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संस्मरण

कॉलेज में कई जीवन वर्ष: विजया सती

हिंदू कॉलेज में दशकों हिंदी पढ़ाने वाली डॉक्टर विजया सती जी शिक्षा-जगत से जुड़े अपने अनुभवों को संस्मरण के रूप में दर्ज कर रही हैं। आज उसकी तीसरी कड़ी पढ़िए- ===================== भूलचूक होती हैं – सुधार लें संवार ले .. क्या ही बात हो! पिछली बार मैं अपने गुरुजनों में …

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गुमनाम लेखक की डायरी: 5: विमलेश त्रिपाठी

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी का यह स्तम्भ एक लम्बे अंतराल के बाद फिर से शुरु हो रहा है। लेखक की स्मृतियों में उसका जीवन कैसा होता है, विमलेश त्रिपाठी ने बड़ी सहजता से लिखा है- छूट गए समय की पहिलौंठी स्मृतियाँ – एक पहली घटना जो जेहन में है वह …

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आश्रम से बाहर जिन्दगी: विजया सती

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज की पूर्व प्राध्यापिका ने विजया सती आजकल संस्मरण लिख रही हैं। उनके संस्मरण का पहला अंश हम जानकी पुल पर पढ़ चुके हैं जो आश्रम के जीवान को लेकर था। इस बार उन्होंने आश्रम के बाहर के जीवन को लेकर लिखा है। तत्कालीन शिक्षा पद्धति …

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आश्रम में बचपन: विजया सती

आज पढ़िए विजया सती जी का यह संस्मरण ज़ी उनके बचपन के दिनों को लेकर है। विजया सती मैम दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में प्राध्यापिका रही हैं। आजकल स्वतंत्र लेखन करती हैं। उनका यह संस्मरण पढ़िए- ===================================================== यह एक घिसी-पिटी सी कहन ही तो है – वे भी क्या …

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मैं शहर में नहीं शहर मुझमें बस गए!

पूनम दुबे दुनिया के अलग अलग शहरों पर लिखती रही हैं। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन पर पहले भी लिख चुकी हैं। इस बार वहाँ के समर यानी गर्मियों पर लिखा है। पढ़िएगा- =============== जून के साथ-साथ कोपनहेगन में समर का आगमन हो गया है। महीनों से फ़िज़ा में लिपटी उलझी …

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विमलेश त्रिपाठी का स्तम्भ एक गुमनाम लेखक की डायरी-3

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी अपनी जीवन यात्रा को दर्ज कर रहे हैं। गाँव के छूटे हुए दिनों को बड़ी शिद्दत से याद कर रहे हैं। आज तीसरी किस्त पढ़िए- ==================== लगातार मनुष्यता की ओर यात्रा करने वाला मुसाफिर मुझे अपने जन्म का वर्ष और तारीख पता नहीं है। माँ से …

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प्रकाश मनु के संस्मरण में शैलेश मटियानी

आज अपने ढंग के अकेले लेखक शैलेश मटियानी का जन्मदिन है। इस अवसर पर उनको याद कर रहे हैं वरिष्ठ लेखक प्रकाश मनु। इस आत्मीय संस्मरण को आप भी पढ़ सकते हैं- ===============================   [1] मैं बहुत लेखकों से मिला हूँ। पर बहुत कम लेखक ऐसे मिले, जो पहली बार …

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इदरीस भाई: एक सफ़र चालीस रूपये से डाइरेक्टर ग़ालिब इंस्टिट्यूट तक

सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पुलिस अफसर हैं, गम्भीर शायर हैं। वे उन शायरों में हैं जो अच्छा गद्य भी लिखते हैं, जैसे यह संस्मरण देख लीजिए- ========================================== ‘मुन्ना! क्या यह स्पोर्ट्सस्टार मैं ले लूँ?’ इदरीस भाई ने यूँ तो स्पोर्ट्स्टार ले तो रखी ही थी अपने हाथों में। मगर इस ‘ले …

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मेरी कवयित्री चाची ‘शैलप्रिया’ – अविनाश

कवयित्री शैलप्रिया जी को याद करते हुए यह संस्मरण लिखा है अविनाश दास ने। वे जाने माने फ़िल्म निर्देशक हैं, लेकिन उससे पहले बहुत अच्छे कवि और गद्यकार हैं। आइए शैलप्रिया जी को याद करते हैं- ======================================= 91-92 की बात है। मैं स्कूल के अपने अंतिम सालों में था। मोरहाबादी …

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जब  दर्द  नहीं  था  सीने में तब ख़ाक मज़ा था जीने में!

शायर और पुलिस अधिकारी सुहैब अहमद फ़ारूक़ी कोविड 19 से संक्रमित होकर आइसोलेशन में हैं। वहाँ से उन्होंने यह मार्मिक अनुभव लिख भेजा है। आप भी पढ़िए – ======================================= जब  दर्द  नहीं  था  सीने में तब ख़ाक मज़ा था जीने में यह तो गाने का मुखड़ा है कुछ  दर्द   बढ़ा …

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