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सिधपुर की भगतणें : स्त्री के स्वभाविक विद्रोह का प्रमाणिक आख्यान

लक्ष्मी शर्मा के उपन्यास ‘सिधपुर की भगतणें’ पर यह सुविचारित टिप्पणी लिखी है जितेंद्र विसारिया ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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       उपन्यास भले ही बाह्य विधा के रूप में  हिंदी में प्रविष्ट हुई हों, किन्तु यह विधा आधुनिक खड़ी बोली के प्रारंभिककाल से ही हिंदी साहित्य की लोकप्रिय विधा रही है। फैंटेसी की ऊँची से ऊँची उड़ान और यथार्थ की गहरी से गहरी पैठ इस विधा में मुक़म्मल तौर पर बनती रही है।

               एक समय में उपन्यास भले ही मनोरंजन के साधन रहे हों, पर जब से हिंदी ने प्रगतिशील मूल्यों को आत्मसात किया है, तब से यथार्थ और ज़मीनी पकड़ जैसे उसका जीवन दर्शन बन गया है।

               रचना जितनी अनुभव की आँच में तपकर अपने परिवेश की गहन सच्चाइयों के साथ रच-बसकर प्रस्फुटित होगी, वह उतनी ही दीर्घजीवी, साहित्यिक व समाजशास्त्रीय मूल्यों की कसौटी पर खरी उतरेगी।

               2016 में सामयिक प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित, कथाकार लक्ष्मी शर्मा का पहला उपन्यास “सिधपुर की भगतणें” उपन्यास विधा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उपन्यास संस्मरणात्मक शैली में है और जिसका सम्बन्ध लेखिका (मैं) के ननिहाल से वास्ता रखता है।

              ननिहाल जो कि पश्चमी राजस्थान के धौलपुर जिले के किसी सिधपुर गाँव में था। इस सिधपुर के जमींदार व्यास (ब्राह्मण) परिवार की हवेली में घटित होने वाली कुछ पीढ़ियों की कहानी को, लक्ष्मी शर्मा ने, इसमें बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया है।

               उपन्यास के केंद्र में हैं, ‘मैं’ के ननिहाल की ‘भजन मामी उर्फ़ भगतण।’ राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में ‘भगतण’ उस स्त्री को कहते हैं, जो किसी से नहीं डरे। …’भजन’ भी एक ‘भगतण’ है। उपन्यास “सिधपुर की भगतणें” भजन और उस हवेली या उसके सम्पर्क में रहीं ऐसी ही बेलौस और बेबाक़ स्त्रियों की बहुत क़रीब से देखी गईं आपबीतियाँ हैं।

               राजस्थान के राजबाड़ों, ज़मींदार घरानों और ठिकानों की स्त्रियों के अपमान और शोषण की एक ऐसी ही आपबीती दास्तान हमें, आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘गोली’ में मिलती है।  ‘गोली’ एक पुरुष लेखक द्वारा स्त्री की आत्मकथात्मक शैली में लिखी कहानी है। आगे चलकर उपन्यास की इस शैली में कांता भारती ने ‘रेत की मछली’ जैसा प्रसिद्ध उपन्यास लिखा, तो मृदुला सिन्हा ने  इसी शैली में ‘सीता पुनि बोली’ जैसा मिथकीय परिवेश का उपन्यास।

               ‘सिधपुर की भगतणें’ की ‘भजन मामी’ और ‘गोली’ की ‘चंपा’ में अंतर इतना भर है कि ‘भजन मामी’ गोली नहीं हैं। …जानकारी भर को बता दूँ कि राजस्थान के राजबाड़ों में मुख्य रानियों के साथ ब्याह में जो दासियाँ आती थीं, वे भी उपरोक्त रियासतदार की उपपत्नी (गोली) होती थीं! उनसे पैदा संतान ‘गोला’ कहलाती थी, जो उस रियासतदार की अवैध संतान मानी जाती थी!! ‘राजपूत है या ‘गोला?’ लगभग गाली और हिक़ारत के रूप में इस शब्द का प्रयोग हम, अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ फ़िल्म के एक संवाद में भी देखते हैं!!!

                पर ‘मैं’ की नानी और भजन की सास ‘भजन’ के हठी स्वभाव के चलते, उसे ‘गोली’ से कम नहीं आँकतीं-“अजी, कुछ होगा तो बताएगी न। कुछ नहीं बाई सा इस ‘गोली’ के ढोंग हैं सारे। केदार लालसा को भी आप जानती हो कि कैसे देवता मिनख हैं। रानी जी को कभी कुछ कहते नहीं, इसके कुछ भी करने पर रोक लगाते नहीं, फिर क्या दुख है इसको? चरित्तर है चारित्तर। ओछे घरों की छोरियां बड़े घर में आकर ऐसे ही छल-छंदर दिखाती हैं, वह वही करती है यह ‘भगतण।” (पृ.23)

               अब ऐसा अनायास तो होता नहीं कि किसी गरीब और अभावग्रस्त परिवार की लड़की, भरे-पूरे खाये-पिये परिवार में आये और उसे उस घर के सुख न सुहायें? कहीं कुछ तो कमी रही होगी कि ‘भजन भगतण सदैव अपनी सास और ‘मैं’ की नानी से चिढ़ी रहती है?? बेला-कुबेला जब भी उसका अपनी सास से सामना होता है, तो सीधा संवाद नहीं होता! जो होता उसमें शामिल होता है, एक दूसरे के अनिष्ट होने की कामना!! कुबोलों की विषबुझी कटारें और एक दूसरे को निरन्तर घायल करतीं, अनगिनत श्रापों की बरछियाँ!!!

        लक्ष्मी शर्मा ने स्त्री मनोविज्ञान के इस रहस्य को एक सीमा के बाद, परत-दर-परत उघाड़कर रख दिया है। पारिवारिक सम्बन्धों की कथा को ‘स्व’ के माध्यम से लिखना, कम साहसिक नहीं होता। यह लिखना ठीक वैसा ही है, जैसे रोगी अपनी ही जाँघ उघाड़कर अपना ही ज़ख़्म दिखाता है।

        लक्ष्मी शर्मा में वह लेखकीय साहस दिखता है। वह जब अपने ‘मैं’ के माध्यम से कहलवाती हैं कि उनके केदार मामा नादर (नामर्द) थे। नानी ने अपना कुल-ख़ानदान चलाने के लिए, एक बार नहीं दो-दो बार गाँव के एक बलिष्ठ ठाकुर से अपनी ‘भजन’ बहू का बलात्कार करवाया था। गरीब घर की भजन मामी बाद उसके न तो आत्महत्या कर मरीं, न हवेली छोड़ मायके गईं और न ठाकुर से पैदा हुई अपनी संतान को गिराया। वे आजीवन उस व्यास परिवार की उपेक्षित कमेरी बहू बनी रहीं पर मरते-मरते उनकी खीझ, गुस्सा सास के प्रति अक्षम्य भाव आजीवन बना रहा। जिसके चलते उन्हें उस घर मे मिली लगभग गाली के समानार्थी ‘भगतण’ की उपाधि, किन्तु वे भजन से ‘भगतण’ कैसे बनीं? यह उस घर में उनके उनकी सास और पति के अतिरिक्त कोई नहीं जान सका!!!

       जब जनाने की बारी आई तो यह बात स्वयं भजन ‘भगतण’ ने ही बताई, अपने बहू-बेटे और पुत्री के समान ननद की बेटी राधे को। राधे, जो इस उपन्यास की “मैं” यानी सूत्रधार हैं। वह बताना जहाँ कम साहसिक नहीं है, उससे अधिक बताने के पीछे का मन्तव्य अधिक साहसिक था, जो भजन को हिंदी साहित्य का एक विशिष्ट साहसी चरित्र बनाता है। यह चरित्र अनपढ़ और आधुनिकता से अपरिचित होते हुए भी अपने निखालिस अनुभव से समझता है कि अपना वंश, अपनी औलाद, अपना रक्त, अपना गोत्र व अपनी जाति की बुनियाद और उसके पाये, कितने सतही और भुरभुरी ज़मीन पर खड़े हैं। इसीलिए भजन भगतण, बेटे की चाहत में बेटी को गर्भ में ही मारने चले अपने बेटे भैरों को ललकारती है कि जिस वंश को बचाने के लिए तूँ अपनी अजन्मी बच्ची का हत्यारा हुआ जा रहा, उसका सच तो यह कि तूँ इस कुल का असली वंशधर है ही नहीं! और एक स्त्री होने के नाते जो मैं सह चुकी वह अब हवेली की किसी और स्त्री को सहने न दूँगी-“मुझ पर जो बीती सो बीती, अब मेरे जीते जी घर की किसी लुगाई जाई के साथ कोई अन्याय मैं ना होने दूँगी। और तेरी कोख के बालक की जाँच को भी मैंने इस कारण से ही मना करी थी सुगना। अरी, तू तो खुद लुगाई है, तू ही लुगाई जात की कदर ना करेगी तो कौन करेगा? और लूगाईयाँ न होवेंगी तो संसार कित्ते दिन चल जाएगा। छोरी तो दूर एक भाटा पैदा करने की सकत ना है इन मर्दों की।”(पृ.33)

        संघर्ष की कोख से पैदा हुआ अनुभव, किसी भी महान पुस्तक में दिए सिद्धांत और विद्वत्सभा में दिए भाषण से अधिक प्रमाणिक होता है। भजन के अनुभव और उस पर उसकी दृढ़ता भले उसके साथ न्याय नहीं कर पायी हो, किन्तु वह अपने बाद कि पीढ़ी और सम्पर्क में आये लोगों के लिए मिसाल बनता है।

        उपन्यास सूत्रधार आगे बताता है कि ‘भजन मामी’ के अतिरिक्त भी सिद्धपुर में और भी थीं, जो किसी भी तरह से भजन भगतण से जुड़ीं और पुरुष समाज के बनाए मानकों से हटकर अपने नए प्रतिमान गढ़तीं हैं। यह प्रतिमान इतने बीहड़, चौकाऊँ व साहस भरे हैं कि पाठक कई जगह विस्मित होकर रह जाता है। स्त्रीख़ोर मर्दजात से अपनी सामान्य सुरक्षा के लिए स्त्रियाँ भी अपने तिलिस्म रचती हैं कि जिन्हें संभवतः निर्बलों और स्त्रियों के डराने के लिए पुरुषसत्ता ने रचा था? इस उपन्यास की भगतने उसका प्रयोग पुरुष समाज को डराने और अपनी सुरक्षा हेतु करती दिखती हैं। इसमें आश्चर्य कि वे इसमें सफल भी हैं!!!

         इस उपन्यास की एक और मज़बूत भगतन है। ललिता। अपने प्रेम के साथ सुदूर मद्रास से निकली तो थी, एक नई दुनिया बसाने, किन्तु क्रूर काल ने उसका खिला उपवन बीच मार्ग ही उजाड़ दिया। बेसहारा परदेशी ललिता को आश्रय मिला तो उसी सिद्धपुर की हवेली से, जहाँ भजन भगतण का भाग्य जुड़ा है। भजन उसे सहयोग तो दे सकती पर अकेली स्त्री को पुरुष निगाह से कैसे बचाये। ललिता इसके लिए अपने आसपास तंत्र-मंत्र और मसान सिद्धि का ऐसा अभेद्य आवरण रचती है, कि फिर रात तो क्या दिन में भी कोई पुरुष उसके सन्निकट आने का साहस नहीं जुटा पाता :

        -“हाँ मौसी लोग कहते हैं तुम्हे मरीमाता सिद्ध है, तुमने प्रेत साध रखा है, तुम रात में कपड़े उतार नाचती हुई श्मशान जगाती हो और खप्पर में बकरे के कलेजे का खून भरके पीती हो?”

        -“हां बाई, तूने सच सुना है। बगीची में डोलती थी मैं बिना कपड़ों के।”

ललिता बिना किसी झिझक के अपनी बेशर्मी की हामी भर रही है, मुझे शर्म आ रही है और डर भी लग रहा है । रातों में बिना कपड़े लिए भटकने वाली ये बूढी कहीं मुझे तो मेंढी नहीं बना लेगी। लेकिन फिर अपने साइंस बेकग्राउंड का ध्यान आया और मेरी हिम्मत बंधी।

        -“ये मेरे आने के चारेक दिन के बाद की बात है, राजस्थान की गरमी और असाढ़ का महीना… सारा दिन पसीना बहता। आँधी चलती तो मिट्टी चिपक जाती, ऐसे में एक धोती को कित्तेक दिन पहनती। दूसरे लत्ते होते तब भी मैं दिन में नहाना-धोना नहीं कर सकती थी फिर मेरे पास तो थे ही नहीं। मेरे माथे में और कपड़ों में जूँ चलने लगी और बालों की जटा बन गई तो एक रात कपड़े धो के कैर की रूँखड़ी पर सूखने डाल दिए और मैं आप भी माथा चोटी नहा के पीपली की जड़ पर बैठी थी कि कपड़े सूखें तो पहनूँ। और वोई घड़ी रूंजडियों (नीलगाय) को हाँकता हुआ 47 लोधियों का रामधन आ गया।” ललिता की आवाज में दुख है, अपने कष्ट को साझा करने का कष्ट। कैसा रहा होगा वो क्षण जब एक सत्रह साल की औरत श्मशान में नंगे बदन बैठी होगी, मेरी नसों में सनसनी होने लगी।

        -“कौन है उधर?” मैंने आवाज दी, पर उस बखत मैं इधर की बोली का एक हरफ नहीं जानती थी तो अपने देस की बोली में ही बोली। अब मेरी बोली सुन उस ठाकरिये का दस दिन बुखार ना उतरा तो मैं क्या करती।” बोलते समय ललिता की बूढी आँखों में कैसी तो खिलंदड़ शरारत कौंध रही थी।

        -“और बाई मेरी, वो दिन से मैं आधी रात को खप्पर ले के नंगी नाचने वाली डाकण हो गई।” (पृ.47-48)

उपन्यास में एक अन्य भगतण है। गुलाब। गुलाब भजन भगतण की रिश्ते में बड़ी जेठानी है। उसकी त्रासदी यह कि वह गौने से पूर्व ही विधवा हो गई थीं। विवाह के दिन बाद भजन के जेठ को एकाएक हैजा हुआ और वह नहीं रहा। पति की मौत तो बीमारी से हुई पर कलंक गुलाब के सिर मढ़ा गया। अपशकुनी कहकर उसके ससुराल आने के सारे रास्ते रोक दिए। 16 साल की गुलाब ने मायके में जैसे-तैसे अपना मन रमाने का प्रयास किया ही था कि व्यसनी बाप ने एक दिन, गणगौर के मेले के बहाने उसे जयपुर ले जाकर इलाके के एक बूढ़े महंत के हाथ धोखे से बेच दिया। बेबस गुलाब बाप की उम्र के उस भौमिया के साथ जीवनोपरांत, कभी मन से नहीं रहीं। वह अपने को आजन्म सिद्धपुर के व्यास घर की बहू ही मानती रही। बूढ़ा महंत दाम और दंड के दम पर युवा गुलाब की देह को तो जीत लिया, पर मन सदैव गुलाब का ही ताबेदार बना रहा। …गुलाब के मन की इस निष्ठा का मान रखा भी तो सिद्धपुर की उसी भजन भगतण ने, जो रिश्ते में उसकी देवरानी होती है। भजन गुलाब के न रहने पर सबका विरोध सहतीं, सिद्धपुर की हवेली में गुलाब का सम्मानपूर्वक श्राद्ध करती हैं। उनकी आत्मशांति हेतु बारह ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं। …एक स्त्री के मन की अपराजेयता का मान एक अन्य स्त्री के द्वारा, ससम्मानपूर्ण रखना इस प्रसंग का बड़प्पन है।

        इस उपन्यास की अंतिम और चौथी भगतण है-“सौभाग्य।” यह सिद्धपुर की तीसरी पीढ़ी है। भजन की पोती। सुगना और भैरों की बेटी। एकदम सुशिक्षित, आधुनिक, तेज़तर्रार और विचारों से तर्कशील। हवेली और सिद्धपुर से आगे दिल्ली एम्स में न्यूरो सर्जन। अपनी भजन दादी की तरह विद्रोही डॉक्टर सौभाग्य का भाग्य जुड़ा तो, तथाकथित विधर्मी सहपाठी ‘अमजद’ से। एक क़स्बाई हेडमास्टर के मेहनती, ईमानदार और अपने विषय में दक्ष बेटे की औकात, बकौल उपन्यास की ‘मैं’ सिद्धपुर की हवेली में घुसने की भी नहीं है-“अमजद सौभाग्य से तीन वर्ष सीनियर है और अब ऐम्स से न्यूरो सर्जरी में पीजी कर रहा है। पिता उदयपुर के पास किसी कस्बे में सरकारी स्कूल के हेड मास्टर है। अपनी प्रतिभा के बल पर पढाई कर रहे अमजद का पारिवारिक स्टेटस सिधपुर की हवेली में घुसने का भी नहीं है।“ (पृष्ठ.63)

        पर इस स्टेटस को बराबरी और विवाह तक लाने का काम स्वयं ‘सौभाग्य’ ही करती है, जिसके विवाह और पति के सम्बंध में विचार उसी की तरह कम क्रान्तिकारी नहीं हैं-

        “राम …दुनिया के सबसे पुअर हस्बैंड, अपनी प्रेगनेंट वाइफ को अकेले छोड़ने वाला केरेक्टर …ना चाची वैसा दूल्हा तो कभी नही चलेगा।”

        “अरे वो तो उनका प्रजा के लिए सम्मान था। उस धोबी की बातें जो सुन ली थी रामजी ने, उससे उन्हें लोगों के विचार मालूम हुए और उन्होंने अपनी जनता के विचारों का सम्मान किया वरना जनता में असंतोष होता बेटी। राजा को तो सब का ध्यान रखना पड़ता है न, वरना वो भी जानते थे कि सीता पवित्र है।”

        दुर्गा अपनी यथास्थिति में आधुनिक है लेकिन यथास्थिति में ही, और इसमें उसका दोष भी नहीं। “हाँ, शोभा, राम का इरादा बुरा नहीं था।” अब सुगना भी बीच में बोल गई।

        “कैसी बातें करते हो मम्मा, वो एक राजा था, अपने समय का बड़ा सेलिब्रिटी। और हमारे देश में सेलिब्रिटी कॉमन मैन का हीरो होता है, टॉक आफ टाउन होता है। वो उनके लिए एक परसन नहीं फिनोमिना होता है, सब उसे अपने-अपने तरीके से फॉलो करते हैं…”

        “तो…?” सुगना बेचारी इतनी बारीक़ कताई कैसे पकड़ती।” देखो, जो कॉमन मैन यानि आम आदमी होता है न, उस के हीरो उनकी कल्पनाओं, आशाओं सब का सेंटर होते हैं, वो सब की नजर में होता है और हर कॉमन मैन चाहता है कि उसका रोल मॉडल उसकी आइडियोलॉजी के हिसाब से काम करे, उस के हिसाब से जीवन जिए। हो सकता है जिस समय वो आदमी खराब मूड में राम को बुरा कह रहा था उसी समय कोई अच्छे मूड में राम की महानता की तारीफ कर रहा होगा। एक राजा को क्या इतनी समझ नहीं थी?”

        “और आप ही बताएं, जब उन्होंने सीता को त्यागने का निर्णय लिया था तो उनकी फेमिली और दूसरे लोगों ने विरोध नहीं किया होगा क्या? कितने सारे लोग होंगे जिन्होंने सीता को पवित्र माना होगा। कितने लोग होंगे जिन्होंने सीता की अग्निपरीक्षा की याद दिलाई होगी। फिर तुम्हारे धीर गम्भीर राम ने उस मोस्ट कॉमन मैन की बात ही क्यों मानी? क्या वो इतना इंटेलिजेंट था या उसकी बातें धर्म और धर्म-ग्रन्थों के पॉइंट से कोई वेल्यू रखती थी?”

        “लेकिन उस धोबी ने कहा तो था न।” मम्मा, वो आदमी राम के पास न अपनी बीबी की शिकायत ले कर आया था न उनकी बीबी की, राम ने अपने पर्सनल डिसीजन से बेवजह बेचारे को विलेन बना दिया। अरे भई मियां-बीवी हैं, सब में टेंटें-पेपें हो जाती है, गुस्से में आदमी कुछ अनाप-शनाप भी बोल जाता है पर वो सब सच थोड़े ना होता है।

        दरअसल राम अपनी जनता के बीच गुडमैन बनना चाहते थे, और पोलिटिकली अपनी पोजीशन स्ट्रांग करने के लिए उन्हें ये दो ही सॉफ्ट टॉरगेट मिले, एक औरत और एक गरीब।”

        “ये छोरी दुनिया से अनोखी बात करती है।” सुगना अपने धर्म और महानायकों के लिए ऐसी बातों पर उलझ जाती है जो उसने कभी नहीं सुनी। और ऐसे में वो “मर जा तू” कहने के अलावा कुछ नहीं कर पाती।

        “और हां पापा, मेरे लिए कृष्ण जैसा ओवर एम्बिशियस लड़का भी नहीं देखना। मुझे शिव जैसा दूल्हा ला के देना, इंटेलिजेंट, लिवरल और रेशनल। जो वाइफ की फ्रीडम और इन्डीविजुअलिटी का रेस्पेक्ट करे और उसे उसका स्पेस दे। “सौभाग्य को पूरा यकीन है कि उसके पापा एक दिन ऐसा दामाद जरूर खोज के लाएंगे।” और उसका मेरे पापा जितना हेंडसम होना जरूरी है, इससे कम नहीं चलेगा।” सौभाग्य भी जानती है कि वह रूपगर्विता है। और उसके पापा उसके आइडियल हैं, उसके हीरो।“ (पृष्ठ.61-62)

        मुझे नहीं लगता हिंदी साहित्य में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह का इतना महीन और मनोहर चित्रण किसी अन्य उपन्यास में हुआ हो? ले-देकर जैसे-तैसे शादी करवा दी जाती है और ‘वे राजा भए, वे रानी’ पर आकर किस्सा समाप्त। रचनाओं को जानबूझकर इतना भयावह और दमघोंटू बना दिया जाता है कि उसमें सहजता के लिए कोई स्थान बचता। पाठक के लिए वे प्रेरणादायक कम, डरावनी अधिक लगती हैं।

        “सिधपुर की भगतणें” उपन्यास इस रूप में भी सफल कहा जा सकता है कि वह समाज मे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों के प्रति बनती एक सूक्ष्म किन्तु सहज सहमति को बड़ी बारीकी और आत्मीयता से प्रस्तुत किया है कि उसे पढ़कर इस रास्ते पर बढ़े युवक-युवतियों और उनके परिवारों को, इससे प्रेरणा और स्फूर्ति ही मिलेगी।

        यह उपन्यास पढ़ते कुछ लोगों के मन में सवाल उठ सकता है कि एक बड़े फलक पर ग्रामीण और क़स्बाई पृष्ठभूमि पर लिखे इस उपन्यास में दलित आदिवासी स्त्री-पुरुष ग़ायब हैं। और उनका ग़ायब रहना क्या सायास है? अथवा सहज…या सवर्ण स्त्री के दायरों की सीमा?

        बतौर एक समीक्षक यह आरोप मैं भी लगा सकता था। ख़ूब लानत-मलामत कर सकता था लेखिका की, यदि कुछ-एक साल पहले मेरे साथ यह घटना न घटी होती। बात यह कि एक बीमारी के चलते जिला अस्पताल में मेरी बहन के बगल मात्र दस-खेत दूर पड़ोसी पुरा के सहपाठी ठाकुर लड़के की बहन भी भर्ती थी। हम पुरुष और पड़ोसी रोज़ का मिलना-जुलना। वह किसी काम से बहन को मेरे भरोसे छोड़ घर खाना लेने चला गया। भाई के जाने के बाद बहन ने उत्सुकतावश पूछ लिया-“कौन से पुरा के हो?” मैंने अपने पुरा और पिताजी का नाम बताया। जिसमें उसने पुरा का नाम छोड़ बाक़ी नाम से अपनी अनविज्ञता बताई। उसने कहा कुछ और नाम बताओ। मैंने घर परिवार के कुछ और नाम बताए। उनमें से सब छोड़कर उसे मेरे एक राजगीर ‘भगवानदास चाचा’ का नाम याद रहा, जो संयोग से कभी उसके

        घर पर चिनाई का काम करने गए थे!!! उस दिन मुझे सवर्ण परिवेश में बंद लड़कियों और स्त्रियों की हदबंदी का दायरा समझ आया कि कितने बंधन हैं उनके जीवन पर…। साथ ही याद आया बाबा साहेब अम्बेडकर का वह कथन-“इस देश में दलित और सवर्ण जब आपस में मिलते हैं तो वे दो व्यक्ति की तरह नहीं, दो देशों की भाँति मिलते हैं।” उस पर मेरा यह मानना है कि मिलने के यह अवसर आम सवर्ण स्त्री के जीवन में अत्यंत न्यून हैं।

        “सिधपुर की भगतणें” उपन्यास और उसके लेखक की पृष्ठभूमि लगभग वही है। उपन्यास में दलित-पिछड़े स्त्री पुरुषों की उपस्थिति ठीक वैसी ही है, जैसी मैंने अपने बारे में दिए उपरोक्त प्रसंग में बताई है। पहला ज़िक्र भजन भगतण द्वारा हुआ है। लगभग सुना-सुनाया ही। देखा कम-“ये तो गाँव का ठाकुर बीर जी है। सारे गाँव की लुगाइयां उसके नाम से ही डरती थीं, राक्षस का सा तगड़ा डील था उसका। रात-दिन नशे में झूमता, कांधे पर बन्दूक लटकाए घोड़ी पर निकलता तो लुगाइयां क्या मोटियार क्या, सबका कलेजा धूज जाता, गाँव में नयी ब्याह के आई नटणी, रैबारण, कौलन, कुम्हारी को नहीं छोड़ता था राक्षस।” (पृ.58) भजन का किसी दलित से सामना होता है, तो हवेली के कामदार ‘हाली से, जिससे उसका व्यवहार ठीक वैसा ही होता है, जैसा एक दलित मजदूर से सवर्ण पुरुष का होता है-“अरे करण्या, ऐसे दीदे फाड़ के क्या देख रहा है रे इसको, कभी जवान लुगाई ना देखी क्या तूने लुच्चे?” (पृ.80) कहने का अर्थ यह कि लक्ष्मी शर्मा ने इस दृष्टि से भी जो और जितना चित्रण किया वह अपने आप में ईमानदार है बनावटी बिल्कुल नहीं।

       उपन्यास के भाषा और शिल्प पर बात की जाए तो, यह उपन्यास अपने संक्षिप्त कलेवर में बेहतर बन पड़ा है। राजस्थानी मिश्रित हिंदी, स्त्री पृष्ठभूमि और स्वयं एक स्त्री लेखक द्वारा सृजित यह उपन्यास, अपनी प्रभावी चित्रात्मक भाषा और सीधे मन पर छाप छोड़ते सहज संवाद भी इसे और विशिष्ट बनाते हैं।

        -“गंगोत्री बाई सा! मेरी नणदल बाई, मेरी चिड़कली, मेरी गणगौर…” छोटी सी माँ को अपने वक्ष से चिपकाए उसी स्त्री की आँखें माँ के बालों को सींच रही थीं। “बाईसा यह गुलाब भाभी हैं, बड़े जेठ जी की परणी।” भजन मामी की दबी आवाज में प्रतिबंधित बात कहने की हिचक है। अब माँ के हाथ भी उठकर गुलाब नामक स्त्री की कमर में लिपट गए हैं।”

        यह एक संवाद भर नहीं है। यह लोक की सहज अभिव्यक्ति है, जिसमें सम्बोधन मात्र संबोधन नहीं। जैसे उपमाओं की लड़ी हो। सरल स्नेहिल मन के उद्गार हों, जिसमें सम्बन्ध, स्नेह, संस्कार, लोक और पर्यावरण सब एक साथ आकर समाहित हो गया है। …और यह सब इस उपन्यास में एक स्थान पर नहीं अनेक जगहों पर उपस्थित हुआ है।

        बस कहीं-कहीं कुछ ठेठ राजस्थानी शब्द अर्थ निष्पत्ति में अवश्य बाधा डालते हैं, जिनका लेखिका अंत में या कोष्ठक में अर्थ दे देतीं तो बेहतर रहता। बाक़ी यह उपन्यास अपने परिवेश में सीमाओ के भीतर नकार और विद्रोह को अंजाम देतीं, साथ-ही साथ कहीं-कहीं विचित्र से लगते इन स्त्री चरित्र (भगतणो) के लिए, अवश्य याद रखा जाना चाहिए।

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सम्प्रति :

विभागाध्यक्ष – हिंदी विभाग

शासकीय एम.जे.एस. स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिण्ड-477001  (म.प्र.)

मोबाईल : 9893375309

 
      

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