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आयाम : साहित्यिक आयोजन है या गुटबाजी का एक मंच

पटना में ‘आयाम’ संस्था के बैनर तले स्त्री लेखन का एक अच्छा आयोजन हुआ। इस आयोजन का आँखों देखा हाल सुना रहे हैं  युवा लेखक सुशील कुमार भारद्वाज– ================== बिहार की साहित्यिक संस्था “आयाम” का दूसरा वर्षगांठ जेडी विमेंस कॉलेज, पटना के भव्य सभागार में तिलक एवं अक्षत के साथ …

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बिना मेकअप की सेल्फ़ियाँ: एक ज़रूरी हस्तक्षेप

सुबह सुबह उठा तो एक जबर्दस्ती की लेखिका का फेसबुक स्टेटस पढ़ा जिसमें उन्होने निंदा की थी कि नेचुरल सेलफ़ी जैसे अभियान सोशल मीडिया के चोंचले होते हैं। हालांकि पढ़ते हुए समझ में आ गया कि भीड़ का हिस्सा न बनकर उससे अलग दिखना भी सोशल मीडिया का ही एक …

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किसी को चाहते जाना क्या इंक़लाब नहीं?

आज पेश है ज़ीस्त की एक नज़्म, जिसका उनवान है ‘इंक़लाब’ – संपादक ======================================================= मुझसे इस वास्ते ख़फ़ा हैं हमसुख़न मेरे मैंने क्यों अपने क़लम से न लहू बरसाया मैंने क्यों नाज़ुक-ओ-नर्म-ओ-गुदाज़ गीत लिखे क्यों नहीं एक भी शोला कहीं पे भड़काया मैंने क्यों ये कहा कि अम्न भी हो सकता …

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खुशी हमारा अंदरूनी भाव होता है- उसे पहचानें

आज ‘दैनिक भास्कर’ के सभी संस्करणों में मेरा यह लेख आया है- प्रभात रंजन ========================================= खुशी का मतलब बड़ी-बड़ी भौतिक उपलब्धियां पाना नहीं होता है। हालांकि हमारे समाज की यह कड़वी सच्चाई है कि हम इंसान का आकलन उसकी उपलब्धियों के आधार पर करते हैं। इससे समाज में हमारी पहचान …

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प्रकृति करगेती की कुछ कहाविताएं

युवा लेखिका प्रकृति करगेती लेखन में नए नए प्रयोग करती हैं। कहाविता ऐसा ही एक प्रयोग है। आज उनकी कुछ कहाविताएं पढ़िये- मौडरेटर ==============       चेकमेट लड़का और लड़की, शतरंज के खेल में मिले। लड़का, दिलोदिमाग हारता गया। लड़की खेलती गयी। खेलते खेलते लड़का मारा गया। लड़की ने आंखिरी …

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सौम्या बैजल की कविताएं

सौम्या बैजल की कवितायें-कहानियाँ जानकी पुल पर कुछ वर्षों से समय समय पर आती रही हैं। अच्छा यह लगता है कि उन्होने लगातार अपने लेखन-कौशल को परिष्कृत किया है। इन दो कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा महसूस हुआ- ========================================= चोट  देखो छिली खाल, दर्द हुआ? यह लाल पानी, जिसका एक …

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राकेश शंकर भारती की कहानी ‘रंडियों का दल्ला’

राकेश शंकर भारती की कुछ कहानियों ने इधर मेरा ध्यान खींचा है। जेएनयू से पढ़ाई करने के बाद आजकल वे यूक्रेन में रहते हैं। उनकी इस कहानी को पढ़कर मुझे राजकमल चौधरी की याद आ गई। उनकी कहानी ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ का परिवेश भी यही था लेकिन …

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जापानी फिल्म ‘इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस’ पर श्री का लेख

मुक्त जुनून कामनाओं के सब द्वार खोलता है या कि शांत और अबोधगम्य आकाश के खालीपन में खुद को रिक्त कर देता है? – इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस इन द रियल्म ऑफ़ द सेन्सेस नागिसा ओसीमा के निर्देशन में बनी 1976 में प्रदर्शित हुई एक विवादास्पद जापानी फिल्म …

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आदमी की निगाह औरत को क्या बनाती है?

युवा आलोचक वैभव सिह का यह लेख पढ़ने और चर्चा करने के योग्य है। उनके लगभग हर लेख की तरह सुचिन्तित और गहरी वैचारिकता से परिपूर्ण- मॉडरेटर ===================== भारतीय उपमहाद्वीप में स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में खुलकर बात करने की मनाही नहीं है, पर आज भी इसे एक ‘संदिग्ध …

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राजेश प्रधान की कविता ‘कुछ ऐसी भी बातें होती हैं’

मुझे सबसे सच्चे कवि वे लगते हैं जो अपने मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कवितायें लिखते हैं। जैसे राजेश प्रधान जी। अमेरिका के बोस्टन में रहते हैं। वास्तुकार हैं, राजनीति विज्ञानी हैं। लता मंगेशकर के गीत ‘कुछ ऐसी बातें होती हैं’ को सुनते हुए एक बड़ी प्यारी कविता …

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