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महाकरोड़ क्लब की फिल्मों की कंटेट पर चर्चा करना बेमानी है!

शाहरुख़ खान की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ सैकड़ों करोड़ कमाकर सुपर डुपर हिट हो चुकी है. ऐसे में उस फिल्म की प्रशंसा या आलोचना करना बेमानी सा लगता है. फिर भी, एक दर्शक की नजर से सैयद एस. तौहीद ने इस फिल्म के जरिये कुछ मौजू सवाल उठाए हैं- मॉडरेटर. …

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स्याह दौलत(काला धन) और उम्मीद के अनुलोम-विलोम

लोकसभा चुनावों से पहले काला धन वापस लाने का ऐसा शोर था कि कई लोग तो सपने देखने लगे कि उनके बैंक खातों में 3 से 15 लाख तक रुपये आ जायेंगे. बड़े बड़े मंसूबे बंधे जाने लगे. मियां बुकरात, बटेशर, खदेरू भी कुछ ऐसी उलझनों में खोये हैं सदफ नाज़ …

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कविता भाषा में अपने होने की जद्दोजहद की पहचान है!

सविता सिंह की कविताओं का हिंदी में अपना अलग मुकाम है. उनकी कविताओं में गहरी बौद्धिकता को अलग से लक्षित किया जा सकती है. अपनी कविताओं को लेकर, अपने कविता कर्म को लेकर, स्त्री कविता को लेकर उनका यह जरूरी लेख पढ़ा तो मन हुआ कि साझा किया जाए आपसे- …

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‘हैदर’ नहीं देखा तो देख आइए

‘हैदर’ के आये दो हफ्ते हो गए. अभी भी मल्टीप्लेक्स में उसे देखने के लिए लोग जुट रहे हैं. अभी भी लोग उसे देख देख कर उसके ऊपर लिख रहे हैं. युवा फिल्म पत्रकार सैयद एस. तौहीद ने देर से ही सही लेकिन ‘हैदर’ पर सम्यक टिप्पणी की है. आप …

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महाभूत चन्दन राय की कविताएं

इधर महाभूत चन्दन राय की कवितायेँ पढ़ी. पेशे से इंजीनियर चन्दन की कविताओं में समकालीनता का दबाव तो बहुत दिखता है लेकिन उनकी कविताओं में एक नया, अपना मुहावरा गढ़ने की जद्दोजहद भी दिखाई देती है. उम्मीद करता हूँ भविष्य में इनकी और बेहतर कवितायेँ पढने को मिलेंगी. फिलहाल इनकी …

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सिनेमा में वीर रस क्या होता है?

युवा लेखकों की एक बात मुझे प्रभावित करती है- वे बड़े फोकस्ड हैं. अपने धुन में काम करते रहते हैं. अब प्रचण्ड प्रवीर को ही लीजिये रस-सिद्धांत के आधार पर विश्व सिनेमा के विश्लेषण में लगे तो लगता है उसे पूरा किये बिना नहीं मानेंगे. आज वीर रस की फिल्मों …

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जिसे दुनिया मनमोहन देसाई कहती थी!

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में ड्रामा से अधिक मेलोड्रामा का तत्त्व हावी रहा, मेलोड्रामा बढ़ते ही मनमोहन देसाई की याद आती है. मुझे याद आता है कमलेश्वर जी कहते थे कि हिंदी का लेखक फ़िल्मी दुनिया में सफल इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि वह अपने फ़िल्मी लेखन को मजबूरी …

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पड़ोसी की इमारत और कल्लन ख़ालू का दुख

सदफ नाज़ के व्यंग्य की अपनी ख़ास शैली है. व्यंग्य चाहे सियासी हो, चाहे इस तरह का सामाजिक- उनकी भाषा, उनकी शैली अलग से ही नजर आ जाती है. आप भी पढ़िए और बताइए- मॉडरेटर  ================================================================ हमारी मुंह-भोली पड़ोसन पिछले दिनों हमारे घर आईं तो काफी दुखी लग रही थीं। …

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इस्लाम की पश्चिमी छवि और ‘दफ्न होती जिंदगी’

जिस अखबार, जिस मैगजीन को उठाइए उसमें कुछ चुनिन्दा प्रकाशकों की किताबों के बारे में ही चर्चा होती है। एक तो मीडिया में साहित्य का स्पेस सिमटता जा रहा है, दूसरे उस सिमटते स्पेस में भी चर्चा कुछ ‘ख़ास’ ठप्पों वाली किताबों तक सिमटती जा रही है। नतीजा यह होता …

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सारा आकाश पड़ गया छोटा, इतना ऊंचा था कभी सर अपना

कभी कभी सोचता हूँ हिंदी की मुख्यधारा से सार्थक लेखन करने वाले बहुत सारे लेखक कैसे काट दिए जाते हैं. बिहार के लेखकों को लेकर हिंदी की मुख्यधारा कुछ अधिक ही निर्मम रही है. मुझे नामवर सिंह का वह भाषण आज टीस देता है जिसमें उन्होंने कहा था कि रेणु …

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