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अनुकृति उपाध्याय की कहानी ‘गली और चिड़ियाँ’

अनुकृति उपाध्याय समकालीन कथा-संसार में अपनी अलग पहचान रखती हैं। बहुत कम समय में उन्होंने अछूते विषयों पर लिखी कहानियों से अलग पहचान बनाई है। यह उनकी नई कहानी है। ‘नया ज्ञानोदय’ में प्रकाशित यह कहानी आप लोगों के लिए-

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उसने तय किया कि वह घर की एक और चाभी बनवाएगा।  बहन को देगा कि वह जब चाहे आ सके।  जा सके।  इसकी भी एक कहानी है। उसका जीवन ही ऐसा है।  उसे लगता है कि बिना कहानी कहे उस के जीवन के बारे में बात नहीं की जा सकती।  बहन, पिता, माँ, क़स्बा, पढ़ाई, शहर – सब की कहानी, कभी कभी एक से अधिक। यह कहानी नहीं है। 

सुबह से  चिड़िए तीखी आवाज़ में चिल्ला रहे थे।  इस ओर , यानी उसके कमरे के बग़ल में लटकी वट की डाली से, और उस ओर, यानी सड़क -पार की नई इमारत के बाग़ीचे में लगे पेड़ की शाख से। नई इमारत के बाग़ीचे में लगा पेड़ खूबसूरत था, बल्कि वहाँ लगे सभी पेड़ खूबसूरत थे – सभी एक से क़द के , सभी की शाखाएँ  सुघड़ तराशी, सभी सुघड़ शाखाओं पर सजीले लाल -लाल फूल। वट ख़ैर वट था –  उसकी बूढी-जवान जड़ें आपस में उलझी, उस पर बँधी मनौती की चीथें  फड़फड़ाती, बिजली-फोन-केबल के तारों से जहाँ-तहाँ कटी डालें मूँड हिलातीं । महानगर में बरसों बरस एक ही जगह जमे रहना खेल नहीं, उसे इस शहर में आए कुल दस महीने ही हुए हैं और यह उसका तीसरा कमरा है। यह कहने की भी ज़रुरत नहीं लेकिन अक्सर जो कहने की  ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, वही कहना बहुत ज़रूरी होता है।  न कहने से वह दिमाग़ की सलवटों में गुम हो जाता है और उसे कहने की बेहद ज़रुरत पड़ने लगती है लेकिन नहीं कहा हुआ कहीं अँटा-सटा गुम। 

कमरा उसका टीन पत्तर, प्लाई, लोहे जाली का दड़बा कच्चे-पक्के घर की पहली मंज़िल पर।  यहाँ कहते हैं – माला पर। दिन में स्टेशन पंद्रह मिनट की  दूरी पर, रात को ट्रेन कमरे से हो कर गुज़रे, पानी दो दिनों में एक बार, बिजली रात भर, अगर गोटे दादा को महीने का हज़ार दो तो ।  आठ सौ दो, तो हफ्ते में एकाध बार बत्ती गुल।  वह आठ सौ ही देता है।  बाक़ी दो सौ महीने के पहले ही दिन बैंक के अलग खाते में।  खाता बहन के नाम।  बहन ने आज तक खाते से धेला भी नहीं लिया है । दरअसल बहन ने आज तक कहीं किसी से भी धेला भी नहीं लिया । चप्पल टूटी तो हाथ से सिल ली, अमीर औरतों की उतरन पहन ली,   न माँगा, न चाहा, न ना मिलने पर शिकायत की।  बहन यहाँ पढ़ रही ।  उसे यहाँ दो साल हुए हैं।  फ़ीस माफ़ , खाना-पीना-सोना हॉस्टल का।  छः लड़कियाँ एक कमरे में, बिस्तरा दो के लिए भी नहीं।  रात को छत से पलस्तर झरे, सुबह को ग़ुसलख़ाने में पानी न मिले।  फिर भी , कोई शिकायत नहीं।

बहन ने कभी शिकायत नहीं की है।  ग़ुस्सा किया,  चीखी-चिल्लाई, एक दफ़ा पिता पर गीले कपड़ों का गठ्ठा फेंक मारा।  पिटी -कुटी, घर में मूँदी गई, घर से निकाली गई, पर शिकायत एक नहीं।  जब वह शहर में पहली बार आया और बहन से मिलने नहीं गया, तब भी नहीं, जब लैब से पहली तनख़्वाह मिली, तनख़्वाह से पहली ख़रीद की, पहली ख़रीद ले कर बहन के हॉस्टल गया, हॉस्टल के लोहे के दरवाज़े के इस पार से उसे काग़ज़ का पुड़ा पकड़ाया, पुड़ा खोल उसमें की मक्खन की टिकिया, बिस्कुट और सूजी टोस्ट के पैकेट और बादाम की पुड़िया देखी, तब भी नहीं।  रोई, नाक सुड़की , आँसू नहीं पोंछे, मैडम की चिरौरी कर उसे भीतर लिया, भीतर ले कर घन-घन करते पंखे वाले हॉल में बिठाया, बिठा कर कहीं से एक प्याला चाय लाई।  लेकिन शिकायत? न, नहीं।  बहन।  उसने गर्दन  झटकी। एक और चाभी होगी तो बहन कभी -कदाक आ सकेगी। आ कर उसके स्टोव पर मन का पका-खा सकेगी।  वह तब स्टोव के लिए हमेशा केरोसिन रखेगा  और दाल-चावल-सूखी मँगोड़ी -अचार की बोतल भी। वह काम ख़त्म कर ट्रेन लेगा, लैब के रसायनों से गंधाते कपड़ों के कारण ट्रेन में लोग रोज़ की तरह नाक-हाथ-पैर- सिकोड़ेंगे, स्टेशन पर उतर घर पहुंचेगा तब तक बहन जा चुकी होगी क्योंकि बहन का हॉस्टल दो घंटे ट्रेन-बस-पैदल दूर, छः  बजे हॉस्टल का लौह-द्वार बंद, अंदर के अंदर और शहर भर बाहर। हालांकि बहन ने कोई चिठ्ठी पर्ची नहीं छोड़ी होगी फिर भी वह जान लेगा बहन आई। उसके कमरे में स्टोव वाला कोना गर्म होगा , एक कटोरे में दाल-भात, तश्तरी में रोटियाँ, शायद दीवार पर अख़बार की कुछ कतरनें  चिपकी होंगी – रसायनों पर लेख, लैब में तकनीकी पदों पर भर्ती के विज्ञापन, अच्छी सेहत के लिए रोज़ करने वाले पाँच व्यायाम । प्लास्टिक का चौखटविहीन प्री-फैब दरवाज़ा लकड़ी के तख़्ते के फ़र्श पर घिसट कर खुलेगा और वह भीतर आ, एक पैर से दूसरे  पैर का जूता उतारते, टीन की  छत से बाल-बाल नीचे खड़ा, बहन के बारे में सोचेगा।  जैसे कि अभी।

चिड़ियों का शोर ज़ारी है।  बल्कि उसे लगा कि कुछ बढ़ ही गया है।  छुट्टी के दिन की सुबह, ट्रेन की धड़-धड़ से न खुलने वाली नींद, चिड़ी की चिल्लाहट से टूटी है ।  आदमी को किसी भी चीज़ की आदत पड़ सकती है – हमेशा भीड़ में होने की, हमेशा अकेले होने की, ट्रेन में खड़े-खड़े सोने की, होने की, न होने की।  चिड़ी की चुन-चुन की भी आदत पड़ सकती है।  फिलहाल नहीं है, सो वह जाग पड़ा । उसने एहतियात से बाँहें फैलाईं, पैर ताने, गर्दन अकड़ाई, देह का भूगोल अंगड़ाई में खँगाला। शौचालय नीचे गली में है , शौचालय के सामने लगने वाली मग्गों, लोटों की क़तार गली में है , मग्गे, लोटे सरकाने पर होने वाली तू-तू-मैं-मैं की चिल्ल-पौं भी गली में है । उसक कमरे में बग़ल वाले बरगद की डाल पर बैठे चिड़ियों का चूँ -चूँ शोर है।  विचित्र सुबह है।  चाय के डिब्बे में पत्ती है, शक्कर के डिब्बे में शक्कर, थरमोकोल वाले डिब्बे में भरी बर्फ़ पानी-पानी हो चुकी है लेकिन उसमें रखा आधी प्याली  दूध मीठा-सौंधा है ।  चाय बनाई जा सकती है, प्याली हाथ में ले  कर प्लाई की दीवार में बने चौकोर छेद पर दो कीलों से अटका प्लास्टिक का टुकड़ा सरका कर झरोखे से गली, गली पार की इमारत, इमारत पार के  ऊँचे -सँकरे शहर की शोर-भरी झाईं देखी जा सकती है।  लेकिन ये चिड़ियाँ।  और ये उनका  शोर। 

वह जंग-लगे लोहे की सीढ़ियों पर हल्के-हल्के पैर धरता गली में उतरा।  रबर की चप्पलें गली के कीचड़ में छपाक धँसी।  रात बारिश हुई थी।  आज भी होगी।  कल भी।  महीनों होगी।  गर्म-गर्म बारिश जैसे आसमान का पसीना।  फिर महीनो नहीं होगी।  इस शहर में बारिश का यही ढंग है – झरती है तो रुकती नहीं, रुकती है तो शहर को भूल जाती है।  कुछ-कुछ बहन जैसी – जब घर में थी तो कहीं  और नहीं , और अब घर में नहीं तो बस नहीं ही।  घर में पिता हैं , माँ, चौका, बर्तन, राशन, गर्मी-सर्दी-बारिश, घुटन बस बहन नहीं है।  और अब वह। 

गली में सब कुछ सुबह सा है – भजिए वाले के स्टोव का भनन-भनन और कड़ाही कड़छी की खनन-खनन, ऊपर  माले से मोरी में गिरते पानी के कुल्ले, लोग, मुँह, पाँव।  रविवार, मानसून और पुरानी बस्ती का पुरानापन।  नई इमारत से पहले उस पार पुरानी इमारत थी , पुरानी बस्ती से पहले इस पार झाड़-झंखाड़-घूरा-झुग्गी।  अब भी है। 

यहाँ कहते हैं – गल्ली।  गल्ली पार, गल्ली के बाजू, गल्ली से हट के।  गल्ली।  गली में चिड़ियों का शोर दबा-दबा है। वह एड़ियों उचक-उचक कर वट की डालियों में झाँकने लगा, जैसे वे खिड़कियाँ हों, या उढ़के दरवाज़े, या बहन का फिराया हुआ मुँह, कान-गर्दन-बाल के गुच्छे भर दीखता।  तीसरी, चौथी  या पाँचवी  बड़ी डाल पर दो चिड़ियाँ टिकी हैं, मामूली, भूरी-कत्थई-ज़र्द धब्बे-धारी वाली।  चिड़ियाँ और भी हैं लेकिन सबसे ज़्यादा शोर इन दो का ही। चिड़ा -चिड़ी, कहानी वाले, आले-गीले चिड़े को चिड़ी बिल्ली से बचाती  है और चिड़ा दूसरी चिड़ी के लिए चोंच से मार-मार कर पहली चिड़ी को कुँए में धकेल देता है । कहानी में ऐसा होता है।  बहरहाल, इधर ये दो पंख फड़फड़, गर्दन लम्बी कर, नुकीली चोंच खोल – चीं चीं, चें चें , टियूं , टियूं ,टीं sss टीं और कुछ गोल-गोल छल्ले जैसी आवाज़ें ।  इतनी ज़रा सी गौरैयाँ इतने ज़ोर और इतने ढंग से बोल सकती हैं , अचरज तो होना ही है।  उस पार से भी चिड़िया का विकल सुर लेकिन वह भी दबा-दबा। वह चें चें को कान में खोंस कर गली पार, बस्ती पार, सड़क पार, नई इमारत की  रंगारंग दीवार, दीवार के ऊपर टिकी रंगारंग शाखा तक चला आया।  शाखा  पर एक और चिड़ी।  एक ही, और कोई नहीं आसपास, सिवाय दूर बैठे टेढ़ी-गर्दन कौवे के, सिवाय दूर उड़ती फैले-डैने चीलों के।  उसने ग़ौर से देखा – अकेली चिड़ी गदबद, रंग जैसे दूध वाली चाय, पंख जैसे रूएँ-रूएँ, फूले-फूले, कोमल-कोमल।  चोंच खोले झाँय झाँय कर रही है।  बिला रुके, बिला थके।  झाँय झाँय झाँय झाँय।  चोंच खुली की  खुली, न एक क्षण  चोंच बंद हो, न एक पल  झाँय झाँय। लगभग दर्ज़न भर झाँय झाँय के बाद पंख उठा उड़ने को उदग्र होती तो उस ओर की चाँय चाँय तीखी हो उठती।  इस ओर वाली चिड़ी अधर पर देह से लगा लेती लेकिन झाँय झाँय फिर भी अनवरत करती।  वह खड़ा खड़ा देखता रहा।  एक बार अकेली चिड़ी  ने पंख उठाए और उस ओर की चाँय चाँय के बावजूद समेटे नहीं, और फैलाए, फैला कर उड़ी तो उसे ओर वाले अधबीच ही आ गए, इसे चोंच-पर-पंजों से इस ओर ठेल दिया। 

नई इमारत में आख़िर सुबह होने लगी और सुबह की हलचल।  दूध-अंडा-अख़बार-झाडू-कटका-बर्तन , दिन के कारोबार चल निकले। लोहे के ऊँचे-आधुनिक दरवाज़े में जड़ा एक बच्चा-दरवाज़ा खुला और सुबह-सैर को तैयार रहवासी फुदक-फुदक कर निकलने लगे जैसे कोटर से उल्लू या चुल्लू से मेंढक। जाते-जाते एक दीवार-तले थमक गया। 

-क्या? क्या देखते हो?

– वो… वो एक चिड़ी … वहाँ, अकेली, छोटी … उसने हाथ से इशारा किया।

सैर वाले ने गर्दन उठाई, हिलाई, डुलाई, आँखें सिकोड़े देखने लगा, देखता रहा। चिड़ी निहायत ही देखने लायक़ थी। 

– वो उधर वाले इसे आने नहीं दे रहे  … वहाँ, उस वट पर  …

-अँ हाँ , दैट बिग बैनियन! आँखें नुकीली कर उस ओर ताका।  बिना आँखें नुकीली किए उस ओर ताका ही नहीं जा सकता था।  दूरी ही ऐसे और इतनी है।  ओहो, आए सी ! माता पिता हैं, बच्चे का घोंसला छुड़ा रहे हैं, उस को उड़ना सिखा रहे हैं ! देखो, देखो, सी हाओ दैट लिटिल स्पैरो  … ! सैर वाले ने भी हाथ से इशारा किया।  उसका इशारा ज़्यादा वज़नदार  था लेकिन वह तो देख ही रहा था कि  इस ओर वाली चिड़ी कैसे बेतरह चिंचिया रही थी, उसकी जी-तोड़ चिचियाहट कैसे जी तोड़ रही थी। 

बीच की सड़क चलने लगी है।  भीड़ सी होने लगी,  धूप भी , मानसून के साँवले दिन की तीखी धूप जो बादलों को चीर-काट कर कटार सी घुंपने लगे।  वह धीरे-धीरे पुरानी बस्ती की ओर लौटने लगा। उस ओर से मुड़ कर देखा तो सैर वाला अब भी ख़ुशी से मुँह फाड़े दीवार तले खड़ा था। उसने तय कर लिया कि तुरंत सुतार के पास जाएगा।  बहन के लिए चाभी आज ही बनवाएगा।

अनुकृति उपाध्याय

63, हिल पार्क, मालाबार हिल, मुंबई 400006

Anukrti.upadhyay@gmail.com

 
      

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7 comments

  1. अनंत आलोक

    बेहतरीन कहानी एक बार शुरू करो तो ट्रेन की तरह चलती जाती है रूकती ही नहीं बधाई

  2. You ought to be a part of a contest for one of the highest quality blogs online. Im going to recommend this website!

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