Recent Posts

‘रसीदी टिकट’ के बहाने अमृता को जैसा जाना मैंने!

कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं हिन्हें पढ़ते हुए हर दौर का पाठक उससे निजी रूप से जुड़ाव महसूस करते हुए भावनाओं में बह जाता है। प्रत्येक पाठक उस रचना का अपना पाठ करता है। ऐसी ही एक कृति है अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’, इसका पाठ किया है निधि …

Read More »

नियति का अर्थ है पैतृकता की पहचान

   कैलाश दहिया आजीवक विचारक हैं और अपने इस लेख में उन्होंने नियति के सिद्धांत पर विचार करते हुए धर्मों में स्थापित भाग्यवाद की तार्किक आलोचना की है। एक ज्ञानवर्धक लेख पढ़ा इसलिए साझा कर रहा हूँ- जानकी पुल। ==================== भारतीय चिंतन जगत में ‘जन्म’ को ले कर बड़ी बहस …

Read More »

बेगम समरु और दिल्ली का इतिहास

हाल में राजगोपाल सिंह वर्मा की किताब आई ‘बेगम समरु का सच’। संवाद प्रकाशन से आई यह किताब तथ्यात्मक इतिहास नहीं है बल्कि औपन्यासिक शैली में लिखा गया उस युग का जीवंत कथानक है। इस पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ल ने लिखी है। आप भी पढ़ सकते हैं- …

Read More »