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‘काजल लगाना भूलना’ का मर्म

व्योमेश शुक्ल समकालीन हिंदी कविता का जाना पहचाना नाम है। हाल में उनका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘काजल लगाना भूलना’। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह पर यह लम्बी टिप्पणी की है बीएचयू के शोध छात्र मानवेंद्र प्रताप सिंह ने- ========== व्योमेश शुक्ल का हाल ही में प्रकाशित कविता …

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निवेदिता की कहानी ‘जड़ें बुलाती हैं!’

निवेदिता जी लेखिका, हैं कवयित्री हैं और समर्पित ऐक्टिविस्ट हैं। उनकी इस कहानी में समकालीन संदर्भों में विस्थापन के दर्द को समझिए। उन लोगों के दर्द को जिनका न परदेस बचा न देस- जानकी पुल। ========================= आसमान में बादल नहीं है। लू के नुकीले नाखूनों ने उसके पुरसुकुन चेहरे को …

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फिल्में ही सब कुछ नहीं थीं सुशांत सिंह राजपूत के लिए

प्रज्ञा मिश्रा यूके में रहती हैं। वहाँ लॉकडाउन के अनुभवों को कई बार लिख चुकी हैं। इस बार उन्होंने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद की प्रतिक्रियाओं को लेकर यह संवेदनशील टिप्पणी लिखी है- जानकी पुल। ======================= सुशांत सिंह राजपूत की ख़ुदकुशी की खबर आने के बाद से लोगों …

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स्पीति में बारिश-कृष्णनाथ को पढ़ते हुए

  कृष्णनाथ के यात्रा वृत्तांतों का अलग महत्व रहा है। उनके यात्रा-वृत्त ‘स्पीति में बारिश’ को पढ़ते हुए यतीश कुमार ने यह काव्यात्मक समीक्षा लिखी है। किताबों पर काव्यात्मक टिप्पणी करने की यतीश जी की अपनी शैली है। उस शैली में किसी किताब पर लिखे को पढ़ने का अपना सुख …

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प्रदीपिका सारस्वत की कहानी ‘मैं सुंदरता से प्रेम करती हूँ’

प्रदीपिका सारस्वत बहुत अलग तरह का गद्य लिखती हैं। जीवन के अनुभव, सोच सब एकमेक करती हुई वह कुछ ऐसा रचती हैं जो हमें अपने दिल के क़रीब लगने लगता है। लम्बे समय बाद उन्होंने कहानी लिखी है। आप भी पढ़ सकते हैं- ================ अपने बारे में कुछ बताओ? ‘मैं …

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    अखोनी- दिल्ली में पूर्वोत्तर की गाढ़ी खुशबू वाली फिल्म

12 जनवरी को नेटफ़्लिक्स पर एक फ़िल्म रिलीज हुई ‘अखोनी’। यह फ़िल्म एक संवेदनशील और अछूते विषय पर है, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ उत्तर भारत में बर्ताव पर। इस फ़िल्म की समीक्षा लिखी है प्रीति प्रकाश ने। प्रीति असम के तेज़पुर विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में पीएचडी कर रही …

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   घासलेटी आंदोलन :  ‘अबलाओं का इन्साफ’ और अश्लीलता

‘अबलाओं का इंसाफ़’ शीर्षक से एक किताब चाँद कार्यालय से 1927 में प्रकाशित हुआ था। क्या वह किसी पुरुष का लिखा था? बनारसीदास चतुर्वेदी ने ‘घासलेटी साहित्य’ नामक आंदोलन चलाया था। वह क्या था? नैतिकता-अनैतिकता के इस बड़े विवाद पर एक दिलचस्प लेख लिखा है युवा शोधकर्ता सुरेश कुमार ने। …

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पंखुरी सिन्हा की कहानी ‘मृग मरीचिका और कस्तूरी कथा’

पंखुरी सिन्हा की कहानियों ने इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में आलोचकों-पाठकों सभी को प्रभावित किया था। वह कविताएँ भी लिखती हैं, हिंदी अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं और प्रकाशित हैं। यह उनकी नई कहानी है। समकालीन जीवन संवेदनाओं से लबरेज़। आप भी पढ़कर अपनी राय दें- =====================जब तक …

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लालची हूहू की कहानी:   मृणाल पाण्डे

प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे आजकल एक सीरीज़ लिख रही हैं ‘बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथा’, जिसमें पारम्परिक बोध कथाओं को लिख रही हैं और समकालीन संदर्भों में वे पोलिटिकल सटायर लगने लग रही हैं। सीरीज़ की दूसरी कथा पढ़िए- जानकी पुल ================================= बहुत दिन हुए एक घने जंगल …

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ज्वलंत सवालों की किताब ‘बोलना ही है’

रवीश कुमार की किताब ‘बोलना ही है’ पर यह लम्बी टिप्पणी लिखी है संजय कुमार ने। संजय कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज(सांध्य) में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं- ============== आप रवीश को ट्रोल कर सकते हैं। आप रवीश को मोदी विरोधी कह सकते हैं। …

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