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फिल्म समीक्षा

सोशल मीडिया की असलियत बताने वाली फ़िल्म है ‘द सोशल डिलेमा’

प्रज्ञा मिश्रा ब्रिटेन में रहती हैं और समय-समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर जानकी पुल पर नियमित लिखती हैं। उनकी यह टिप्पणी जेफ़ ओरलोवसकी निर्देशित डोक्यूड्रामा ‘सोशल डिलेमा’ पर है। आप भी पढ़िए- ============= पिछले कुछ सालों में न जाने कितनी बार यह बात कही और सुनी गयी है कि …

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‘द होली फ़िश’: विस्थापन के बीच अकेली स्त्री का शोकगीत

पिछले दिनों एक ओटीटी मंच पर विमलचंद्र पाण्डेय की फ़िल्म ‘द होली फ़िश’ रिलीज़ हुई, जिसका पता इस लेख में दिया गया है। उसी फ़िल्म पर युवा लेखक जितेंद्र विसारिया ने एक विस्तृत लेख लिखा है। आप भी पढ़ सकते है – ======================== 2004 में वागर्थ का अक्टूबर में नवलेखन …

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हमारा सिनेमा और कहानियाँ बदल रही हैं

हाल में ओटीटी प्लेटफ़ोर्म पर प्रदर्शित कुछ फ़िल्मों, वेब सीरिज़ को लेकर यह लेख लिखा है भूमिका सोनी ने।  भूमिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स में पढ़ाई करने के बाद एक बहुराष्ट्रीय बैंक में काम करती हैं और अलग अलग विषयों पर लिखती रहती हैं- ============= भारतीय सिनेमा में हीरो होना अलग …

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समाप्ति: सेल्यूलाइड पर विशुद्ध जादुई यात्रा

सत्यजित राय की फ़िल्म पर यह लेख मूल रूप से अंग्रेज़ी में सत्य चैतन्य ने लिखा है जिसका हिंदी अनुवाद विजय शर्मा ने किया है। आप भी पढ़िए- ============================= जब मैंने सत्यजित राय की ‘तीन कन्या’ की अंतिम फ़िल्म ‘समाप्ति’ देखी तब तक मैंने पहली दोनों मूवी नहीं देखी थी …

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समकालीन सिनेमा की दुनिया में हाशिए की जिंदगी

युवा शोधकर्ता आशीष कुमार ने एक अच्छा लेख लिखा है जिसमें उन्होंने यह देखने की कोशिश की है कि हाल की फ़िल्मों में हाशिए के जीवन का चित्रण किस तरह किया गया है। पढ़ने लायक़ लेख है- ================================ मुक्ति कृपा से प्राप्त वस्तु नहीं है। वह यथास्थिति को तोड़ती है। …

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मॉइग्रेंट्स : दृश्य नहीं, अदृश्य में दिखती बेबसी की नियति

जाने-माने लेखक, शायर संजय मासूम ने माइग्रेंट्स नाम से एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई है। उसी पर यह टिप्पणी पढ़िए कवि -कला समीक्षक राकेश श्रीमाल की- ==========================  लाकडाउन का लम्बा चला दौर, जो व्यक्ति और अंततः समाज की सुरक्षा के लिए था, एक बड़े वर्ग के लिए महामारी के बरक्स एक …

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श्रीराम डाल्टन की फ़िल्म ‘स्प्रिंग थंडर’ पर गीताश्री की टिप्पणी

श्रीराम डाल्टन ऐक्टिविस्ट फ़िल्ममेकर रहे हैं। उनकी फ़िल्म ‘स्प्रिंग थंडर पर यह टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ लेखिका गीताश्री ने। गीता जी पहले भी फ़िल्मों पर लिखती रही हैं। आउटलुक में उनके लिखे कई लेख मुझे आज भी याद है। कल ‘आर्या’ देखते हुए मुझे गीताश्री की सुष्मिता सेन के साथ बातचीत …

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    अखोनी- दिल्ली में पूर्वोत्तर की गाढ़ी खुशबू वाली फिल्म

12 जनवरी को नेटफ़्लिक्स पर एक फ़िल्म रिलीज हुई ‘अखोनी’। यह फ़िल्म एक संवेदनशील और अछूते विषय पर है, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ उत्तर भारत में बर्ताव पर। इस फ़िल्म की समीक्षा लिखी है प्रीति प्रकाश ने। प्रीति असम के तेज़पुर विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में पीएचडी कर रही …

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सत्यजित राय की जयंती पर उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ की याद

आज महान फ़िल्मकार सत्यजित राय की जयंती है। आज से उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आरम्भ हो रहा है। उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ के बहाने उनको याद किया है विजय शर्मा जी ने- मॉडरेटर =================== आज महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित राय का जन्मदिन है। आज से उनकी जन्म शताब्दी भी प्रारंभ …

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एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड: स्मृति वन में भटकते मन की कथा-फ़िल्म

सुदीप्ति जब फ़िल्मों पर लिखती हैं तो वह इतना परिपूर्ण होता है कि अपने आपमें स्वतंत्र कलाकृति के समान लगता है। जैसे ‘एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड’ पर लिखते हुए मानव जीवन में स्मृतियों के महत्व के ऊपर एक सुंदर टिप्पणी की है। इसको पढ़ने के बाद आपको फ़िल्म …

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