इन तथ्यों के कटघरों में खड़ा होना नहीं जानता।

क्लास में घुसने से कुछ कदम पहले मैडम बॉवरी का आखिरी अध्याय याद करती हूँ। आज किसी भी हालत में खत्म कर वुदरिंग हाइट्स शुरू करना है। पिछले हफ्ते से सोचा हुआ था कि अंत के आखिरी आधे घंटे में एक बहस रखूँगी पर इस उथल-पुथल के कारण कुछ सवाल सोच ही नहीं पाई। क्लास में घुसकर लेक्चर स्टैंड पर अपनी किताबें रख ही पाती हूँ कि वही ख्याल फिर दिमाग में चक्कर काटने लगते हैं।

सामने खड़े लड़कों में संभावित प्रेमी दिखाई देते हैं। इस ख्याल से डगमगा जाती हूँ। माथा पसीने से तर हो जाता है। घूँट भर पानी पीती हूँ और बिना किसी अगले ख्याल को मन में लाए पढ़ाने लगती हूँ।

“चैप्टर 13”

पहले बेंच पर बैठे एक लड़के ने चटक पीली टी-शर्ट पहनी हुई है जिस पर लिखा है—फक दिस वर्ल्ड। नाक और कान में बाली, गले में लंबी मेटल चैन। सारे शरीर पर बेशुमार टैटू। वो अपने फोन में पूरी तरह खोया हुआ है। मैं उसे बाहर निकलने के लिए कहती हूँ पर वह इस चेतावनी को अनसुना कर देता है।

दूसरी बार भी वो मेरी बात पर कोई तवज्जो नहीं देता। पहले से ही झुँझलाई मैं उस पर चीख पड़ती हूँ। घसीटकर उसे बाहर करने के लिए हिंस्र भाव से उसकी तरफ बढ़ती हूँ। उसकी बाज़ू पकड़ने को होती हूँ जब वो मेरी हथेली पकड़ छिटक देता है। उसके स्पर्श में शायद दुत्कार हो, लेकिन मुझे एक दृढ़ता महसूस होती है। मेरा चेहरा विकृत बना रहता है, और वो अपने जूते पटकता इस तरह कमरे से बाहर निकल जाता है जैसे उसे कोई फर्क नहीं पढ़ता।

मेरे दिमाग में उस लड़के की आकृति घूम रही है, जबकि बाकी बच्चे बहस के विषय के लिए मेरा मुँह ताकने लगते हैं। मुँह से यकायक निकलता है—एम्मा बॉवरी ने क्या अपने पति को धोखा देकर ठीक किया?

एक लड़की पीछे से चीखी, “शी इस अब्सोलूटली राइट। वी शुड लव विदाउट थिंकिंग ऑफ कंसीक्वेंस।”

दूसरी लड़की प्रत्युत्तर में बोली, “इवन इफ थाट मीन्स कोलाप्सिंग यॉर होम।”

एक लड़के का जवाब गूँजा, “होम इस व्हाट वी बिल्ड आउर लाइफ अराउंड।”

“ड्यूड, थाट वॉस विक्टोरियन एरा। टॉक एबाउट दिस सेंचुरी।” लड़की ने तंज़ कसा।

“व्हाट एबाउट द हसबैंड हू लव्ड हर होनेस्ट्ली?” एक लड़के ने बात काटी।

“ही वॉस फूल थाट ही कुडेंट अंडर्सटैंड हर डिजायर्स। ही लेफ्ट हर विद नो ऑप्शन।”

“सो इफ देर इज़ नो ऑप्शन, चीट योर पार्टनर। हॉली फक।”

“वैसे भी दिमाग से सब एक-दूसरे को चीट करते ही हैं। वाय हैव यू मेड सच ए बिग डील अबाउट सेक्स।”

मैं एक स्तर पर सब कुछ सुनती रही थी, लेकिन दूसरे स्तर पर मैं उस लड़के के बारे में सोचे जा रही थी। हर बार दिमाग को उसके बारे में न सोचने के लिए चेताती, दूसरे ही पल उसका ख्याल ठाँठे मारता दूने वेग से मेरे दिमाग में प्रविष्ट हो जाता। समय की सुइयाँ धीमी हो गई थीं। बड़ी देर में घंटा हुआ और पर्स टाँगते हुए मैंने चैन की साँस ली।

बाहर उस लड़के को देख ठिठक गई जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। मैं एक चोर की तरह नज़रें बचाती निकल ही रही थी, जब उसने कहा—

“एम्मा ने अपने हिसाब सही ही किया। हम लोगों का सही-गलत हमारे तर्क और आदर्शों पर निर्भर करता है।”

“तुम्हारा नाम क्या है?” मैं उसे सिर से पैर तक घूरती हूँ।

“रायन”

रेने मैग्रिट की ‘लवर्स’ पेंटिंग मेरे ऑफिस की सामने की दीवार पर लगी है। दोनों चूमते प्रेमियों के चेहरे एक पर्दे में छुपे हुए हैं। न वो एक-दूसरे को, न कोई उनको देख पाता है। एक जो आशय लोगों को समझ आया है वह है की प्रेम करने वाले एक-दूसरे को कभी नहीं समझ पाते। जितने नज़दीक जाते जाते हैं, उतना फोकस बढ़ता है, पूरे अस्तित्व की बजाए हमें केवल अस्तित्व का वह हिस्सा दिखने लगता है जो हम देखना चाहते हैं।

पर अब मैं देखती हूँ तो सोचती हूँ क्या इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि शरीर स्वार्थी है, केवल अपना मतलब निकालना चाहता है, वह संसर्ग चाहता है, स्पर्श चाहता है, ऊष्णता चाहता है, और उसे जब तक उसे वह मिलता रहता है, उसे चेहरे या आंतरिकता से कोई मतलब नहीं।

मेज़ पर सिर टिका कर लेट जाती हूँ। रायन के ख्याल आने बंद नहीं होते। मेधा के पेट में होने के बारे में जैसे ही पता चला था शिशिर तो मुझसे बिलकुल कट ही गया था। मेरा पूरा ध्यान रखता लेकिन शारीरिक तौर पर पास भी नहीं फटकता। कहता कि बच्चे को कुछ भी खतरा हो सकता है और एक अजीब-सी हँसी हँसता मानो मुझसे कोई पुराना बदला ले रहा हो।

मेरा शरीर हर तरफ से फूल रहा था, कभी अपच, कभी गैस, कभी उल्टी, कभी भारीपन। शरीर जैसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन लगता। एक बंधन, एक पिंजरा लगता जिसमें मेरा दम घुट जाएगा। तब जब डॉक्टर, माँ, रिश्तेदार संकेतों में पति के साथ संबंध न स्थापित करने की कड़ी हिदायतें दे रहे थे, इच्छाएँ ज्वालामुखी की तरह फट पड़ती। कहीं भी। कभी भी। लेकिन अब और तब की इच्छाओं में फर्क था—तब केवल उसका सौम्य पक्ष चाहती थी कि गाल से गाल सटा वो मेरे साथ बैठा रहे, मुझे चूमे और दोहराता रहे कि मैं अब भी सुंदर हूँ।  लेकिन अब उससे बढ़कर चाहती हूँ, वह बाँकपन और बनैलापन।

किसी से बात नहीं कर सकती—यह सोचकर और कुढ़ जाती हूँ। लेकिन साशा को तो बता सकती हूँ, मेरे दिमाग में अचानक कौंधता है।

“कैसी है मलिनी?” साशा की वही आत्मविश्वासी आवाज़।

“ठीक हूँ यार। जेसन कैसा है?” मेरी निरीह आवाज़।

“वी आर प्लानिंग तो मैरी बाय द एंड ऑफ दिस ईयर।” उसकी आवाज़ में गुँजार।

“क्यों… मेरा मतलब इतनी जल्दी क्या है?”

“यार वी आर नाउ टायर्ड ऑफ बीइंग रडरलेस।”

“मतलब?”

“तू ये सब छोड़…अपनी बता। फोन क्यों किया था?”

“कुछ नहीं। ऐसे ही किया था। मन किया तुझसे बात करने का।”

“फिर वीकेंड पर बात करते हैं। आजकल ऑफिस थोड़ा हेक्टिक चल रहा है।” वो फोन रखने के लिए होती है, पर स्वीकृति में मेरा कोई जवाब न सुन फिर पूछती है, “हेलो…हेलो मलिनी…आर यू ओके?”

न जाने कैसे मेरी आँखों से आँसू धारासार होने लगते हैं। मैं फफक कर रो पड़ती हूँ, “नो, नथिंग इस अलराइट इन माय मैरिज।”

“काम डाउन यार…पानी पी…ये आदमी होते ही ऐसे हैं। बास्टार्ड।”

“डोंट स्पीक रबिश…शिशिर बहुत प्यार करने वाला पति और पिता है। इतने बिज़ी शेड्यूल के बावजूद मेधा का आधे से ज्यादा काम वही करता है।” मेरे मुँह से वाक्य अपने-आप फूट पड़ते हैं।

“फिर प्रॉब्लम क्या है?”

“आई कांट स्टॉप थिंकिंग अबाउट रायन।”

“कौन रायन?”

“…कोई नहीं।”

“मलिनी, टेल मी। प्लीज़ आई एम वरीड फॉर यू।”

“… ए स्टूडेंट”

“फॉर गॉड्स सेक…डोंट स्पॉएल यॉर होम। डोंट डू दैट। आई हैव ऑलवेज लुक्ड अप्टू यू एंड शिशिर।”

“लेकिन मैं अपने दिमाग से उसे नहीं निकाल पा रही हूँ।”

“टॉक टू ए थेरेपिस्ट यार।”

“शिशिर नहीं मानेगा कभी। और मैंने यूट्यूब विडियो भी देखे थे…कंपेशन या एंपैथी ही अलापते हैं सभी…अपने पार्टनर को समझो…”

“कन्वर्सेशन इज़ द ऑनली सॉल्यूशन।”

“वो ये बात छेड़ते ही झुँझला जाता है। पहले तो ही वाज़ ओके, अब न जाने क्या हुआ?”

“उसे कोई स्ट्रेस तो नहीं? सम मेंटल हेल्थ इश्यू?”

“कहा तो ही इज़ परफेक्टली अल्राइट।”

“भड़क क्यों रही है? अच्छा छोड़ उसको…तू अपना सोच…हैव यू ट्राइड फिंगर्स?”

“…आई नो लॉन्गर एंजॉय इट। इट फील्स अननेचुरल”

“गेट योरसेल्फ ए वाइब्रेटर देन हनी। दीज़ मैन कैन नेवर कंपीट इट।”

“वाइब्रेटर? मुझे नहीं पता बट आई डोंट फील राइट अबाउट इट।”

“फ्लश दीज़ मोरल्स।”

“मोरल्स की बात नहीं है… बेकार की हाइप क्रिएट की हुई है लोगों ने…क्योंकि अगर वाइब्रेटर इतना अच्छा होता तो अब तक तो आदमियों को ही रिप्लेस कर देता।”

“तू दुनिया की छोड़। फर्स्ट सेव योर मैरिज। सी यू।”

5.

लस्ट स्टोरीज़ में कियारा आडवाणी का वाइब्रेटर के साथ सीन रह-रहकर याद आ रहा है। जैसे ही यह दृश्य आया था मैं दंग थी देखकर कियारा का रबर की तरह तुड़ता-मुड़ता शरीर। दर्द मिश्रित मीठी कराह की बढ़ती ध्वनि सुन शिशिर ने मुझे घूरा था क्योंकि फिल्म देखने का आग्रह मैंने ही उससे किया था। मैं उसकी तरफ नज़र उठाकर देख भी नहीं पाई थी और फिल्म दो-तीन मिनट आगे खिसका दी थी।

गूगल सर्च करती हूँ और पूरा इंटरनेट वाइब्रेटर की तारीफ से अटा पड़ा है। हर जगह सुख की ऐसी व्याख्या है जिससे मेरा मन शायद अनचीन्हा ही रह गया है। ट्राई करने में क्या जाता है?

जब अमेजन पर वाइब्रेटर सर्च करने लगती हूँ तो न जाने कहाँ से आदर्शों की एक चीख मन में उठती है जिसके भार के नीचे मेरे सभी तर्क दम तोड़ देते हैं। तभी मुझे दिखता है कि रायन मेरे कपड़े इस तरह से उतार रहा है जैसे मक्की को घनछत सुनहरे बालों से अलग कर दिया जाता है। एक बार फिर मैं भौंचक्क सी फिर-से वाइब्रेटर भरने लगती हूँ।

जो सबसे पहले दिखाई दिया, मैंने बिना एक भी मिनट की देर

लगाए उसे झट से खरीद लिया। चेकआउट के दौरान अपना नाम बदलकर ‘एक्स वाई जेड’ कर देती हूँ लेकिन फोन नंबर कोई दूसरा नहीं है। शिपिंग डिटेल्स में क्या भरूँ? साशा के घर का पता दे दूँ…लेकिन यदि जेसन ने डिलीवरी रिसीव की? या कॉलेज का…अगर किसी चपरासी या क्लर्क के हाथ लग गया तो फज़ीहत हो जाएगी। अपने घर का ही एड्रेस देना सबसे सुरक्षित है। आज थोड़ा जल्दी कॉलेज से निकल जाऊँगी और मुस्तैदी से खुद ही पार्सल ले लूँगी। पेमेंट कैश ऑन डिलीवरी ही ठीक है—कहीं पासबुक रिन्यू करवाते हुए वहाँ पर लिखा आया…

घंटी बजती है तो दिल में धुकधुक होने लगती है। आज अचानक क्यों इतने सारे लोगों की घर में आवाजाही है? मैं हर आधे मिनट में मेल को रिफ्रेश करती हूँ। कॉल लॉग्स बार-बार चेक करती हूँ।  डिलीवरी एजेंट का फोन आता है तो एक गहरी साँस लेकर उठाती हूँ।

“मैडम, आपका पार्सल है। डॉक्टर शिशिर के घर पर डिलीवरी करनी है?”

“कौन शिशिर?” मैं आवाज़ भारी करके पूछती हूँ।

“मैम, एड्रेस तो उनके घर का ही है।”

“तुम्हारा दिमाग सही ठिकाने पर है क्या?” मैं उस पर खीज पड़ती हूँ। “जब एक बार कह दिया मैं किसी शिशिर-विशिर को नहीं जानती।”

“सॉरी मैम। वो एड्रेस वही लिखा हुआ है। मतलब शायद मेरे ही पढ़ने में गलती हुई होगी। कहाँ आना है?”

“वो जिस गली में मंदाकिनी एनक्लेव के लिए घुसते हैं, मैं तुम्हें वहीं खड़ी मिलूँगी।”

मैं शिशिर का ट्रैक सूट पहनकर और मास्क लगाकर निकलती हूँ।

मैं दबे पाँव सीढ़ियाँ उतर रही हूँ जैसे अब नहीं तो तब कोई बिल्ली की तरह दबोच लेगा। दूसरे फ्लोर वाली मिसेज़ सुनीता जब अपने घर के बाहर का लोहे का दरवाज़ा भाड़ के बंद करती हैं तो मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती है। मैं अचकचाकर वहीं खड़ी हो जाती हूँ लेकिन वो शायद किसी जल्दी में होने के कारण मुझे बिना देखे ही नीचे उतर जाती हैं।

मैं लगभग दस मिनट से वहाँ खड़ी हूँ जहाँ मैंने उस डिलीवरी ब्वॉय को बुलाया था। शाम का समय है तो पार्क की तरफ बढ़ते  हुए बहुत से लोग सामने से निकल रहे हैं। जब कभी कोई जाननेवाला मुझे देख किसी सोच में पड़ जाता है, तो मैं अपना चेहरा पीछे मोड़ उसी भारी आवाज़ में फोन पर बात करने लगती हूँ जब तक वो मुझे कोई और समझ कर निकल नहीं जाता।

पाँच मिनट बाद डिलीवरी ब्वॉय हाँफता हुआ वहाँ आता है तो उसे आँखें तरेरती हूँ।

डाँटने को होती हूँ कि वो पार्सल मेरी तरफ बढ़ा कहता है, “मलिनी मैडम, आपका पार्सल!” उसके होठों पर एक व्यंग्य-भरी मुस्कान तैर जाती है।

मुझे लगा जैसे मेरी कलई खुल गई, लेकिन फिर अपने को सहज कर उसे झिड़का, “मेरा नाम मलिनी नहीं है। तुम्हें कुछ गलती हुई है।”

“मैडम ट्रूकॉलर पर यही लिखा आया था।” उसने एक बालसुलभ मासूमियत से कहा।

“गलत होगा…मुझे क्या मालूम। मेरा नाम शिप्रा है।” मैंने बेफ़िक्री से कहा।

“मैम यहाँ तो एक्स वाय जेड लिखा है।” उसने उसी मासूमियत को बरकरार रखा।

“तुम्हें क्या मतलब…पैसे पकड़ो और चलते बनो।” मैंने रौब से उसके हाथ से पैकेट छीन लिया।

पैसे उसने अपनी शर्ट की जेब में डाले और सिर से पैर तक मुझे अपनी आँखों की एक्स-रे मशीन से टटोला। फिर अपनी नज़र मेरे क्लच पर गड़ाकर वहीं खड़ा रहा। मैंने सौ रुपए का नोट निकालकर उसे थमाना चाहा तो उसने पकड़ा  नहीं बल्कि फूहड़ ढंग से अपने सामने के पीले दाँत दिखाकर हँसने लगा। “कितना मज़ा आएगा जब सबको…” उसने चटखारे लेते हुए कहा।

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मैंने पाँच सौ का नोट उसकी ओर बढ़ाया और उसकी खिल्ली उड़ाती नज़रों से दूर भागती चली गई।

घर में अकेली हूँ लेकिन मेधा उठी हुई है। डेढ़ साल की बच्ची कुछ नहीं समझ पाएगी लेकिन फिर अपने ऊपर एक अजीब-सा पहरा महसूस होता है। उसके सोने के बाद ही कुछ मुमकिन है।

आठ के साढ़े आठ हो गए लेकिन मेधा है की आज सो ही नहीं रही। मैं पालने में लिटा उसे थपकती हूँ, पर वह कुछ मिनटों के नींद के बाद अचानक हाथ-पैर पटकने लगती है। उसे सुलाते-सुलाते नौ बजे तक थक कर चूर हो जाती हूँ। जी करता है उसे ज़ोर से थप्पड़ रसीद कर दूँ। ज़मीन पर पटक दूँ। फिर याद आता है मेडिसिन बॉक्स में नींद की गोली रखी है। शिशिर ने कहा था कि जब भी वो न हो, और मैं सोना चाहती हूँ, तो आधी गोली मेधा को दूध में मिलाकर पिला दूँ।

मैं अपनी गोद में लिए देर तक लिए हलराती रहती हूँ। हर थपकी के बाद एक नज़र दीवार घड़ी पर जाती है। जल्दी सो जाओ मेधा—मैं उससे एक मूक प्रार्थना करती हूँ। उसकी आँखें उनींदी होने लगती हैं तो मैं फटाफट पालने में उसे लिटा वॉशरूम की ओर पैकेट लेकर भागती हूँ।

टॉयलेट सीट उढ़का कर बैठ जाती हूँ। मेरा सारा शरीर बेतहाशा थरथरा रहा है। ऊपर चढ़ा रैपिंग पेपर बेढंगी तरह से फाड़ देती दूँ। अपनी टाँगें चौड़ी कर उसे अपनी योनि की परतों के बीच रखकर अपनी जाँघें कसकर भींच लेती हूँ। आँखें बंद करती हूँ तो पहला ख्याल रायन के गदराए बदन का आता है। लेकिन दूसरा ख्याल उस डिलीवरी बॉय की मखौल करती आँखों का आता है। तीसरा, लोग क्या कहेंगे। चौथा, ठहाकों की आवाज़ और उपहास भरे चेहरे।

नहीं…मुझे कुछ नहीं सोचना…एंजॉय करना है। पूरी तरह से। मैं स्पीड बढ़ा देती हूँ। शरीर झनझनाता है। शरीर के पोरों में कुछ उछलता-कूदता महसूस होता है। थर्मोकोल की गोलियों जैसा। देह जैसे खदकता हुआ अदहन है। एक-एक बुलबुला कहीं से उठता, मेरे शरीर को उमेठता, कहीं फच्च से फूट जाता। मैंने आँखें फिर बंद कर ली थीं, इस बार सुख के सकोरे से चाशनी लपालप चाटने के लिए। अपनी जीभ, होठ, गाल सब तर करने के लिए।

लेकिन तभी घंटी बजती है। मैं जैसे वहीं बैठी जम जाती हूँ। बुलबुले अचानक डंक मारते बिच्छुओं में तब्दील हो जाते हैं। वाइब्रेटर मेरे हाथ से छूट कर ज़मीन पर गिरता है और टूट जाता है। घंटी का कर्कश नाद तीव्र हो जाता है। कमरे में रखा फोन घनघनाने लगता है।

“कमिंग, कमिंग” मैं चिल्लाती हूँ।

शिशिर के चेहरे पर बारह बजे हुए हैं। घबराया हुआ वो मुझे अपनी बाहों में भर लेता है। मैं भी उसकी छाती से चिपट जाती हूँ। पश्चाताप का दहकता गोला मेरी छाती के बीचों बीच पड़ा धधकता है। टप-टप बहते मेरे आँसू उसका शर्ट भिगो देते है।

“मेधा ठीक है ना…मैं डर गया था।” वो मेरे कंधों को झकझोरता हुआ पूछता है।

मैं एक रूखी हाँ कहकर उससे छिटक कर अलग हो जाती हूँ। बाकी सब तो ठीक हैं शिशिर बस मैं ही ठीक नहीं…और तुम्हें पूरी दुनिया के हाल की पड़ी है बस मुझसे ही नहीं पूछते। मैं किचन की ओर बढ़ती हुई सोचती हूँ जब वॉशरूम का दरवाज़ा खटाक से बंद होता है।

“नो शिशिर…नो…नो शिशिर।” मैं वॉशरूम की ओर दौड़ती हूँ। दरवाज़ा पीटते हुए चीखती हूँ।

शिशिर दरवाज़ा खोलता है तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया है। हम दोनों की आखों के सामने पड़ा नीला वाइब्रेटर और उसे ताकते हुए हम लोग। उसके मन में सवालों का बवंडर। आरोपों की झड़ी। हीनता के बीज। मेरे अंदर महुए की तरह सवाल बीनती एक कृशकाय लड़की। उसके शरीर में चुभती अपराध-बोध की कंटीली झाड़ियाँ।

“अल्ट्रा मॉडर्न होने का भूत चढ़ा है क्या?” उसका धिक्कारता स्वर।

“यह तुम्हारे बारे में नहीं है…पेरहाप्स वी शुड इट नेक्ट टाइम।” मैं अपने आत्मविश्वासी स्वर से खुद चौंक जाती हूँ।

“मुझे चिढ़ाने के लिए लाई हो न…तभी मेरे पसंदीदा रंग…।” उसका स्वर रुँध गया। आँसू उसकी आँखों के कोरों को भिगाते छलछलाने लगे। वो मुझ पर किसी जानवर की तरह झपटने को होता है मैं ज़ोर से उसे धक्का दे देती हूँ।

उस रात के लिए मैं दिनों तक अपने को कोसती रही। लेकिन विश्वास था कि समय बीतने पर भावनाओं का अतिरेक घट जाएगा। तथ्यों के पहाड़ों से धीरे-धीरे कुहासा जाता रहेगा। उसे समझ आएगा इस शरीर की ज़रूरतें बंदूक की गोलियों की तरह होती हैं जो रिवॉल्वर में सालों पड़ी रहें लेकिन एक बार बंदूक से निकलती हैं तो निशाना भेदे बिना नहीं रुकतीं। अब कब तक डगमगाकर इन गोलियों से बचूँ?

लेकिन शिशिर ने अपने शरीर के चारों ओर एक काँच की दीवार बना ली है। हम एक ही कमरे में सोते हैं लेकिन मेधा रूपी दीवार के इर्द-गिर्द। पूरा घर एक अदृश्य लकीर से फाँक हो गया। मेरे पास ढेर सारा समय बचने लगा। अपने कटघरों में खुद खड़े होने के लिए। बॉवरी को एक स्तर पर बेवकूफ समझती रही थी कि न जाने कैसे छलिया, छरहरे लड़कों की बाजुओं में अपने को कैद करके मर गई। भला घाट-घाट का पानी पीने से क्या उसका स्वाद बदल जाता है?

लेकिन समझदारी की इन सब बातों पर पलीता लग जाता जब रायन क्लास में बैठा अपनी हेज़ल ब्राउन आँखों से मुझे निहारने लगता। क्लास के अंत वो ज़रूर मुझसे कोई सवाल पूछने के लिए बाहर आ जाता। मैं जवाब में तमाम उपन्यासों के उदाहरण देने लगती। किसी

आवेश से भरी उन सब किताबों के नाम अँगुलियों पर गिनवाने लगती जो मैंने भी खुद नहीं पढ़ीं।

वह शेक्सपियर के नाटकों पर कोई रिसर्च कर रहा था। उसने मुझसे किताबों के नाम पूछे तो मैंने उससे घर आकर किताबें ले जाने के लिए कहा। हाँ में सिर हिलाकर वह चला गया लेकिन सीढ़ियों से उतरते ही मुझे लगा जैसे उसे घर बुलाकर मैंने आ बैल मुझे मार वाली कहावत को सच कर दिया है। चपरासी के हाथ क्या उसे कहलवा दूँ कि आज मेहमान आ रहे हैं? कल फिर यही पसोपेश। लेकिन चपरासी को पहले इस बात का जवाब देना होगा कि मुझे उसे अपने घर बुलाने की क्या ज़रूरत आन पड़ी? इससे अच्छा होगा कि किताबें देकर बाहर के बाहर ही भेज दूँगी।

चाय के कप-दर-कप पीती जाती हूँ, लेकिन उसका कोई अता-पता नहीं। मैंने किताबें एक साथ रख दी हैं, दरवाजे से ही उसे विदा कर दूँगी ऐसा पक्का निश्चय कर लिया है। लेकिन ये सुगबुगाते ख्याल? जिनका रास्ता उसके शरीर से होकर गुजरता है। क्या इन्हें अनाथ छोड़ पाऊँगी?

सात बजने लगते हैं। दिन लगभग छिपने को है लेकिन रायन अभी तक नहीं आया। वो नहीं आएगा—मैंने सोच लिया है—लेकिन फिर भी उम्मीद का कोई चूज़ा अंदर फुदक रहा है। उम्मीद के उसे नन्हे चूज़े के कारण ही हर मिनट बीतने के साथ मेरी आँखें भरती और आवाज़ भर्राती जा रही है।

आठ से कुछ मिनट ऊपर हो गए है। अब तो वह पक्का ही नहीं आएगा। उसके न आने से मन को गहरा आघात पहुँचता है। सोचती हूँ उसने भी मुझे शिशिर की तरह बिलकुल उथला समझा है। गुस्से का गुबार मन में फूटता है। आँखें लाल सुर्ख हो जाती हैं।

मैं लॉबी के बीचों-बीच बैठी अपने कपड़े उतार कर फेंक देती हूँ।  एक हथेली पर दूसरी रख एक मछली की तरह अपने हाथों को शरीर पर तैराती हूँ। एक स्नेह-सिक्त स्पर्श महसूस करती हूँ। लगता है जैसे मेरा शरीर कोई लंबी मेज़ है जिस पर पुरुषों की पंगत खाना खाती है और उठती जाती है।

अंगुलियाँ मैंने वैसलीन में डुबो ली हैं। जाँघें एक त्रिकोण के आकार में खोल ली हैं। हज़ारों आदमी मक्खियों की तरह मेरे शरीर पर भिनभिना रहे हैं।

कमरे से आती मेधा की रोने की आवाज़ पूरे घर में गूँजने लगती है।

*एमिली डिकिंसन की एक कविता से

 
      

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