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प्रत्यक्षा की किताब ‘ग्लोब के बाहर लड़की’ की समीक्षा

प्रत्यक्षा की किताब ‘ग्लोब के बाहर लड़की’ पर यह विस्तृत लेख लिखा है अदिति भारद्वाज ने। यह किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। अदिति दिल्ली विश्वविद्यालय से विभाजन-साहित्य और उत्तर-औपनिवेशिकता पर शोध कर रही हैं। पत्र-पत्रिकाओं, वेबसाइट्स पर नियमित लेखन करती हैं। आप उनका लिखा यह लेख पढ़िए-

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जिस तरह समय के साथ-साथ जीवन के विकास की गति परिवर्तित होती जाती है, साहित्य में और विशेषकर गद्य विधा में भी समय के साथ कुछ ऐसे बड़े परिवर्तन हमेशा से हुए हैं, जिसने इस विधा को समृद्ध और संभावनाशील किया है। आधुनिकता अब केवल समय को व्यंजित करने वाला शब्द नहीं बल्कि नित-नवीन प्रविधियों के द्वारा सार्वभौमिक अनुभूतियों को व्यक्त करने का भी एक पर्याय बन गया है। प्रत्यक्षा को पढ़ते हुए साहित्य की इन्हीं नवीन प्रविधियों को समझ पाने का ठोस आधार मिलता है। उनके साहित्य पर दृष्टि डालने पर यह महसूस होता है कि साहित्य की सफलता का कारण केवल भाषा पर पकड़ होना नहीं, बल्कि मामला इससे भी गहरे उतर कर मानवीय संवेदनाओं और मानव-जगत के विविध क्रिया-प्रतिक्रियाओं, को उसकी सम्पूर्ण विविधता में समझने का है।

प्रत्यक्षा की रचनाओं में या यूं कह लें उनके मन की चंद बहकनों में, सतरों में हमें उनके मानवीय-जीवन और संवेदनाओं के साथ उनके गहरे तादात्म्य को समझने का मौका मिलता है। और उनकी नयी रचना ‘ग्लोब के बाहर लड़की’ भी इस तादात्म्य से इतर नहीं है। स्वयं प्रत्यक्षा के शब्दों में “2005 से 2010 के बीच लिखी गईं ये सतरें दिल की बहकन हैं, इतने दिनों गुमनाम ब्लॉग के पते पर खोयी-सोयीं, अब इस किताब के सामने हैं। न कविता, न कथा, न यात्रा, न डायरी। ये बस मन के अरमान हैं…”

तो इस मन के अरमान को आलोचना के शब्दों में बांधने के लिए भी शायद नयी प्रविधियाँ ही चाहिए क्योंकि बतौर पाठक अगर इस रचना को कहानियों, उपन्यासों या कविताओं की मानिंद पढ़ा और बूझा जाये तो शायद, निराशा हाथ लगेगी। हमारी पाठकीय रूढ़िवादिता हर शब्द को उसके नियत परिणति तक पहुंचे हुए देखने की दुराग्रही होती है, पर यह भी तो संभव है और खासकर के साहित्य में ही यह संभव है कि हर शब्द अपने आप में एक कहानी हो, कोई कविता हो, उसका अपना इतिहास और भविष्य हो। प्रत्यक्षा की रचना में शब्द अपने इसी अनंत संभावनाशीलता के साथ मौजूद हैं। जिस तरलता और गतिशीलता से यहाँ रूप/शैली आपस में घुलते-मिलते, एक धूप-छांही आभा बनाते हैं, वह पढ़ने वालों को गद्य में भी कविता की-सी रवानी, वही मधुरता, वही ध्वनियाँ अनुभूत करवा सकता है।

ग्लोब के बाहर लड़की इस अर्थ में, शब्दों का ऐसा वृहत संसार है जो किसी इंद्रजाल की तरह एक ऐसे जादुई लोक में ले जाता है जो एकबारगी पाठक को किसी अंचल विशेष की संवेदनाओं से गूँथा हुआ लग सकता है, तो वहीं एक वैश्विक पाठक को, एक कंटेम्पररी पाठक को भी, उतनी ही आत्मीयता दे सकता है। यह रचना इसलिए मेरी दृष्टि में, एक व्यापक स्तर पर बिम्ब है- बिम्ब, शब्दों के, गंध के, ध्वनि के, रसना के। कुल मिलाकर जीवन को भरपूर चखने के, छक कर घूंट-घूंट पी लेने की जो तृप्ति है, वह इन बिंबों से झाँकती है। और यह भी आभास होता है कि लिखने वाले ने भी ऐसे बिम्ब को लिखने के किए अपनी कल्पना से भी ज़्यादा संभवतः अपनी अनुभूतियों को ही आधार बनाया होगा-जब घूंट-घूंट में ज़िंदगी का, इसकी तमाम अच्छी-बुरी स्मृतियों का आस्वाद चखा होगा।

पढ़ने की सुविधा से चार खंडों (‘ये जो दिल है,दर्द है कि दवा है’, ‘घर के भूगोल का घर’, क़िस्से करमख़ोर’ और ‘दोस्त दिलनवाज़’) में पुस्तक की सामग्री को बांटा गया है, जहां पर एक व्यापक थीम के अंतर्गत बात कही गयी है, पर रचनात्मक संवेदना पहले हर्फ़ से आख़री सफ़े तक लगातार वही बनी रहती है – स्मृतियों से हू-बू-हू साम्य रखने वाले वर्णनों की, और कल्पना के विश्व-व्यापी इतिहास-व्यापी विस्तार की। हर कथा (या हर अनुच्छेद कहना ज़्यादा तर्कसंगत होगा), बिना किसी निष्कर्ष की अपेक्षा रखे, अपने-आप में सम्पूर्ण है। प्रत्यक्षा, बहुत अर्थों में स्वयं के साथ लगातार संवाद की स्थिति में रहती हैं, और पाठक उस संवाद को एक प्रत्यक्षदर्शी की तरह देखता है। जैसा किसी चलचित्र को देखते वक़्त अनुभूत होता है, या संभवतः एक ऐसा निजी पत्र जिसे लिखा तो किसी और ने है, पर पढ़ने पर संवेदनाएं अपनी ही लगने लगें। और इसीलिए इन कथाओं (बहुत हद तक आत्माभिव्यक्तियों) को पढ़ते हुए, कुछ परिचित-सा तो महसूस होता ही है, पर जो आफ्टर टेस्ट होता है, वह फूलों के रस से निचोड़े गए शहद का-सा मीठा होता है, जो स्मृतियों को, पूरी-की-पूरी चेतना को रसासिक्त कर जाता है।  

पर लेखिका की सफलता इस रचना में सिर्फ उन स्मृतियों को साक्षात रूप दे देने में नहीं है, बल्कि इस तरह की शैली में लिखते हुए भी, उन्होंने, कुछ बड़े महत्वपूर्ण और सार्वभौमिक मसलों को उठाया है। अगर कई दफ़े स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर विचार किया है, तो वहीं गरीब मजदूरों की शोचनीय स्थिति पर भी, पीढ़ियों के अंतर पर अगर एक मार्मिक दृष्टि डाली गयी है तो वहीं ‘प्यार में माईग्रैन’ जैसी कहानियों में स्त्री आकांक्षाओं की भी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। स्त्री-विमर्श की दृष्टि से, ‘रोशनी के बाहर खड़ी औरतें’, ‘धूप में रंगीन छतरी’, ‘अंधेरे में लाइटहाउस’, ‘मछ्ली और सुख’ उल्लेखनीय हैं। बहुत बड़ी बातें न कर के भी, वस्तु स्थितियों के माध्यम से लेखिका ने इस आधी आबादी के सच को दिखला दिया है। बहुत लाउड न रहते हुए भी, बस विवरणों से, एक खास क़िस्म की डिटेलिंग से ही स्त्रियों के शारीरिक और मानसिक, दोनों ही पक्षों को दिखला दिया है। ‘रात पाली के बाद’ में औरत का, दिन भर फैक्ट्री में ‘हाड़-तोड़ खटाई’ कर अपनी पाली ख़त्म कर के आने वाला मर्द तो, खा कर अपनी मसहरी लगी चारपाई पर अलस पड़ जाता है, पर उसकी निंदाई औरत पानी का ग्लास थामे निढाल आती है बिस्तर पर क्योंकि “रसोई समेटना बांक़ी है अभी, दही जमाना बांक़ी है अभी, मुन्नू की आख़िरी बोतल बनाना बांक़ी है अभी। गँधाती फलियों और कपड़ों के ढेर को सरका कर जगह बनाती वह सोचती है उसकी रात पाली कब ख़त्म होगी”।

इस पुस्तक में जिस जीवन की झाँकियाँ हैं, उसका एक बड़ा अंश लोक-संस्कृति, विश्वासों, मिथकों के ताने-बाने से बुना गया है। कस्बाई-ग्रामीण जीवन, जहां ज़िंदगी की गति एक निश्चित सम से शुरू होकर विराम लेती दिखती है, उसके अवशेषों को प्रत्यक्षा ने भिन्न-भिन्न तरीके से दिखलाया है। ‘सोने के नथ वाली मछ्ली’ में बाबू, निम्मा को सुनाता है “पोखर तो कोई रहस्यमय पोखर है। सुना उसमें कोई दसेक किलो की मछ्ली है जिसकी सोने की नथिया चमचम चमकती है”। कितनी दफ़े ऐसा लगता है मानो इन लोक संस्कृतियों से किसी भूले-बिसरे इतिहास को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। ‘तैमूर तुम्हारा घोडा किधर है’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। पर, रचना सिर्फ साहित्य-संस्कृति  के मानदंडों को लेकर चलती हो ऐसा भी नहीं है, ज्ञान के वो सब भंडार जो मानवीय प्रज्ञा को उपलब्ध हैं, मसलन- विश्व-इतिहास, भूगोल, प्राणी-विज्ञान, विज्ञान, पर्यावरण इन सब को अपनी समवेदनाओं के विस्तार के लिए, अभिव्यक्ति के माध्यमों की तरह प्रयोग किया गया है। यह लेखिका के ज्ञान-भंडार के प्रदर्शन से ज़्यादा अनुभवों को प्रामाणिकता देने के लिए एक टूल की तरह ज़्यादा लगता है और कथावस्तु की विविधता भी इससे, अवश्य ही बहुगुणित हुई है।

किताब में कुछ तो निश्चित रूप से कहानियाँ हैं, जिसमें याद करने के बहाने से पूरी कथा बतलाई गयी है। उदाहरण के लिए, ‘बाबू अब और क्या?’ समय के साथ क्षय होते जाने वाले पात्रों हुस्नआरा और रसूल के माध्यम से, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर एक गैर-रोमांटिक दृष्टि डालती है। भावना से दूर, यथार्थ के धरातल पर ज़िंदगी कितनी कष्टकर, कितनी अरूचिकर हो सकती है, प्रत्यक्षा बड़ी सहजता से बतलाती हैं। एक उदाहरण देखिये:

“रसूल चौंक कर देखते हैं, किस बात पर जाँनिसार हुए थे? जाना था इस औरत को, और उसने मुझे? किस जमाने की बात है ? कोई और रहा होगा, कोई और समय, कोई और भूगोल। मैं नहीं, मैं नहीं, मैं नहीं…..”

किताब में अधिकतर कथाएँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर आधारित हैं। प्रायः शाश्वत आदमी और शाश्वत औरत, जिन्हें किसी नाम की आवश्यकता नहीं, वह प्रत्यक्षा के पात्र हैं। इस प्रकार ये चरित्र मनोजगत के धरातल पर स्त्री और पुरुष के अपने-अपने पक्ष रचते हैं। इनकी अपेक्षाएँ, इनकी भावनाओं में आधारभूत अंतर, प्रेम के अलग-अलग मूल्य, यह सब इन कथाओं में इतने सूक्ष्म स्तर पर लेखिका ने अंकित किए हैं कि आत्मानुभूति में सार्वभौमिकता का तत्व आ मिलता है। ऐसा लगता है कि यह तो हर जगह, हर सदी की आद्यांतर कथा है। ‘मेरी यात्रा शुरू होती है अब’ में पुरुष कहता है:

“लेकिन मैं सिर्फ तुम्हारे साथ के दिनों से खुद को सीमित कैसे कर लूँ? दुनियाँ बड़ी है, बहुत बड़ी और जीवन नियामत है, एक बार मिली हुई नियामत। और हज़ार चीज़ें करनी हैं इस एक जनम में। तुमसे मुहब्बत की, टूट कर इश्क किया, मेरी आत्मा में नए रंग भरे । उन रंगों का वास्ता, अब मुझे कुछ और करना है…….मैं यायावर होना चाहता हूँ”।

और वहीं पर ‘एक और प्रेमकथा…..रीप्ले?’ में औरत कहती है:

“औरत के अंदर बहुत सारी दुनियाँ वास करती है। कुछ एक के बाद एक, कुछ साथ-साथ, कुछ जो बीत चुकीं, कुछ जो रीत चुकीं…… उसका सफर हर रोज़ शुरू होता है…..औरत सोचती है, खूब सोचती है…..और आदमी?

इस तरह, प्रेम के ऐसे अनगिनत चित्र, इस किताब में मिलते हैं, जहां प्रेम हर रूढ़ि, हर बाह्य छद्म से परे एक विशुद्ध मानवीय संवेदना बन कर आता है। कई चित्र ऐसे भी हैं, जहां ‘मैं’ शैली में जीवन को लेकर, प्रेम को लेकर, लेखिका ने अपनी अनुभूतियों को, अपने अनुभवों को रचना संसार का केंद्र बनाया है।

इस पुस्तक में स्मृतियों, या अतीत के जिये हुए दिनों के प्रति जिस तरह की नोस्टेल्जिया का भाव लेखिका ने दिखाया है वह, दो कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला तो, जिस चीज़ को, जिस जगह को या जिन स्मृतियों को दुबारा से याद किया जा रहा है, वह, और, दूसरा, वर्णन शैली की दृष्टि से। पहले पर अगर विचार करें तो ग्लोब के बाहर लड़की, “स्मृतियों का चलचित्र है”। ऐसी-ऐसी यादें, जो कभी सुदूर बचपन के किसी कोने से निकाल कर एकाएक जीवंत कर दी जाती हैं तो, वहीं किसी सुदूर जगहों के अनोखे-से अनुभवों को फिर से अपनी चेतना में जाग्रत करने का प्रयत्न किया जाता है। और यह प्रयत्न कहीं भी श्रमसाध्य या बनावटी नहीं लगता, ऐसा लगता है कि इन्हें याद करने वाले मन ने इन्हें कितना भरपूर, कितनी संवेदना से जिया था कि, एक साधारण से पाठक को भी इनसे तादात्म्य का अनुभव होता है। कहानियों से भी ज़्यादा इन्हें अगर स्मृति-कथा कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ‘यादें खोल में बंद कछुआ हैं’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। यहाँ जिस अतीत को याद किया जा रहा है वह अपने वर्णन की विश्वसनीयता की वजह से पाठक पर एक जादुई प्रभाव डालता है। मसलन:

“आती है तुम्हें भी खुशबू….उस बीते बचपन की, उस बीते समय की, लौकी के बचके और साग के पत्ते की पकौड़ी की, मुंगौड़ी और बैंगन बड़ी की, मूली के पत्ते के साग की, तिल-तिलौड़ी की, गरम-गरम भात और राहड़ के दाल पर माँ का कलछुल में ताज़ा करकराया शुद्ध घी ऊपर से गिराने की…….धीरे-धीरे स्मृतियों की महक भारी होने लगती है…वे दिन सब विलुप्त हुए… हमारे जीवन से ऐसी सब चीज़ें अब सिर्फ स्मृतियों में शेष हों”।  

प्रत्यक्षा को इस रचना में जिस बात में सफलता मिली है, वह है वर्णन के यथार्थ में। ऐसा लगता है उन आँखों ने हर उस स्मृति को, या अपने आस-पास के परिवेश को इतने माइक्रोस्कोपिक दृष्टि से देखा है कि, एक-एक कोशिका, एक-एक रेशा दिखाई पड़ने लगता है। उदाहरण के तौर पर ट्रेन के एक सफर, जो एकबारगी तो बड़ा-ही साधारण-सा क्षण हो सकता है, पर जिसका वर्णन ऐसी बारीकी से किया गया है, वह अद्भुत है:

“किसी सफर में , ट्रेन में पीली बत्ती की गर्माई रोशनी में… कोई साथ के बर्थ पर बैठा जोड़ा अपने खाने का टिफिन निकालता… सलीके से स्टील के गोल-गोल डब्बों से चार पूड़ी, आलू की सूखी तरकारी, लाल मिर्च का भरवां अचार और बूंदी का लड्डू ऐसे भूख की मरोड़ उठाता कि अपने बेसलीक़े से पैक किया गया खाना हड़बड़ाहट में बेशऊरी से निकलता…अख़बार में लपेटा खाना। भुजिये से तेल की परत पूरे अख़बार को पीला तेलाइन कर चुकी होती। ….अख़बार खोल लेने पर चार बड़े मोटे आलू से ठसाठस भरे पराँठे के बिस्तर पर महीन कटे भिंडी के भुजिये की जान मारू सुगंध….। पूरा कम्पार्टमेंट ऐसे मनोयोग और तल्लीनता से सर झुका कौर गटकता जैसे इसी हरेक कौर में प्राण बसे हों, जैसे सारी इंद्रियाँ एकत्रित हो गईं हों बस स्वाद को अनुभव करने के लिए”।

पूरी पुस्तक इस प्रकार के वर्णनों से आच्छादित है। “घर के भूगोल का घर” खंड में माँ को केंद्र में रखते हुए ऐसी कई स्मृतियों का पुनर्पाठ किया गया है, जहां माँ बचपन की समस्त समवेदनाओं का पुंज बन जाती है।  

पर इस स्मृति-कथा की कुछ अपनी सीमाएं भी हैं। कहीं-कहीं जिन क्षणों को या जिन अनुभवों को रेखाचित्रों में बदला गया है, वह एक विशिष्ट रूप में एक परिवेश विशेष के अनुभव प्रतीत होते हैं। इस प्रक्रिया में इन्हें एक आंचलिकता मिल जाती है, जिससे संभव है कि ऐसे लोग जो इस परिवेश विशेष से ताल्लुक न रखते हों, वह बहुत ज़्यादा संगति न बिठा सकें। इसी प्रकार, विदेशी संदर्भों में जिन अनुभवों को लेखिका ने दिखलाया है (मसलन, ‘लास वेगास के चकमक रास्तों में चित्तकोहड़ा की तलाश’, ‘तुमी बाजना बाजाओ न कैनो” में ), संभव है वहाँ भी एक साधारण निम्न-मध्य वर्गीय जनता मेल के कोई बिन्दु तुरंत ही न ढूंढ सकें।

पर यहाँ सवाल यह उठता है, और जो कि हर रचनाकार के लिए उठता है, कि वह किसके लिए लिख रहा है? उसका ‘मिलियु’ क्या है? हाँ, यह सत्य है कि रचना सबसे पहले अपने निज को उड़ेल देने के लिए होती है और प्रत्यक्षा को पढ़ते हुए यह बारंबार लगता भी है कि रचना उनके स्वयं के साथ एक संवाद है, अपने आस-पास के परिवेश, चीजों पर, सम्बन्धों पर, लोगों पर उनकी निजी प्रतिक्रिया है। ऐसे में जरूरी तो नहीं कि हर पाठक इसमें अपने विलयन के सूत्र ढूँढता रहे। भूमिका में भी लेखिका ने यह स्वयं ही स्वीकार किया है कि ये उनके अंतरतम की झलक हैं। पर इन सबके बावजूद, अंततः यह एक ऐसा मानस है, जो सुविधा-संपन्न है और इसलिए जीवन-जगत के अनुभव भी सुविधाओं के अनुभव हैं। कहने का तात्पर्य यह कि जिन स्मृतियों को लेखिका याद करती हैं, वह एक सुखी जीवन, भावों से भरे जीवन की झलकियाँ है, क्योंकि गरम-गरम भात और राहड़ की दाल पर कलछुल से डाला घर का बना घी, हर किसी को मयस्सर नहीं, या बड़े शहरों में रहते हुए, सुविधाओं में घिरे रहते हुए, अतीत के मधुर सुमिरन की सुविधा ‘रात की पाली’ की उस औरत को नहीं। और जहां कहीं अभावों से भरी ज़िंदगी के रेखाचित्र प्रत्यक्षा ने खींचे भी हैं, वहाँ विश्वसनीयता का अभाव खटक सकता है और इसलिए ऐसे चित्र भी कम ही हैं। और आलोचक को तो यहाँ तक लग सकता है कि यह ग्लोब के बाहर जो लड़की है, वह कजीवन की क्रूर वास्तविकताओं, अभावों से भी बाहर ही है क्या? और देखा जाये तो क्या यह वह उत्तर-आधुनिक मध्य-वर्ग नहीं है, जो अपने दिवा-स्वप्नों की, अपनी स्मृतियों की वायवीय दुनिया में, एक ‘बबल’ में रह कर अपने परिवेश को ऊपर से देखता है, एक खास किस्म की निस्संगता के साथ। एक गंभीर पाठक, को इस रचना में इसलिए एक फोकस की कमी दिख सकती है जिसकी वजह से ‘सब कुछ है भी’ और ‘कुछ नहीं भी’ के दो विपरीत ध्रुवों में स्वयं लेखक भी झूलता दिखता है और पाठक भी।       

बहरहाल, रचना में ऐसे सभी भाग जहां पर एक व्यापक बात की गयी है, (या कहा जाये, जहां पर मानवीय सम्बन्धों की बात की गयी है), वहाँ पर रचना का प्रभाव निश्चित ही व्यापक हो जाता है, सार्वजनीन और सार्वदेशिक।

लेखन की शैली पर अगर बात की जाये तो ग्लोब के बाहर लड़की को किसी निश्चित फ़ॉर्म में तो नहीं रखा जा सकता। ऐसा लगता है कि डायरी के पृष्ठों पर अपनी पसंदीदा स्मृतियों को, विषयों को, कविताओं को संकलित किया गया है, और एक बेहद ही रचनात्मक संकलन किया गया है। स्मृतियों पर बहुत ज्यादा केन्द्रित होने की वजह से प्रतीत होता है, जैसे अवचेतन में जा-जाकर मानो, स्मृतियों का चुनाव किया गया हो और इस चुनाव में कोई तार्किक संगति नहीं , कोई क्रम नहीं है। जैसे “stream of consciousness” तकनीक में एक-के-बाद-एक चित्र मानस-पटल पर आते हैं जिनका कोई तारतम्य नहीं होता, ठीक उसी तरह इस रचना में भी कहानी के भीतर कहानी है, बात के बीच ही दूसरी बात चलने लगती है, स्वप्न के भीतर ही एक दूसरा स्वप्न। कुछ दूरी तक किसी थीम का, किसी चेतना का पीछा किया जाता है, पर फिर अचानक ही बात बदल जाती है, दृश्य बदल जाते हैं।

अतीत और वर्तमान में गोते लगाते हुए, भाषा को भी एकदम-ही तरल बना दिया गया है। पानी की तरह फिसलने वाली- गतिशील भाषा, जो हर चित्र को पकड़ पाने में सक्षम है और जहां नहीं है वहाँ यह भाषिक तरलता हिन्दी से इतर भाषाओं का भी प्रयोग अपने कल्पना में रंग भरने के लिए या अपनी सघन अनुभूति को व्यक्त करने के लिए कर लेती है। उदाहरण देखिये:

“I can feel the blisters in my soul. He laughs at me, his eyes crinkling at the edges. I feel hurt, I feel abandoned…. his going is coming back to me. I push away the face bathed in pain and reach for the voice which smile always.”

यह गद्य की दृष्टि से एक अनूठा प्रयोग भी लग सकता है और एक रचनाकार की, अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों को निचोड़ कर उपयोग कर लेने की जिजीविषा भी। पर ग्लोब के बाहर लड़की इस प्रकार के प्रयोगों से आप्लावित है, जहां भाषा वह ‘बहता नीर’ हो गयी है जो संस्कृतियों को शब्द मात्र से परिभाषित कर देने, रूपाकृति देने का काम करती है। सिर्फ शब्दों से झारखंड के आदिवासी अंचल को जिस काव्यात्मकता से लेखिका ने बिंबित कर दिया है वह स्वयं में एक नया प्रयोग कहा जाना चाहिए। सिर्फ शब्द-समूहों से पूरे आदिवासी प्रदेश के भूगोल-इतिहास-संस्कृति से लेकर के समकालीन राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य तक को समेटते हुए कथा कह दी गयी है। उदाहरण देखिये:   

  “लाल लाल मिट्टी….सब लाल….सुबर्णरेखा…..सर्पीली धार…. अलस्त….मस्त….मुर्गा लड़ाई… मड़ई…बढ़ई….हड़िया….बासी भात…..सूखी मछली….बिसाईन बिसाईन गंध….फिर लाल लाल मिट्टी….सूखे पत्ते…टेसू के फूल…..फूलगेंदवाचमके….सफ़ेद सफ़ेद दाँत….. काले सुचिक्कन चेहरे…. फक्क-फक्क हंसी…ट्रेकर पर लाउडस्पीकर….नगपुरिया गीत…वोट दो….वोट दो……..निर्मला मुंडा को…वोट दो वोट दो…. चर्च का क्रॉस….खुली जीप….अमरीकी डॉलर….निर्मल हृदय…… सचमुच !” (उलट-पलट कोलाज किधर से )

भाषा का इससे ज़्यादा विकास क्या हो सकता है, जहां एक चित्र की भांति एक छोटे कैनवस में आसमान से लेकर धरती तक को समा दिया जाता है।

प्रत्यक्षा लंबे अरसे से लिख रही हैं, अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित हो चुकी हैं और हिन्दी में एक के बाद एक कई पुस्तकें आ चुकी हैं। समग्र रूप में उनके साहित्य को देख कर और विशेषकर ‘ग्लोब के बाहर लड़की के’ संदर्भ में, यही लगता है कि अपनी तमाम कमियों के बावजूद भी, यह साहित्य संभावनाओं से भरपूर है। प्रयोग वैसे भी बहुतेरे हैं और अच्छी बात यह है कि ये हमें चिर-परिचित लगते हुए भी, हमें हमारे ‘कंफ़र्ट’ से बाहर निकालते हैं। नयी कविता ने लंबी कविताओं के माध्यम से गद्य को काव्य-भाषा बनाने की जो मुहिम शुरू की थी, प्रत्यक्षा और उन जैसे नयी खेप के कई लेखक, उसी गद्य भाषा को काव्यात्मकता में ढालते हुए गद्य लेखन करने का अगला कदम उठाने का साहस करते हैं। और इस साहस के लिए, इस प्रयोग के लिए इन रचनाकारों को पूरा श्रेय देना चाहिए जो न केवल हिन्दी भाषा को नयी सर्जना-क्षमता से लैस कर रहे हैं, बल्कि गद्य विधा को भी नए मायने दे रहे हैं, नए पाठक दे रहे हैं।  

अदिति भारद्वाज

 
      

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