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युवा शायर #26 मुस्तहसन जामी की ग़ज़लें

युवा शायर सीरीज में आज पेश है मोहम्मद मुस्तहसन जामी की ग़ज़लें। जामी, पाकिस्तानी शायरी में एक उभरती हुई आवाज़ हैं। वो आवाज़, जो अपने आप में धूप की नर्मी और बर्फ़ की गर्मी एक साथ समेटे हुए है। वो आवाज़, जो ख़्वाब देखना तो चाहती है मगर जिसे ताबीर की …

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विश्व साहित्य की प्रसिद्ध नायिकाएँ

वरिष्ठ लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का यह लेख विश्व साहित्य की प्रसिद्ध नायिकाओं को लेकर है। आप भी पढ़िए बहुत रोचक है- ================= कोई भी कला स्त्री की उपस्थिति के बिना अपूर्ण है चाहे वह अमूर्त हो कि विशुद्ध या जादुई यथार्थ! साहित्य अधूरा है, नायिकाओं के बिना। नायिकाएं, एकरेखीय जीवन जिएं और …

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ज़ेहन रोशन हो तो बाहर के अँधेरे उतना नहीं डराते

गीताश्री के उपन्यास ‘वाया मीडिया’ एक अछूते विषय पर लिखा गया है। इसको पढ़ने वाले इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। यह उनके किताब की एक खास समीक्षा है क्योंकि इसे लिखा है वंदना राग ने। वंदना जी मेरी प्रिय लेखिकाओं में हैं और इस साल उनका एक बहुत प्यारा …

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      कोरोना के समय में ताइवान : एक मेधावी चिंतक, मुस्तैद रक्षक

देवेश पथ सारिया ताइवान के एक विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं। वे हिंदी में कविताएँ लिखते हैं और सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। उनका यह लेख ताइवान में कोरोनाकाल के अनुभवों को लेकर है। बहुत विस्तार से उन्होंने बताया है कि किस तरह ताइवान ने …

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औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ: सुजाता

समकालीन लेखिकाओं में सुजाता जाना पहचाना नाम है। पिछले साल उनका एक उपन्यास भी प्रकाशित हुआ था ‘एक बटा दो’। उनका यह लेख औपन्यासिक कल्पना और यथार्थ पर है, जिसे उन्होंने नेमिचंद जैन जन्मशती पर साहित्य अकादेमी में आयोजित कार्यक्रम में पढ़ा था। सरस शैली में लिखा गया एक गम्भीर …

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पंकज मित्र की कहानी ‘मंगरा मॉल’

पंकज मित्र हिंदी के वरिष्ठ लेखक हैं और निस्संदेह अपनी तरह के अकेले कथाकार हैं। समाज की विद्रुपताओं पर व्यंग्य की शैली में कथा लिखने का उनका कौशल उनको एक अलग पहचान देता है। यह उनकी एक प्रासंगिक कहानी है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर ========== शहर के किनारे जब मंगरा …

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सत्यजित राय की जयंती पर उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ की याद

आज महान फ़िल्मकार सत्यजित राय की जयंती है। आज से उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आरम्भ हो रहा है। उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ के बहाने उनको याद किया है विजय शर्मा जी ने- मॉडरेटर =================== आज महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित राय का जन्मदिन है। आज से उनकी जन्म शताब्दी भी प्रारंभ …

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इरफान अभी यात्रा के बीच थे

महान अभिनेता इरफ़ान के असमय निधन ने सबको उदास कर दिया है। यह श्रद्धांजलि लिखी है जाने माने युवा पत्रकार-लेखक अरविंद दास ने- मॉडरेटर =============== इरफान अभी यात्रा के बीच थे. उन्हें एक लंबी दूरी तय करनी थी. हिंदी सिनेमा को उनसे काफी उम्मीदें थी. हिंदी जगत की बोली-बानी, हाव-भाव, …

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केदारनाथ पाठक: हिन्दी नवजागरण दुर्ग के फाटक

यह लेख उस शख़्सियत पर है जिसकी हिंदी सेवा को भुला दिया गया। लिखा है सुरेश कुमार ने- ==================== सन् 2008 की बात है कि एम.ए. में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का  इतिहास’ पढ़ते  हुए केदारनाथ पाठक का नाम सुना था. मेरे मन उसी समय इनके संबंध में जानने की इच्छा हुई लेकिन कहीं जानकारी नहीं मिली. इधर, शोधकार्य करते समय नवजागरण कालीन हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं की पुरानी फाइल देखते समय केदारनाथ पाठक का चित्र मिला. इसके बाद इनके संबंध में  जहां थोड़ी बहुत समाग्री मिली नोट करता गाया. यह लेख उसी समाग्री के आधार पर लिखा गया है. नवजागरण काल के इतिहास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, राधाचरण गोस्वामी पंडित बदरीनारायण चैधरी ‘प्रेमघन’ और बाबू श्यामसुन्दर दास आदि विद्वानों ने हिन्दी साहित्य और भाषा को स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया है. नवजागरणकाल में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए दो तरह के दल सक्रिय थे. इनमें एक दल  लेखकों का था जिसने  नागरी भाषा में साहित्य का सृजन कर हिन्दी भाषा के प्रति जनता की ललक पैदा की. दूसरा दल हिन्दी सेवियों का था जिन्होंने हिन्दी  को जनमानस के बीच ले जाने का काम किया.                                                       (एक)    केदारनाथ पाठक नवजागरण काल के महान हिन्दी सेवी थे. इन्होंने नागरी भाषा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया था. केदारनाथ पाठक का जन्म सन् 1870 में मिर्जापुर में हुआ था. इनकी शिक्षा मिशनरी स्कूल में हुई थी. इनके पिता का नाम पीतांबर पाठक था. इनके पितामह गिरधारीलाल पाठक मेरठ से  प्रयाग में आकर बस गए थे. इसके बाद  जीविकोपार्जन के लिए काशी भी गए. काशी में कुछ दिन रहने  के बाद इनके पूर्वज मिर्जापुर में स्थाई रुप बस गए थे. केदारनाथ पाठक जब तीन साल के थे, तब इनके पिता का निधन हो गया था.  केदारनाथ पाठक का विवाह काशी के प्रतिष्ठित व्यक्ति छेदीलाल तिवारी की कन्या सरस्वती से हुआ था. गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारी के कारण पाठक जी मिर्जापुर की  जार्डिन फैक्टरी में काम करने लगे थे.  इस फैक्टरी का वातावरण इनके मन के अनुकूल न होने के कारण नौकरी छोड़ दी. इसके बाद हिन्दी के प्रतिष्ठत साहित्यकार पंडित बदरीनारायण के यहां ‘आनन्द कादंबिनी’प्रेस में काम करने लगे. जहां इनका परिचय हिन्दी के अनेक विद्वानों और  लेखकों से  हुआ. इन लेखकों की सोहबत में इनके मन में हिन्दी सेवा का बीज अंकुरित हुआ .   यह बड़ी दिलचस्प बात है कि केदारनाथ पाठक के यहां हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका बंग महिला के पिता रामप्रसन्न घोष किरायेदार बनकर रहते थे. सन् 1893 में केदारनाथ पाठक  इटावा चले गए. वहां इनकी मुलाकात प्रसिद्ध लेखक गदाधर सिंह से हुई. गदाधरसिंह की सहायता से इटावा में इन्हे गंगालहर के आफिस में नौकरी मिल गई. इस दौरान देवकीनंदन खत्री का उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’प्रकाशित होकर धूम मचा रहा था. सन् 1894 में केदारनाथ पाठक देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता’ की दिवानगी में इटावा छोड़कर काशी की तरफ चल दिए.                                                              (दो)    सन् 1893 में नागरी-प्रचारिणी सभा की स्थापना बनारस में होती है. नागरी-प्रचारिणी सभा ने सन् 1896 में हिन्दी  भाषा को अदालतों में लागू करने का प्रस्ताव ब्रिटिश हुकूमत को भेजने पर विचार किया जाता है. नागरी-प्रचारिणी सभा के सभापतियों ने यह तय किया कि पंडित मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार को ‘कोर्ट-केरेक्टर नागरी मेमोरियल  भेजा जाए. इस मेमोरियल पर जनता हिन्दी समर्थकों के हस्ताक्षर चाहिए थे. इस कार्य के लिए नागरी प्रचारिणी सभा को एक उपयुक्त व्यक्ति की तलाश थी. बाबू राधाकृष्ण दास ने केदारनाथ पाठक को इस काम के लिए उपयुक्त समझा. इस कठिन कार्य को पाठक जी ने अपने हाथ लेकर ‘कोर्ट-केरेक्टर नागरी मेमोरियल’पर दस्तखत करवाने के लिए निकल पड़े. आप कल्पना कर सकते हैं कि ब्रिटिश सरकार के चलते इस मेमोरियल पर दस्तखत करवाना केदारनाथ पाठक के लिय कितना कठिन कार्य रहा होगा. केदरारनाथ पाठक ‘हंस’ प 1931 में प्रकाशित अपने आत्मकथ्य मे लिखते हैं : ‘‘सन् 1896 में  काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से, एक  प्रार्थना-पत्र पश्चिमो त्तर प्रदेश (वर्तमान में संयुक्तप्रांत)की सरकार के पास, इस आशय से भेजने के  लिए कि – हम लोग सरकार से देवनागरी जारी करने की प्रार्थना करते है. एक डेपुटेशन, प्रजा का हस्ताक्षर करने के लिए, वर्ष तक इस प्रान्त  भर में पर्यटन करता रहा.” इस मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाने  जब पाठक जी कानपुर पहुंचे तो इनकी मुलाकात हिन्दी के प्रसिद्ध सेवक और मर्चेन्ट प्रेस के मालिक बाबू सीताराम से हुई. सन 1885 में बाबू सीताराम ने  ‘भारतोदय’नामक एक  दैनिक पत्र निकाला था. इधर, राधाकृष्ण दास भारतेन्दु की स्मृति में एक पत्र निकालना चाह रहे थे. वे काफी प्रयास के बाद पत्र नहीं निकाल सके. तब ‘भारतोदय’के संपादक बाबू सीताराम ने राधाकृष्ण दास को एक पत्र. लिखा था. पाठक जी इस पत्र का उल्लेख ‘हंस में प्रकाशित अपने आत्मकथ्य में करते हैं. वह पत्र इस प्रकार है,-                                                       21 अप्रैल 1885 प्रिय मित्र, कुछ देखा –सुना? भारतोदय का जन्म जन्माष्टमी ही को है. यह नित्यमेव प्रकाश करेगा,केवल रविवार को नहीं . लो बस, लेखनी को सुधारों, कागज को उठाओ. लेखों की मरामारी से नागरी की इस क्यारी में तुम भी न्यारी ही कर लो. यह चार यारों राधाकृष्ण,चरण,प्रताप और राम की–चारयारी है. इसे बांटो अपने मान के गट्टे खोलो. लिखो, कहा तक लिखोगे. प्रिय यदि आज्ञा हो, तो इस निसहाय हिन्दू को ही प्रथम भारतोदय में ही प्रकाशित कर डाले. आपका अभिन्न सीताराम इस पत्र में चरण-राधाचरण गोस्वामी ,प्रताप- पडित प्रतापनरायण मिश्र और राम- सीताराम है. यह पत्र इस बात की गवाही देता है कि उस दौर में हिन्दी के लिए लेखक कितने समर्पित थे.   केदारनाथ पाठक ब्रिटिश सरकार के जुल्मों की परवाह किए बगैर कानपुर, लखनऊ, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, इटावा, अलींगढ़, मेरठ, हरदोई, देहरादून, फैजाबाद आदि  इलाकों से मेमोरियल हस्ताक्षर प्राप्त कर नागरी प्रचारिणी के सभापतियों को सौंप दिया. बाबू श्यामसुन्दर दास अपनी आत्मकथा  ‘आत्मकहानी (1941 ) में केदारनाथ पाठक के योगदान के सम्बन्ध में लिखा है : ‘‘इस स्थान पर मैं पंडित केदारनाथ पाठक की सेवा का संक्षेप में उल्लेख करना चाहता हूं ये हिन्दी के बड़े पुराने भक्तों और सेवकों में थे. इन्होंने सभा के पुस्तकालय का कार्य अनेक वर्षो तक बड़ी लगन से किया है. ये सच्चे हृदय से सभा की शुभकामना करते थे. नागरी के आंदोलन के समय इन्होंने अनेक नगरों में घूमकर मेमोरियल पर सर्वसाधारण जनता के हस्ताक्षर प्राप्त किए थे और इस कार्य में उन्हें पुलिस की हिरासत में रहना पड़ा था. पाठक जी का परिचय बहुत से लेखकों से था. यदि वे अपने संस्मरण लिख जाते तो बड़े मनोरंजक होते.“   केदारनाथ पाठक ने नागरी प्रचारिणी सभा की बड़ी सेवा की थी. वे इसके प्रचार-प्रसार के लिए देश के भिन्न-भिन्न प्रांतों में जाकर नागरी प्रचारिणी सभा के कार्य के बारे में लोगों को बताते और हिन्दी पढ़ने के लिए लगातार लोगों को उत्साहित करते थे. केदारनाथ पाठक सभा का प्रचार करने के लिए जब बिहार पहुंचे वहां अयोध्यासिंह उपाध्याय के गुरु सुमेर सिंह इनकी हिन्दी सेवा से काफी प्रभावित हुए . शिवनंदन सहाय और गोपीकृष्ण को नागरी प्रचारिणी सभा का महत्व बताकर, केदारनाथ पाठक बांकीपुर  के प्रसिद्ध विद्वान काशीप्रसाद जायसवाल को हिन्दी साहित्य की …

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इरफ़ान मरते हैं, कलाकार इरफ़ान कभी नहीं मरते

इरफ़ान खान के समय निधन ने सबको आहत किया है। यह छोटी सी मार्मिक टिप्पणी लेखक और राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम की पढ़िए। यह राजकमल द्वारा व्हाटसऐप पर भेजी जा रही ‘पाठ पुनर्पाठ’ ऋंखला की 12 वीं कड़ी का हिस्सा है– ======================= जाने वाले, तुझे सलाम! …

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