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वे 15 शताब्दी तक प्रसिद्ध रहेंगे

युवा लेखक द्वारिका नाथ पांडेय ने महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले के बारे में लिखा है। उनका पढ़ना मुझे इसलिए दिलचस्प लगा क्योंकि वे जिस पीढ़ी के हैं उस पीढ़ी ने पेले को मैदान पर खेलते हुए नहीं देखा था या उनके मैचों की कमेंट्री नहीं सुनी थी। आप भी पढ़िए-
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फुटबॉल शायद एक ऐसा खेल जिसके बारे में जितना ज्यादा सुना उतना ही कम देखा। जब स्कूल से आने के बाद अखबार मे खेल वाला पृष्ठ पलटता तो क्रिकेट की बोलती तस्वीरों के अलावा कुछ एक और खेलों की खबरों पर नजर दौड़ती। लेकिन फुटबॉल से हिंदी अखबारों को भी मतलब नही था और मुझे भी। समय बीता तो क्रिकेट प्रेम खेलों के प्रेम में बदल गया और सूचना का स्त्रोत भी अखबार से इंटरनेट में बदल गया। नजर क्रिकेट के अलावा भारत और विश्व के दूसरे खेलो, खिलाड़ियों और उनके नित बनाए जा रहे कीर्तिमानों और किए जा रहे कारनामों को मन में संग्रहित करने लगी।
कबड्डी, हॉकी, कुश्ती, बॉलीबॉल, बॉक्सिंग के अलावा कई खेलो का दर्शक भी बना लेकिन फुटबॉल देखने या समझने की हसरत कभी दिल में नही उठी। लेकिन रोज सबसे ज्यादा नवीन चमत्कारों की खबरे जिस खेल से आती वह फुटबॉल ही था। फुटबॉल के कुछ नाम व तस्वीरे भी दिल के करीब हो गई। बाइचिंग भूटिया से सुनील छेत्री को जानने व इनके बारे में पढ़ने से फुटबॉल ने मैसी, रोनाल्डो, एम बापे, माराडोना और पेले जैसे खिलाड़ियों से परिचय कराया।
पहली बार फुटबॉल का मैच 2022 फीफा विश्व कप का फाइनल भी मैसी के कारण ही देखा। लेकिन फुटबॉल से शुरुआती वैराग्य के बावजूद एक जिंदा खिलाड़ी जिसे देखते ही मन से पवित्र भाव आते वह थे पेले। पेले को कभी खेलते नही देखा लेकिन उनके बारे में जितना भी पढ़ा वह इस बात को पुख्ता करता गया कि इतना करतबी व्यक्तित्व ईश्वर का तोहफ़ा ही हो सकता है।
कभी फुटबॉल न देखने पर भी पेले द्वारा किए गए 1000वें गोल को पचासों बार देखा होगा। पेले ने जैसे ही गेंद गोलचौकी में डाली पूरे विश्व के फुटबॉल प्रेमी झूम उठे। एक हजारवें गोल का जश्न ऐसा की खेल को बीस मिनट के लिए रोक दिया गया और पेले को साथी खिलाड़ियों ने कंधे पर बैठकर पूरे मैदान में घुमाया। विपक्षी टीम द्वारा लाई गई जर्सी जिसमे पेले की जर्सी संख्या दस को बजाय हजार लिखा था को पहने पेले के चेहरे पर उस वक्त सब कुछ पा लेने के बाद की मुस्कान थी। और क्या चाहेगा कोई अपने जीवन में ? पूरा विश्व उस कीर्ति के जश्न को मना रहा था यह सिर्फ पेले का उत्कर्ष नही था यह फुटबॉल का उत्कर्ष था, खेल का उत्कर्ष था।
महज सोलह साल की उम्र में अपने देश ब्राजील के लिए पहली बार खेलने वाले पेले ने अठारह वर्ष से कुछ दिन कम उम्र में वो हासिल कर लिया जिसके लिए खिलाड़ी अपना पूरा जीवन लगा देते है। विश्व की दूसरी सबसे प्रतिष्ठित खेल प्रतियोगिता ‘फीफा विश्व कप’ की ट्राफी किशोरवय पेले के हाथो मे थी। पेले ने इस विश्व कप में कुल आठ गोल दागे जिनमे से दो तो फाइनल में थे।
फीफा विश्व कप की चमचमाती ट्राफी को तीन बार पेले के हाथो मे आने का सौभाग्य मिला। बालिग होने से पहले ही उनके देश ब्राजील ने पेले को राष्ट्रीय संपदा घोषित कर दिया। पेले का जादू ऐसा की पूरी दुनिया मैदान में नाचते उनके कदमों को देखने के लिए ठहर जाती।
कितना अद्भुत था वह दिन जब जादूगर पेले के खेल ने युद्ध को दो दिन के लिए रुकवा दिया था। नाइजीरिया गृहयुद्ध से जूझ रहा था। नाइजीरिया और बायाफ्रा के बीच लड़ाई थी। यह मैच ऐसी ही युद्धग्रस्त जगह पर रखा गया था। अनेक राजनायिकों से जो नही हो सका वह पेले ने कर दिखाया। दोनों पक्षों ने पेले को देखने के लिए युद्धविराम कर दिया। यह फुटबॉल का जादू था या पेले का यह कहना उतना भी मुश्किल नहीं है क्योंकि पेले और फुटबॉल उस वक्त एक दूसरे के पर्याय थे। यह सिर्फ मैं नही कहता बल्कि अमेरिकी सिंगर जॉन लेनन ने एक बार कहा था कि ”चक बेरी के योगदान को देखते हुए रॉक एंड रोल म्यूज़िक का नाम चक बेरी होना चाहिए, उसी तरह से फ़ुटबॉल को पेले भी कहा जा सकता है।”
शताब्दी के सर्वोत्तम खिलाड़ी की प्रसिद्धि कितनी है यह तो तय कर पाना भी मुश्किल है। अमेरिकी कलाकार एंडी वारहोल ने शोहरत और प्रसिद्धि को लेकर दिए गए अपने बयान को संशोधित करते हुए भविष्यवाणी की थी, “पेले उन चुनिंदा लोगों में हैं, जो मेरी थ्योरी के उलट हैं- 15 मिनट की प्रसिद्धि की जगह वे 15 शताब्दी तक प्रसिद्ध रहेंगे. अनेकों उपाधिधारक पेले को ब्लैक पर्ल कहा गया। ब्लैक पर्ल यानी काला मोती जिसका मिलना दुर्लभ है।
पेले दो बार भारत आए। पहली बार 1977 मे और दोबारा 2015 में। मेरे लिए 2015 से ज्यादा गौरवान्वित करने वाला क्षण 1977 का है। पेले ने पहली बार भारत में कदम रखा और उनका मैच भारत के सबसे बड़े क्लब मोहन बागान से था। ईडेन गार्डन के खचाखच भरे मैदान में यह मुकाबला खेला गया। तीन बार के फीफा वर्ल्ड कप विजेता पेले ने अपना जादू दिखाना शुरू ही किया था कि मोहन बागान के खिलाड़ियों ने उन्हें गोल चौकी की पहुंँच से पूरे मैच दूर रखा। मोहन बागान यह मैच जीत ही गया था कि एक विवादित पेनाल्टी के कारण मुकाबला ड्रॉ पर छूटा। पेले इस मैच में कोई गोल नही कर सके लेकिन उनका जादू ऐसा था कि करीब 30-40 हजार प्रशंसक उनके दर्शन करने आधी रात को दमदम हवाई अड्डे पहुंच गए थे।
पेले खुद कहते थे कि “मैं फुटबॉल खेलने के लिए पैदा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे बीथोवेन संगीत लिखने के लिए और माइकल एंजेलो पेंट करने के लिए पैदा हुए थे।” जैसे बीथोवेन के जाने पर उनका संगीत और माइकल एंजेलो के बाद उनकी पेंटिंग्स जिंदा है वैसे ही पेले की फुटबॉल प्रलय तक हमे अचंभित करती रहेगी।
कितना कुछ है इस हाड़-मांँस के पुतले के बारे में कहने को लेकिन फिलहाल तो बस इतना ही कहूंँगा – अलविदा ब्लैक पर्ल
 
      

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2 comments

  1. बहुत खूब।ब्लैक पर्ल को समर्पित इस रोचक लेख के माध्यम से सुंदर श्रद्धांजलि अर्पित की है आपने पेले जी को।
    खेल प्रेमियों के हृदय आज भी उनका नाम अंकित है।आपने अपने इस लेख के माध्यम से फुटबाल के इतिहास के सुनहरे लम्हों को आपने पुनः जीवित करने का सफल एवं सराहनीय प्रयास किया है।शुभकामनाएँ।

  2. बहुत खूब।ब्लैक पर्ल को समर्पित इस रोचक लेख के माध्यम से सुंदर श्रद्धांजलि अर्पित की है आपने पेले जी को।
    खेल प्रेमियों के हृदय आज भी उनका नाम अंकित है।आपने अपने इस लेख के माध्यम से फुटबाल के इतिहास के सुनहरे लम्हों को आपने पुनः जीवित करने का सफल एवं सराहनीय प्रयास किया है।शुभकामनाएँ।

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