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कथा-कहानी

मेरी नई कहानी ‘यार को मैंने जाबजा देखा…’

आज अपनी ही नई कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ जो एक कथा श्रृंखला का हिस्सा है- प्रभात रंजन  ===============================================================   यार को मैंने जाबजा देखा प्रभात रंजनउसकी बायीं आँख के ठीक नीचे कटे का निशान था. बड़ा-सा. चेहरे में सबसे पहले वही दिखाई देता था. ‘तीन टाँके लगे थे’, उसने बताया था. देखने में दो …

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हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘हबि डार्लिंग’

हृषीकेश सुलभ बिहार की धरती के सम्भवतः सबसे मौलिक इस रचनाकार ने अपने नाटकों में लोक के रंग को जीवित किया तो कहानियों में व्यंग्य बोध के साथ वाचिकता की परंपरा को. समकालीन जीवन की विडंबनाएं जिस सहजता से उनकी कहानियों में आती हैं, जिस परिवेश, जिस जीवन से वे कहानियां …

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पंकज मित्र की कहानी ‘सहजन का पेड़’

अभी हाल में ‘लमही’ पत्रिका का कहानी विशेषांक आया है. उसमें कई कहानियां अच्छी हैं, लेकिन  ‘लोकल’ में ‘ग्लोबल’ की छौंक लगाने वाले पंकज मित्र की इस कहानी की बात ही कुछ अलग है. स्थानीय बोली-ठोली में बदलते समाज का वृत्तान्त रचने वाले इस कहानीकार का स्वर हिंदी में सबसे जुदा …

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आशुतोष भारद्वाज की कहानी ‘मिथ्या’

आज आशुतोष भारद्वाज की कहानी. उनकी कहानी का अलग मिजाज़ है. जीवन की तत्वमीमांसा के रचनाकार हैं वे. वे शब्दों को लिखते नहीं हैं उसे जीते हैं, उनकी कहनियों में जीवन की धड़कनों को सुना जा सकता है. कश्मीर के परिवेश को लेकर एक अलग तरह की कहानी है ‘मिथ्या’, …

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