Home / फिल्म समीक्षा

फिल्म समीक्षा

समकालीन सिनेमा की दुनिया में हाशिए की जिंदगी

युवा शोधकर्ता आशीष कुमार ने एक अच्छा लेख लिखा है जिसमें उन्होंने यह देखने की कोशिश की है कि हाल की फ़िल्मों में हाशिए के जीवन का चित्रण किस तरह किया गया है। पढ़ने लायक़ लेख है- ================================ मुक्ति कृपा से प्राप्त वस्तु नहीं है। वह यथास्थिति को तोड़ती है। …

Read More »

मॉइग्रेंट्स : दृश्य नहीं, अदृश्य में दिखती बेबसी की नियति

जाने-माने लेखक, शायर संजय मासूम ने माइग्रेंट्स नाम से एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई है। उसी पर यह टिप्पणी पढ़िए कवि -कला समीक्षक राकेश श्रीमाल की- ==========================  लाकडाउन का लम्बा चला दौर, जो व्यक्ति और अंततः समाज की सुरक्षा के लिए था, एक बड़े वर्ग के लिए महामारी के बरक्स एक …

Read More »

श्रीराम डाल्टन की फ़िल्म ‘स्प्रिंग थंडर’ पर गीताश्री की टिप्पणी

श्रीराम डाल्टन ऐक्टिविस्ट फ़िल्ममेकर रहे हैं। उनकी फ़िल्म ‘स्प्रिंग थंडर पर यह टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ लेखिका गीताश्री ने। गीता जी पहले भी फ़िल्मों पर लिखती रही हैं। आउटलुक में उनके लिखे कई लेख मुझे आज भी याद है। कल ‘आर्या’ देखते हुए मुझे गीताश्री की सुष्मिता सेन के साथ बातचीत …

Read More »

    अखोनी- दिल्ली में पूर्वोत्तर की गाढ़ी खुशबू वाली फिल्म

12 जनवरी को नेटफ़्लिक्स पर एक फ़िल्म रिलीज हुई ‘अखोनी’। यह फ़िल्म एक संवेदनशील और अछूते विषय पर है, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ उत्तर भारत में बर्ताव पर। इस फ़िल्म की समीक्षा लिखी है प्रीति प्रकाश ने। प्रीति असम के तेज़पुर विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में पीएचडी कर रही …

Read More »

सत्यजित राय की जयंती पर उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ की याद

आज महान फ़िल्मकार सत्यजित राय की जयंती है। आज से उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आरम्भ हो रहा है। उनकी फ़िल्म ‘पोस्टमास्टर’ के बहाने उनको याद किया है विजय शर्मा जी ने- मॉडरेटर =================== आज महान फ़िल्म निर्देशक सत्यजित राय का जन्मदिन है। आज से उनकी जन्म शताब्दी भी प्रारंभ …

Read More »

एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड: स्मृति वन में भटकते मन की कथा-फ़िल्म

सुदीप्ति जब फ़िल्मों पर लिखती हैं तो वह इतना परिपूर्ण होता है कि अपने आपमें स्वतंत्र कलाकृति के समान लगता है। जैसे ‘एटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड’ पर लिखते हुए मानव जीवन में स्मृतियों के महत्व के ऊपर एक सुंदर टिप्पणी की है। इसको पढ़ने के बाद आपको फ़िल्म …

Read More »

जेंडर डिस्कोर्स में अंततः पुरुष ही हीरो बनता है

अनुभव सिन्हा की फ़िल्म ‘थप्पड़’ पर यह सुविचारित टिप्पणी लिखी है युवा लेखक-पत्रकार फ़िरोज़ खान ने- =================== हिंदी में हम जिस तरह का सिनेमा देखते रहे हैं, उसमें सांप्रदायिकता पर भी बात हुई है, जाति पर भी और जेंडर पर भी। सांप्रदायिकता और जाति पर काफी फिल्में हैं। कुछ बहुत …

Read More »

सिनेमा की बदलती ज़मीन : भविष्य का सिनेमा:मिहिर पंड्या

मिहिर पांड्या सिनेमा पर जो लिखते बोलते हैं उससे उनकी उम्र की तरफ़ ध्यान नहीं जाता। हिंदी में इस विधा का उन्होंने पुनराविष्कार किया है। यह बात अलग से रेखांकित करनी पड़ती है कि वे 40 साल से कम उम्र के युवा हैं। 28 फ़रवरी को राजकमल प्रकाशन स्थापना दिवस …

Read More »

‘एसिड पहले दिमाग में घुलता है तभी तो हाथ में आता है’

छपाक एक ऐसी फ़िल्म है जिसको गम्भीर लोगों ने अपने विषय के लिए पसंद किया। हर फ़िल्म व्यवसायिक सफलता-असफलता के लिए बनाई नहीं जाती है बल्कि कुछ फ़िल्मों के निर्माण के पीछे वजह होती है किसी बड़ी समस्या के ऊपर ध्यान आकर्षित करना। ‘एसिड अटैक’ ऐसी ही एक गम्भीर बुराई …

Read More »

चुन-चुन खाइयो मांस: आमिस  

असमिया भाषा की फ़िल्म ‘आमिस’ पर यह टिप्पणी युवा लेखक-पत्रकार अरविंद दास ने लिखी है- मॉडरेटर ============== एक बार मैं एक दोस्त के साथ खाना खा रहा था. अचानक से दाल की कटोरी से उसने झपटा मार के कुछ उठाया और मुँह में डाल लिया. जब तक मैं कुछ समझता, हँसते …

Read More »