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लेख

‘चीखती हुई चीं-चीं ‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं…’

अनामिका जी को देखता हूँ, उनसे मिलता हूँ तो करुणा शब्द का मतलब समझ में आता है. इतनी करुणामयी महिला मैंने जीवन में नहीं देखी. उनके लिए जो भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग करेगा वह अपना चरित्र ही दिखाएगा. हिंदी में इतनी विराट और विविधवर्णी उपस्थिति किसी लेखिका का नहीं …

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भारत भूषण पुरस्कार कवि का अवमूल्यन भी कर देता है !

पिछले कुछ सालों से युवा कविता के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिलने के बाद बहस-विवाद की शुरुआत हो जाती है. बहस होना कोई बुरी बात नहीं है. भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार की शुरुआत साल की सर्वश्रेष्ठ युवा कविता को पुरस्कृत करने के लिए किया गया था. लेकिन साल …

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तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-2

आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी।  पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। आज पेश है दूसरा भाग – त्रिपुरारि ======================================================== छोटी सी ‘मुन्ना’ की अनोखी कहानी अक्सर बच्चे स्कूल जाने …

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मीना कुमारी और तन्हाई का अंधा शिगाफ़ : भाग-1

ख़ुद ही को तेज़ नाख़ूनों से हाए नोचते हैं अब हमें अल्लाह ख़ुद से कैसी उल्फ़त होती जाती है – मीना कुमारी भारतीय सिनेमा की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के बारे में हम सब टुकड़ों-टुकड़ों में बहुत कुछ जानते हैं। लेकिन बहुत कुछ है जो अनकहा है, अनसुना है। आज …

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आज भी मोहम्मद रफी की आवाज का कोई सानी नहीं

आज प्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफी की पुण्यतिथि है। उनकी गायकी को याद करते हुए यह लेख युवा लेखक विमलेंदु ने लिखा है- ========== कौन भूल सकता है मो. रफी को ! भले ही उनको हमसे जुदा हुए तैंतीस साल हो गए हों, पर एक लम्हे को भी कभी महसूस हुआ …

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सलूक जिससे किया मैने आशिकाना किया !

आज नामवर सिंह जी का जन्मदिन है। उनके ऊपर बहुत अच्छा लेख युवा लेखक विमलेंदु ने लिखा है- मौडरेटर ====================================================== पिछली 28 जुलाई को नामवर सिंह जब नब्बे साल के हुए तो उनके विरोधी उन्हें चुका हुआ मानकर उत्साह के अतिरेक में थे. उनके जन्मदिन पर इन्दिरा गाँधी कलाकेन्द्र, दिल्ली …

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बिना मेकअप की सेल्फ़ियाँ: एक ज़रूरी हस्तक्षेप

सुबह सुबह उठा तो एक जबर्दस्ती की लेखिका का फेसबुक स्टेटस पढ़ा जिसमें उन्होने निंदा की थी कि नेचुरल सेलफ़ी जैसे अभियान सोशल मीडिया के चोंचले होते हैं। हालांकि पढ़ते हुए समझ में आ गया कि भीड़ का हिस्सा न बनकर उससे अलग दिखना भी सोशल मीडिया का ही एक …

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आदमी की निगाह औरत को क्या बनाती है?

युवा आलोचक वैभव सिह का यह लेख पढ़ने और चर्चा करने के योग्य है। उनके लगभग हर लेख की तरह सुचिन्तित और गहरी वैचारिकता से परिपूर्ण- मॉडरेटर ===================== भारतीय उपमहाद्वीप में स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में खुलकर बात करने की मनाही नहीं है, पर आज भी इसे एक ‘संदिग्ध …

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एजाज अहमद को क्यों पढना चाहिए?

वैभव सिंह मेरी पीढ़ी के उन कुछ बुद्धिजीवियों में बचे हैं जो मेरी तरह लोकप्रियता की आंधी में बह गए बल्कि अध्ययन-लेखन की मजबूत ज़मीन को पुख्ता बनाने में लगे हुए हैं. उनका यह लेख वामपंथी चिन्तक और साहित्यालोचक एजाज अहमद पर है. इसे पढ़ा जाना चाहिए- मॉडरेटर ======================= पश्चिम …

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भोगे हुए यथार्थ द्वारा सम्बन्धो से मोहभंग

हिंदी में छठे दशक के बाद लिखी गई कहानियों को केंद्र में रखकर, विजय मोहन सिंह और मधुकर सिंह द्वारा सम्पादित एक समीक्षात्मक किताब आई है. अब उस समीक्षात्मक किताब की समीक्षा कर रहे हैं माधव राठौर. आप भी पढ़िए- संपादक =======================================================   “60 के बाद की कहानियां” किताब विजय …

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