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कविता शुक्रवार 6: शिरीष ढोबले की कविताएँ

इस बार ‘कविता शुक्रवार’ में अपनी अलग पहचान के कवि शिरीष ढोबले की नई कविताएं और प्रख्यात चित्रकार अखिलेश के रेखांकन। शिरीष ढोबले का जन्म इंदौर में 1960 में हुआ था। वे पेशे से ह्रदय शल्य चिकित्सक हैं। पूर्वग्रह पत्रिका की अनुषंग पुस्तिका में उनका कविता संग्रह ‘रेत है मेरा …

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संतराम बी.ए. के बारे में आप कितना जानते हैं?

सुरेश कुमार युवा शोधकर्ता हैं और 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्ध के अनेक बहसतलाब मुद्दों, व्यकतियों के लेखन को अपने लेखों के माध्यम से उठाते रहे हैं। संतराम बीए पर उनका यह लेख बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है- ==============   हिन्दी के आलोचकों ने नवजागरण …

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मिखाइल बुलगाकोव  के उपन्यास ‘मास्टर एंड मार्गारीटा’ का अंश ‘मुर्ग़े की बदौलत’

मिखाइल बुलगाकोव  के उपन्यास ‘मास्टर एंड मार्गारीटा’ का रूसी साहित्य में अलग स्थान रहा है। मूल रूसी से इस उपन्यास का अनुवाद करने वाली आ चारुमति रामदास ने ध्यान दिलाया कि दशकों पहले इन्हीं दिनों एक पत्रिका में इस उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन शुरू हुआ था। इसका एक अंश पढ़िए- …

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हिंदी की भूमंडलोत्तर कहानी के बहाने

दिनेश कर्नाटक लेखक हैं, अध्यापक हैं। हिंदी कहानी के सौ वर्ष और भूमंडलोत्तर कहानी पर उनकी एक किताब आई है। उसी किताब से यह लेख पढ़िए- ========================== भूमंडलोत्तर कहानीकारों के हिन्दी कथा परिदृश्य में सामने आने का समय बीसवीं सदी का अंतिम दशक है। यह समय देश में कई तरह …

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हरि मृदुल की कहानी ‘आलू’

हरि मृदुल संवेदनशील कवि और कथाकार हैं। छपने छपाने से ज़रा दूरी बरतते हैं लेकिन लिखने से नहीं। जीवन के छोटे छोटे अनुभवों को बड़े रूपक में बदलने में दक्ष हैं। बानगी के तौर पर यह कहानी पढ़िए- ======================== फु ऽऽ स्स… मुझे पता था कि यही होना है! इसीलिए मैं चाहता था कि हसु खुद यह पैकेट खोले। हालांकि उसने कोशिश तो पूरी की थी, लेकिन वह खोल नहीं पाया। ‘ऐेसे खोलो, ऐसे’, मैंने इस काम से बचने का आखिरी प्रयत्न किया। परंतु हसु से पैकेट नहीं खुला। आखिरकार उसने मेरे हाथों में थमा दिया। ‘पापा खोल दो ना, आप ऐसा क्या करते हो?’ हसु चिढ़़ गया। ‘अब तेरा यही ड्रामा रहेगा। अपनी मम्मी को दे ना,’ मैंने चालाकी दिखाने का फिर से प्रयास किया। चूकि नेहा पानी की बोतल खरीदने के लिए पर्स में छुट्टे रुपए ढूंढ़ रही थी, सो वह भी झुंझला पड़़ी — ‘कमाल है, बच्चे का इतना सा काम करने में भी आलस आ रहा है। मैं तो इसे पूरा दिन संभालती हूं। खोलिए पैकेट।’ मैं कोई जवाब देता, वह पानी की बोतल खरीदने जा चुकी थी। ‘ला, हसु बेटा। आज पूरे दिन पापा को ऐसे ही तंग करना हां’, यह कहते हुए मैंने पैकेट का एक कोना दांतों से दबाकर फाड़़ा और हसु को दे दिया। फु  ऽऽ   स्स…। …

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मृणाल पाण्डे की कहानी ‘निर्बुद्धि राजा और देशभक्त चिड़ियों की कथा’

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे इन दिनों कथा ऋंखला लिख रही हैं- बच्चों को न सुनाने लायक बालकथा। यह उस सीरिज़ की छठी कथा है। जितनी प्राचीन उतनी ही समकालीन। इतिहास अपने आपको दुहराता है या नहीं लेकिन कथाएँ अपने आपको दुहराती हैं। एक रोचक, पठनीय और प्रासंगिक कथा का आनंद …

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एक लडकी को उसके जूते की सही जोड़ी दो और वह आपको दुनिया जीत कर दिखा देगी: मर्लिन मुनरो

मर्लिन मुनरो 1950 के दशक की हॉलीवुड की सबसे चर्चित अदाकारा रही हैं. उनका जन्म 1 जून, 1926 को अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में हुआ. मर्लिन जब पैदा हुईं तो उनकी मां बहुत खराब मनोस्थिति से गुजर रही थी. पिता कौन था. पता नहीं था. जब वो छोटी थी तो …

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रचना का समय और रचनाकार का समय

योगेश प्रताप शेखर दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और हिंदी के कुछ संभावनाशील युवा आलोचकों में हैं। रचना के समय और रचनाकार के समय में अंतर को समझने में  यह लेख बहुत सहायक है- ============================ कहते हैं कि साहित्य समय की अभिव्यक्ति है। समय की व्यापकता और उसके …

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कविता शुक्रवार 5: अरुण देव की नई कविताएँ

‘कविता शुक्रवार’ में इस बार अरुण देव की कविताएं और युवा चित्रकार भारती दीक्षित के रेखांकन हैं। अरुण देव का जन्म सन बहत्तर के फरवरी माह की सोलह तारीख़ को कुशीनगर में हुआ, जो बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल और अज्ञेय की जन्मभूमि है। पितामह रंगून के पढ़े लिखे थे। वे …

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उन्नीसवीं शताब्दी का आख़िरी दशक, स्त्री शिक्षा और देसी विदेशी का सवाल

युवा शोधकर्ता सुरेश कुमार ने 19 वीं शताब्दी के आख़िरी दशकों तथा बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों के स्त्री साहित्य पर गहरा शोध किया है। हम उनके लेख पढ़ते सराहते रहे हैं। आज उनका लेख 19 वीं शताब्दी के आख़िरी दशकों में स्त्री शिक्षा को लेकर चल रही बहसों को …

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