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फिल्म समीक्षा

जेंडर डिस्कोर्स में अंततः पुरुष ही हीरो बनता है

अनुभव सिन्हा की फ़िल्म ‘थप्पड़’ पर यह सुविचारित टिप्पणी लिखी है युवा लेखक-पत्रकार फ़िरोज़ खान ने- =================== हिंदी में हम जिस तरह का सिनेमा देखते रहे हैं, उसमें सांप्रदायिकता पर भी बात हुई है, जाति पर भी और जेंडर पर भी। सांप्रदायिकता और जाति पर काफी फिल्में हैं। कुछ बहुत …

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सिनेमा की बदलती ज़मीन : भविष्य का सिनेमा:मिहिर पंड्या

मिहिर पांड्या सिनेमा पर जो लिखते बोलते हैं उससे उनकी उम्र की तरफ़ ध्यान नहीं जाता। हिंदी में इस विधा का उन्होंने पुनराविष्कार किया है। यह बात अलग से रेखांकित करनी पड़ती है कि वे 40 साल से कम उम्र के युवा हैं। 28 फ़रवरी को राजकमल प्रकाशन स्थापना दिवस …

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‘एसिड पहले दिमाग में घुलता है तभी तो हाथ में आता है’

छपाक एक ऐसी फ़िल्म है जिसको गम्भीर लोगों ने अपने विषय के लिए पसंद किया। हर फ़िल्म व्यवसायिक सफलता-असफलता के लिए बनाई नहीं जाती है बल्कि कुछ फ़िल्मों के निर्माण के पीछे वजह होती है किसी बड़ी समस्या के ऊपर ध्यान आकर्षित करना। ‘एसिड अटैक’ ऐसी ही एक गम्भीर बुराई …

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चुन-चुन खाइयो मांस: आमिस  

असमिया भाषा की फ़िल्म ‘आमिस’ पर यह टिप्पणी युवा लेखक-पत्रकार अरविंद दास ने लिखी है- मॉडरेटर ============== एक बार मैं एक दोस्त के साथ खाना खा रहा था. अचानक से दाल की कटोरी से उसने झपटा मार के कुछ उठाया और मुँह में डाल लिया. जब तक मैं कुछ समझता, हँसते …

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रितुपर्णो घोष की फ़िल्म ‘शुभो मुहूर्त’ पर विजय शर्मा का लेख

रितुपर्णो घोष की फ़िल्में उपन्यास की तरह होती हैं। किसी क्लासिक उपन्यास की तरह बार बार थोड़ा-बहुत देखने लायक़। ‘शुभो मुहूर्त’ तो अगाथा क्रिश्टी के उपन्यास पर आधारित है और रितुपर्णो द्वारा निर्देशित एकमात्र मर्डर मिस्ट्री है। इस फ़िल्म पर विजय शर्मा का लेख पढ़िए। यह उनकी आगामी किताब का …

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ड्रीम गर्ल- कहानी भीड़ में तन्हा होने की

हाल में ही रिलीज़ हुई फ़िल्म ड्रीम गर्ल की समीक्षा लिखी है निवेदिता सिंह ने- ====================================== इस फ़िल्म को देखने से पहले जब भी किसी के मुँह से ड्रीम गर्ल के बारे में सुनती थी तो हेमा मालिनी का खूबसूरत से चेहरा खुद-ब-खुद आँखों के सामने तैर जाता था पर …

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शिक्षा के नज़रिए से फ़िल्म’सुपर थर्टी’ का एक विश्लेषण

‘सुपर थर्टी’ फ़िल्म का शिक्षा की दृष्टि से बहुत अच्छा विश्लेषण किया है शिक्षा एवं भाषाशास्त्र के विशेषज्ञ कौशलेंद्र प्रपन्न ने- मॉडरेटर ================================================ संघर्ष व दुख जिन्हें मांजती है उन्हें आनंद कुमार बना देती है। यही एक पंक्ति कही जा सकती है जिसमें आनंद कुमार की पूरी संघर्ष यात्रा को …

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कबीर सिंह एब्‍नॉर्मल और एक्‍स्‍ट्रा नाॅॅर्मल है, उसे न्‍यू नॉर्मल न बनाएं

कबीर सिंह फ़िल्म जब से आई है तबसे चर्चा और विवादों में है। इस फ़िल्म पर एक टिप्पणी लेखक, कोच। पॉलिसी विशेषज्ञ पांडेय राकेश ने लिखी है- मॉडरेटर ================= कबीर सिंह एक व्यक्तित्व विकार से पीडि़त पात्र की कहानी है, साथ- ही मर्दवादी समाज में मिसोजिनि यानि स्‍त्री द्वेष के …

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‘ऐवेंजर्स एंडगेम’ एक पल हँसाती है दूसरे पल भावुक कर जाती है

फ़िल्म ‘ऐवेंजर्स एंडगेम’ पर फ़िल्म समीक्षक सैयद एस॰ तौहीद की टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर ============================================= लंबे इंतजार के बाद भारत में ‘एवेंजर्स इंडगेम’ रिलीज हो चुकी है । हिंदी अंग्रेजी के अलावा तमिल और तेलुगू में भी रिलीज हुई है। फिल्म का इंतजार इसलिए भी था क्योंकि ये एवेंजर्स सीरिज की …

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‘अवेंजर्स एंडगेम’ फ़िल्म नहीं फिनौमिना है!

फ़िल्म अवेंजर्स एंडगेम पर विमलेश शर्मा की टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर ================================== हाँ तो Avengers Endgame की बात कर रहे हैं हम यहाँ जिसे देखना मेरे लिए काफ़ी Adventurous था… इसे देखने से  पहले इतनी हिदायतें दी गई कि मुझे याद नहीं कभी माँ होते हुए मैंने पुत्तर जी को उतनी …

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