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हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है!

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘पंचलैट’ पर बनी फ़िल्म के ऊपर यह टिप्पणी की है साक़िब अहमद ने। साक़िब किशनगंज में रहते हैं और पुस्तकालय अभियान से जुड़े हैं। आप भी पढ़ सकते हैं- ====================== (पंचलैट के सिनेमाई प्रस्तुतिकरण की मुश्किलें और दुश्वारियां) क्या हर रचनात्मकता को कलात्मकता मान लेना चाहिए? …

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कला-राग की आभा: रस निरंजन

राजेश कुमार व्यास की किताब ‘रस निरंजन’ समकालीन कला पर लिखे निबंधों का संग्रह है। इस किताब पर यह विस्तृत टिप्पणी लिखी है चंद्र कुमार ने। चंद्र कुमार ने कॉर्नेल विश्वविद्यालय, न्यूयार्क से पढ़ाई की। वे आजकल एक निजी साफ्टवेयर कंपनी में निदेशक है लेकिन उनका पहला प्यार सम-सामयिक विषयों …

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 द्विज सामंती व्यवस्था का चित्रण है ‘शोले’

दलित लेखक-आलोचक कैलाश दहिया ने ‘शोले’ फ़िल्म की समीक्षा एक अलग ही नज़रिए से की है। आप भी पढ़िए- ================= ‘शोले’ फिल्म भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में माइलस्टोन मानी जाती है। फिल्म का एक-एक सीन-डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा मिलता है। इसे इस फिल्म के लेखकों समेत निर्देशकों …

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