Home / ब्लॉग (page 130)

ब्लॉग

‘नोबेल’ लेखक मारियो वर्गास ल्योसा

मार्केज़ ने अपनी एक बातचीत में कहा है कि क्यूबा की साम्यवादी क्रांति के बाद संसार की नज़र लैटिन अमेरिकी साहित्य की ओर गई. उनकी उसमें दिलचस्पी बढ़ी और एक-एक करके लैटिन अमेरिका के छोटे-छोटे देशों के कई गुमनाम लेखक अंग्रेजी में अनूदित होकर प्रसिद्धि की सीढियां चढ़ने लगे. विश्व …

Read More »

शायरों-अदीबों की गली बल्लीमारान

बरसों पहले गुलज़ार ने एक टीवी धारावाहिक बनाया था ‘ग़ालिब’. उसके शीर्षक गीत में उन्होंने चूड़ीवालान से तुक मिलाते हुए बल्लीमारान का ज़िक्र किया था. उस बल्लीमारान का जिसकी गली कासिमजान में इस उपमहाद्वीप के शायद सबसे बड़े शायर ग़ालिब ने अपने जीवन के आखिरी कुछ  साल गुजारे थे. उसके …

Read More »

सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अरुण देव की इस कविता में इतिहास के छूटे हुए सफों का ज़िक्र  है, उनमें  भूले हुए प्रसंग अक्सर पुराने दर्द की तरह उभर आते हैं. उनकी कवि-दृष्टि  वहाँ तक जाती है जहाँ से हम अक्सर नज़रें फेर लिया करते हैं. इस कविता में तहजीब की उस गली का दर्द …

Read More »

अज्ञेय की पांच दुर्लभ किताबों का पुनर्प्रकाशन

अज्ञेय  की जन्मशताब्दी को ध्यान में रखकर उनका मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन ज़ारी है. सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन ने उनकी पांच दुर्लभ किताबों का प्रकाशन इस अवसर पर किया है. मुझे वे किताबें बहुत अच्छी लगीं. मैंने सोचा आपसे भी उन किताबों को साझा करूं- जानकी पुल. अज्ञेय ने निबंध में साहित्यकार के …

Read More »

गुल तो बहुत हैं मगर एक थे लेखक गुलशन नंदा

कहते हैं गुलशन नंदा ऐसा लेखक था जिसने जासूसों को प्रेम की भूल-भुलैया में भटका दिया. गुलशन नंदा के लेखक के रूप में आगमन से पहले हिंदी में लोकप्रिय उपन्यासों के नाम पर जासूसी उपन्यासों का बोलबाला था. बोलबाला क्या था उनका जादू सिर चढ़कर बोलता था. पाठक या तो …

Read More »

हिन्दी के क्रियोलीकरण के विरुद्ध

प्रसिद्ध पत्रकार राजकिशोर का यह लेख हिंदी भाषा के संकटों की चर्चा करता है. कुछ साल पहले लेखक यु. आर. अनंतमूर्ति ने अपने एक लेख में भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को लेकर कहा था कि अगर यही हाल रहा तो भारतीय भाषाएं ‘किचेन लैंग्वेज’ यानी नौकरों-चाकरों से …

Read More »

मुल्ला पंडित संत सयाने सब हमको समझाने आए

सैयद ज़मीर हसन दिल्ली के जेहनो-जुबान के सच्चे शायर हैं. उनकी शायरी में केवल दिल्ली की रवायती जुबान का रंग ही नहीं है, वह अहसास भी है जिसने दिल्ली को एक कॉस्मोपोलिटन नगर बनाए रखा है. उसके बिखरते जाने का दर्द भी है और उस दर्द से उपजी फकीराना मस्ती. …

Read More »

प्रसिद्ध पत्रकार-लेखक कन्हैयालाल नन्दन नहीं रहे

कन्हैयालाल  नंदन का निधन हो गया.  कन्हैयालाल नंदन का नाम आते ही न जाने कितनी पत्रिकाओं-पत्रों के नाम याद आ जाते हैं जिनके संपादक एक रूप में बचपन से उनका नाम देखते आए थे.  बचपन में हम लोग उनको पराग के संपादक के रूप में जानते थे. धर्मयुग से पत्रकारिता …

Read More »

धर्म को पकड़े रहो, धर्मों को छोड़ दो

आज यानी २३ सितम्बर को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है. लेकिन मन २४ सितम्बर के संभावित अदालती फैसले को लेकर आशंकाओं से घिरा है. ऐसे में धर्मों के भेद-मतभेद, एकता-अनेकता को लेकर दिनकर के विचारों को टटोलने का मन हुआ. उनका एक लेख है ‘कबीर साहब से भेंट’ …

Read More »

दिनकर की कविताएँ अज्ञेय की पसंद

२०११ में अज्ञेय की जन्म-शताब्दी है. इसी को ध्यान में रखते हुए सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन ने अज्ञेय संपादित एक पुस्तक ‘पुष्करिणी’ को फिर से प्रकाशित किया है. १९५३ में प्रकाशित इस पुस्तक का ऐतिहासिक महत्व है. अज्ञेय का यह मानना था कि स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रमों को ध्यान में रखकर …

Read More »