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हिंदू कॉलेज के दिन: विजया सती

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज की पूर्व प्राध्यापिका विजया सती अपने अध्ययन-शिक्षण जीवन के संस्मरण लिख रही हैं। यह उसकी अगली किस्त है। हमेशा की तरह बहुत रोचक और जानकारी से भरपूर-

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मेरे गुरुवर अजित कुमार यत्र-तत्र-सर्वत्र ‘अजित जी’ विख्यात थे. हमारे माता-पिता के लिए भी वही हुए. 

हम विश्वविद्यालय से कक्षाएं ख़त्म होने पर उनकी एम्बैसडर कार में लद लेते – वे मॉडल टाउन जाते थे और हमारा घर रास्ते में पड़ता. कभी किसी दिन बहुत आग्रह के साथ हम उन्हें अपने घर ले गए. हमारी मां के हाथ के बने भोजन का स्वाद वे फिर कभी न भूले. उन्हें हमारे डॉक्टर भाई की किताबों का संग्रह बहुत पसंद आया जिसमें डॉ जिवागो, The day of the Jackal, I am Ok you are Ok, और डेल कार्नेगी की How to win friends and influence people, How to stop worrying and start living जैसी किताबें थी. 

सर कहते –  मेरे संगी-साथियों में मेरी ख्याति है कि मुझे वह तो अच्छा लगता ही है जो अच्छा है, जो अच्छा नहीं है, वह भी कुछ ख़ास बुरा नहीं लगता. वे अक्सर यह भी कहते – जो हो गया सो अच्छा और जो न हुआ वह और भी अच्छा ! यह बात हमारे बूढ़े माता-पिता को खूब पसंद आती. हमारे घर में सब उनके मुरीद हो गए.

ऐसे थे गुरुवर, ऐसा था उनका साथ …

हरि अनंत हरि कथा अनंता ! 

कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता !!

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हिन्दू कॉलेज में मुझे आरंभिक कक्षाएं मीरा, कबीर, घनानंद पर मिली. इसमें महादेवी का गद्य (पथ के साथी), प्रसाद (ध्रुवस्वामिनी और लहर), दिनकर, भवानी प्रसाद मिश्र और नागार्जुन जुड़ते रहे. एकदम अंत में अमीर खुसरो जैसे रचनाकारों को समझने का अवसर इस रूप में अधिकाधिक मिला कि अब मैं उन्हें पढ़ा रही थी. अब मुझे इन्हें पूरी गहराई से, समग्रता में समझना चाहिए…यह बोध मेरे मन में गहराता चला गया. छात्र जीवन में सात में से पांच प्रश्न करने का विकल्प मिलता है, लेकिन अब हर पंक्ति, हर शब्द, हर सन्दर्भ को ..समुचित जानना ही चाहिए, प्रबुद्ध विद्यार्थियों के सम्मुख ह्रदय की धड़कन बढ़ जाने का ख़तरा नहीं लिया जा सकता !    

पढ़ाते हुए मैंने मीरा के दुःख-दर्द को नए सिरे से जाना. विमर्शों का काल तो बाद में आया किंतु स्त्री मीरा क्या-क्या सुनती-झेलती-सहती थी – धीरे-धीरे यह बहुत स्पष्ट होता चला गया. अपने विषय को डूब कर पढ़ाना तभी संभव होता है जब हम रचयिता से एकाकार हुए रहते हैं. मैं तो दर्द दिवानी हूँ – मेरा दर्द कोई नहीं जानता – कहने वाली मीरा से क्रमश: आत्मिक तादात्म्य होता चला गया, मीरा का दुःख घना था और उसकी सघनता बढ़ती चली गई. उनके पदों में जो जलते और उबलते प्रश्न आते  – सूली ऊपर सेज पिया की, किस विध मिलना होय ? और जो दृढ़ निश्चय था – ..कुल की मरजादा मन में एक ना राखूँगी, वह मेरे भीतर हलचल मचाए रहते. बचपन में हमारी मां अक्सर एक भजन सुनाती थी – हमें अच्छा लगता था –

‘पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे ! 

लोग कहें मीरा भई है बावरी, सास कहे कुल नासी रे !  

कस्तूरबा आश्रम में हमारा जीवन ऐसे पदों के निकट रहा ही था – 

प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी.

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा.

प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहि मिलत सुहागा.

रैदास, कबीर, सूरदास के प्रिय पद गाते हुए हम मीरा को भी बारम्बार दोहराते थे – म्हाने चाकर राखो जी !  और …मैं तो गिरधर के घर जाऊं !

बस इसी तरह मीरा ने मेरे मन में बसेरा किया. विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम बदलता रहता था – कई वर्ष मीरा को नहीं पढ़ाया गया, फिर एक बार मीरा आई और बरसों बाद, नई शताब्दी में मैंने मीरा को पढ़ाया. इस बार का पढ़ाना मीरा के जीवन के कटु सत्य को नए सिरे से पहचानना था. दो किताबें इस दिशा में मेरी बहुत सहायक हुई – विश्वनाथ त्रिपाठी जी की मीरा का काव्य और सहयोगी पल्लव द्वारा भेंट की गई, उन्हीं की संपादित पुस्तक जिसमें मैंने अनामिका सरीखे सर्जकों के आलेख पढ़े और मीरा को गहनता से जाना, इस हद तक कि कक्षा में उन्हें पढ़ाने का आनंद दुगुना हो गया.

कबीर अपनी सादगी और प्रखरता के कारण हमेशा से मेरे मन के निकट थे. उनका अक्खड़पन मुझे भाता था. पाहन पूजे हरि मिले और पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ जैसी पंक्तियां बचपन से कहते-सुनते आए थे. आगे-आगे – तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखिन की देखी, बुरा जो देखन मैं चला, पानी केरा बुदबुदा, जल में कुम्भ कुम्भ में जल है, जैसी साखियां जीवन के अजाने पहलुओं का साक्षात्कार करा गई. कबीर से लगाव गहरा हुआ.   

बावरी रीझ के हाथों हारे घनानंद का निश्छल प्रेम और प्रेम का विषाद मन को आंदोलित करता. अति सूधो सनेह को मारग है – कहने वाले घनानन्द ‘लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत’ जैसी पंक्तियां रच कर स्मृति का अनिवार्य हिस्सा हो गए. पाठ्यक्रम से अलग हटकर, घनानंद के साथ बोधा, ठाकुर और आलम के काव्य को जानना ताज़ा हवा के झोंके की तरह था. ‘यह प्रेम को पंथ कराल महा, तरवार की धार पे धावनो है’ जैसी लयात्मक कथन भंगिमा इन कवियों को अधिकाधिक प्रिय बनाती रही.

आने वाले समय में महादेवी वर्मा के पथ के साथियों को अपने सम्मुख इतना व्यक्त पाकर हमारी आँखें खुली. प्रसाद, निराला, सियाराम शरण गुप्त, मैथिली शरण गुप्त के जीवन के दुःखों ने उनके सृजन के संभावना द्वार उन्मुक्त किए. जयशंकर प्रसाद मनभावन कविताओं का संसार लिए कब से कब तक प्रिय बने रहे, यह रेखांकित करने की बात नहीं है. ‘जीवनधन ! इस जले जगत को वृन्दावन बन जाने दो’ – यह उदात्त भाव मेरे मन का आदर्श रहता आया.   

उर्वशी के प्रेममय दिनकर को परशुराम की प्रतीक्षा के स्वर में खोजना रुचिकर था. बादल को घिरते देखने वाले नागार्जुन की दन्तुरित मुस्कान, बहुत दिनों के बाद, गुलाबी चूड़ियां, सिन्दूर तिलकित भाल, उनको प्रणाम जैसी कविताओं के साथ विद्यार्थियों के तादात्म्य को देखना सुखद लगता रहा.

भवानी प्रसाद मिश्र  की कविता ‘घर की याद’ में ‘पिताजी भोले बहादुर, वज्र भुज नवनीत सा उर’ पंक्ति किसे अपने पिता से न जोड़ देगी? और मां बिन पढ़ी मेरी, दुःख में वह गढ़ी मेरी – अधिकांश भारतीय घरों की मां का ही चित्र लगता. सन्नाटा, सतपुड़ा के जंगल और गीत फरोश कविताओं के तेवर दिन-प्रतिदिन अपनी अर्थ छवियों को खोलते जाते, यही मेरे शोध के कवि भी थे तो इनसे जुड़ना एक बेशकीमती अनुभव का हिस्सा बनता चला गया.   

हर दिन एक नई ऊर्जा से भर कर कॉलेज जाना, एक तृप्ति के साथ लौटना, अगले दिन की तैयारी करना – यह मेरे आरंभिक अध्यापक जीवन का क्रम था. 

आजकल जो बी ए प्रोग्राम कहा जाता है, वह उन दिनों बी ए पासकोर्स हुआ करता था. हिन्दू कॉलेज के आरंभिक दिनों में पासकोर्स में लड़कियों का प्रवेश नहीं था. प्राय: खेल जगत के उदीयमान सितारे इस कक्षा की शोभा बढ़ाते – कभी वे प्रैक्टिस के लिए जाते, कभी मैच खेलने, कभी किसी प्रतियोगिता में शामिल होते. ऐसे में कक्षाओं में उनकी उपस्थिति की कल्पना की जा सकती है. अरसे बाद बी ए प्रोग्राम बनकर ये द्वार लड़कियों के लिए क्या खुले कि कक्षा एकाएक गंभीर और रोचक हो गई.  

हिंदू कॉलेज का पूरा चरित्र बहुत ऊर्जा से भर देने वाला और उल्लसित कर देने वाला रहा. चौदह से भी अधिक विभागों में बहुत सृजनात्मक गतिविधियां जारी रहती. कॉलेज के विद्यार्थियों में भावी कवि और शायर भी थे, गजब के चित्रकार-गायक, नर्तक-नृत्यांगनाएं और अभिनेता-अभिनेत्रियाँ भी. कॉलेज के किसी छोर पर कभी कोई भाषण, कोई गोष्ठी, कोई क्विज़ या वाद-विवाद प्रतियोगिता हो रही है, कहीं नृत्य और संगीत के सुर लहरा रहे हैं तो कभी मंचीय और नुक्कड़ नाटकों की धूम मच जाती ! बाद में कॉलेज की नाट्य संस्थाएं इब्तदा/इब्तिदा और अभिरंग बनी. एक से बढ़कर कर व्यक्तित्व संवाद करने आते – अभिजात से लेकर जमीन से जुड़े चेहरे तक. एनएसएस और एनसीसी की गतिविधियां बिना रुके जारी रहती. विद्यार्थियों का उत्साह देखते ही बनता. कभी पर्यावरण पर संवाद हो रहा है, कभी दृष्टि-बाधित छात्र वृन्द के हित से जुड़ा आयोजन, किसी दिन HIV AIDS से सम्बद्ध संस्था अपना वृहत कार्यक्रम करती, कभी मानसिक स्वास्थ्य पर बात होती या सड़क सुरक्षा अभियान चलता, कभी स्वच्छता पखवाड़ा व्यस्त रखता !  

यह सब पढाई के बाद की गतिविधियां रहती. सुबह पढ़ाई, दोपहर के बाद विभिन्न गतिविधियां. तीन दिन के विंटर फेस्टिवल ‘मक्का’ को हर हिन्दुआइट शिद्दत से याद करता होगा. कॉलेज में ईक्वल ऑपर्चुनिटी सेल भी गतिमान था और विमेंस डेवलेपमेंट सेल भी.  

कॉलेज के आरंभिक वर्षों में मैं सभी आयोजनों में केवल दर्शक और श्रोता थी, कॉलेज की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी न थी. धीरे-धीरे यह कोहरा भी छंटा.  

मेरे लिए गर्व से याद करने का क्षण कॉलेज की वार्षिक पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ’ से जुड़ना रहा. 

विद्यार्थियों की ऊर्जा क्या न करवा ले – कॉलेज में कई विभागों की पत्रिकाएं तैयार होने लगी. कॉलेज की भित्ति पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ थी तो हिन्दी विभाग की भित्ति पत्रिका ‘लहर’. कालांतर में विभागीय हस्तलिखित पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ ने भी अपनी पहचान कायम की. सभी पत्रिकाओं के संयोजन-सम्पादन में विद्यार्थियों की कलात्मक  क्षमताएं चमत्कृत करती. 

ये सभी सृजनात्मक काम मेरे दिल के बहुत करीब हुए. मैं सभी पत्रिकाओं से जुड़ी, सबसे लंबा समय ‘इन्द्रप्रस्थ’ के साथ बीता. विद्यार्थी संपादकों के साथ पत्रिका के व्यवस्थापक – magazine manager के अनवरत श्रम ने पत्रिका को नई ऊंचाई तक पहुंचाया. ‘इन्द्रप्रस्थ’ पत्रिका के चार प्रमुख खंड हुए – हिन्दी अंग्रेज़ी संस्कृत और विज्ञान ! इन्द्रप्रस्थ पत्रिका हिंदू कॉलेज की एक गौरवशाली उपलब्धि कही जा सकती है – कॉलेज का इतिहास, प्रमुख क्षणों की चित्रमय स्मृति, विद्यार्थियों की सृजनात्मक-कलात्मक विशेषताओं से युक्त पत्रिका ने पुराने विद्यार्थियों की उपस्थिति को भी अपने में समाहित किया.   

कॉलेज के जाने-माने छात्र विभिन्न मंचों पर अनवरत सक्रिय रहकर कॉलेज का मान बढ़ाते रहे – भारतीय प्रशासिक सेवा, विदेश सेवा, पुलिस सेवा, बैंक, फिल्म-रेडियो-टेलेविज़न, अख़बार .. हिन्दुआइट कहां नहीं? इसलिए वे अपने परिचय के लिए लिए उचित ही इस ‘स्लोगन’ का प्रयोग करते हैं – Hinduite Dynamite ! 

हिन्दी विभाग के कितने ही विद्यार्थी दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं, भारत के अन्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी सुस्थापित हुए हैं. वे अखबार की दुनिया में हैं ,टेलेविज़न, फिल्म और रंगमंच पर हैं, विद्यालयों में, देश और विदेश में हैं. गृहस्थी में तो खैर हैं ही ! हम कहीं भी, कभी भी अपने विद्यार्थियों से टकरा जाते हैं. जब अंडमान निकोबार द्वीप समूह की यात्रा पर थे तो वहां जवाहर लाल नेहरू महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ा रहे रमेश से अचानक मिलना हो गया. उड़ीसा यात्रा में आइजी पुलिस संजीव मरिक मिल पड़े ! चितरंजन खेतान भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहकर किसी ट्रेनिंग के दौरान यूरोप में मिल गए ! और यह सूची बहुत लम्बी हो सकती है.

इस जीवन्त संस्था से जुड़कर मैं धीरे-धीरे अपने प्रिय कॉलेजों लेडी श्रीराम और मिरांडा हाउस को भूलने सा लगी.. वहां मुझे अब कौन जानता था ? 

जीवन का बहुत लंबा समय हिंदू कॉलेज में बीता… कुछ वर्ष देश और विदेश में – प्रतिनियुक्ति यानी deputation पर भी – यह सब हिंदू कॉलेज में रहते हुए ही संभव हुआ ! 

विजया सती 

 
      

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7 comments

  1. Shandar abhivyakti.jis sahajta se anubhavon ko prastut kiya hai vah nisandeh prashanshneey hai.vikhyat kaviyon ki rachnaon ko padhana apneaap me garv ka bodh karvata hai
    Sukhad bhavishya ke liye shubhkamnayen.likhna jari rakhen.

  2. Bahut sundar sansmaran

  3. अतिसुन्दर। विजया मैम के संस्मरण की हर पंक्ति के साथ हिन्दू कॉलेज की मेरी यादें एक बार फिर से जीवंत हो गयीं।

  4. प्रणाम मैम🙏 हिंदू कॉलेज को आपके शब्दों में जानना और वो भी एक स्वर्ण युग को मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक रहा है। जब हिंदू कॉलेज अपने सुनहरे भविष्य के लिए तैयार हो रहा था, उस समय में आपका हिंदू कॉलेज में प्रवेश और आपका योगदान अद्वितीय रहा है। आपसे पढ़ने और जीवन में आगे बढ़ने की जो हिम्मत मिली उसके लिए मैं आपकी सदा आभारी रहूंगी मैम। हिंदू कॉलेज के संस्मरण की इस कड़ी में अगले लेख का इंतजार रहेगा। मैम आपसे एक निवेदन है, आपका एक लड़की के रूप में घर से बाहर निकलने से संबंधित क्या चुनौतियां रही, ये जानने की जिज्ञासा है। एक स्त्री विद्यार्थी और शिक्षिका के रूप में आपके अच्छे – बुरे जो भी अनुभव रहे वो भी जानने के इच्छुक हूं एक पाठक के रूप में।

    • धन्यवाद काजल !
      बहुत कुछ जानना चाहती हो, देखूं कितना कह पाती हूं

      जिज्ञासा अच्छी लगी, आभार

  5. यह संस्मरण के साथ-साथ एक साहित्यिक यात्रा भी है। अच्छा लगा मैम।☺️

  6. उम्दा।

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